राजस्थान की चित्रकला ( Rajasthani painting )

– ब्राउन महोदय ने राजस्थान की चित्रकला को ‘राजपुत कला’ कहा।

– H.C. मेहता – ‘हिन्दू शैली’ 

– आनन्द कुमार स्वामी ने 1916 में लिखी अपनी पुस्तक ‘Rajput Paintings’ में राजस्थान की चित्रकला को राजपूत चित्र शैली कहा तथा इस राजपूत चित्र शैली में पहाड़ी शैली (हिमाचल प्रदेश) को भी शामिल कर लिया। 

– रामकृष्ण दास- राजस्थानी चित्रकला 

– मेवाड़ को राजस्थानी चित्रकला की जन्मभूमि कहा जाता हैं। 

– राजस्थान के सबसे प्राचीन चित्र जैसलमेर के जिनभद्र सूरी भंडार में संग्रहीत हैं। 

– मुख्य प्राचनी चित्र:(1) ओद्य नियुक्ति वृत्ति (2) दस वैकालिक सूत्र चूर्णि – जैन ग्रन्थ 

Note- जैनों ने सबसे पहलेकागज पर चित्र तथा क्षेत्रीय भाषा में लिखना शुरू किया। 

– भौगौलिक व सांस्कृतिक आधार पर राजस्थान की चित्रकला को 4 भागों में बांटा जाता हैं। 

(1) मेवाड़ शैली- चावण्ड, देवगढ़, नाथद्वारा 

(2) मारवाड़ शैली- जाधेपुर, बीकानेर, किशनगढ़, अजमेर, नागौर, जैसलमेर 

(3) ढुंढाड़ शैली- जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी 

(4) हाड़ौती शैली- कोटा, बूंदी

(1) मेवाड़ शैली:

1260 ई. में रावल तेजसिंह के समय आहड में ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि’ नामक ग्रंथ चित्रित किया गया। 

– 1423 ई. में मोकल के समय देलवाडा में ‘सुपार्श्वनाथ चरित्र’ नामक ग्रंथ चित्रित किया गया। 

– महाराणा कुम्भा ने भी मेवाड़ की चित्रकला में अपना योगदान दिया था। 

– महाराणा प्रताप के समय चावण्ड से मेवाड़ की चित्रकला शैली का स्वतंत्र विकास प्रारम्भ होता हैं। 

– इस समय ढोला-मारू का चित्र चित्रित किया गया, जो वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में रखा हुआ हैं। 

– महाराणा अमरसिंह के समय इस चित्रकला शैली का विकास अग्रसर होता हैं। नासिरद्दीन नामक एक चित्रकार ने ‘रागमाला’ का चित्रण किया। 

– इसके बाद बारहमासा का चित्रण किया गया। 

– महाराणा जगतसिंह के समय को मेवाड़ की चित्रकला का स्वर्णकाल कहते हैं। 

– जगतसिंह ने ‘चितेरो की ओबरी’ का निर्माण करवाया। चितेरी की ओबरी को ‘तस्वीरां रो कारखानों’ भी कहते हैं।

– जगतसिंह के समय साहिबदीन नामक एक चित्रकार ने महाराणाओं के व्यक्तिगत चित्र बनाए। 

– महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के समय कलीला-दमना व मुल्ला दो प्याजा के लतीफे ग्रन्थों के चित्र चित्रित किए। 

– महाराणा जगतसिंह द्वितीय के समय नुरूद्दीन नामक चित्रकार ने जगतसिंह द्वितीय का चित्र बनाया। 

– इस शैलीह में शिकार के दृश्यों की चित्रकारी में त्रि-आयामी प्रभाव दिखायी देता हैं। 

– मनोहर व कृपाराम इस शैली के अन्य चित्रकार थे। 

– कदम्ब वृक्ष का अधिक चित्रण किया गया हैं।

– 1680 ई. में महाराणा जयसिंह ने द्वारिकादास चूंडावत को देवगढ़ ठिकाणा दिया था। 

– यहीं से चित्रकला की देवगढ़ शैली प्रारम्भ होती हैं। 

– देवगढ़ शैली में मोड मारवाड व आमरे तीनों शैलियों का प्रभाव दिखायी देता हैं। 

– श्रीधर अंघारे ने इस शैली को प्रकाश में लाने का काम किया। 

– देवगढ़ शैली में अघारा की ओबरी व मोतीमहल के भित्ति चित्र देवगढ़ शैली के प्रमुख आहरण हैं। 

– हरे व पीले रंगों का अधिक प्रयोग किया गया हैं।

नाथद्वारा:

– पिछवाई चित्रण नाथद्वारा शैली की मौलिक विशेषता हैं। 

– केले के वृक्षों की प्रधानता हैं।

मारवाड शैली:जोधपुर

– मालदेव के समय यह चित्र शैली प्रारम्भ हुई। 

– चोखेला महल में भित्ति चित्र बनाए गए। (राम-रावण युद्ध के दृश्य) 

– उतराध्ययन सूत्र नामक ग्रन्थ चित्रित किया गया। 

– महाराजा सूरसिंह के समय ढोला-मारू व भागवत पुराण चित्रित किए गए। 

– 1623 ई. में वीरजी (विठ्ठलदास चाम्पावत) ने ‘रागमाला’ का चित्रण किया। 

– महाराजा जसवंतसिंह के समय चित्रकला में मुगल प्रभाव आ गया था। 

– इस समय कृष्ण लीलाओं के चित्र अधिक चित्रित किए गए। 

– मानसिंह के समय नाथों का प्रभाव अधिक था, अतः शैव सम्प्रदाय से सम्बन्धि चित्र अधिक चित्रित हुए। 

– पुस्तकें:- नाथ चरित्र, शिव पुराण, दुर्गा चरित्र 

– महाराजा तख्तसिंह के समय यूरोपीय प्राव आ जाता हैं। 

– K. K. MULER नामक एक चित्रकार ने दुर्गादास राठौड़ का घोड़े पर बैठकर भाले से रोटी सेंकते हुए चित्र बनाया हैं। 

– “चौबीस घड़ी, आठ पहर, घुडले ऊपर वास। सेल अणी सुं सेकतो, बाटी दुर्गादास” 

– जोधपुर शैली में प्रेम कहानियां अधिक चित्रित की गयी। – जैसे – ढोला मारू, महेन्द्र-मुमल, वीरमदेव सोनगरा आदि। – इन शैली में बादलों का अधिक चित्रण किया गया। 

– लाल व पीले रंगों का अधिक प्रयोग हुआ हैं। 

– हासिये में भी पीले रंग का अधिक प्रयोग हुआ हैं।

बीकानेर शैली – महाराजा रायसिंह के समय प्रारम्भ हुई भागवत पुराण विचित्र करवाया गया। 

– महाराजा अनूपसिंह का समय चित्रकला शैली का स्वर्णकाल कहा जाता हैं। 

उस्ता कला:- महाराजा अनूपसिंह लाहौर से अली रजा, रूक्नुद्दीन नामक दो कलाकारों को लेकर आए, जिन्होनें बीकानेर में उस्ता कला प्रारम्भ की। 

– उस्ता कला में ऊंट की खाल पर सोने की चित्रकारी की जाती हैं। 

– हिसामुद्दीन उस्ता को इसके लिए पद्म श्री मिल चुका हैं। 

– बीकानेर के ‘कैमल हाईड ट्रेनिगं सेन्टर’ में उस्ता कला सिखायी जाती हैं।

मथेरणा कलाः

जैनों की एक उपजाति 

– गीले प्लास्टर पर चित्र बनाए जाते हैं 

– इसे फ्रेस्को कहते हैं। 

– इसे अराथरा भी कहते हैं। 

– शेखावाटी क्षेत्र में पणा कहा जाता हैं। 

– बीकानेर की चित्र कला शैली में पंजाबी, दक्कनी व मुगल तीनों प्रभाव दिखायी देते हैं। 

– बीकानेर शैली की प्रमुख विशेषता मुस्लिम चित्रकारों द्वारा हिन्दू पौराणिक चित्रों का अंकन किया जाना हैं। 

– “तेरा सारा जहर उतर जाएगा, दो दिन मेरे शहर में रह कर तो देख” 

– बीकानेर के चित्रकार चित्र के साथ अपना नाम व तिथि अंकित करते थे।

किशनगढ़ शैली:

– ‘फैयाज अली व एरिक डिक्सन’ इस शैली को प्रकाश में लाए। 

– महाराजा सावन्तसिंह का समय किशनगढ़ शैली का स्वर्णकाल कहा जाता हैं। 

– वल्लभ सम्प्रदाय का प्रीव अधिक होने के कारण कृष्ण 

– लीलाओं का चित्रण करवाया। 

– इसी रसिक बिहारी की तस्वीर को बणी-ठणी कहा जाता हैं, जिसका चित्रकार ‘मोरध्वज निहालचन्द’ था। – एरिक डिक्सन ने इसे ‘भारत की मोनालिसा’ कहा हैं। 

– एक दूसरा प्रमुख चित्र चांदनी रात की गोष्ठी हैं जिसका चित्रकार अमीरचन्द था। 

– किशनगढ़ शैली में कांगड़ा शैली का प्रभाव अधिक दिखायी देता हैं। 

– नारी सौन्दर्य का अधिक चित्रण हुआ हैं। 

– नारी पात्रों के नाक में बाली इस शैली की प्रमुख विशेषता हैं

अजमेर शैली:

– साहिबा नामक एक महिला चित्रकर का नाम मिलता हैं।

नागौर शैली:

– इस शैली में बुझे हुए रंगों का अधिक प्रयोग किया जाता था। 

– पारदर्शी वेशभूषा इस शैली की विशेषता हैं।

जैसलमेर:

– मूमल का चित्रण अधिक हुआ हैं। 

– जैसलमेर के चित्रों पर किसी अन्य शैली का प्रभाव नजर नहीं आता हैं।

बणी-ठणी पर 1973 में डाक-टिकट जारी किया गया।

ढुंढाढ शैली:- ढुंढाढ

जयपुरः

मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव दिशखायी देता हैं। 

– महाराजा मानसिंह के समय यशोदा का चित्र बनाया गया।

– मिर्जा राजा जयसिंह ने – बिहारी सतसई , कृष्ण रूक्मणि, गीत गोविन्द, आदि के चित्र अपनी रानी चन्द्रावती

के लिए बनवाए। 

– सवाई जयसिंह ने आमरे में सूरतखाने की स्थापना की। 

– महाराजा ईश्वरीसिंह के समय साहिबराम नामक एक चित्रकार ने आदमकद चित्र बनाए। 

– माधोसिंह के समय भित्ति चित्र अधिक बनाए गए। 

– ‘पुण्डरीक हवेली’ के भित्ति चित्र प्रमख हैं। 

– प्रतापसिंह का समय जयपुर चित्रकला शैली का स्वर्णकाल था। 

– इस समय लालचंद नामक एक चित्रकार ने पशुओं की लड़ाई के दृश्य बनाए। 

– विशेषताएं :- आदमकद चित्रण, भितिचित्रण, उद्यान चित्रण, हाथियों का चित्रण

अलवर शैली:

– महाराजा विनयसिंह का समय अलवर शैली का स्वर्ण काल था। 

– बलदेव नामक एक चित्रकार ने शेखवादी की पुस्तक ‘गुलिस्ता’ का चित्रण किया। 

– अलवर शैली में वेश्याओं के चित्र सर्वाधिक बनाए गए। 

– महाराजा शिवदान सिंह के समय ‘कामशास्त्र’ का चित्रण हुआ। 

– मूलचन्द नामक एक चित्रकार हाथीदांत पर चित्रकारी करता था। 

– विशेषता:- लघु चित्रणा, योगासन के चित्र, हासिये में बेल – बूटों का प्रयोग। 

– राजगढ़ के महलों में शशमहल का चित्रण राव बख्तावरसिंह के द्वारा करवाया गया, यहीं से चित्रकला की अलवर शैली का विकास हुआ।

उणियारा शैली:- (टोंक) 

– कछवाओं की ‘नरूका शाखा’ का प्रमुख ठिकाणा। 

– यहां ढुंढाढ़ व बूंदी शैली का प्रभाव/तमन्वय देखने को मिलता हैं। 

– चित्रकार – धीमा, भीम, मीरबख्श, काशी, राम लखन

शेखावाटी शैली:

– भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध।

– कम्पनी शैली का प्रभाव अधिक दिखायी देता हैं। 

– नीले व हरे रंगों का अधिक प्रयोग किया गया। 

– उदयपुरवाटी में जोगीदास की छतरी भित्ति चित्रों को लिए प्रसिद्ध हैं। इन भित्ति चित्रों का चित्रकार ‘देवा’ था। 

– पतेहपुर की गोयनका हवेली के भित्ति चित्र भी आकर्षक हैं।

हाडौती शैली:बूंदी:

राव सुरजन के समय यह शैली प्रारम्भ हुई थी। 

– राव रतनसिंह के समय दीपक व भैरवी राग पर चित्र बनाये गये। 

– शत्रुसाल के समय रंगमहल का निर्माण करवाया गया जो भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। 

– उम्मेदसिंह का समय बूंदी चित्रकला शैली का स्वर्ण काला कहा जाता हैं। इन्होंने बूंदी के किले में चित्रशाला का निर्माण करवाया, जिसे भिति चित्रों का स्वर्ग कहते हैं।

विशेषताः- पशु-पक्षी व प्रकृति चित्रण। 

– मेवाड़ शैली का अधिक प्रभाव दिखायी देता हैं।

कोटाः– महाराव रामसिंह के समय शुरू हुयी थी। 

– भीमसिंह के समय कृष्ण लीलाओं का अधिक अंकन हुआ हैं। 

– उम्मदेसिंह का समय कोटा-शैली का स्वर्णकाल माना जाता हैं। 

– ‘डालू’ नामक एक चित्रकार ने रागमाला को चित्रित किया। 

– प्रमुख विशेषता- शिकार के दृश्य – महिलाओं को पशुओं का शिकार करते हुये दिखाया गया हैं।

 – नारी सौन्दर्य का सबसे अधिक चित्रण कोटा शैली में हुआ हैं।

प्रमुख आधुनिक चित्रकार: 

(1) रामगोपाल विजयवर्गी:

– राजस्थान के सबसे अग्रणी चित्रकार। 

– सबसे पहले एकल चित्र प्रदर्शनी लगानी शुरू की। 

– इनके गुरू का नाम शैलेन्द्र नाथ डे। 

– साहित्यिक रचना:- ‘अभिसार निशा’

(2) गोवर्धन लाल बाबा:

– भीलों का चितेरा 

– प्रमुख चित्र :- बारात

(3) कुन्दनलाल मिस्त्री:

– इन्होनें महाराणा प्रताप का चित्र बनाया। 

– राजा रवि वर्मा ने कुन्दन लाल मिस्त्री के चित्रों को देखकर महाराणा प्रताप का चित्र बनाया। राजा रविवर्मा (केरल) को ‘भारतीय चित्रकला का पितामह’ कहा जाता हैं। 

(4) सौभाग्यमल गहलोत:- इन्हें नीड़ का चितेरा कहते हैं। 

(5) परमानन्द चोयल:

– इन्हें भैंसों का चितेरा कहते हैं।

(6) जगमोहन मायोडिया:

– इन्हें स्वान का चितेरा कहते हैं।

(7) भूरसिंह शेखावतः 

– इन्होनें देशभक्त व क्रांतिकारियों के चित्र बनाए। 

– इनके चित्रों में राजस्थानी अंश अधिक पाया जाता हैं।

(8) ज्योतिस्वरूप कच्छावाः – चित्र INNER JUNGLE

(9) देवकीनन्दन शर्माः

– इन्हें ‘The Master of Nature and Living Object’ कहते हैं।

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अक्षांश, देशान्तर, समय, दिशाएँ(Latitudes, Longitudes, Time, Directions)

कल्पित रेखाओं का वह जाल जिसके द्वारा प थ्वी पर विभिन्न स्थानों की स्थितियाँ निश्चित की जा सकें वे अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ कहलाती है। पथ्वी के निकटतम शुद्ध प्रतिरूप ग्लोब पर दर्शाई जाने वाली क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर रेखाएँ अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ ही होती हैं। 

अक्षांश (Latitude) 

किसी स्थान की भूमध्य रेखीय तल से उत्तर एवं दक्षिण दिशा की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं। भूमध्य रेखीय तल के उत्तर की ओर उत्तरी अक्षांश तथा दक्षिण की और दक्षिणी अक्षांश कहलाते हैं। गोलाकार प थ्वी में कुल 360 अक्षांश होते हैं 0° अक्षांश भूमध्य रेखा द्वारा दर्शाया जाता है जो प थ्वी को ठीक दो समान भागों में बताता है। यह वत्त प थ्वी का महानतम व त है। भूमध्य रेखा से 90° अक्षांश उत्तर की ओर तथा 90° अक्षांश दक्षिण की ओर होते हैं। 90° उत्तरी अक्षांश उत्तरी ध्रुव तथा 90° दक्षिणी अक्षांश दक्षिणी ध्रुव कहलाता है। 

अक्षांश रेखाएँ (Lines of Latitude) वे कल्पित रेखाएँ जो उन स्थानों से होकर गुजरती हैं जिन स्थानों की भूमध्य रेखा से एक ही दिशा में कोणात्मक दूरी एक समान हो अक्षांश रेखाएँ कहलाती हैं। सभी अक्षांश रेखाएँ एक दूसरे के समानान्तर होती हैं। भूमध्य रेखा से उत्तर एवं दक्षिण दिशा की ओर इन रेखाओं का विस्तार कम होता जाता है। ध्रुव पर तो इन रेखाओं का विस्तार केवल एक बिन्दु ही रह जाता है। भूमध्य रेखा के अतिरिक्त कर्क एवं मकर अन्य प्रमुख अक्षांश रेखाएँ हैं।

कर्क रेखा- 21 जून को उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर 23- के कोण पर झुका होता है। अर्थात इस दिन 23- उत्तरी अक्षांश 2 पर सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ती है इस अक्षांश को कर्क रेखा कहते हैं।

मकर रेखा- 22 दिसम्बर को दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर 23- के कोण पर झुका होता है अर्थात इस दिन सूर्य कि किरणे 23- दक्षिणी अक्षांश पर लम्बवत पड़ती है इसी अक्षांश को मकर रेखा कहते है।

देशान्तर (Longitude)

प्रधान मध्याह्वन अर्थात 0° देशान्तर से किसी स्थान की पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं। 

देशान्तर रेखाएँ (Lines of Longitude) 

वे कल्पित रेखाएँ जो इस प्रकार खींची जाती हैं कि उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से होती हुई भूमध्य रेखा को समकोण पर काटती हो वे देशान्तर रेखाएँ कहलाती है ये सभी रेखाएँ समान दीर्ध वर्त होते हैं। क्योंकि सभी देशान्तर रेखाएँ उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से होकर गुजरती है इसलिए ये अक्षांश रेखाओं की तरह एक दूसरे के समानान्तर नहीं होती हैं। भूमध्य रेखा पर इनके बीच की दूरी सर्वाधिक होती है तथा ध्रुव की तरफ बढ़ते हुए इनके बीच की दूरी कम होती जाती है। ध्रुर्वो पर तो ये रेखाएँ एक ही बिन्दु पर मिल जाती है। देशान्तर रेखाएँ संख्या में 360 होती हैं। इंग्लैंड के ग्रीनविच नामक स्थान से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को प्रधान देशान्तर अथवा प्रधान मध्याह्न रेखा माना गया है। यह प्रधान मध्याह्न 0° देशान्तर मानी गई है। इसके पूर्व एवं पश्चिम में क्रमश 180° तक देशान्तर रेखाएँ खींची गई हैं। 

देशान्तर एवं समय (Longitude and Time)

पथ्वी अपने अक्ष पर 24 घण्टे में एक चक्कर लगाती है। अर्थात पथ्वी 24 घण्टे में 360° घूमती है। इस प्रकार प्रति एक घण्टे  में पथ्वी 360/24=15° घूम जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि पूर्व एवं पश्चिम दिशा में स्थित दो स्थान जिनके बीच 15° का फासला है उनके बीच समय का अन्तर 1 घण्टे का होगा। इसी प्रकार 10 के अन्तराल वाले स्थानों के बीच – =4 मिनट 15 का अन्तर होगा। इस प्रकार समय तथा देशान्तर में गहरा सम्बन्ध है। 

स्थानीय समय (Local Time)

किसी स्थान पर जब सूर्य का प्रकाश एकदम लम्बवत गिर रहा हो अर्थात वहाँ का देशान्तर ठीक सूर्य के नीचे हो तो उस समय यदि वहाँ की घड़ियों में दिन के 12 बजा दिए जाए तो वह समय उस स्थान का स्थानीय समय कहलाता है। 

प्रामाणिक समय (Standard Time) 

विश्व में अगर हर स्थान पर अपने-अपने स्थानीय समय का प्रयोग किया जाए तो विश्व में समय सम्बन्धी समस्या खड़ी हो जाए। क्योंकि इससे रेडियो, रेलवे, वायुयान, तार तथा दूरदर्शन जैसी सार्वजनिक सुविधाओं में बहुत असुविधा आ जाएगी। इस समस्या से बचने के लिए इंग्लैंड में ग्रीनविच के समीप से गुजरने वाली देशान्तर को 0° देशान्तर मानकर विश्व को समय कटिबन्धों (Time Zones) में बांटा गया। प्रत्येक देश एक निश्चित देशान्तर के स्थानीय समय को अपने पूरे देश में प्रयोग करते हैं। भारत में इलाहाबाद के निकट से गुजरने वाली 82- पूर्वी देशान्तर रेखा के स्थानीय समय को भारत का प्रामाणिक समय माना गया है। 

समय कटिबन्ध (Time Zones) 

विश्व के वो देश जिनका धरातलीय फैलाव पूर्व-पश्चिम दिशा में अधिक है, उन्हें एक से अधिक प्रामाणिक समयों का प्रयोग करना पड़ता है। इस प्रकार किसी देश के भिन्न-भिन्न प्रामाणिक समयों वाले भागों को समय कटिबन्ध कहा जाता है। उदाहरण के लिए कनाड़ा तथा अमेरिका जिनका धरातलीय फैलाव पूर्व-पश्चिम दिशा में अधिक है इन देशों को यहाँ की सरकारों ने क्रमशः 5 तथा 4 समय कटिबंधों में विभक्त किया हुआ है। सन् 1884 में अमेरिका की राजधानी वांशिगटन डी.सी. में हुई अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठी में सम्पूर्ण विश्व को 24 समय कटिबन्धों में बांटा गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line)

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा वह कल्पित रेखा है जिस पर तिथि में परिवर्तन होता है। अर्थात इस रेखा के पूर्व एवं पश्चिम में तिथि में एक दिन का अन्तर होता है। अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर का लगभग अनुसरण करती हुई चलती है। लेकिन यह रेखा कभी 180° देशान्तर के पूर्व में तथा कभी पश्चिम में विचलित होती है। यह इसलिए किया गया है ताकि 180° देशान्तर पर स्थित सभी भूभागों पर एक ही तिथि बनी रहे। अगर अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को इस प्रकार विचलित नहीं किया जाता तो साइबेरिया के पूर्वी भाग में एक ही दिन दो तिथियाँ होती है। क्योंकि 180° देशान्तर साइबेरिया के पूर्वी भाग में से होकर गुजरती है। इसलिए इस समस्या से बचने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को साइबेरिया से पूर्व की और बेरिंग जलड्मरूमध्य में 165° देशान्तर तक विचलित किया गया। 

इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को भूमध्य रेखा के थोड़ा दक्षिण में 71/, पूर्व की और विचलित किया गया है ताकि एल्लीस, वालिस, फिजी तथा टोंगा द्वीप समूहों पर एक ही तिथि बनी रहे। जो न्यूजीलैंड के कैलेन्डर दिवस जैसी हो।

उदाहरण :

प्रश्न 1: कोलकाता ( 90° पू0) पर क्या स्थानीय समय होगा जबकि भारत के प्रामाणिक समय के अनुसार प्रातः के 6 बजे हों? 

उत्तर- भारत में इलाहाबाद के पास से गुजरने वाली 82 1/2° पूर्वी देशान्तर रेखा का स्थानीय समय प्रामाणिक समय माना जाता हैं। इस प्रकार हमें 82 1/2° पूर्वी देशान्तर रेखा का स्थानीय समय ज्ञात है, जिसकी सहायता से कोलकाता का स्थानीय समय सरलता से प्रतीत किया जा सकता है।

कोलकाता का देशान्तर = 90° पूर्व 

इलाहाबाद का देशान्तर = 8212° 

पूर्व दोनों स्थानों के बीच देशान्तर का अन्तर = 90° – 82/20 = 7:1/2

दोनों स्थानों के बीच समय का अन्तर = 15-2×4=30 मिनट

क्योंकि कोलकाता इलाहाबाद के पूर्व में है इसलिए कोलकाता का स्थानीय समय इलाहाबाद के स्थानीय समय अर्थात् भारत के प्रामाणिक समय से आगे होगा। इस प्रकार कोलकाता का स्थानीय समय प्रातः 6 बजकर 30 मिनट होगा। 

प्रश्न 2 : सेंट लूई ( 90° प०) का स्थानीय समय प्रतीत करो जबकि न्यूयार्क ( 74° प0) में प्रातः के आठ बजे हों।

उत्तर

90°W 74°W 0°E सेंट 

लूई का देशान्तर = 90° प0 

न्यूयार्क का देशान्तर = 74° प0 

दोनों स्थानों के बीच देशान्तर का अन्तर = 90° – 74° = 16° 

दोनों स्थानों के बीच समय का अन्तर = 16 x 4 = 64 मिनट

क्योंकि सेंट लूई न्यूयार्क के पश्चिम में है, इसलिए वहाँ का स्थानीय समय पीछे होगा। इस प्रकार यदि न्यूयार्क में प्रातः के आठ बजे हो तो सेंट लूई में ( 8.1 घण्टा 4 मिनट) प्रातः के 6 बजकर 56 मिनट होंगे।

दिशाएँ (Directions)

सूर्य के उदय एवं अस्त होने से दो दिशाओं का ज्ञान होता है जिन्हें पूर्व (East) तथा पश्चिम (West) कहते हैं। पथ्वी अपने अक्ष पर चक्कर लगाती हैं इस अक्ष के दोनों सिरे अन्य दो दिशाओं का संकेत देते है जिन्हें उत्तर (North) एवं दक्षिण (South) कहते हैं। इस प्रकार प्रमुख चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण का ज्ञान होता है अगर सूर्योदय के समय हम उसकी तरफ मुँह करके खड़े हो जाए तो हमारे सामने पूर्व दिशा, ठीक हमारे पीछे पश्चिम दिशा, दाहिने हाथ की तरफ दक्षिण दिशा तथा बाएँ हाथ की तरफ उत्तर दिशा होगी। इन चार प्रमुख दिशाओं के बीच कई अन्य दिशाएँ होती है। कुल मिलाकर 16 दिशाओं का उपयोग किया जाता है।

मानचित्र पर दिशाएँ (Directions on the Maps)

चार प्रमुख दिग्विन्दु और उनके बीच की दिशायें जब तक किसी मानचित्र पर दिशा अंकित नहीं की जाती तब तक उस मानचित्र को समझ पाना बहुत कठिन है। इसलिए मानचित्र पर दिशा अंकित करना आवश्यक है। नाविक, सैनिक, वायुयान चालक आदि सभी के लिए दिशा अंकित मानचित्र अति उपयोगी है। इसके बगैर ये सभी यात्रा पथ भटक सकते है।

 मानचित्र पर दर्शाई गई अक्षांश एक देशान्तर रेखाएँ भी दिशाओं का बोध कराती है। अक्षांश रेखाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा में तथा देशान्तर रेखाएँ उत्तर-दक्षिण दिशा में बिछि हुई होती है। इसके अलावा कुछ मानचित्रों पर ऊपरी दाहिने कोने में एक तीर का चिन्ह बना होता है। जो उत्तर दिशा की ओर संकेत करता है। मानचित्र पर लगे इस तीर के चिन्ह से अन्य सभी दिशाओं का पता लगाया जा सकता है। अधिकांश मानचित्रों पर ऊपर की ओर उत्तर, नीचे की ओर दक्षिण दाहिने हाथ की ओर पूर्व तथा बाएँ हाथ की ओर पश्चिम दिशा होती है।

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मापनी (Scale)

सामान्य परिचय एवं परिभाषा (General Introduction and Definition) मापनी वह युक्ति है जिसकी सहायता से समस्त प थ्वी अथवा उसके किसी भू-भाग को आवश्यकता के अनुसार छोटा अथवा बड़ा आकार देकर मानचित्र बनाया जा सकता है। अर्थात मापनी पथ्वी एवं मानचित्र के बीच वह अनुपात है जिसके द्वारा रातल पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की वास्तविक दूरी को मानचित्र पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी के द्वारा दर्शाया जा सके।

मापनी- दो बिन्दुओं के बीच की ममचिन पर दूरी/उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की धातल पर दूी

एफ.जे. मांक हाऊस (F.J. Monk House) के अनुसार : ‘मापनी द्वारा वह सम्बन्ध व्यक्त किया जाता है जो मानचित्र पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच तथा धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच होता है।’ 

राबिन्सन, रैंडल तथा मौरिसन (Robinson, Randall and Morrison) के अनुसार :- ‘वास्तविकता तथा प्रतिनिधित्व के बीच पाए जाने वाले सम्बन्ध को मापनी कहते हैं।’

मापनी व्यक्त करने की विधियाँ (Methods of Expressing the Scale) 

मानचित्र पर मापनी प्रदर्शित करने की तीन विधियाँ होती हैं। 

1. साधारण कथन विधि (Simple Statement Method) 

2. निरूपक भिन्न विधि (Representative Fraction Method) 

3. रैखिक मापक विधि (Linear Scale Method) 

(1) साधारण कथन विधि (Simple Statement Method)- इस विधि द्वारा शाब्दिक विवेचन से किसी मानचित्र की मापनी का विवरण दिया जाता हैं। अर्थात मानचित्र पर मापनी को शब्दों में लिख दिया जाता है। जैसे 1 इंच : 1 मील या 1 सेमी. : 1 किमी. आदि। मापनी व्यक्त करने की यह सबसे सरल विधि है। प्रायः भूसम्पति मानचित्र इस विधि से मापनी को प्रदर्शित करते है। लेकिन इस विधि का उपयोग काफी सीमित है। क्योंकि एक तो इस मापक विधि को केवल वहीं लोग समझ सकते है जो माप प्रणाली से परिचित हो। तथा दूसरे मानचित्र के आकार में परिवर्तन करने पर मापनी अशुद्ध हो जाती है। 

(2) निरूपक भिन्न विधि (Representative Fraction (R.E.) Method)- इस विधि द्वारा मापक एक भिन्न द्वारा दर्शाया जाता है। दर्शाया गया भिन्न मानचित्र तथा धरातल पर मापी गई दूरी को प्रकट करता है। इस भिन्न में अंश का मान सदैव 1 होता है जबकि हर का मान मापक के अनुसार बदलता रहता है। निरूपक भिन्न में अंश तथा हर सदैव एक ही इकाई में व्यक्त किये जाते हैं। निरूपक भिन्न (R.F.) = मानचित्र पर दूरी/धरातल पर दूरी भारत का भूगोल एवं प्रयोगात्मक भूगोल उदाहरणार्थ, यदि किसी मानचित्र का निरूपक भिन्न 1 : 40, 000 है तो इसका अर्थ होगा कि मानचित्र एवं धरातल की दूरियों में 1 तथा 40,000 का अनुपात है दूरियाँ चाहे इंचों में हो अथवा सेमी. में हो। जैसे 1 सेमी. : 40,000 सेमी. का अर्थ होगा मानचित्र पर 1 सेमी. की दूरी धरातल पर 40,000 सेमी. दूरी को व्यक्त करेगी। साधारण कथन विधि की तरह इस विधि में भी मानचित्र का आकार परिवर्तित करने पर दर्शाई गई मापनी अशुद्ध हो जाती है। 

(3) रैखिक मापक विधि (Linear Scale Methed)- इस विधि में मापक को एक सरल रेखा द्वारा दर्शाया जाता है जिसकी लम्बाई, धरातल पर ली गई वास्तविक दूरी को किसी निश्चित अनुपात में दर्शाती है। फिर इस सरल रेखा को प्राथमिक एवं गौण भागों में विभक्त कर दिया जाता है तथा उन भागों पर धरातल की वास्तविक दूरियों के मान अंकित कर दिए जाते हैं। इस विधि की विशेषता यह है कि मानचित्र का आकार परिवर्तित करने पर भी दशाई गई मापनी शुद्ध रहती है क्योंकि मानचित्र के आकार के अनुपात में मापनी का आकार बड़ा अथवा छोटा हो जाता है।

मापनियों का रूपांतरण (Conversion of Scales) 

(1) साधारण कथन मापक को निरूपक भिन्न में परिवर्तित अथवा रूपांतरित करना

उदाहरण : एक मानचित्र का साधारण कथन मापक 1 से०मी० : 10 कि०मी० है इसका निरूपक भिन्न ज्ञात करो। दिया गया है साधारण कथन मापक = 1 से०मी० : 10 कि०मी० अर्थात मानचित्र पर दूरी 1 से०मी० = धरातल पर दूरी 10 कि०मी०

हम जानते है कि निरूपक भिन्न = मानचित्र पर दूरी धरातल पर दूरी 

अर्थात R.E =1 सैमी०/10 कि०मी०

क्योंकि प्रदर्शक भिन्न में अंश तथा हर एक ही इकाई में व्यक्त किये जाते है इसलिए यहां पर किमी. को सेमी. में परिवर्तित करना होगा।

हम जानते है 1 कि०मी० = 1,00,000 से०मी०

इसलिए R.E=

क्योंकि निरूपक भिन्न में किसी मापक प्रणाली का प्रयोग नहीं किया जाता, इसलिए

निरूपक भिन्न (R.E.)= 1/10000 या 1 : 10,00,000

(2) प्रदर्शक भिन्न को साधारण कथन मापक में परिवर्तित अथवा रूपांतरित करना

उदाहरण : एक प्रदर्शक भिन्न 1 : 633600 है तो उसे मील में दर्शाने के लिए साधारण कथन मापक में परिवर्तित करो। दिया गया प्रदर्शक भिन्न = 1:633600 क्योंकि यहां पर प्रदर्शक भिन्न को मील में परिवर्तित करना है इसलिए दिया गया प्रदर्शक भिन्न इंच में मानना होगा अर्थात 1 इंच : 633600 इंच जिसका अभिप्राय है 

मानचित्र पर 1 इंच दूरी धरातल के 633600 इंच दूरी को प्रदर्शित करती है। 

क्रिया – 1 इंच : 633600 

इंच यहाँ पर हमें इंच को मील में परिवर्तित करना है। 

हम जानते है 1 मील = 63360 इंच

मापनी = 1 इंच : – 633600/ 63360 मील 

अथवा 1 इंच : 10 मील 

अतः साधारण कथन मापक = 1 इंच : 10 मील

सरल रेखा का समान भागों में विभाजन करना (Division of a Straight Line into Equal Parts)

रैखिक मापक बनाने के लिए सर्वप्रथम दर्शाई गई सरल रेखा को समान भागों में विभक्त करना अनिवार्य होता है। सरल रेखा को समान भागों में विभक्त करने की दो ज्यामितीय विधियाँ है। 

प्रथम विधि मान लो एक सरल रेखा PQ दी गई है जिसको 6 समान भागों में विभक्त करना है। सर्वप्रथम P बिन्दु पर परकार की सहायता से एक न्यून कोण बनाती हुई सरल रेखा खींचो। फिर P बिन्दु से परकार की सहायता द्वारा इस रेखा पर 6 बिन्दु A,B,C,D,E,F समान दूरी पर अंकित करो। F बिन्दु को Q बिन्दु से मिलाओ। फिर सेट-स्क्यर की सहायता से FQ रेखा के समानान्तर A, B, C, D तथा E बिन्दुओं से E-1, D-2, C-3, B-4 तथा A-5 रेखायें खींचो जो PQ रेखा को P-5, 5-4, 4-3, 3-2, 2-1 तथा 1Q,6 समान भागों में विभक्त करेगी।

दूसरी विधि मान लिया एक सरल रेखा PQ दी गई है। जिसको 6 समान भागों में विभक्त करना है सर्वप्रथम PQ एक सरल रेखा लो फिर P बिन्दु से ऊपर की तरफ तथा Q बिन्दु से नीचे की तरफ दो समान न्यून कोण बनाती हुई रेखाएं खींचो। इन दोनों रेखाओं पर परकार की सहायता से समान दूरी पर A,B,C,D,E,F तथा G,H,IJ,K,L चिन्ह अंकित करो। अब F को Q से, E को G से, D को से, C को I से, B को J से, A को K से तथा P को L से इस प्रकार मिलाओ ताकि वे QR रेखा को 1, 2, 3, 4, 5 पर काटे। इस प्रकार P-5, 5-4, 4-3, 3-2, 2-1 तथा LQ, PQ रेखा के 6 समान भाग होगें।

मापनियों के वर्ग (Categories of Scales)

रचना विधि एवं उद्देश्यों के आधार पर मापनियों को 5 वर्गों में रखा जाता है। 

1. बड़ी मापनी (Large Scale) 

2. छोटी मापनी (Small Scale) 

3. सरल मापनी (Simple Scale) 

4. विकर्ण मापनी (Diagonal Scale) 

5. तुलनात्मक मापनी (Comparative Scale) 

(1) बड़ी मापनी ( Large Scale) – वह मापनी जिसके द्वारा धरातल की छोटी दूरियाँ मानचित्र की लम्बी दूरियों द्वारा दर्शाई जाती हैं बड़ी मापनी कहलाती है अर्थात जिस मापनी का निरूपक भिन्न (R.E) बड़ा होगा वह बड़ी मापनी होती है। उदाहरण के तौर पर 20 से०मी० : 1 कि०मी० (R.E. 1 : 5,000) जिसका अर्थ है मानचित्र पर 20 से०मी० लम्बी रेखा धरातल की मात्र 1 कि०मी० दूरी को दर्शाती है। इस मापनी द्वारा बनाए गए मानचित्र दर्शाए गए क्षेत्र की विस्त त जानकारी प्रदान करते है। इनमें गौण लक्षणों को भी प्रदर्शित किया जाता है। भू-सम्पति मानचित्र एवं स्थलाक तिक मानचित्र बड़ी मापनी पर बने होने के कारण विस्त त जानकारी प्रदान करते हैं। 

(2) छोटी मापनी (Small Scale) – वह मापनी जिसके द्वारा धरातल की लम्बी दूरियों को मानचित्र पर छोटी दूरियों द्वारा दर्शाया जाता है छोटी मापनी कहलाती है। छोटी मापनी का निरूपक भिन्न (R..) भी छोटा होता है। उदाहरणार्थ : 1 से०मी० : 20 कि०मी० जिसका अर्थ है मानचित्र पर 1 से०मी० लम्बी रेखा धरातल की 20 कि०मी० दूरी को दर्शाती है। छोटी मापनी पर बने मानचित्र विस्त त क्षेत्रफल को दर्शाते हैं लेकिन इन मानचित्रों में गौण लक्षणों को दर्शाना सम्भव नहीं होता। एटलस एवं दीवारी उनमें मानचित्र छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। 

(3) सरल मापनी (Plain Scale) – जैसा कि नाम से विदित है यह मापनी बनाने में बहुत सरल है। इस मापनी को एक सरल रेखा के द्वारा दर्शाया जाता है जिसकी लम्बाई 5 से 8 इंच या 12 से 20 से०मी० के मध्य होती है। सर्वप्रथम इस रेखा को आवश्यकता के अनुसार समान प्राथमिक भागों (Primary Divisions) में बाँट दिया जाता है जो धरातल की लम्बी दूरियों को दर्शाते हैं। इसके बाद छोटी दूरियों को पढ़ने के लिए मापनी के बाईं ओर के प्रथम प्राथमिक भाग को समान गौण भागों (Secondary Divisions) में बाँट दिया जाता है जो धरातल की छोटी दूरियों को दर्शाते हैं। रेखा के प्राथमिक एवं गौण भागों पर धरातलीय दूरियों को अंकित किया जाता है। शून्य सदैव बाईं ओर के प्राथमिक भाग को छोड़कर अंकित किया जाता है। 

मापक पर अंकित धरातलीय दूरियाँ पूर्णाक संख्या (Round Figure) में होनी चाहिए। सरल मापनी के साथ साधारण कथन मापक या निरूपक भिन्न अवश्य लिखा जाना चाहिए। इस मापनी को रैखिक मापनी (Linear Scale) या आलेखी मापनी (Graphic Scale) के नाम से भी जाना जाता है। 

उदाहरण : एक मानचित्र का निरूपक भिन्न 1 : 20,00,000 है किलोमीटर में दूरी पढ़ने के लिए सरल मापनी की रचना कीजिए। रचना विधि- दिया गया निरूपक भिन्न (R.E.) = 1 : 20,00,000 अर्थात मानचित्र पर 1 से०मी० लम्बी रेखा धरातल की 20,00,000 से०मी० लम्बी रेखा को दर्शाती है। 

माना मापनी बनाने के लिए एक सरल रेखा 15 से०मी० ली गई जो दिए गए निरूपक भिन्न के अनुसार धरातल की

20,00,000/100000 x 15= 300 कि०मी० को प्रदर्शित करेगी।

मापनी

1 कि०मी० = 1,00,000 से०मी० 

सर्वप्रथम एक सरल रेखा 15 से०मी० लम्बी लो उसके 5 समान प्राथमिक भाग करो। प्रत्येक प्राथमिक भाग धरातल की 60 कि०मी० दूरी को दर्शाएगा। फिर बाईं ओर के पहले प्राथमिक भाग को 5 समान गौण भागों में बाटों प्रत्येक भाग धरातल की 12 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा।

प्रथम प्राथमिक भाग को छोड़कर शून्य अंकित करो शून्य से दाईं तरफ प्राथमिक भागों पर क्रमशः 60, 120, 180 तथा 240 अंकित करो तथा शून्य से बाईं और गौण भागों पर क्रमशः 12, 24, 36, 48 तथा 60 अंकित करो मापनी के दोनों सिरो पर किलोमीटर लिख दो। मापनी के ऊपर दिया गया निरूपक भिन्न (R.F.) लिखो इस प्रकार सरल मापनी तैयार हो जाएगी। 

(4) विकर्ण मापनी (Diagonal Scale)

जिस मापनी में विकर्णों का प्रयोग करके गौण भागों को और भी छोटे भागों में विभक्त कर दिया जाता है वह विकर्ण मापनी कहलाती है। सरल मापनी में मील फलांग, किलोमीटर, हेक्टोमीटर आदि दो मात्रकों (Units) को ही पढ़ा जा सकता है जबकि विकर्ण मापनी में तीन मात्रकों जैसे मील-फलांग-गज या किलोमीटर-हैक्टोमीटर-डेकामीटर में दूरियाँ पढ़ी जा सकती हैं। विकर्ण मापनी में प्रथम दो मात्रकों को बनाने की रचना विधि सरल मापनी के अनुसार है जबकि तीसरे मात्रक की दूरी को मापनी के गौण भाग पर बनाए गए आयतों (Rectangles) में विकर्ण खींचकर बनाया जाता है। 

उदाहरणार्थ – माना किसी आयत में क्षैतिज रेखा के अतिरिक्त समान अन्तर पर खींची गई समानान्तर रेखाओं की संख्या 5 है तो आयत का विकर्ण पहली रेखा को 1 : 4, दूसरी को 2 : 3, तीसरी को 3 : 2, चौथी को 4 : 1 में विभाजित करेगा। तथा पांचवी भुजा आयत की क्षैतिज भुजा की लम्बाई प्रदर्शित करेगी। मान लो गौण भाग (क्षैतिज भुजा) की लम्बाई 1 से०मी० है तो समान अन्तर पर खींची गई रेखाओं पर क्रमशः 0.2, 0.4, 0.6, 0.8 से०मी० की दूरियाँ आसानी से पढ़ी जा सकती हैं। अन्तिम अर्थात पांचवी रेखा को विकर्ण विभाजित नहीं करेगा अतः इसका मान 1 से०मी० व

1 c.m. होगा। यहाँ विशेष बात यह है कि गौण भाग को जितने भागों में बाँटना हो आयत की क्षैतिज भजा के समानान्तर उतनी ही संख्या में सरल रेखाएँ खींची जाती हैं।

उदाहरण : एक मानचित्र का निरूपक भिन्न 1 : 5,00,000 है। 

इसके लिए विकर्ण मापक बनाओ जिसमें 1 कि०मी० तक की दूरी पढ़ी जा सके। 

रचना विधि- दिया गया निरूपक भिन्न = 1 : 5,00,000

अर्थात मानचित्र पर 1 से०मी० = धरातल पर 5,00,000 सै०मी० अथवा 1 सै०मी० = 5 कि०मी०

12 से०मी० लम्बी रेखा दूरी प्रकट करेगी = 5 x 12 = 60 कि०मी० 

सर्वप्रथम एक सरल रेखा AZ 12 से०मी० लम्बी लो। इसको 5 समान प्राथमिक भागों में विभक्त करो प्रत्येक भाग 12 कि०मी० दूरी को दर्शाएगा फिर बाईं ओर की प्रथम प्राथमिक भाग AB को 3 समान गौण भागों में विभक्त करो। प्रत्येक गौण भाग 4 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा। प्रत्येक प्राथमिक एवं गौण भाग पर उसका मान अंकित करो। प्रत्येक

1c.m. प्राथमिक भाग पर लम्ब खींचो। बाईं और के लम्ब AD पर समान दूरी पर 4 समान भाग काटो तथा उन भागों से AZ रेखा के समानान्तर रेखाएं खींचो। बाईं और के प्राथमिक भाग पर बनी आयत ABCD की भुजा CD को भी AB की भांति 3 समान भूगोल गौण भागों में विभक्त करो। तथा उनका मान अंकित करो अब भुजा CD के 4 कि०मी० वाले बिन्दु को AB के 0 कि०मी० वाले बिन्दु से, 8 कि०मी० वाले बिन्दु को 4 कि०मी० वाले बिन्दु तथा 12 कि०मी० वाले बिन्दु को 8 कि०मी० वाले बिन्दु से मिलाकर विकर्ण खींचो। इस प्रकार विकर्ण मापनी तैयार हो जाएगी।

5) तुलनात्मक मापनी (Comparative Scale) .

जिस मापनी के द्वारा एक से अधिक मापक प्रणालियों में दूरियों को प्रदर्शित किया जा सके वह तुलनात्मक मापनी कहलाती है। जैसे मील तथा किलोमीटर, मीटर तथा गज आदि। कई बार इस मापनी द्वारा समय एवं दूरी का तुलनात्मक प्रदर्शन भी किया जाता है। 

तुलनात्मक मापनी की विशेषताएँ

1. तुलनात्मक मापनियाँ एक ही निरूपक भिन्न पर बनाई जाती है। 

2. तुलनात्मक मापनियों का शून्य अंक सदैव एक उर्ध्वाधर सरल रेखा में होता है। कई बार तुलनात्मक मापनियाँ अलग-अलग न बनाकर एक ही सरल मापनी को इस प्रकार विभाजित कर दिया जाता है कि मापनी का एक ही भाग दो विभिन्न मापों को सुगमता से दिखा सके। 

उदाहरण- एक मानचित्र के लिए किलोमीटर तथा मील में दूरियाँ दर्शाने के लिए तुलनात्मक मापनी की रचना कीजिए। जिसका निरूपक भिन्न 1 : 6,33,600 से। 

क्रिया- किमी. मापनी के लिए : दिए गए उदाहरण के अनुसार मानचित्र पर 1 से०मी० लम्बी रेखा धरातल के 6,33,600 से०मी० दूरी को दर्शाती है।

अथवा मानचित्र पर 15 से०मी० लम्बी रेखा धरातल पर =95.04 कि०मी० को दशाएंगी।

परन्तु 95.04 एक पूर्ण संख्या नहीं है इसलिए हम एक पूर्ण संख्या 100 कि०मी० लेते है।

धरातल की 100 कि०मी० दूरी मानचित्र पर

100/95.04 x 15 = 15.8 से०मी० लम्बी रेखा द्वारा दर्शाई जाएगी।

सर्वप्रथम 15.8 से०मी० लम्बी एक सरल रेखा लो उसको 5 समान प्राथमिक भागों में बांटो प्रत्येक भाग धरातल की 20 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा। फिर बाईं ओर के प्रथम प्राथमिक भाग को 5 समान गौण भागों में बांटो प्रत्येक भाग धरातल की 4 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा। मापनी के दोनों सिरों पर कि०मी० लिख दो। प्रत्येक भाग का मान अंकित करो 

क्रिया- मीलों की मापनी के लिए दिए गए 

उदाहरण के अनुसार

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मानचित्र का सामान्य परिचय (General Introduction to Maps)

मानचित्र का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of a Map)

कागज अथवा किसी समतल सतह पर प थ्वी के सम्पूर्ण अथवा कुछ भाग के धरातलीय एवं सांस्क तिक लक्षणों को दर्शाना मानचित्र कहलाता है। मानचित्र (Map) लैटिन भाषा के मैप्पा (Mappa) शब्द से लिया गया है। मानचित्र को फोटो चित्र से अलग रखा जाता है। फोटोचित्र में किसी वस्तु अथवा स्थान की वास्तविक आक ति आ जाती है। जब कि मानचित्र में दर्शाए जाने वाले विभिन्न विवरणों को रूढ चिन्हों के द्वारा दर्शाया जाता है। 

एफ.जे. मॉक हाऊस के मतानुसार (According to F.J. Monk House): ‘निश्चित मापनी के अनुसार धरातल के किसी भाग के लक्षणों के समतल सतह पर निरूपण को मानचित्र कहते हैं।’ 

स्टैनले व्हाइट के अनुसार (According to Stanley White): मानचित्र वह साधारण चित्र है जिस पर किसी देश अथवा प्रदेश की आक ति को समतल सतह पर चित्रित किया जाता है।

मानचित्रों का उद्देश्य (Purpose of Maps) 

मानचित्र का प्रथम उद्देश्य प थ्वी पर पाए जाने वाली विभिन्न प्राक तिक एवं मानवीय लक्षणों को मापनी के अनुसार छोटे आकार में परिवर्तित करके उन्हें समझने योग्य बनाना है। क्योंकि हमारी प थ्वी इतनी बड़ी है कि इसको एक बार में आँखों से देखना सम्भव नहीं है। धरातल पर विभिन्न प्रकार की स्थल आक तियाँ जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, झीलें तथा नदियाँ, मिट्टियाँ और जलवायु के साथ-साथ अनेक प्रकार के मानवीय क्रिया कलाप पाए जाते हैं। इन सभी प्रकार के तथ्यों को दर्शाना मानचित्र का उद्देश्य है। इसके अलावा धरातल पर अद श्य परन्तु महत्वपूर्ण प्रतिरूपों को भी मानचित्रों के द्वारा दर्शाया जा सकता है। यद्यपि इस कार्य के लिए अनेक सांख्यिकीय आरेखों का भी प्रयोग किया जाता है लेकिन वे सब गौण विधियाँ हैं। इन सब को प्रदर्शित करने के लिए मानचित्र ही एक उपयुक्त विधि है।

मानचित्रों की आवश्यकता एवं उपयोग (Needs and Uses of Maps)

वास्तव में ग्लोब ही प थ्वी की आक ति को सही प्रदर्शित करता है लेकिन ग्लोब के अध्ययन में अनेक कठिनाईयाँ आती है जैसे1. आक ति में ग्लोब गोल होने के कारण उस पर दर्शाए गए भिन्न महाद्वीपों एवं महासागरों दोनों को एक ही समय एक नजर में देख पाना सम्भव नहीं हैं जिसके कारण एक आम आदमी प थ्वी पर फैले हुए महाद्वीपों एवं महासागरों की सही-सही स्थिति को समझ नहीं पाता जब कि मानचित्र द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी को एक ही नजर में देखा जा सकता है।

2 ग्लोब आक ति में बहुत छोटे होने के कारण पथ्वी के किसी क्षेत्र को उन पर विस्तारपूर्वक नहीं दिखाया जा सकता जबकि मानचित्र द्वारा छोटे से छोटे क्षेत्र का विस्तारपूर्वक अध्ययन सम्भव है। 

3. मानचित्र द्वारा प थ्वी के किन्हीं दो क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है जबकि ग्लोब द्वारा यह सम्भव नहीं है। 

4. मानचित्र पर किन्हीं दो स्थानों की दूरी मापना आसान है जबकि यह कार्य ग्लोब पर काफी कठिन है। मानचित्रों का उपयोग मानव के आर्थिक, सामाजिक, सांस्क तिक तथा राजनैतिक क्रियाकलापों को दर्शाने के लिए किया जाता है। मानचित्र के उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसे ‘भूगोल वेता का उपकरण’ कहा गया है। भूगोल के अतिरिक्त मानचित्र का उपयोग – भू-विज्ञान, जलवायु विज्ञान, मौसम विज्ञान, समुद्र विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, खगोल विज्ञान, इतिहास, क षि आदि विषयों में भी बढ़ रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व में मानचित्रों का उपयोग काफी बढ़ा है मानचित्र के उपयोग का हिटलर के इस कथन से भी पता चलता है ‘मुझे किसी भी देश का मानचित्र दो, मैं उस देश पर विजय प्राप्त कर लूँगा।’ मानचित्र के द्वारा कम से कम स्थान पर अधिक से अधिक सूचनाओं को दर्शाया जाता है। डॉ. एच.आर. मिल (Dr. H.R. Mill) के अनुसार “यह सिद्धान्त मान लिया जाना चाहिए कि भूगोल में जिसका मानचित्र नहीं बनाया जा सकता उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।”

मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps) 

मानचित्रों का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जा सकता है जैसे- मापनी, उद्देश्य, स्थलाक तिक लक्षण की मात्रा, अतवस्तु तथा रचना विधि लेकिन प्रमुख रूप से मानचित्रों के वर्गीकरण का प्रमुख आधार, मापनी, एवं उद्देश्य हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है।

मापनी के आधार पर मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps on the basis of Scales) 

मापनी के अनुसार मानचित्रों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। (i) बड़ी मापनी मानचित्र तथा (ii) छोटी मापनी मानचित्र। बड़ी एवं छोटी मापनी के आधार पर मानचित्र चार प्रकार के होते हैं। 

(A) भूसम्पति मानचित्र (Cadastral Maps) यह मानचित्र बड़ी मापनी पर बनाए जाते हैं अर्थात किसी छोटे से क्षेत्र का विस्त त विवरण इन मानचित्रों में दर्शाया जाता है। जैसे ग्राम मानचित्र, नगर मानचित्र, सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत भूमि क्षेत्र मानचित्र आदि इन्हें सरकारी मानचित्र भी कहते हैं। क्योंकि सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की कर वसूली, नगर योजना, ग्रामीण भूमि उपयोग आदि के लिए भूसम्पति मानचित्र बनवाए जाते है। इन मानचित्रों की मापनी 1 से0मी0 : 40 मीटर अथवा 1 इंच : 110 गज से लेकर 1 से0मी0 : 20 मीटर अथवा 1 इंच: 55 गज तक होती है। 

(B) स्थलाक तिक मानचित्र (Topographical Maps) भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अनुसार स्थलाक तिक मानचित्र वे मानचित्र होते है जिसमें दिखाए गए प्रत्येक लक्षण की स्थिति एवं आक ति को मानचित्र में देखकर उस लक्षण की धरातल के ऊपर पहचान की जा सके। यह मानचित्र भी बड़ी मापनी पर बनाए जाते हैं। इन मानचित्रों के द्वारा उच्चावच (पर्वत, पठार, मैदान), प्रवाह, वनस्पति, ग्राम, नगर, विभिन्न प्रकार के परिवहन मार्गों तथा नहरों आदि को दर्शाया जाता है। किसी छोटे क्षेत्र के विस्त त अध्ययन के लिए यह मानचित्र अधिक उपयोगी होते हैं। मीट्रिक प्रणाली आने से पहले इन मानचित्रों को इंच : 1 मील, 1 इंच : 2 मील तथा 1 इंच : 4 मील की मापनी पर बनाया जाता था लेकिन मीट्रिक प्रणाली अपनाने के बाद यह मानचित्र 1:25, 000 तथा 1 : 50, 000 मापनी पर बनाए जाने लगे हैं।

(C) दीवारी मानचित्र (Wall Maps) इन मानचित्रों को भौगोलिक मानचित्र भी कहा जाता है। इनके द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी अथवा उसके किसी विस्त त भाग को दर्शाया जाता है। स्कूल एवं कालेज की दीवारों पर लगे मानचित्र भी इसी श्रेणी के अर्न्तगत आते हैं। इन मानचित्रों द्वारा विस्त त भू-भाग के अनेक प्राक तिक अथवा मानवीय लक्षणों को दर्शाया जा सकता है जैसे- जलवायु, वनों के प्रकार, खनिजों का वितरण, जनसंख्या वितरण, विभिन्न प्रकार की फसलों का वितरण आदि। यह मानचित्र छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा यह मानचित्र 1 : 15,000,000 से 1 : 2, 500,000 अथवा 1 सेमी0 : 5 कि.मी. से 1 सेमी0 : 40 किमी. मापनी पर बनाए जाते हैं। 

(D) एटलस मानचित्र (Atlas Maps) इन मानचित्रों के द्वारा महाद्वीपों या प्रदेशों के केवल प्रमुख प्राक तिक एवं मानवीय लक्षणों को ही दर्शाया जाता है। क्योंकि एटलस मानचित्र भी छोटी मापनी पर बनाए जाते है। इसलिए छोटे लक्षणों को मानचित्र पर दर्शाना सम्भव नहीं हो पाता। एटलस मानचित्र प्रायः 1 : 15,00,000 से छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। भारत की राष्ट्रीय मानचित्रावली का अंग्रेजी संस्करण 1:1,0,00,000 मापनी पर तैयार किया गया है। एटलस मानचित्र शिक्षण कार्यों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं इन मानचित्रों के द्वारा सम्पूर्ण विश्व, महाद्वीप अथवा किसी देश के विभिन्न भौतिक एवं सांस्क तिक लक्षणों को एक नजर में देखा जा सकता है।

(2) उद्देश्य अथवा विषय वस्तु के आधार पर मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps According to Purpose or Subject Matter) 

उद्देश्य अथवा विषय वस्तु पर आधारित मानचित्रों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। 

(A) प्राक तिक अथवा भौतिक मानचित्र 

(B) मानवीय अथवा सांस्क तिक मानचित्र। 

(A) प्राक तिक अथवा भौतिक मानचित्र (Natural or Physical Maps)

निम्नलिखित मानचित्रों को प्राक तिक अथवा भौतिक मानचित्रों की श्रेणी में रखा गया है। I 

1 खगोलीय मानचित्र (Astronomical Maps) इन मानचित्रों के द्वारा खगोलीय नक्षत्रों, निहारिकाओं, ग्रहों, तथा उपग्रहों आदि की आकाशीय स्थिति को दर्शाया जाता है। 

II भूवैज्ञानिक मानचित्र (Geological Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की संरचना एवं उसकी बाह य आक ति (परिच्छेदिका) को दर्शाया जाता है। 

III भूकम्पी मानचित्र (Seismic Maps) इस मानचित्र के द्वारा भूकम्पीय केन्द्र, भूकम्पीय तरंगों तथा उनके फैलाव को दर्शाया जाता है। 

IV उच्चावच मानचित्र (Relief Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी अथवा उसके किसी भाग की बनावट तथा उस पर पाई जाने वाली विभिन्न स्थलाक तियों को दर्शाया जाता है जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, नदियाँ, घाटियाँ आदि। 

V जलवायु एवं मौसम मानचित्र (Climatic and Weather Maps) इन मानचित्रों के द्वारा जलवायु एवं मौसम सम्बन्धी विभिन्न तत्वों को दर्शाया जाता हैं जैसे- तापमान, वर्षा, वायुदाब, पवनों की दिशा आदि का विवरण।

VI अपवाह मानचित्र (Drainage Maps) इन मानचित्रों के द्वारा प्रमुख नदी एवं उसकी सहायक नदियों के प्रवाह एवं उसकी दिशा को दर्शाया जाता है। 

VII मदा मानचित्र (Soil Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की मिट्टियों को दर्शाया जाता है। 

VIII वनस्पति मानचित्र (Vegetation Maps)

इन मानचित्रों के द्वारा किसी प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्न प्राकतिक वनस्पतियों के वितरण को दर्शाया जाता है। 

(B) मानवीय अथवा सांस्क तिक मानचित्र (Human or Cultural Maps) 

निम्नलिखित मानचित्रों को मानवीय अथवा सांस्क तिक मानचित्रों की श्रेणी में रखा जाता है।

I समाज-सांस्कतिक मानचित्र (Socio-Cultural Maps) इन मानचित्रों द्वारा मानव संस्क ति से जुड़े हुए घटकों को दर्शाया जाता है जैसे- जाति, भाषा, धर्म, वेशभूषा आदि। 

II जनसंख्या मानचित्र (Population Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण विश्व, किसी देश अथवा राज्य की जनसंख्या का वितरण, धनत्व, व द्धि, स्त्री-पुरुष अनुपात, आयु-वर्ग, स्थानान्तरण तथा व्यावसायिक संरचना आदि को दर्शाया जाता है। 

III आर्थिक मानचित्र (Economic Maps) इन मानचित्रों द्वारा मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को दर्शाया जाता है। जैसेक षि मानचित्र में विभिन्न फसलों के वितरण को दर्शाया जाता है। औद्योगिक मानचित्र में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को दर्शाया जाता है। परिवहन मानचित्र में किसी क्षेत्र के विभिन्न प्रकार के परिवहन मार्गों को दर्शाया जाता है। खनिज मानचित्र में किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले खनिजों का वितरण दर्शाया जाता है।

IV राजनैतिक मानचित्र (Political Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण विश्व, किसी देश, राज्य अथवा जिले आदि की राजनैतिक सीमाओं को दर्शाया जाता है। 

V ऐतिहासिक मानचित्र (Historical Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी देश के राजनैतिक इतिहास तथा इससे सम्बन्धित घटानाओं को दर्शाया जाता है।

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भारत : खनिज संसाधन एवं उद्योग (Mineral Resources & Industries)

कोयला (Coal)

कोयला देश में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत हैं और देश की व्यावसायिक ऊर्जा की खपत में इसका योगदान 67 प्रतिशत है। इसके अलावा यह इस्पात और कार्बो-रसायनिक उद्योगों में काम आने वाला आवश्यक पदार्थ है। कोयले से प्राप्त शक्ति खनिज तेल से प्राप्त की गयी शक्ति से दोगुनी, प्राकृतिक गैस से पाँच गुनी तथा जल-विद्युत शक्ति से आठ गुना अधिक होती है। इसके महत्व के कारण इसे काला सोना की उपमा दी जाती है। कोयले के भण्डारों की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है – भारतीय मिनरल ईयर बुक (IMYB) 2009 के अनुसार देश में 1200 मीटर की गहराई तक सुरक्षित कोयले का भण्डार 26721.0 करोड़ टन था।

कोयले के पाँच शीर्ष भण्डारक राज्य

राज्यभण्डारण (करोड़ टन में)
झारखण्ड7671.1
ओडिशा6522.6
छत्तीसगढ़4448.3
प. बंगाल2832.6
म. प्र.2098.1
स्रोत : IMYB2009

वर्ष 2008-09 के दौरान कोयले का कुल उत्पादन 492.9 मिलियन टन था। 

देश में कोयले के समस्त उत्पादन का लगभग 77% भाग बिजली उत्पादन में खपत होता है।

कोयला उत्पादक शीर्ष पाँच राज्य

राज्यउत्पादन % में
छत्तीसगढ़20.7
ओडिशा20.0
झारखण्ड19.5
मध्य प्रदेश14.4
आन्ध्र प्रदेश9.0

भारत में कोयले के प्रकार 

कार्बन, वाष्प व जल की मात्रा के आधार पर भारतीय कोयला निम्न प्रकार का है

1. एन्थेसाइट कोयला (Anthracite Coal) : यह कोयला सबसे उत्तम है। इसमें कार्बन की मात्रा 80 से 95 प्रतिशत, जल की मात्रा 2 से 5 प्रतिशत तथा वाष्प 25 से 40 प्रतिशत तक होती है। जलते समय यह धुंआ नहीं देता तथा ताप सबसे अधिक देता है। यह जम्मू-कश्मीर राज्य से प्राप्त होता है।

2. बिटुमिनस कोयला (Bituminous Coal) : यह द्वितीय श्रेणी का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 55% से 65%, जल की मात्रा 20% से 30% तथा 35% से 50% होती है। यह जलते समय साधारण धुंआ देता है। गोंडवाना काल का कोयला इसी प्रकार का है। 

3. लिग्नाइट कोयला (Lignite Coal) : यह घटिया किस्म का भूरा कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 45 प्रतिशत से 55 प्रतिशत, जल का अंश 30 प्रतिशत से 55 प्रतिशत तथा वाष्प 35 प्रतिशत से 50 प्रतिशत होती है। यह कोयला राजस्थान, मेघालय, असम, वेल्लोर, तिरुवनालोर (तमिलनाडु), दार्जिलिंग (प. बंगाल) में मिलता है।

कोयला क्षेत्र 

(क) गोंडवाना कोयला क्षेत्र : गोंडवाना क्षेत्र के अन्तर्गत दामोदर घाटी के प्रमुख कोयला क्षेत्र निम्न हैं

रानीगंज क्षेत्र : प. बंगाल का रानीगंज कोयला क्षेत्र ऊपरी दामोदर घाटी में है जो देश का सबसे महत्वपूर्ण एवं बड़ा कोयला क्षेत्र है। इस क्षेत्र से देश का लगभग 35% कोयला प्राप्त होता है।

शीर्ष तीन लिग्नाइट भण्डारक राज्य

राज्य% मात्रा
तमिलनाडु80.36
राजस्थान11.65
गुजरात6.81

कोयला उत्पादक प्रमुख क्षेत्र

क्षेत्रराज्य
झरियाझारखण्ड
कालाकोडजम्मू-कश्मीर
उमरसारगुजरात
पलानाराजस्थान
बाहुरपांडिचेरी
निचाहोमजम्मू-कश्मीर
बरकलाकेरल
नवेलीतमिलनाडु
नागचिक नामअरुणाचल प्रदेश

लिग्नाइट उत्पादक शीर्ष तीन राज्य

राज्य% अंश में
तमिलनाडु65.7
गुजरात31.1
राजस्थान3.08

कोयले के पाँच शीर्ष उपयोग क्षेत्र

क्षेत्र% अंश में
तापीय संयन्त्र74.6
ईंटों के भट्टे 9.9
इस्पात उद्योग3.7
सीमेन्ट उद्योग3.5
उर्वरक1.0

धनबाद जिले में स्थित झरिया कोयला क्षेत्र झारखण्ड राज्य का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक क्षेत्र है। देश के 90% से अधिक कोकिंग कोयले के भण्डार यहाँ स्थित हैं। कोयला धोवन शालाएँ सुदामडीह तथा मोनिडीह में स्थित हैं। 

गिरिडीह क्षेत्र : झारखण्ड राज्य में स्थित, यहाँ के कोयले की मुख्य विशेषता यह है कि इससे अति उत्तम प्रकार का स्टीम कोक तैयार होता है जो धातु शोधन के लिए उपयुक्त है। 

बोकारो क्षेत्र : यह हजारीबाग में स्थित है। यहाँ भी कोक बनाने योग्य उत्तम कोयला मिलता है। यहाँ मुख्य यह करगाली है जो लगभग 66 मीटर मोटी है। 

करनपुरा क्षेत्र : यह ऊपरी दामोदर की घाटी में बोकारो क्षेत्र से तीन किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। 

सोन घाटी कोयला क्षेत्र : इस क्षेत्र केअन्तर्गत मध्य प्रदेश के सोहागपुर, सिंद्वारौली, तातापानी, रामकोला और उड़ीसा के औरंगा, हुटार के क्षेत्र आते हैं। 

महानदी घाटी कोयला क्षेत्र : इस क्षेत्र के अन्तर्गत उड़ीसा के तलचर और सम्भलपुर क्षेत्र, मध्य प्रदेश के सोनहट तथा विश्रामपुर-लखनपुर क्षेत्र मुख्य हैं। 

छत्तीसगढ़ में कोरबा क्षेत्र की खाने हैं। इसका उपयोग भिलाई के इस्पात कारखाने में होता है। कोरबा के पूर्व में रायगढ़ की खानें हैं। चलवर खाने ब्राह्मणी नदी घाटी में हैं।

आन्ध्र प्रदेश के सिंगरैनी क्षेत्र में उच्च किस्म का कोयला मिलता है। 

(ख) सिंगरैनी युग के कोयला क्षेत्र : सम्पूर्ण भारत का 2 प्रतिशत कोयला टर्शियरी युग की चट्टानों से प्राप्त होता है। इसके मुख्य क्षेत्र राजस्थान, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु हैं। राजस्थान में लिग्नाइट कोयले के भण्डार पलाना, बरसिंगरसर, बिथनोक (बीकानेर) कपूरकड़ी, जालिप्पा (बाड़मेर) और कसनऊ-इग्यार (नागैर) में है।

तमिलनाडु राज्य के दक्षिण में अर्काट जिले में नवेली नामक स्थान पर लिग्नाइट कोयला मिलता है। लिग्नाइट का सर्वाधिक भण्डार तथा उत्पादक तमिलनाडु में होता है। मन्नारगुड़ी (तमिलनाडु) में लिग्नाइट का सबसे बड़ा भण्डार अवस्थित है।

खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम (Mineral Oil or Petroleum)

पेट्रोलियम टर्शियरी युग की जलज अवसादी (Aqueous sedimntary rocks) शैलों का ‘चट्टानी तेल’ है। जो हाइड्रोकार्बन यौगिकों का मिश्रण है। इसमें पेट्रोल, डीजल, ईथर, गैसोलीन, मिट्टी का तेल, चिकनाई तेल एवं मोम आदि प्राप्त होता है। भारत में कच्चे पेट्रोलियम का उत्पादन 2008-09 में 33.5 मिलियन टन था। जिसमें अभितटीय (Onshore) क्षेत्र का योगदान 11.21 मिलियन टन तथा अपतटीय (Offshore) क्षेत्र का योगदान 22.3 (66.6%) मिलियन टन था।

भारत में अवसादी बेसिनों का विस्तार 720 मिलियन वर्ग किमी. क्षेत्र पर है जिसमें 3.140 मिलियन वर्ग किमी. का महाद्वीपीय तट क्षेत्र सम्मिलित है। इन अवसादी बेसिनों में 28 बिलियन टन हाइड्रो-कार्बन के भण्डार अनुमानित किये गये हैं, जिनमें स 20082009 तक 7-70 बिलियन टन भण्डार स्थापित किये जा चुके हैं। हाइड्रोकार्बन में 70% तेल एवं 30% प्राकृतिक गैस मिलती है। प्राप्ति योग्य भण्डार 2.60 बिलियन टन होने का अनुमान है।

खनिज तेल क्षेत्र : भारत में चार प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। यथा

  1. ब्रह्मपुत्र घाटी 
  2. गुजरात तट 
  3. पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र 
  4. पूर्वी अपतटीय क्षेत्र 

ब्रह्मपुत्र घाटी : यह देश की सबसे पुरानी तेल की पेटी है जो दिहिंग घाटी से सुरमा घाटी तक 1300 किमी. क्षेत्र में विस्तृत है। यहाँ के प्रमुख तेल उत्पादक केन्द्र हैं- डिगबोई (डिब्रुगढ़), नाहरकटिया, मोरनहुद्वारीजन, रुद्रसागर-लकवा तथा सुरमाघाटी। 

गुजरात तट :

  • यह क्षेत्र देश का लगभग 18 प्रतिशत तेल उत्पादन करता है।  यहाँ तेल उत्पादन की दो पेटियाँ हैं। यथा खम्भात की खाड़ी के पूर्वी तट के सहारे, जहाँ अंकलेश्वर तथा खम्भात प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। 
  • खेड़ा से महसाना तक, जहाँ कलोर, सानन्द, नवगाँव, मेहसाना तथा बचारजी प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। भरूच, मेहसाना, अहमदाबाद, खेड़ा, बड़ोदरा तथा सूरत प्रमुख तेल उत्पादक जिले हैं। 
  • अंकलेश्वर तेल क्षेत्र भरूच जिले में 30 वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। 
  • अशुद्ध तेल कोयली तथा ट्राम्बे में परिष्कृत किया जाता है। खम्भात : लुनेज क्षेत्र, जिसे ‘गान्धार क्षेत्र’ भी कहते हैं, बड़ोदरा के 60 किमी. पश्चिम में स्थित है। 
  • अहमदाबाद-कलोर क्षेत्र खम्भात बेसिन के उत्तर में अहमदाबाद के चारों ओर स्थित है।

प्राकृतिक गैस के शीर्ष उत्पादक क्षेत्र/राज्य 2008-09]

क्षेत्र/राज्य मात्रा मिलियन क्यूबिक मी. में
अपतटीय24086 (73.3%)
गुजरात2605 (7.93%)
असोम2603 (7.92%)
आन्ध्र प्रदेश1524 (4.63%)
तमिलनाडु1542 6
त्रिपुरा553
सम्पूर्ण भारत32849 (100%)
सार्वजनिक क्षेत्र 25265 (76.9%)
निजी क्षेत्र7584 (23.0%)

कच्चे तेल के शीर्ष उत्पादन क्षेत्र/राज्य

क्षेत्र/राज्यमात्रा (हजार टन में)
अपतटीय22232 (66.35%)
गुजरात5944 (17.74%)
असोम4673 (13.94%)
तमिलनाडु289 5
आन्ध्र प्रदेश265
सम्पूर्ण भारत33506
सार्वजनिक क्षेत्र28832 (86.0%)
निजी क्षेत्र4674 (13.94%)

कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का भण्डार

क्षेत्र/राज्यकच्चा तेल (मिलियन टन मे)प्राकृतिक गैस (बिलियन
क्यूबिक मी.)
भारत773.301115.27
(क) अपतटीय452.46840.09
(ख) तटीय320.8427517
सम्पूर्ण भारत 773.301115.27

3. पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र : इस क्षेत्र से देश के समस्त कच्चे तेल उत्पादन का 67 प्रतिशत उत्पादित किया जाता है। इसके अन्तर्गत तीन क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। यथा

  • बम्बई-हाई तेल क्षेत्र देश का विशालतम तेल उत्पादक क्षेत्र है जिसका राष्ट्रीय उत्पादन में 60% से अधिक योगदान है। यह मुम्बई के 176 किमी. दक्षिण पश्चिम में लगभग 2500 वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। अतिदोहन के कारण इसका उत्पादन निरन्तर घट रहा है। 
  • बेसीन तेल क्षेत्र बम्बई हाई के दक्षिण पश्चिम में स्थित है। इस क्षेत्र के तेल भण्डार बम्बई हाई से अधिक बड़े हैं। अलियाबेट तेल क्षेत्र भावनगर से 45 किमी. दूर खम्भात की खाड़ी में स्थित है। 

4. पूर्वी अपतटीय क्षेत्र :

  • पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस कृष्णा, गोदावरी तथा कावेरी नदियों के बेसिनों तथा डेल्टाओं में प्राप्त हुए हैं। कृष्णा-गोदावरी अपतटीय बेसिन में स्थित रवा क्षेत्र में तेल प्राप्त हुआ है। अन्य तेल क्षेत्र अमलापुरु (आन्ध्र प्रदेश), नारिमानम तथा कोइरकलापल्ली (कावेरी बेसिन) में स्थित हैं अशुद्ध तेल चेन्नई के निकट पनाइगुड़ि में परिष्कृत किया जाता है।
  • अशुद्ध तेल कावेरी डेल्टा, ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश) तथा बाड़मेर (राजस्थान) में भी प्राप्त हुआ है। 
  • मन्नार की खाड़ी (तिरुनेलवेली तट), पाइन्ट कालीमीर तथा जफना प्रायद्वीप एवं अवन्तांगी, कराईकुडी तट, बंगाल की खाड़ी, कश्मीर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक विस्तृत पेटी, अण्डमान द्वीप के पश्चिम में अपतटीय क्षेत्र आदि में भी तेल प्राप्ति की सम्भावना है। सरकार ने नयी खोज लाइसेन्स नीति के तहत 48 नये क्षेत्रों में तेल की खोज के लिये विदेशी कम्पनियों से निविदा आमन्त्रित किये थे। 

यूरेनियम

इसकी प्राप्ति धारवाड़ तथा आर्कियन श्रेणी की चट्टानोंपेग्मेटाइट, मोनोजाइट बालू तथा चेरालाइट में होती है। यूरेनियम के प्रमुख अयस्क पिंचब्लेंड, सॉमरस्काइट एवे थेरियानाइट है। झारखण्ड का जादूगोडा (सिंहभूम) क्षेत्र यूरेनियम खनन के लिए सुप्रसिद्ध है। सिंहभूम जिले में ही भाटिन, नारवा, पहाड़ और केरुआडूंगरी में भारी यूरेनियम के स्रोतों का पता लगा है। राजस्थान में यूरेनियम की प्राप्ति भीलवाड़ा, बूंदी और उदयपुर जिलों से होती है।

थोरियम

भारत विश्व का सर्वाधिक थोरियम उत्पादक राष्ट्र है। थोरियस मोनोजाइट रेत से प्राप्त किया जाता है, जिसका निर्माण प्री-कैम्ब्रियन काल की चट्टानों के विध्वंश चूर्ण से हुआ है। जो मुख्यतः केरल के तटवर्ती भागों में मिलता है। इसके अलावा यह नीलगिरि (तमिलनाडु), हजारीबाग (झारखण्ड) और उदयपुर (राजस्थान) जिलों में तथा पश्चिमी तटों के ग्रेनाइट क्षेत्रों में रवों के रूप में भी प्राप्त होता है।

अभ्रक (Mica)

अभ्रक का मुख्य अयस्क पिग्माटाइट है। वैसे यह | मस्कोवाइट, बायोटाइट, फ्लोगोपाइट तथा लेपिडोलाइट जैसे खनिजों का समूह है, जो आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों में खण्डों के रूप में पाया जाता है। मिनरल ईयर बुक 2009 के अनुसार भारत 1206 हजार टन अभ्रक उत्पादित कर विश्व का (0.3%) 15वाँ सर्वाधिक अभ्रक उत्पादक राष्ट्र है। ज्ञातव्य है कि अभ्रक का मुख्य उपयोग विद्युतीय सामान में इन्सुलेटर सामग्री के रूप में तथा वायुयानों में उच्च शक्ति वाली मोटरों में, रेडियों उद्योग तथा रडार में होता है।

अभ्रक (कच्चा) के चार शीर्ष भण्डारक राज्य

राज्य% अंश
राजस्थान51
आन्ध्र प्रदेश28
महाराष्ट्र17
बिहार3

चार शीर्ष अभ्रक (कच्चा) उत्पादक राज्य

राज्य% अंश में
आन्ध्र प्रदेश100.0
राजस्थानउत्पादन नहीं हुआ
बिहारउत्पादन नहीं हुआ
झारखण्डउत्पादन नहीं हुआ

प्राकृतिक अभ्रक के उत्पादन में भारत का विश्व में 15वाँ (0.3%) स्थान है जबकि अभ्रक शीट के उत्पादन एवं भण्डारण में प्रथम स्थान है। इसके आयातक देशों में जापान, यू.एस.ए. ब्रिटेन प्रमुख है। अभ्रक उत्पादक प्रमुख क्षेत्र अधोलिखित हैं। यथा

राज्यक्षेत्र
आन्ध्र प्रदेशनैल्लोर और खम्भात
राजस्थानजयपुर तथा उदयपुर
झारखण्डहजारीबाग, सिंह भूमि
बिहारगया, आगलपुर, मुंगेर

 जिप्सम (Gypsum)

यह अवसादी चट्टानों पाया जाता है। इसे सैलेनाइट भी | कहते हैं। यह कैल्शियम का एक जलकृत सल्फाइड है। इसका उपयोग मृदा सुधारक, सीमेंट तथा चूना मिलाकर प्लास्टर-ऑफ-पेरिस, रंग-रोगन-रासायनिक पदार्थों, गन्धक का अम्ल एवं रासायनिक खाद बनाने में किया जाता है।

जिप्सम भण्डारक प्रथम तीन राज्य

राज्य% अंश में
राजस्थान43.28
जम्मू एवं कश्मीर42.46
तमिलनाडु9.37

जिप्सम उत्पादक शीर्ष दो राज्य

राज्य% अंश में
राजस्थान99
जम्मू एवं कश्मीर0.80

जिप्सम उत्पादक प्रमुख क्षेत्र अधोलिखित है। यथा

राज्यक्षेत्र
राजस्थाननागौर, बीकानेर, जैसलमेर, गंगानगर, बाड़मेर, और पाली जिले
जम्मू एवं कश्मीरउरी, बारामूला, डोडा जिले
तमिलनाडुकोयम्बटूर, तिरुचिरपाल्ली व
चिंगलपेट जिला

बॉक्साइट (Bauxite)

बॉक्साइट टर्शियरी युग में निर्मित लेटराइटी शैलों से सम्बद्ध है, जो एल्युमिनियम का ऑक्साइड है। यह अवशिष्ट अपक्षय का प्रतिफल है जिससे सिलिका का निक्षालन होता है। ज्ञातव्य है कि बॉक्साइट में एल्युमिना की मात्रा 55 से 65 प्रतिशत होता है।

एल्युमिनियम एक हल्की, मजबूत, धातुवर्गनीय (Malleable), तन्य (Ductile), ऊष्मा एवं विद्युत की संचालक तथा वायुमण्डलीय संक्षारण की प्रतिरोधी धातु होने के कारण सर्वाधिक उपयोगी धातुओं में गिनी जाने लगी है। यह विद्युत, धातुकर्मी, वैमानिकी (Aeronautics), स्वचालित वाहनों, रसायन, रिफ्रेक्टरी बॉक्साइट से 1 टन एलुमिना का उत्पादन और 2 टन एलुमिना से 1 टन एल्यूमिनियम का उत्पादन होता है। IMEB-09 के अनुसार भारत में बॉक्साइट का कुल भण्डार 328 करोड़ टन का है, जो विश्व के समस्त बॉक्साइट भण्डार का 7 प्रतिशत है अर्थात् संचित भण्डार की दृष्टि से भारत का स्थान चतुर्थ है।

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भारत : कृषि (India Agriculture)

रबी फसल

• यह अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती है तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती है। जैसे- गेहूँ, जौ, चना, मटर, मसूर, सरसों इत्यादि।

खरीफ फसल

• यह जून-जुलाई में बोई जाती है तथा अक्टूबर में काटी जाती है। जैसे- चावल, मक्का, कपास, ज्वार, गन्ना, बाजरा, तम्बाकू, दालें इत्यादि ।

जायद फसलें

• यह मार्च में बोई जाती है तथा मई-जून में काटी जाती है। जैसे- ककड़ी, खीरा, तरबूज, खरबूजा इत्यादि। – नकदी फसल यह वह फसल है जो व्यापार के उद्देश्य से किसानों द्वारा उगाई जाती है। जैसे- कपास, गन्ना, जूट, तम्बाकू इत्यादि।

झूम (Jhum) की खेती

  • यह अस्थिर प्रकार की कृषि है जो एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होती रहती है।
  • असम, अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैण्ड आदि पूर्वोत्तर राज्यों में यह कृषि प्रचलित है। इसमें जंगलों में आग लगाकर, पेड़ों को काटकर, भूमि साफ की जाती है।
  • इसके बाद इस भूमि पर खेती की जाती है। 2-3 साल बाद यह भूमि त्याग दी जाती है और नई भूमि तैयार की जाती है। इस प्रकार एक के बाद एक वनों का सफाया होता रहता है।
  • यह खेती पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है क्योंकि जंगलों को समाप्त करने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ जाता है।
  • झूम खेती विश्व के अन्य देशों में भी होती है जहाँ इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।

झूम खेती देश 

लाडांग (Ladang) मलेशिया 

चैंगिन (Chengin) फिलीपीन्स

मिलपा (Milpa) मैक्सिको 

कोनुको (Konuko)  वेनेजुएला

माजोले (Masole)  जायरे बेसिन 

चेना (Chena) श्रीलंका

कृषि सम्बन्धी राज्यवार उत्पादन (अवरोही क्रम में) उत्पादन हजार टन में (वर्ष 2009-10 में) 

चावल (Rice) (1) पश्चिम बंगाल (2) पंजाब (3) उत्तर प्रदेश 

गेहूँ (Wheat) (1) उत्तर प्रदेश (2) पंजाब (3) हरियाणा 

ज्वार (Jowar) (1) महाराष्ट्र (2) कर्नाटक (3) मध्य प्रदेश 

बाजरा (Bazra) (1) राजस्थान (2) उत्तर प्रदेश (3) हरियाणा 

मक्का (Miaze) (1) कर्नाटक (2) आंध्र प्रदेश (3) महाराष्ट्र 

कुल खाद्यान्न (1) उत्तर प्रदेश (2) पंजाब (3) मध्य प्रदेश 

चना (Gram) (1) मध्य प्रदेश (2) महाराष्ट्र (3) आन्ध्र प्रदेश 

अरहर (Pulse) (1) महाराष्ट्र (2) मध्य प्रदेश (3) कर्नाटक 

मूंगफली (Groundnut) (1) गुजरात (2) आन्ध्रप्रदेश (3) तमिलनाडु 

रेपसीड और सरसो (1) राजस्थान (2) हरियाणा (3) मध्य प्रदेश 

कपास (हजार बेल्स) (Cotton) (1) गुजरात (2) महाराष्ट्र (3) आन्ध्रप्रदेश ।

जूट (Jute) हजार बेल्स (1) पश्चिम बंगाल (2) बिहार (3) असम

काफी (Coffee) (1) कर्नाटक (2) केरल (3) तमिलनाडु 

चाय (Tea) (1) असम (2) पश्चिम बंगाल (3) तमिलनाडु 

प्राकृतिक रबड़ (Natural Rubber) (1) केरल (2) तमिलनाडु (3) कर्नाटक 

नारियल (Coconut) (1) केरल (2) तमिलनाडु (3) कर्नाटका 

गन्ना (Sugar Cane) (1) उत्तर प्रदेश (2) महाराष्ट्र (3) कर्नाटक 

तम्बाकू (Tobacco) (1) आन्ध्रप्रदेश (2) गुजरात (३) कर्नाटक 

आलू (Potato) (1) उत्तर प्रदेश (2) पश्चिम बंगाल (3) बिहार 

कुल रेशम (हजार किग्रा.) (Silk) (1) आन्ध्र प्रदेश (2) कर्नाटक (3) पश्चिम बंगाल 

केला (Banana) (1) महाराष्ट्र (2) तमिलनाडु (3) गुजरात 

काली मिर्च (Black Pepper) (1) केरल (2) कर्नाटक (3) तमिलनाडु 

सोयाबीन (1) मध्यप्रदेश (2) महाराष्ट्र (3) राजस्थान 

तिलहन (1) मध्य प्रदेश (2) राजस्थान (3) गुजरात 

भेड़ (हजार) (Sheep) (1) आंध्रप्रदेश (2) राजस्थान (3) कर्नाटक 

कुल दूध (Milk) (1) उत्तर प्रदेश (2) पंजाब (3) राजस्थान

शीर्ष पाँच बंजर भूमि वाले राज्य

राज्य (2005)बंजर भूमि वर्ग किमीभौगो. क्षे. का %
राजस्थान10145429.64
जम्मू-कश्मीर7020269.24
म. प्र.5713418.53
महाराष्ट्र4927516.01
आन्ध्र प्रदेश4526716.45
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भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान/अभयारण्य (National Park / Sanctuary)

भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान/अभयारण्य

राष्ट्रीय उद्यान/अभयारण्यराज्यप्रमुख वन्य जीव
मानस वन्य जीव अभयारणअसमभालू, चीता, हाथी, लंगूर
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यानअसमएक सींग वाला गैंडा हाथी
गरम पानी वन्य जीव अभयारणअसमघड़ियाल
औरांग वन्य जीव अभयारणअसम
पक्कुई वन्यजीव अभयारणअरुणाचल प्रदेशहाथी, हिरण, अजगर
नामदफा वन्य जीव अभयारणअरुणाचल प्रदेश
जिम कॉरवेट राष्ट्रीय उद्यान (भारत का पहला राष्ट्रीय पार्क)उत्तराखण्डबाघ, चीता, हिरण, भालू, हाथी
गोविन्द पशु विहारउत्तराखण्ड
नन्दा देवी जीवन आरक्षित क्षेत्रउत्तराखण्डकाला भलू, भूरा भालू, कस्तूरी मृग, सुनहरा बाज
वैली ऑफ फ्लावर्सउत्तराखण्ड
बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यानकर्नाटकचीता, तेंदुआ, हाथी, सागर
सोमेश्वर वन्य जीव अभयारण्यकर्नाटक
डन्डेली वन्य जीव अभयारणकर्नाटक
रंगनाथिटू पक्षी विहार कर्नाटक
बनेर धट्टा राष्ट्रीय उद्यान कर्नाटक
नागर होल राष्ट्रीय उद्यानकर्नाटकचीता, हाथी, तेंदुआ, भालू, चकोर, तीतर
तुंग भद्रा वन्य जीव अभयारणकर्नाटक
पारम्वीकुलम वन्य जीव अभयारणकेरलजंगली सुअर, नीलगाय, हिरण, तेंदुआ, सांभर
पेरियार वन्य जीव अभयाराकेरलचीता, हाथी, तेंदुआ
खगचंदजेदा राष्ट्रीय उद्यानसिक्किम
कंचनजंगा वन्य जीव अभयारणसिक्किम
दुधवा राष्ट्रीय उद्यानउत्तर प्रदेशचीता, बाघ, नीलगाय, सांभर
चन्द्रप्रभा वन्य जीव अभयारणउत्तर प्रदेशभालू, नील गाय, तेंदुआ, चीता
सिमली पाल वन्य जीव अभयारणउड़ीसाहाथी, बाघ, चीता, मगरमच्छ
चिल्का अभयारणउड़ीसाजल कौवा, प्रवासी पक्षी, पेलीवन
इन्द्रावती रा0उ0छत्तीसगढ़
कंगेरघाटी अभयारणछत्तीसगढ़
संजय राष्ट्रीय उद्यानछत्तीसगढ़
वोरीवली (संजय गांधी) रा0उ0महाराष्ट्रलंगूर, हिरण, तेंदुआ, जंगली सुअर
नवेगाव राष्ट्रीय उद्यानमहाराष्ट्र
पंच राष्ट्रीय उद्यानमहाराष्ट्रचीता, साभर, चौसिया
रणथम्बौर वन्य जीव अभयारणराजस्थानचीता, बाघ, शेर, लकड़बग्घा
सरिस्का वन्य जीव अभयारणराजस्थानप्रोजेक्ट टाइगर
केवला देव घाना पक्षी विहारराजस्थानसाइबेरियन सारस, मुर्गा, घड़ियाल, साइबेरियन क्रेन
गिर राष्ट्रीय उद्यानगुजरातशेर, साभर, तेंदुआ, जंगली सुअर
नल सरोव अभयारणगुजरातजलपक्षी
वालाराम राष्ट्रीय उद्यानगुजरात
जंगली गधा जीयारणगुजरातगधा
केवुल लमजोआमणिपुरदुर्लभ जाति के हिरन
डचीगम अभयारणजम्मू कश्मीरहांगुल (कश्मीरी मृग) इसे रेड डाटा बुक
में उल्लेखित किया गया है।
सिटी फारेस्ट (सलीन अली) अभयारणजम्मू कश्मीर
जलदापारा वन्य जीव ीीयारणपश्चिम बंगाल
सुन्दर वन टाइगर रिजर्वपश्चिम बंगाल
कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यानमध्य प्रदेशबाघ, चीता, तेंदुआ, बारहसिंहा
पंचमढ़ी अभयारणमध्य प्रदेश
बाधव गढ़ राष्ट्रीय उद्यानमध्य प्रदेश
गांधी सागर वन्य जीव अभयारणमध्य प्रदेश
पन्ना राष्ट्रीय उद्यानमध्य प्रदेश
सिंथौली वन्य जीव अभयारणमध्य प्रदेश
हजारी बाग वन्य जीव अभयारणझारखण्ड चीता, भालू, तेंदुआ
डोल्मा वन्य जीव अभयारणझारखण्ड हाथी, तेंदुआ, हिरण
तोपचाची अभयारणझारखण्ड
वेतला वन्य जीव अभयारणझारखण्ड
कैमूर वन्य जीव अभयारणबिहारबाघ, नील गाय, घड़ियाल
राजगीर अभयारणबिहार
गौतम बुद्ध वन्य जीव अभयारणबिहार
इंटाग्फी वन्य जीव अभयारणनागालैण्ड
डाम्प वन्य जीव अभयारणमिजोरम
रास आइलैण्ड राष्ट्रीय उद्यानअंडमान नीकोबार द्वीप समूह
शिकटी देवी वन्य जीव अभयारणहिमांचल प्रदेश
रोहला राष्ट्र उद्यानहिमांचल प्रदेश
नोक्रेक रिजर्वमेघालय
वाल पक्रम अभयारणमेघालय
मुदुमलाई वन्य जीव अभयारणतमिलनाडु
वादान्तंगल पक्षी विहारतमिलनाडु
कावल वन्य जीव अभयारणआन्ध्र प्रदेश
नालापट्टी पक्षी विहारआन्ध्र प्रदेश
कोल्लेरू एलिकेनरीआन्ध्र प्रदेश
पाखाल वन्य जीव अभयारणआन्ध्र प्रदेश
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भारत : मिट्टियाँ (India: Soils)

भारत में मुख्य रूप से आठ प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं

1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)

• उत्तर भारत के विशाल मैदानों में यह मिट्टी नदियों द्वारा लाकर जमा की गयी है तथा समुद्री तटों पर समुद्री लहरों द्वारा। यह मिट्टी दो उपवर्गों में बँटी हुई है- नयी मिट्टी (खादर) एवं पुरानी जलोढ़ मिट्टी (बांगर)। धान, गेहूँ, दलहन, तिलहन, गन्ना एवं जूट की खेती के लिए यह मिट्टी बहुत उपयुक्त है। यह 46.2 प्रतिशत क्षेत्र में है। 

2. काली मिट्टी (Black Soil or Regur Soil)

• यह मिट्टी मुख्यतः दक्कन के लावा क्षेत्र में पाई जाती है। इस मिट्टी का रंग गहरा काला होता है क्योंकि इसमें लोहा, एल्यूमीनियम और मैग्नीशियम लवण की मात्रा अधिक होती है। इस मिट्टी के कण , घने होते हैं जिसके कारण नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसका क्षेत्र महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में फैला हुआ है। यह मिट्टी कपास की फसल के लिए अच्छी होती है। 

3. लाल मिट्टी (Red Soil)

इसका निर्माण स्वेदार आग्नेय शैल जैसे ग्रेनाइट तथा निस के विखण्डन से हुआ है। कहीं-कहीं इसका रंग पीला, भूरा, चॉकलेटी और काला भी पाया जाता है। रंग की विभिन्नता का कारण लोहे के अंश की विभिन्नता है। मुख्य रूप से यह मिट्टी दक्षिणी भारत में मिलती है। इस मिट्टी की प्रधान उपज ज्वार-बाजरा, दलहन, तम्बाकू आदि है। 

4. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)

इसका निर्माण मानसूनी जलवायु के विशेष लक्षण-आर्द्र एवं शुष्क मौसम के क्रमिक परिवर्तन के कारण निक्षालन की प्रक्रिया (leaching away) द्वारा होता है। इसमें सिलिका की कमी होती है। इसमें लोहा तथा ऐल्युमीनियम अधिक होता है। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलने वाली लैटेराइट निम्न क्षेत्र में पाई जाने वाली लैटेराइट की तुलना में ज्यादा अम्लीय होती है। यह मिट्टी झारखण्ड के राजमहल, पूर्वी और पश्चिमी घाटों के क्षेत्रों एवं मेघालय के पहाड़ी क्षेत्रों में पायी जाती है। इसम तथा पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में भी यह मिट्टी पायी जाती है। इसकी प्रधान उपज चाय, कॉफी आदि है। 

5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)

अरावली श्रेणी के पश्चिमी में जलवायु की शुष्कता तथा भीषण ताप के कारण नंगी चट्टाने विखण्डित होकर ये मिट्टी बनाती हैं। यह मिट्टी राजस्थान तथा हरियाणा के दक्षिण-पश्चिमी भाग में पायी जाती हैं। इसमें सिंचाई की उपलब्धता के द्वारा कृषि कार्य सम्भव है। 

6. वन एवं पर्वतीय मिट्टी (Forests and Mountain Soil)

• इस प्रकार की मिट्टी अधिकांशतः वनों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में मिलती है। ये मिट्टियाँ उन क्षेत्रों को घेरती हैं, जहाँ या तो पर्वतीय ढाल हो या वन्य क्षेत्रों में घाटियाँ हों। इसमें जैविक पदार्थों तथा नाइट्रोजन की अधिकता होती है। यह हिमालय के पर्वतीय भागों तमिलनाडु, कर्नाटक, मणिपुर, आदि जगहों पर मिलती है। 

7. लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी (Saline and Alkaline Soils)

• ये अनुर्वर एवं अनुत्पादक रेह, ऊसर एवं कल्लर के रूप में भी जानी जाती है। ये मिट्टियाँ अपने में सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम समाहित करती हैं। उत्तरी भारत के सूखे एवं अर्द्ध सूखे क्षेत्रों, यथा पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान तथा बिहार के कुछ हिस्सों में इस मिट्टी का विस्तार है। 

8. पीट एवं जैविक मिट्टी (Prary and Marshy Soils)

उच्च घुलनशील लवण एवं जैविक पदार्थों से युक्त पीट मिट्टी केरल के अलप्पी व कोट्टायम जिले, बिहार के पूर्वोत्तर भाग, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में मिलती है।

शीर्ष पाँच लवणीय मृदा वाले राज्य

राज्य क्षेत्रफल लाख हेक्टेयर
गुजरात12.16
प. बंगाल8.20
आन्ध्र प्रदेश5.88
हरियाणा5.00
तमिलनाडु4.70

महत्वपूर्ण तथ्य 

पारिस्थितकीय आधार पर मृदा अधोलिखित प्रकार की होती है। यथा

1. अवशिष्ट मिट्टी (Residual Soil)- जो मिट्टी बनने के स्थान पर ही पड़ी रहती है उसे अवशिष्ट मिट्टी कहते हैं। 

2. वाहित मिट्टी (Transported Soil)- यह मिट्टी बनने वाले स्थान से बहकर आई हुई मिट्टी होती है।

3. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)-  जो मिट्टी जल द्वारा बहकर दूसरे स्थान पर पहुंचती है। 

4. वातोढ़ मिट्टी (Eoilan)- जो मिट्टी वायु द्वारा उड़कर दूसरे स्थानपर पहुंचती है। 

5. शैल, मलवा मिट्टी (Colluvial)- जो मिट्टी पृथ्वी के आकर्षण के द्वारा दूसरे स्थान पर पहुंचती है।

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भारतीय राज्यव्यवस्था के महत्वपूर्ण प्रश्न (Important questions of Indian polity)

लोकसभा द्वारा पारित धन विधेयक को राज्यसभा को कितने दिन के भीतर लौटाना होता है ?

-14 दिन 

संसद में बजट कौन प्रस्तुत करता है ?

-वित्त मंत्री 

राजनीति विज्ञान का केन्द्रीय प्रतिपाद्य क्या है ?

-राज्य

संविधान सभा ने अपना स्थायी अध्यक्ष किसे चुना था ?

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को

 राष्ट्रीय एकता परिषद् की अध्यक्षता कौन करता है ?

-प्रधानमंत्री 

भारत के प्रधानमंत्री को कौन नियुक्त करता है ?

–भारत का राष्ट्रपति 

यूनाइटेड किंगडम (ग्रेड ब्रिटेन) में कैसा शासन है ?

-एकात्मक शासन 

राष्ट्रीय आपात् स्थिति में भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों को निलंबित करने का अधिकार किसको है ?

–भारत के राष्ट्रपति को 

कुछ मूल अधिकार सशस्त्र सेनाओं के सदस्यों को उपलब्ध नहीं होते हैं। इसके निर्णय का अधिकार किसको है ?

-संसद को 

किसी राज्य की विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी होती है ?

-500 

भारतीय संविधान का कौन-सा मूल अधिकार सिक्खों को कृपाण रखने का अधिकार देता है ? |

-धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार 

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में किसकी सर्वोच्चता होती है ?

-संविधान की 

लोकसभा के अध्यक्ष को कौन हटाता है ?

-लोकसभा के बहुसंख्यक सदस्य

किसको संसद द्वारा महाभियोग के जरिए अपने पद से हटाया जा सकता है ?

–भारत के राष्ट्रपति 

राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता पाने के लिए किसी राजनीतिक दल को कम-से-कम कितने राज्यों में मान्यता प्राप्त करनी चाहिए ?

-चार राज्य 

लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में आधिकारिक रूप में मान्यता पाने के लिए उसके दल के सदस्यों की संख्या कम-से-कम कितनी होनी चाहिए ?

-सदन के कुल सदस्यों का 10 प्रतिशत 

राज्यसभा की एक-तिहाई जगहों को भरने के लिए चुनाव कब किए जाते हैं ?

-दो वर्ष में एक बार 

संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता कौन करता है ?

-लोकसभा के अध्यक्ष

एक अपराध के दोष-सिद्ध व्यक्तियों को क्षमा करने का अधिकार किसको होता है ? -राष्ट्रपति और राज्यपाल • 

दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत भारतीय संसद सदस्य या राज्य विधान मंडल के किसी सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाती है, यदि वह

-अपने दल की सदस्यता छोड़ देता है 

द्विसदन पद्धति किसकी सूचक है ?

-दो सदनों वाला विधान मंडल 

भारत में किस राज्य का अलग संविधान है ?

-जम्मू-कश्मीर 

भारतीय संविधान के निर्माताओं में ‘सरकार का संसदीय स्वरूप’ कहाँ से लिया था ?

-ब्रिटेन से 

केन्द्रीय मंत्रिमंडल के आकार और सदस्यता का निर्णय कौन करता है ?

-प्रधानमंत्री 

राष्ट्रपति किसकी सलाह/अनुरोध पर लोकसभा को उसकी अवधि की समाप्ति से पहले भंग कर सकता है ?

-प्रधानमंत्री 

राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचन मंडल में कौन-से सदस्य शामिल होते हैं ? 

-संसद और राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य

भारत के संविधान में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति प्रदान की गई है, जिसका मुख्य आधार है- -अनुच्छेद-13 

मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अलावा, केन्द्र में कितने निर्वाचन आयुक्त होते हैं ?

-दो 

राज्य सरकार के कार्य किसके नाम में कार्यान्वित किए जाते हैं ?

-राज्य के राज्यपाल 

भारत के किस राज्य का अपना संविधान है ?

-जम्मू कश्मीर 

राष्ट्रपति द्वारा आपात् स्थिति की घोषणा के लिए क्या आवश्यक है ?

-तीस दिन के भीतर संसद का अनुमोदन 

भारत में शासन करने के अवशिष्ट अधिकार किसके पास हैं ?

-केन्द्र सरकार 

राष्ट्रपति के अध्यादेश की अधिकतम अवधि कितनी होती

-छः सप्ताह 

जब एक समाज सभ्यता के चरण में पहुँचता है तब उसकी सबसे बड़ी विशेषता किसका आविर्भाव होता है ?

_–संगठित सामुदायिक जीवन का

आधार पर वर्गीकृत की जाती हैं ?

-विधानमंडल और कार्यपालिका 

किस राज्य में जनता कसी राय नियन्त्रित और परिचालित नहीं की जाती है ?

-उदार प्रजातंत्रीय राज्य में

• एक उदार प्रजातंत्र में ‘समानता’ की संकल्पना में किस बात पर जोर दिया गया है ? 

-सभी व्यक्तियों को एक ही/समान नैतिक महत्व और सम्मान दोनों है 

• एक संघ मुख्य रूप से राज्य का अधीनस्थ होता है, क्योंकि

-उसको राज्य के समान सर्वोपरी शक्ति प्राप्त नहीं होती है |. 

भारत का संविधान कब से लागू हुआ ?

-26 जनवरी, 1950 से |

• भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकार दिये गये हैं

-संविधान के भाग-III में 

भारत के कौन-से राष्ट्रपति लगातार दो कार्यकाल तक अपने पद पर बने रहें ?

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 

राष्ट्रीय आपात स्थिति की घोषणा जारी नहीं रहती यदि संसद उसे अनुमोदन प्रदान न कर दे

-एक माह के भीतर 

संसद के दोनों सदनों की बैठकों का सभापति कौन होता है ?

-लोकसभा अध्यक्ष 

उस संसद समिति को जो भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट का संवीक्षण करती है, कहा जाता है

-प्राक्कलन समिति 

लोकसभा की बैठक के लिए कम-से-कम कितने सदस्यों का कोरम होना चाहिए ?

-सदन के कुल सदस्य संख्या का 1/10वाँ भाग 

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की नियुक्ति । कौन करता है ?

-राष्ट्रपति 

राज्यसभा का पदेन (Ex-officio) अध्यक्ष कौन होता है ?

-उपराष्ट्रपति 

राष्ट्रपति का पद अधिकतम कितने महीने के लिए रिक्त रह सकता है ?

-छह माह 

बराबर वोट पड़ने पर निर्णायक मत कौन देता है ?

-अध्यक्ष (Speaker) 

राज्यपाल कब तक अपने पद पर बना रह सकता है ?

-राष्ट्रपति जब तक चाहे 

• वित्त विधेयक कहाँ पेश किये जा सकते हैं ?

-केवल लोकसभा में |

• मृत्यु-दंड को कौन माफ कर सकता है ?

-राष्ट्रपति 

कौन-सा प्रजातांत्रिक देश स्वरूप में संघात्मक परंतु प्रकृति में एकात्मक कहा जाता है ?

–भारत 

सरकारों को एकात्मक और संघात्मक के रूप में वर्गीकृत करने का आधार क्या है ?

-केन्द्र और राज्यों के बीच में संबंध

संसद राज्य सूची में दिए गए विषयों के बारे में कब कानून बना सकती है ?

-दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर 

किसी सांविधानिक सरकार के दो मूल मूल्य क्या होते

-स्वतंत्रता और समानता 

• राज्यों के राज्यपाल कब तक अपने पद पर बने रहते हैं ?

-राष्ट्रपति का प्रसाद बने रहने तक 

यदि किसी मनुष्य को संचालन की स्वतंत्रता नहीं दी जाती है तो इसका अर्थ कौन-सी स्वतंत्रता से वंचित करना है ?

-नागरिक स्वतंत्रता 

किसी राज्य के महाधिवक्ता के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए व्यक्ति में किसकी योग्यताएँ होनी चाहिए ?

-उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का 

अल्पकालीन अध्यक्ष का क्या कार्य होता है ?

-सदस्यों को शपथ दिलाना और नियमित अध्यक्ष के चुने जाने तक कार्य संभालना 

भारत के राष्ट्रपति पर संसद द्वारा महाभियोग लगाया जा सकता है 

-यदि वह-उस पर संविधान के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता

• संविधान के अनुच्छेद-I में भारत को क्या कहा गया है ?

-राज्यों का संघ 

किस विधान मण्डल को संसदों की माता के रूप में सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त है ?

-ब्रिटिश संसद 

फासिस्टवाद किसमें विश्वास करता है ?

___-जाति की श्रेष्ठता 

कानूनी समानता में यह निहित होता है कि

-कानून के सामने हरेक व्यक्ति समान है 

• सरकार वास्तव में किसका अभिकर्ता है ?

-राज्य का

 • राज्यसभा की अधिकतम सदस्या संख्या क्या है ?

-250 

संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा का अध्यक्ष बनने वाला प्रथम भारतीय कौन था ?

-वी. के. कृष्णमेनन

 • राष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती कहाँ दी जा सकती है ?

-उच्चतम न्यायालय में

 • निर्वाचन आयोग किस प्रकार की संस्था है ?

-संवैधानिक संस्था 

• भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का अध्यक्ष कौन होता है ?

भारत का राष्ट्रपति 

संविधान के किस अंश में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा की विस्तार से चर्चा हुई है ?

-राष्ट्रनीति के दिशासूचक सिद्धान्त में 

• उप-निरीक्षक पुलिस किसका अंग है ?

-कार्यपालिका का

भारतवर्ष में मताधिकार की आयु किस ढंग से 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई ? 

-संवैधानिक संशोधन द्वारा 

वित्त आयोग क्या है ?

-पंचवार्षिक निकाय 

भारत का संविधान देश को किस रूप में वर्णित करता है ?

-राज्यों का संघ 

भारत के संविधान का तिहत्तरवाँ संशोधन अधिनियम, 1992 के पारित किए जाने का क्या कारण था ?

-पंचायती राज को बल प्रदान 

करना भारतीय संविधान में राज्य की शक्तियाँ एवं कार्य किस प्रकार विभाजित किए गए हैं ? 

-तीन सूचियों में 

भारत के राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा में एंग्लो-इण्डियन समुदाय के कितने सदस्यों को मनोनीत किया जा सकता है ?

-दो 

संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन का सभापतित्व कौन करता है ?

-लोकसभा के अध्यक्ष 

प्रथम अधिनियम जिसके अंतर्गत, अपने अंतर्विवाही समूह का सदस्य न होने वाले व्यक्ति के साथ विवाह की अनुमति प्रदान करने वाला था ?

-विशेष विवाह अधिनियम 

समवर्ती सूची में लिखे विषयों पर अधिनियम बनाने का अधिकार किसके पास होता है ?

-राज्य और संघ के पास 

किसी विशेष दिन, लोकसभा में अधिकतम कितने तारांकित प्रश्न पूछे जा सकते हैं ?

-20 

• प्रेस की स्वतंत्रता किस अधिकार में निहित है ?

-भाषण-स्वातंत्र्य 

भारत में संघीय शासन प्रणाली किस अधिनियम के अंतर्गत प्रारंभ हुई ? 

-भारत सरकार अधिनियम, 1935 

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से संबंधित चुनाव विवादों का समझौता करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय को है। यह उसका कैसा अधिकार है ? 

-मौलिक अधिकार 

संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष कौन बने थे ?

-सच्चिदानन्द सिन्हा 

वित्त आयोग (Finance Commission) के अध्यक्ष की नियुक्ति कौन करता है ?

-राष्ट्रपति 

राज्य में मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूपप से किनके प्रति उत्तरदायी होंगे?

-विधानसभा 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 किन विषयों पर विचार करते हैं ?

-मंत्रिपरिषद 

भारतीय संविधान के प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे ?

-डॉ. बी. आर. अम्बेडकर 

चतुर्थ सम्पदा (Fourth Estate) किसको निर्दिष्ट करती है ?

-समाचार-पत्र 

राज्यसभा का एक स्थायी (Permanent) सदन होने का क्या कारण है ? -क्योंकि एक-तिहाई सदस्य प्रति दो वर्ष पर सेवानिवृत्त होते हैं

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भारतीय राज्यव्यवस्था से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य (Important facts Indian polity)

भारतीय राज्यव्यवस्था से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

  1. भारतीय संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन प्रस्तावों के अनुसार किया गया। 
  2. इसके गठन के लिए जुलाई-अगस्त 1946 में चुनाव हुआ।
  3. 3 जून 1947 के भारत संविधान की योजना की घोषणा के बाद इसका पुनगर्छन हुआ तथा पुनर्गठित संविधान सभा की संख्या 299 थी। 
  4. संविधान सभा के वैधानिक सलाहकार (Constitutional Advisor) के पद पर बी. एन. राव को नियुक्त किया गया। 
  5. 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति (Drafting Committee) का गठन किया। 
  6. 15 नवम्बर 1948 को संविधान के प्रारूप पर प्रथम वाचन प्रारम्भ हुआ। 
  7. 26 नवम्बर 1949 को संविधान के प्रारूप पर अन्तिम वाचन हुआ और इसी दिन संविधान सभा द्वारा पारित कर दिया गया। 
  8. 26 नवम्बर 1946 को संविधान के उन अनुच्छेदों को प्रस्तावित कर दिया गया जो नागरिकता निर्वाचन तथा अंतरिम संसद से सम्बन्धित थे। 
  9. संविधान सभा का अंतिम दिन 24 जनवरी 1950 था और उसी दिन संविधान पर संविधान सभा के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर कर दिया गया। 
  10. संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा। 
  11. वर्तमान में संविधान में 444 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ हैं। 
  12. “पंथनिरपेक्ष’, “समाजवाद” तथा “अखण्डता” शब्द संविधान की उद्देशिका में 42 वें संशोधन के द्वारा 1976 में जोड़े गये। 
  13. भारत की उद्देशिका में प्रयुक्त “गणतन्त्र’ शब्द का तात्पर्य यह है कि भारत का राज्याध्यक्ष वंशानुगत (hereditary) नहीं होगा। 
  14. उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार-संविधान की उद्देशिका संविधान का एक भाग है और इसमें संशोधन किया जा सकता है (केशवानंद भारती बनाम केरल – 1973 ई.)। 
  15. प्रो. व्हीयर ने भारत के संविधान को अर्द्धसंघीय (Quasifederal) संविधान कहा है। 
  16. राज्य पुनगर्छन अधिनियम 1956 द्वारा भाषाई आधारों पर राज्यों का पुनगर्छन किया गया।
  17. भारतीय संविधान में नागरिकता शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है तथा इसके सम्बन्ध में अनुच्देद 5 से 11 तक में प्रावधान किया गया है। 
  18. संविधान के अनुसार कुछ पद केवल भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित है, जैसे- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, महान्यायवादी राज्यपाल एवं महाधिवक्ता का पद। 
  19. संविधान के 44 वें संशोधन द्वारा सम्पत्ति के मूलाधिकार को समाप्त करके इस अनुच्छेद 300(क) के अर्न्तगत रखा गया है। अब यह केवल एक विधिक (Legal) अधिकार रह गया है। 
  20. अनु. 15, 16, 19, 29 तथा 30 द्वारा प्रतयाभूत मूलाधिकार केवल नागरिकों को ही प्रदान किये गये हैं। शेष सभी मूलाधिकार नागरिकों तथा अन्य व्यक्तियों को प्रदान की गयी है। 
  21. मूल कर्तव्यों को 42वें संविधान संशोधन द्वारा 1976 में जोड़ा गया। 
  22. राष्ट्रपति अपने पद पर रहते हुये किसी भी कार्य के लिए न्यायालय में उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। 
  23. भारत में केवल नीलम संजीवा रेड्डी ही र्निविरोध राष्ट्रपति चुने गये। 
  24. भारत के दो राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन तथा फखरूद्दीन अली अहमद की अपने कार्यकाल के दौरान ही मृत्यु हुयी थी। 
  25. भारत के मुख्य न्यायधीश मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने दो बार कार्यकारी राष्ट्रपति के पद का निर्वहन किया था। 
  26. भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है तथा इसी पद के कारण उसका वेतन दिया जाता है। 
  27. संघ शासन की वास्तविक शक्ति केन्द्रीय मंत्रिमंडल में निहित होती है, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है। 
  28. प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य यह है कि संघ के शासन की जानकारी राष्ट्रपति को दे 
  29. प्रधानमंत्री लोकसभा के बहुमत दल का नेता होता है। 
  30. केन्द्रीय मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामुहिक रूप से उत्तरदायी होती है। 
  31. संसद के तीन अंग होते हैं- लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति। 
  32. सरकार के तीन अंग होते हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। 
  33. राज्यसभा का गठन 3 अप्रैल 1952 को हुआ और इसकी पहली बैठक 13 मई 1952 को हुयी।
  34. राज्यसभा के सदस्यों के पहले समूह की सेवा निवृत्ति 2 अप्रैल 1954 को हुयी। 
  35. लोकसभा के परिक्षेत्र का परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है। 
  36. प्रथम लोकसभा की पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई और 4 अप्रैल 1957 को पहली लोकसभा राष्ट्रपति द्वारा विघटित कर दी गयी। 
  37. राज्यसभा तथा लोकसभा के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
  38. लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर थे। पं. जवाहर लाल नेहरू ने इन्हें संसद का पिता या जनक कहा था। 
  39. संयुक्त संसदीय समिति में लोकसभा को दो तिहायी तथा राज्यसभा के एक तिहायी सदस्य होते हैं। 
  40. धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है। 
  41. धन विधेयक के सम्बन्ध में राज्यसभा को केवल सिफारिशी अधिकार है। 
  42. राज्यपाल विधान मंडल के सत्रावसान काल में अध्यादेश जारी कर सकता है। यह अध्यादेश 6 माह तक प्रभावी रहता है। 
  43. राज्यों की मंत्रिपरिषद सामुहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है तथा प्रत्येक मंत्री व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल के प्रति उत्तरदायी होता है। 
  44. राज्य विधानमंडल में राज्यपाल तथा विधानसभा और विधान परिषद शामिल होता है। 
  45. राज्य के विधानसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 500 और न्यूनतम संख्या 60 होगी।
  46. विधानसभा की गणपूर्ति संख्या कुल सदस्यों का 1/10 है। परन्तु यह किसी भी दशा में 10 सदस्य से कम नहीं होगी। 
  47. संविधान के अनुच्छेद 370 द्वारा जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है।
  48. जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा में दो महिलाओं को राज्यपाल नामजद करते हैं। 
  49. राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में वित्तीय आपात की घोषणा नहीं कर सकते। 
  50. राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों से सम्बन्धित संविधान के भाग 4 के प्रावधान जम्मू-कश्मीर राज्य केविषय में लागू नहीं होते हैं। 
  51. जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना संविधान है, जो एक पृथक संविधान सभा द्वारा बनाया गया है और यह संविधान 26 नवम्बर 1957 को लागू कर दिया गया। 
  52. भारत में केवल दो संघ शासित राज्यां में विधान सभायें हैं- दिल्ली और पांडिचेरी। 
  53. भारत में उच्च न्यायालय की संख्या 21 है। देश में छ: ऐसे राज्य हैं जहाँ पर विधान परिषदों का गठन किया गया है- 1. उत्तर प्रदेश,  2. बिहार,  3. महाराष्ट्र,  4. कर्नाटक,  5. जम्मू-कश्मीर और  6. आन्ध्र प्रदेश।
  54. 4 अप्रैल, 2007 को आन्ध्र प्रदेश में पुनः विधानपरिषद का गठन किया गया।
  55. राष्ट्रपति प्रत्येक पाँचवे वर्ष वित्त आयोग का गठन करता है। 
  56. प्रथम वित्त आयोग का गठन 1951 में किया गया था।
  57. भारतीय संविधान के प्रवर्तित होने के बाद पहली बार राष्ट्रपति शासन पंजाब में लागू किया गया।
  58. संविधान सभा के 284 सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किये। 
  59. जब भारत आजाद हुआ तो उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लामेंट एटली थे। 
  60. जब भारत आजाद हुआ तो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष जे. पी. कृपलानी थे। 
  61. 15 अगस्त, 1947 से 26 जनवरी 1950 के मध्य भारत-ब्रिटिश राष्ट्रकुल का एक अधिराज था।
  62. भारतीय संविधान 22 भागों में विभाजित किया गया है। 
  63. भारतीय संविधान के प्रस्तावना के अनुसार भारत की शासन की सर्वोच्च सत्ता भारतीय जनता में निहित है। 
  64. भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के स्थगन सम्बन्धी कार्यपालिका के अधिकारों को जर्मनी के संविधान से लिया गया है। 
  65. भारत संविधान संशोधन की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका के संविधान से ली गयी है। 
  66. राज्य पुर्नगठन अधिनियम 1956 में पारित किया गया, इसके अध्यक्ष फजल अली थे।
  67. संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का अलग से प्रबन्ध नहीं किया गया है। यह अनुच्छेद 19(1)A से अंर्तनिहित है। 
  68. डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय व आत्मा कहा है। 
  69. 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में मूल कर्तव्यों को शामिल किया गया है। 
  70. इन्हें संविधान के भाग IV ए और अनुच्छेद 51 ए में शामिल किया गया है। 
  71. राष्ट्रीय आपात की स्थिति में मौलिक अधिकारों का हनन हो जाता है। 
  72. संविधान में 10 मौलिक कर्तव्यों कावर्णन किया गया है। 
  73. मूल कर्तव्य (अनु0 51 क) को 42वें संविधान संशोधन 1976 में जोड़ा गया। 
  74. 86वें संविधान संशोधन द्वारा एक मूल कर्तव्य और जोड़ा गया जिससे इसकी संख्या अब ग्यारह हो गई। 
  75. “राज्य का नीति निर्देशक तत्व एक ऐसा चेक है जो बैंक की सुविधानुसार अदा किया जाएगा”- के. टी. शाह 
  76. संविधान में नीति निर्देशक तत्वों को शामिल करने का | उद्देश्य सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करना था।
  77. पहला संवैधानिक संशोधन 1951 में बनाया गया। 
  78. 42वें संविधान संशोधन को लघु संविधान कहा जाता है। 
  79. 42वें संविधान अधिनियम स्वर्ण सिंह समिति की रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था। 
  80. 52वें संविधान संशोधन विधेयक 1985 दल-बदल से सम्बन्धित था। 
  81. भारतीय संविधान में सर्वाधिक बार संशोधन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में हुये।
  82. भारत का राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रमुख है। शासन का प्रमुख मंत्रिपरिषद और प्रधानमंत्री होता है।
  83. भारतीय संविधान के अनुसार केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होता है। 
  84. राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते आयकर मुक्त है।
  85. राष्ट्रपति के पद के रिक्त होने से 6 माह के भीतर अगले राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना चाहिए। 
  86. 1952 में राष्ट्रपति के निर्वाचन के समय विपक्षी दलों का उम्मीदवार श्री के.टी. शाह थे। 
  87. राष्ट्रपति पद पर सर्वाधिक समय तक रहने वाले डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे एवं सबसे कम समय तक रहने वाले डॉ. जाकिर हुसैन थे।
  88. राष्ट्रपति पद पर सबसे कम उम्र का राष्ट्रपति बनने का सौभाग्य नीलम संजीव रेड्डी को प्रापत हुआ तथा सबसे अधिक उम्र के. आर. वेंकट रमन राष्ट्रपति बने। 
  89. किस कार्यवाहक राष्ट्रपति ने त्यागपत्र देकर चुनाव लड़ा और विजयी हुआ- वी.वी. गिरी।
  90. नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बनने से पूर्व लोक सभा अध्यक्ष रह चुके थे। 
  91. भारत के राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति ब्रिटेन की महारानी से मिलती जुलती है। 
  92. संविधान के अनुच्छेद 123 के अर्न्तगत राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करता है। 
  93. राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश संसद का सभा प्रारम्भ होने के 6 सप्ताह तक प्रभावी रहता है।
  94. राष्ट्रपति द्वारा आपात काल की उद्घोषणा के 30 दिन के भीतर संसद की स्वीकृति आवश्यक होता है। 
  95. संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदन होने के 6 माह बाद,तक आपात काल प्रभावी रहता है। 
  96. आपात काल के दौरान संसद लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष बढ़ा सकती है। 
  97. 42वें संविधान संशोधन द्वारा आपात काल की अवधिको 6 माह से बढ़ा कर एक वर्ष कर दिया गया है। 
  98. हिन्दू आचार संहिता विधेयक को लेकर प्रधानमंत्री को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से विवाद हुआ था। 
  99. भारत के उपराष्ट्रपति की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका के उपराष्ट्रपति से की जा सकती है।
  100. सर्वाधिक समय तक उपराष्ट्रपति रहने का गौरव डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को है।
  101. मन्त्री परिषद का कोई सदस्य बिना किसी सदन का सदस्य रहे 6 माह तक मन्त्री का पद धारण कर सकता मन्त्री परिषद में तीन स्तर के मन्त्री होते हैं- 1. केबिनेट, 2. राज्य, 3. उपमंत्री 
  102. सामूहिक रूप से मन्त्री परिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है। 
  103. प्रधानमंत्री पद पर सबसे कम समय तक रहने वाले अटल बिहारी बाजपेयी थे (13 दिन)।
  104. दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में पद संभालने वाले व्यक्ति गुलजारी लाल नन्दा थे। 
  105. सबसे कम उम्र में भारत का प्रधानमंत्री राजीव गांधी बने और सबसे अधिक उम्र में मोरार जी देसाई ।
  106. प्रधान मंत्री पद से त्यागपत्र देने वाले पहले व्यक्ति मोरार जी देसाई थे। 
  107. भारत के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल थे। 
  108. संघीय मंत्री परिषद से त्यागपत्र देने वाले पहले मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।
  109.  सबसे कम अवधि (5 दिन) तक मंत्री रहने का कीर्तिमान एच. आर. खन्ना के नाम है। वह विधि विभाग के मंत्री थे।
  110. भारत की सम्परीक्षा और लेखा प्रणालियों का प्रधान नियन्त्रक एवं महालेख परीक्षक (Controller and Auditor General of India) होता है। 
  111. नियन्त्रक अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है।
  112. लोक सभा संसद का निम्न सदनों (लोर हाउस) तथा राज्य सभा उच्च सदन (अपर हाउस) है। 
  113. वर्तमान में लोक सभा के सदस्यों की संख्या 545 तथा राज्य सभा के सदस्यों की संख्या 245 है।
  114. राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं। 
  115. राज्य सभा में सर्वाधिक प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश के हैं। 
  116. राज्य सभा सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। 
  117. राज्य सभा के उप सभापति का चुनाव राज्य सभा के सदस्य करते हैं। 
  118. मूल संविधान में लोकसभा की संख्या 525 निर्धारित की गई थी। 
  119. लोक सभा की वर्तमान सदस्य संख्या 2026 ई. तक अपरिवर्तित रहेगी। 
  120. आपात काल के दौरान संसद लोकसभा का कार्यकाल एक बार मे एक वर्ष तक बढ़ा सकती है। 
  121. लोकसभा की गणपूर्ति कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग प्रथम लोक सभा का अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर थे। उन्हें लोक सभा का पिता भी कहा जाता है। 
  122. ब्रिटिश परम्पराओं के अनुसार लोक सभा अध्यक्ष बनने के बाद श्री नीलम संजीव रेड्डी ने अपनी पार्टी की सदस्यता त्याग दी थी। 
  123. लोक सभा का पहला आम चुनाव 1951-52 के शीतकाल में हुआ था। 
  124. प्रथम लोकसभा के चुनाव के लिए कुल मतदाताओं की संख्या 17.32 करोड़ थी। 
  125. दूसरी लोकसभा में सर्वाधिक (12) निर्विरोध सांसद चुने गये थे। 
  126. 1977 के लोक सभा के निर्वाचन में जनता पार्टी को 265 सीटें मिली थी।पन्द्रहवीं लोक सभा में सर्वाधिक महिलायें 59 सांसद के रूप में निर्वाचित हुई
  127. पहली लोकसभा वालों पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई। 
  128. राज्य सभा का सर्वप्रथम गठन 3 अप्रैल 1952 को हुआ। 
  129. यदि संसद का कोई नामांकित सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने के 6 माह के भीतर किसी राजनैतिक दल में शामिल हो जाता है तो उसकी सदस्यता बरकरार रहेगी। 
  130. दल-बदल के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होता है। 
  131. राज्य–सभा की पहली महिला महासचिव बी. एस. रमादेवी थी। 
  132. संसद का कोई सदस्य अपने अध्यक्ष की पुर्वानुमति लिये बिना 60 दिन तक सदन में नुपस्थित रहता है तो उसका स्थान रिक्त घोषित कर दिया जाता है। 
  133. लोकसभा की नियम समिति का पदेन अध्यक्ष लोक सभा का अध्यक्ष होता है। 
  134. प्रत्येक विधेयक को पारित होने से पूर्व तीन बार वाचन से गुजरना पड़ता है। 
  135. संयुक्त बैठक में विधेयक को दोनों सदनों के उपस्थित और मतदान करने वाले सभी सदस्यों के बहुमत से पारित किया जाता है।
  136. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा का अध्यक्ष होता गैर सरकारी विधेयक शुक्रवार को पेश किये जाते हैं। 
  137. लोक सभा में मान्य विरोधी दल के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए दल के पास लोक सभा की कुल संख्या के 1/10 सदस्य होने चाहिए। 
  138. लोक सभा का विरोधी दल का प्रथम मान्यता प्राप्त नेता राम सुभग सिंह (1969 ई.) थे। ये कांग्रेस संगठन के नेता थे। 
  139. संसद के दोनों सदनों का सत्रावसान राष्ट्रपति करता है। 
  140. संविधान का व्याख्याकार और संरक्षक उच्चतम न्यायालय होता है। 
  141. संविधान के निर्माण के समय सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अलावा 7 न्यायाधीश थे। 
  142. वर्ष 1986 से सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 25 अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई थी। 
  143. सर्वोच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की परम्परा फ्रांस की न्यायिक प्रणाली से ली गई है। 
  144. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों साबित सदाचार और असमर्थता के आधार पर महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है। 
  145. सर्वोच्च न्यायालय ने 80 के दशक में जनहित याचिका की कार्यवाही प्रारम्भ की इसके द्वारा संविधान के अनुच्देद 32 का दायरा बहुत ही विस्तृत हो गया है। 
  146. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी के विरूद्ध 11 मई 1993 को लोक सभा में लाया गया महाभियोग का प्रस्ताव असफल रहा। 
  147. सर्वोच्च न्यायालय का प्रथम मुख्य यन्यायाधीश एच. जे. कानिया थे।
  148. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर सर्वाधिक अवधि तक रहने वाले न्यायाधीश वाई वी. चन्द्रचूड़ थे। 
  149. सर्वोचच न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर सबसे कम समय तक रहने वाले न्यायाधीश के. एन. सिंह थे (17 दिन) 
  150. राष्ट्रपति ने पहली बार सर्वोच्च न्यायालय को दिल्ली विधि अधिनियम के मामले में सलाह देने के लिए निर्दिष्ट किया था। 
  151. सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायधीश मीरा फातिमा बीबी थी। 
  152. सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक कार्य के लिए अंग्रेजी भाशा का प्रयोग किया जाता है। 
  153. लोकसभा का सबसे युवा सांसद मुकुल वासनिक है। 
  154. सर्वाधिक उम्र में लोकसभा का चुनाव जीतने वाले व्यक्ति एन. जी. रंगा थे। 
  155. अब तक लोकसभा के किसी सीट को सर्वाधिक मतों से जीतने का रिकार्ड पी. वी. नरसिंह राव है। 
  156. एक ही निर्वाचन क्षेत्र से लगातार 8 बार लोकसभा चुनाव जीतने का रिकार्ड जगजीवन राम के नाम है। 
  157. लोकसभा में सरकार का मुख्य सचेतक संसदीय मामले का मंत्री होता है। 
  158. लोकसभा के पहले उपाध्यक्ष अन्नत शयनन आयंगर थे। 
  159. देश के छ: राज्यों में विधान परिषदों का गठन किया गया विधान सभा के सदस्यों की संख्या कम से कम 60 तथा अधिकतम 500 हो सकती है। 
  160. किन्तु गोवा इसका अपवाद है, वहाँ केवल 40 सदस्य हैं। 
  161. संघ शासित क्षेत्रों के लिए प्रशासकों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। 
  162. ऐसे संघ शासित क्षेत्र जिनकी विधायिका नहीं है उनके लिए विधियों का निर्माण संसद करती है। 
  163. संविधान के अनुच्छेद 370 के अर्न्तगत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। 
  164. जम्मू-कश्मीर के संविधान को 26 नवम्बर 1957 को लागू किया गया।
  165. भारत में उच्च न्यायालयों की कुल संख्या 21 है। 
  166. सबसे अधिक खण्डपीठ गुवाहाटी उच्च न्यायालय के पास उच्च न्यायालय के न्यायधीश के पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला न्यायधीश दुर्गा बनर्जी थीं। 
  167. दिल्ली एक मात्र संघ शासित क्षेत्र है जिसका अपना उच्च न्यायालय है। 
  168. न्यायधीशों की सबसे कम संख्या सिक्किम उच्च न्यायालय में है। 
  169. लोकसभा में अनुसूचित जाति के लिए 79 और अनुसूचित जनजाति के लिए 40 स्थान सुरक्षित हैं। 
  170. संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को शामिल किया जाता है।
  171. मूल संविधान के आठवीं अनुसूची में केवल 14 भाषाएँ थी। 
  172. बाद में संविधान द्वारा चार भाषाएँ-कोंकणी, सिन्धी, नेपाल और मणिपुरी को शामिल किया गया है। 
  173. संसद तथा विधानमंडल के सदस्यों के निर्वाचन सम्बन्धी विवादों को उच्च न्यायालय द्वारा निपटाया जाता है। 
  174. किसी राजनैतिक दल को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता निर्वाचन आयोग प्रदान करता है। 
  175. इसके लिए जारी है कि उस दल को 4 राज्यों में कम से कम 4% मत मिलें। 
  176. किसी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल को चुनाव आयोग द्वारा चुनाव चिन्ह के आबंटन के निर्णय के विरूद्ध अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जाती है। 
  177. प्रथम लोकसभा का चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 2 फरवरी, 1952 तक सम्पन्न हुआ। 
  178. इस लोकसभा चुनाव में 14 राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय का दर्जा प्रदान किया गया था। 
  179. योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। 
  180. केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के सम्पूर्ण ढांचे पर विचार विमर्श के लिए 1983 में केन्द्र सरकार ने सरकारिया आयोग का गठन किया था। 
  181. देश में पंचायती राज व्यवस्था का आरम्भ बलवन्त राय मेहता समिति की रिर्पोट के आधार पर किया गया है। 
  182. देश में सर्वप्रथम पंचायती राज व्यवस्था 1959 में राजस्थान के नागौर से शुरू की गयी।  इनका ढांचा त्रि-स्तरीय है। 
  183. अशोक मेहता समिति ने पंचायती राज संस्थानों के द्वि-स्तरीय ढाँचे का सुझाव दिया था। 1
  184. 953 में गठित राज्य पुर्नगठन आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे। 
  185. लोक सभा का सचिवालय लोकसभा के अध्यक्ष के अर्न्तगत कार्य करता था। 
  186. भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह 1952 के आम चुनाव से अब तक अपरिवर्तित है।
  187. पहली बार राष्ट्रपति ने मुख्य चुनाव आयुक्त की सहायता के लिए दो अन्य चुनाव आयुक्तों एस.एस. धनोबा व वी. एस. सहगल की 1983 में नियुक्ति की थी। 
  188. संसद ने 1950 में भारत की आकस्मिक निधि का गठन किया था। 
  189. भारत के संविधान के अनुच्छेद 394 (क) के अनुसरण में हिन्दी में संविधान का प्रधिकृत पाठ प्रकाशित किया गया। 
  190. इसे 58वां संविधान संशोधन द्वारा 1987 में तैयार किया गया। 
  191. 1955 में गठित राजभाषा आयोग के पहले अध्यक्ष बी.जी. खेर थे। 
  192. केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना 2 अक्टूबर 1985 को हुयी। 
  193. अन्तर्राष्ट्रीय परिषद के गठन की सिफारिश सरकारिया आयोग ने की थी।
  194. 1966 में दिल्ली उच्च न्यायालय के गठन से पूर्व दिल्ली राज्य क्षेत्र इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकारिता में था। 
  195. संविधान लागू होने के बाद पहली बार त्रिशुंक संसद का गठन 1989 में हुआ। 
  196. भारत में पहली बार मतपत्र और अमिट स्याही का प्रयोग तीसरे निर्वाचन (1962) में किया गया। 
  197. किसी भी उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य |
  198. न्यायधीश बनने का सौभाग्य न्यायमूर्ति लीला सेठ की है। 
  199. 1952 में भारत में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरूआत अमेरिका के तकनीक सहयोग से हुयी। 
  200. लोकसभा में मान्य विरोधी दल का दर्जा किसी भी दल का प्रापत करने के लिए सदस्यों की संख्या सदन की कुल संख्या का 1/10 भाग होना चाहिए। 
  201. संसद में सबसे अधिक अधिनियम 1976 में पारित किये गये। 
  202. सर्वप्रथम अनुच्छेद 356 का प्रयोग केरल में 1956 में किया गया।
  203. संघीय मंत्रिपरिषद का कोई भी मंत्री लोकसभा या राज्यसभा से 4 से अधिक समितियों का सदस्य नहीं बन सकता है। 
  204. भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। 
  205. संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर किसी सांसद/विधायक को अयोग्य ठहराए जाने का प्रावधान है। 
  206. पंचवर्षीय योजनाओं का अनुमोदन तथा पुनर्निरीक्षण राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा किया जाता है। 
  207. भारत के महान्यायवादी को संसद की कार्यवाहियों में भाग लेने तथा सभी न्यायालयों में सुने जाने का अधिकार प्राप्त संघ संविधान समिति के अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू थे। 
  208. डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने गोलमेज सम्मेलन की तीनों बैठकों में भाग लिया था। 
  209. संविधान बनाने वाली प्रारुप समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर थे। 
  210. संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई। 
  211. संविधान की सूचियों में शिक्षा समवर्ती सूची में है। राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करने का विशेष अधिकार राज्य सभा को प्राप्त है। 
  212. 2/3 बहुमत से राज्य सभा अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन कर सकता है। 
  213. संविधान का अनुच्छेद 40 राज्य सरकारों को पंचायतों को गठित करने का निर्देश देता है। उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य भाग लेते हैं। 
  214. राज्य सभा का सभापति सदन का सदस्य नहीं होता।
  215. संविधान के भाग- III को भारत का मैग्नाकार्टा कहा जाता है। 
  216. भारतीयों को सत्ता के हस्तान्तरण का उल्लेख सर्वप्रथम क्रिप्स प्रस्ताव 1942 में किया गया ।
  217. भारतीय राज्यों के नाम और सीमा क्षेत्र में परिवर्तन का अधिकार संसद को प्राप्त है।
  218. भारतीय संविधान का सबसे बड़ा स्रोत भारतीय शासन अधिनियम, 1935 को माना जाता है। 
  219. भारत की स्वतन्त्रता के समय ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार थी। प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली थे। 
  220. भारत का संविधान 22 भागों में विभक्त है। केन्द्रीय निर्वाचन आयुक्त अधिकतम 65 वर्ष की आयु तक पद पर रह सकता है। 
  221. संसद के दो अधिवेशनों के मध्य अधिकतम 6 महीने का अन्तराल हो सकता है। 
  222. संसद के किसी सदस्य की असदस्यता 60 दिन तक लगातार अनुपस्थित रहने पर समाप्त हो जाती है। 
  223. भारतीय संविधान में निर्धारित किए गए के अनुसार लोकसभा में सदस्यों की संख्या अधिकतम 552 हो सकती है। 
  224. भारत सरकार का संवैधानिक अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। 
  225. लोक सभा अध्यक्ष का चुनाव लोकसभा के सदस्य करते हैं। 
  226. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता उन्मूलन से सम्बन्धित है। 
  227. नए केन्द्रीय मन्त्रालय/विभाग का निर्माण प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करता है। 
  228. संविधान में अनुच्देद 12 से 35 तक भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का वर्णन है। 
  229. व्यक्ति, निगम अथवा अधीनस्थ अभिकरण जिस कार्य को करने के लिए आबद्ध है उस कार्य को करने के लिए परमादेश (Mandamus) की रिट जारी की जाती है। 
  230. कर्मचारी चयन आयोग का गठन 1 जुलाई, 1976 को हुआ। 
  231. राजभाषा विभाग गृह मन्त्रालय के अनतर्गत कार्य करता 73वाँ संविधान संशोधन (1992) पंचायत राज के सृदृढ़ीकरण से सम्बन्धित है। 
  232. वर्तमान में सात राजनीतिक दल भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल हैं। 
  233. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु न्यायालय पाँच प्रकार के लेख (रिट) जारी कर सकता है। 
  234. राष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बन्धित विवादों का विनिश्चय उच्चतम न्यायालय करता है। 
  235. संसद के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता लोक सभा अध्यक्ष करता है तथा उसकी अनुपस्थिति में लोकसभा का उपाध्यक्ष करता है। 
  236. लोक सभा की वर्तमान सदस्य संख्या 2026 तक अपरिवर्तनीय है।
  237. यदि मृत्यु, त्यागपत्र अथवा हटाए जाने की स्थिति में भारत के राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाए तो उस पद का कार्यभार उपराष्ट्रपति संभालता है। 
  238. संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य की पदावधि छ: वर्ष या | 65 वर्ष की आयु जो भी पहले हो होती है। 
  239. 42वें संविधान संशोधन (1976) को ‘मिनी कंस्टीट्यूशन’ कहा जाता है। 
  240. संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख अनुच्देद 368 में किया गया है। 
  241. दादर और नागर हवेली भारत में शामिल होने से पूर्व पुर्तगाल के उपनिवेश थे। 
  242. 36वें संविधान संशोधन द्वारा सिक्किम को भारत संघ में पूर्ण राज्य के रूप में शामिल किया गया। 
  243. केन्द्र व राज्यों के मध्य वित्त का बँटवारा वित्त आयोग की सिफारिश पर होता है। 
  244. संविधान से राज्य द्वारा 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रावधान है। 
  245. यदि किसी विधि या संवैधानिक संशोधन को 9वीं अनुसूची में रख दिय जाए तो वह न्यायालय में बाद योग्य नहीं रह जायेगा। 
  246. भारत में पहली बार राष्ट्रीय आपात काल 1962 में किया गया। 
  247. संविधान के अनुच्छेद 360 में वित्तीय आपात स्थिति लागू करने का प्रावधान है। 
  248. राज्य सभा में राष्ट्रपति 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकता है। 
  249. स्वतन्त्र भारत में राज्य सभा के प्रथम सभापति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन थे। 61वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गयी। 
  250. संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना की संस्तुति पर किया गया था। 
  251. संविधान का भाग IV (अनुच्छेद 36 से 51 तक) राज्य के नीति निर्देशक तत्व से सम्बन्धित हैं। 
  252. कलकत्ता, मुम्बई और मद्रास उच्च न्यायलयों की स्थापना 1861 में की गई। 
  • 1854 का शिक्षा पर चार्ल्स वुड डिस्पैच :- चार्ल्स वुड जो अर्ल ऑफ एवरडीन की मिली जुली सरकार में बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के अध्यक्ष थे, ने 1854 में भारत की भावी शिक्षा के लिए एक वृहद योजना बनाई जिसमें अखिल भारतीय आधार पर शिक्षा की नियामक पद्धति का गठन किया गया।  इसे प्रायः भारतीय शिक्षा का मैग्ना कार्टा कहा जाता है।
  • हन्टर शिक्षा आयोग 1882-83 :- शिक्षा के क्षेत्र में 1854 के पश्चात हुई प्रगति की समीक्षा करने के लिए 1882 में सरकार ने डब्ल्यू डब्ल्यू हण्टर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया। इसका कार्य केवल प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा समीक्षण तक ही सीमित था।
  • सैडलर वि0 वि0 आयोग 1917-19 :- इस आयोग को कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा पर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया। 
  • हार्टोग समिति, 1929 :- सन् 1929 में भारतीय परिनियत (Statutory) आयोग ने सर फिलिप हार्टोग की अध्यक्षता में एक सहायक समिति नियुक्त की जिसे शिक्षा के विकास पर रिपोर्ट देने को कहा गया। 
  • राधाकृष्णन आयोग 1948-49 :- नवम्बर, 1948 में सरकार ने डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग नियुक्त किया जिसे विश्व विद्यालयी शिक्षा पर अपनी रिपोर्ट और उसके सुधार के लिए सिफारिशें देनी थीं।
  • कोठारी शिक्षा आयोग 1964-66 :- जुलाई 1964 में एक आयोग डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में नियुक्त किया गया जिसे सरकार को शिक्षा के सभी पक्षों तथा प्रक्रमों के विषय में राष्ट्रीय नमूने की रूप रेखा, साधारण सिद्धान्त तथा नीतियों की रूप रेखाबनाने का आदेश था।
  • शिक्षा की राष्ट्रीय नीति :- मुख्यतः कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित करके 1968 में भारत सरकार ने शिक्षा पर एक प्रस्ताव पारित किया।
  • नवीन शिक्षा नीति 1986 :- नवीन शिक्षा नीति का उद्देश्य हमारे गतिहीन समाज को ऐसे गतिशील समाज में परिवर्तित करना है जिसमें विकास तथा परिवर्तन के प्रति वचनबद्धता हो।
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