अक्षांश, देशान्तर, समय, दिशाएँ(Latitudes, Longitudes, Time, Directions)

कल्पित रेखाओं का वह जाल जिसके द्वारा प थ्वी पर विभिन्न स्थानों की स्थितियाँ निश्चित की जा सकें वे अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ कहलाती है। पथ्वी के निकटतम शुद्ध प्रतिरूप ग्लोब पर दर्शाई जाने वाली क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर रेखाएँ अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ ही होती हैं। 

अक्षांश (Latitude) 

किसी स्थान की भूमध्य रेखीय तल से उत्तर एवं दक्षिण दिशा की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं। भूमध्य रेखीय तल के उत्तर की ओर उत्तरी अक्षांश तथा दक्षिण की और दक्षिणी अक्षांश कहलाते हैं। गोलाकार प थ्वी में कुल 360 अक्षांश होते हैं 0° अक्षांश भूमध्य रेखा द्वारा दर्शाया जाता है जो प थ्वी को ठीक दो समान भागों में बताता है। यह वत्त प थ्वी का महानतम व त है। भूमध्य रेखा से 90° अक्षांश उत्तर की ओर तथा 90° अक्षांश दक्षिण की ओर होते हैं। 90° उत्तरी अक्षांश उत्तरी ध्रुव तथा 90° दक्षिणी अक्षांश दक्षिणी ध्रुव कहलाता है। 

अक्षांश रेखाएँ (Lines of Latitude) वे कल्पित रेखाएँ जो उन स्थानों से होकर गुजरती हैं जिन स्थानों की भूमध्य रेखा से एक ही दिशा में कोणात्मक दूरी एक समान हो अक्षांश रेखाएँ कहलाती हैं। सभी अक्षांश रेखाएँ एक दूसरे के समानान्तर होती हैं। भूमध्य रेखा से उत्तर एवं दक्षिण दिशा की ओर इन रेखाओं का विस्तार कम होता जाता है। ध्रुव पर तो इन रेखाओं का विस्तार केवल एक बिन्दु ही रह जाता है। भूमध्य रेखा के अतिरिक्त कर्क एवं मकर अन्य प्रमुख अक्षांश रेखाएँ हैं।

कर्क रेखा- 21 जून को उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर 23- के कोण पर झुका होता है। अर्थात इस दिन 23- उत्तरी अक्षांश 2 पर सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ती है इस अक्षांश को कर्क रेखा कहते हैं।

मकर रेखा- 22 दिसम्बर को दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर 23- के कोण पर झुका होता है अर्थात इस दिन सूर्य कि किरणे 23- दक्षिणी अक्षांश पर लम्बवत पड़ती है इसी अक्षांश को मकर रेखा कहते है।

देशान्तर (Longitude)

प्रधान मध्याह्वन अर्थात 0° देशान्तर से किसी स्थान की पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं। 

देशान्तर रेखाएँ (Lines of Longitude) 

वे कल्पित रेखाएँ जो इस प्रकार खींची जाती हैं कि उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से होती हुई भूमध्य रेखा को समकोण पर काटती हो वे देशान्तर रेखाएँ कहलाती है ये सभी रेखाएँ समान दीर्ध वर्त होते हैं। क्योंकि सभी देशान्तर रेखाएँ उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से होकर गुजरती है इसलिए ये अक्षांश रेखाओं की तरह एक दूसरे के समानान्तर नहीं होती हैं। भूमध्य रेखा पर इनके बीच की दूरी सर्वाधिक होती है तथा ध्रुव की तरफ बढ़ते हुए इनके बीच की दूरी कम होती जाती है। ध्रुर्वो पर तो ये रेखाएँ एक ही बिन्दु पर मिल जाती है। देशान्तर रेखाएँ संख्या में 360 होती हैं। इंग्लैंड के ग्रीनविच नामक स्थान से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को प्रधान देशान्तर अथवा प्रधान मध्याह्न रेखा माना गया है। यह प्रधान मध्याह्न 0° देशान्तर मानी गई है। इसके पूर्व एवं पश्चिम में क्रमश 180° तक देशान्तर रेखाएँ खींची गई हैं। 

देशान्तर एवं समय (Longitude and Time)

पथ्वी अपने अक्ष पर 24 घण्टे में एक चक्कर लगाती है। अर्थात पथ्वी 24 घण्टे में 360° घूमती है। इस प्रकार प्रति एक घण्टे  में पथ्वी 360/24=15° घूम जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि पूर्व एवं पश्चिम दिशा में स्थित दो स्थान जिनके बीच 15° का फासला है उनके बीच समय का अन्तर 1 घण्टे का होगा। इसी प्रकार 10 के अन्तराल वाले स्थानों के बीच – =4 मिनट 15 का अन्तर होगा। इस प्रकार समय तथा देशान्तर में गहरा सम्बन्ध है। 

स्थानीय समय (Local Time)

किसी स्थान पर जब सूर्य का प्रकाश एकदम लम्बवत गिर रहा हो अर्थात वहाँ का देशान्तर ठीक सूर्य के नीचे हो तो उस समय यदि वहाँ की घड़ियों में दिन के 12 बजा दिए जाए तो वह समय उस स्थान का स्थानीय समय कहलाता है। 

प्रामाणिक समय (Standard Time) 

विश्व में अगर हर स्थान पर अपने-अपने स्थानीय समय का प्रयोग किया जाए तो विश्व में समय सम्बन्धी समस्या खड़ी हो जाए। क्योंकि इससे रेडियो, रेलवे, वायुयान, तार तथा दूरदर्शन जैसी सार्वजनिक सुविधाओं में बहुत असुविधा आ जाएगी। इस समस्या से बचने के लिए इंग्लैंड में ग्रीनविच के समीप से गुजरने वाली देशान्तर को 0° देशान्तर मानकर विश्व को समय कटिबन्धों (Time Zones) में बांटा गया। प्रत्येक देश एक निश्चित देशान्तर के स्थानीय समय को अपने पूरे देश में प्रयोग करते हैं। भारत में इलाहाबाद के निकट से गुजरने वाली 82- पूर्वी देशान्तर रेखा के स्थानीय समय को भारत का प्रामाणिक समय माना गया है। 

समय कटिबन्ध (Time Zones) 

विश्व के वो देश जिनका धरातलीय फैलाव पूर्व-पश्चिम दिशा में अधिक है, उन्हें एक से अधिक प्रामाणिक समयों का प्रयोग करना पड़ता है। इस प्रकार किसी देश के भिन्न-भिन्न प्रामाणिक समयों वाले भागों को समय कटिबन्ध कहा जाता है। उदाहरण के लिए कनाड़ा तथा अमेरिका जिनका धरातलीय फैलाव पूर्व-पश्चिम दिशा में अधिक है इन देशों को यहाँ की सरकारों ने क्रमशः 5 तथा 4 समय कटिबंधों में विभक्त किया हुआ है। सन् 1884 में अमेरिका की राजधानी वांशिगटन डी.सी. में हुई अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठी में सम्पूर्ण विश्व को 24 समय कटिबन्धों में बांटा गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line)

अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा वह कल्पित रेखा है जिस पर तिथि में परिवर्तन होता है। अर्थात इस रेखा के पूर्व एवं पश्चिम में तिथि में एक दिन का अन्तर होता है। अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर का लगभग अनुसरण करती हुई चलती है। लेकिन यह रेखा कभी 180° देशान्तर के पूर्व में तथा कभी पश्चिम में विचलित होती है। यह इसलिए किया गया है ताकि 180° देशान्तर पर स्थित सभी भूभागों पर एक ही तिथि बनी रहे। अगर अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को इस प्रकार विचलित नहीं किया जाता तो साइबेरिया के पूर्वी भाग में एक ही दिन दो तिथियाँ होती है। क्योंकि 180° देशान्तर साइबेरिया के पूर्वी भाग में से होकर गुजरती है। इसलिए इस समस्या से बचने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को साइबेरिया से पूर्व की और बेरिंग जलड्मरूमध्य में 165° देशान्तर तक विचलित किया गया। 

इसी प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को भूमध्य रेखा के थोड़ा दक्षिण में 71/, पूर्व की और विचलित किया गया है ताकि एल्लीस, वालिस, फिजी तथा टोंगा द्वीप समूहों पर एक ही तिथि बनी रहे। जो न्यूजीलैंड के कैलेन्डर दिवस जैसी हो।

उदाहरण :

प्रश्न 1: कोलकाता ( 90° पू0) पर क्या स्थानीय समय होगा जबकि भारत के प्रामाणिक समय के अनुसार प्रातः के 6 बजे हों? 

उत्तर- भारत में इलाहाबाद के पास से गुजरने वाली 82 1/2° पूर्वी देशान्तर रेखा का स्थानीय समय प्रामाणिक समय माना जाता हैं। इस प्रकार हमें 82 1/2° पूर्वी देशान्तर रेखा का स्थानीय समय ज्ञात है, जिसकी सहायता से कोलकाता का स्थानीय समय सरलता से प्रतीत किया जा सकता है।

कोलकाता का देशान्तर = 90° पूर्व 

इलाहाबाद का देशान्तर = 8212° 

पूर्व दोनों स्थानों के बीच देशान्तर का अन्तर = 90° – 82/20 = 7:1/2

दोनों स्थानों के बीच समय का अन्तर = 15-2×4=30 मिनट

क्योंकि कोलकाता इलाहाबाद के पूर्व में है इसलिए कोलकाता का स्थानीय समय इलाहाबाद के स्थानीय समय अर्थात् भारत के प्रामाणिक समय से आगे होगा। इस प्रकार कोलकाता का स्थानीय समय प्रातः 6 बजकर 30 मिनट होगा। 

प्रश्न 2 : सेंट लूई ( 90° प०) का स्थानीय समय प्रतीत करो जबकि न्यूयार्क ( 74° प0) में प्रातः के आठ बजे हों।

उत्तर

90°W 74°W 0°E सेंट 

लूई का देशान्तर = 90° प0 

न्यूयार्क का देशान्तर = 74° प0 

दोनों स्थानों के बीच देशान्तर का अन्तर = 90° – 74° = 16° 

दोनों स्थानों के बीच समय का अन्तर = 16 x 4 = 64 मिनट

क्योंकि सेंट लूई न्यूयार्क के पश्चिम में है, इसलिए वहाँ का स्थानीय समय पीछे होगा। इस प्रकार यदि न्यूयार्क में प्रातः के आठ बजे हो तो सेंट लूई में ( 8.1 घण्टा 4 मिनट) प्रातः के 6 बजकर 56 मिनट होंगे।

दिशाएँ (Directions)

सूर्य के उदय एवं अस्त होने से दो दिशाओं का ज्ञान होता है जिन्हें पूर्व (East) तथा पश्चिम (West) कहते हैं। पथ्वी अपने अक्ष पर चक्कर लगाती हैं इस अक्ष के दोनों सिरे अन्य दो दिशाओं का संकेत देते है जिन्हें उत्तर (North) एवं दक्षिण (South) कहते हैं। इस प्रकार प्रमुख चार दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण का ज्ञान होता है अगर सूर्योदय के समय हम उसकी तरफ मुँह करके खड़े हो जाए तो हमारे सामने पूर्व दिशा, ठीक हमारे पीछे पश्चिम दिशा, दाहिने हाथ की तरफ दक्षिण दिशा तथा बाएँ हाथ की तरफ उत्तर दिशा होगी। इन चार प्रमुख दिशाओं के बीच कई अन्य दिशाएँ होती है। कुल मिलाकर 16 दिशाओं का उपयोग किया जाता है।

मानचित्र पर दिशाएँ (Directions on the Maps)

चार प्रमुख दिग्विन्दु और उनके बीच की दिशायें जब तक किसी मानचित्र पर दिशा अंकित नहीं की जाती तब तक उस मानचित्र को समझ पाना बहुत कठिन है। इसलिए मानचित्र पर दिशा अंकित करना आवश्यक है। नाविक, सैनिक, वायुयान चालक आदि सभी के लिए दिशा अंकित मानचित्र अति उपयोगी है। इसके बगैर ये सभी यात्रा पथ भटक सकते है।

 मानचित्र पर दर्शाई गई अक्षांश एक देशान्तर रेखाएँ भी दिशाओं का बोध कराती है। अक्षांश रेखाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा में तथा देशान्तर रेखाएँ उत्तर-दक्षिण दिशा में बिछि हुई होती है। इसके अलावा कुछ मानचित्रों पर ऊपरी दाहिने कोने में एक तीर का चिन्ह बना होता है। जो उत्तर दिशा की ओर संकेत करता है। मानचित्र पर लगे इस तीर के चिन्ह से अन्य सभी दिशाओं का पता लगाया जा सकता है। अधिकांश मानचित्रों पर ऊपर की ओर उत्तर, नीचे की ओर दक्षिण दाहिने हाथ की ओर पूर्व तथा बाएँ हाथ की ओर पश्चिम दिशा होती है।

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मापनी (Scale)

सामान्य परिचय एवं परिभाषा (General Introduction and Definition) मापनी वह युक्ति है जिसकी सहायता से समस्त प थ्वी अथवा उसके किसी भू-भाग को आवश्यकता के अनुसार छोटा अथवा बड़ा आकार देकर मानचित्र बनाया जा सकता है। अर्थात मापनी पथ्वी एवं मानचित्र के बीच वह अनुपात है जिसके द्वारा रातल पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की वास्तविक दूरी को मानचित्र पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी के द्वारा दर्शाया जा सके।

मापनी- दो बिन्दुओं के बीच की ममचिन पर दूरी/उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की धातल पर दूी

एफ.जे. मांक हाऊस (F.J. Monk House) के अनुसार : ‘मापनी द्वारा वह सम्बन्ध व्यक्त किया जाता है जो मानचित्र पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच तथा धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच होता है।’ 

राबिन्सन, रैंडल तथा मौरिसन (Robinson, Randall and Morrison) के अनुसार :- ‘वास्तविकता तथा प्रतिनिधित्व के बीच पाए जाने वाले सम्बन्ध को मापनी कहते हैं।’

मापनी व्यक्त करने की विधियाँ (Methods of Expressing the Scale) 

मानचित्र पर मापनी प्रदर्शित करने की तीन विधियाँ होती हैं। 

1. साधारण कथन विधि (Simple Statement Method) 

2. निरूपक भिन्न विधि (Representative Fraction Method) 

3. रैखिक मापक विधि (Linear Scale Method) 

(1) साधारण कथन विधि (Simple Statement Method)- इस विधि द्वारा शाब्दिक विवेचन से किसी मानचित्र की मापनी का विवरण दिया जाता हैं। अर्थात मानचित्र पर मापनी को शब्दों में लिख दिया जाता है। जैसे 1 इंच : 1 मील या 1 सेमी. : 1 किमी. आदि। मापनी व्यक्त करने की यह सबसे सरल विधि है। प्रायः भूसम्पति मानचित्र इस विधि से मापनी को प्रदर्शित करते है। लेकिन इस विधि का उपयोग काफी सीमित है। क्योंकि एक तो इस मापक विधि को केवल वहीं लोग समझ सकते है जो माप प्रणाली से परिचित हो। तथा दूसरे मानचित्र के आकार में परिवर्तन करने पर मापनी अशुद्ध हो जाती है। 

(2) निरूपक भिन्न विधि (Representative Fraction (R.E.) Method)- इस विधि द्वारा मापक एक भिन्न द्वारा दर्शाया जाता है। दर्शाया गया भिन्न मानचित्र तथा धरातल पर मापी गई दूरी को प्रकट करता है। इस भिन्न में अंश का मान सदैव 1 होता है जबकि हर का मान मापक के अनुसार बदलता रहता है। निरूपक भिन्न में अंश तथा हर सदैव एक ही इकाई में व्यक्त किये जाते हैं। निरूपक भिन्न (R.F.) = मानचित्र पर दूरी/धरातल पर दूरी भारत का भूगोल एवं प्रयोगात्मक भूगोल उदाहरणार्थ, यदि किसी मानचित्र का निरूपक भिन्न 1 : 40, 000 है तो इसका अर्थ होगा कि मानचित्र एवं धरातल की दूरियों में 1 तथा 40,000 का अनुपात है दूरियाँ चाहे इंचों में हो अथवा सेमी. में हो। जैसे 1 सेमी. : 40,000 सेमी. का अर्थ होगा मानचित्र पर 1 सेमी. की दूरी धरातल पर 40,000 सेमी. दूरी को व्यक्त करेगी। साधारण कथन विधि की तरह इस विधि में भी मानचित्र का आकार परिवर्तित करने पर दर्शाई गई मापनी अशुद्ध हो जाती है। 

(3) रैखिक मापक विधि (Linear Scale Methed)- इस विधि में मापक को एक सरल रेखा द्वारा दर्शाया जाता है जिसकी लम्बाई, धरातल पर ली गई वास्तविक दूरी को किसी निश्चित अनुपात में दर्शाती है। फिर इस सरल रेखा को प्राथमिक एवं गौण भागों में विभक्त कर दिया जाता है तथा उन भागों पर धरातल की वास्तविक दूरियों के मान अंकित कर दिए जाते हैं। इस विधि की विशेषता यह है कि मानचित्र का आकार परिवर्तित करने पर भी दशाई गई मापनी शुद्ध रहती है क्योंकि मानचित्र के आकार के अनुपात में मापनी का आकार बड़ा अथवा छोटा हो जाता है।

मापनियों का रूपांतरण (Conversion of Scales) 

(1) साधारण कथन मापक को निरूपक भिन्न में परिवर्तित अथवा रूपांतरित करना

उदाहरण : एक मानचित्र का साधारण कथन मापक 1 से०मी० : 10 कि०मी० है इसका निरूपक भिन्न ज्ञात करो। दिया गया है साधारण कथन मापक = 1 से०मी० : 10 कि०मी० अर्थात मानचित्र पर दूरी 1 से०मी० = धरातल पर दूरी 10 कि०मी०

हम जानते है कि निरूपक भिन्न = मानचित्र पर दूरी धरातल पर दूरी 

अर्थात R.E =1 सैमी०/10 कि०मी०

क्योंकि प्रदर्शक भिन्न में अंश तथा हर एक ही इकाई में व्यक्त किये जाते है इसलिए यहां पर किमी. को सेमी. में परिवर्तित करना होगा।

हम जानते है 1 कि०मी० = 1,00,000 से०मी०

इसलिए R.E=

क्योंकि निरूपक भिन्न में किसी मापक प्रणाली का प्रयोग नहीं किया जाता, इसलिए

निरूपक भिन्न (R.E.)= 1/10000 या 1 : 10,00,000

(2) प्रदर्शक भिन्न को साधारण कथन मापक में परिवर्तित अथवा रूपांतरित करना

उदाहरण : एक प्रदर्शक भिन्न 1 : 633600 है तो उसे मील में दर्शाने के लिए साधारण कथन मापक में परिवर्तित करो। दिया गया प्रदर्शक भिन्न = 1:633600 क्योंकि यहां पर प्रदर्शक भिन्न को मील में परिवर्तित करना है इसलिए दिया गया प्रदर्शक भिन्न इंच में मानना होगा अर्थात 1 इंच : 633600 इंच जिसका अभिप्राय है 

मानचित्र पर 1 इंच दूरी धरातल के 633600 इंच दूरी को प्रदर्शित करती है। 

क्रिया – 1 इंच : 633600 

इंच यहाँ पर हमें इंच को मील में परिवर्तित करना है। 

हम जानते है 1 मील = 63360 इंच

मापनी = 1 इंच : – 633600/ 63360 मील 

अथवा 1 इंच : 10 मील 

अतः साधारण कथन मापक = 1 इंच : 10 मील

सरल रेखा का समान भागों में विभाजन करना (Division of a Straight Line into Equal Parts)

रैखिक मापक बनाने के लिए सर्वप्रथम दर्शाई गई सरल रेखा को समान भागों में विभक्त करना अनिवार्य होता है। सरल रेखा को समान भागों में विभक्त करने की दो ज्यामितीय विधियाँ है। 

प्रथम विधि मान लो एक सरल रेखा PQ दी गई है जिसको 6 समान भागों में विभक्त करना है। सर्वप्रथम P बिन्दु पर परकार की सहायता से एक न्यून कोण बनाती हुई सरल रेखा खींचो। फिर P बिन्दु से परकार की सहायता द्वारा इस रेखा पर 6 बिन्दु A,B,C,D,E,F समान दूरी पर अंकित करो। F बिन्दु को Q बिन्दु से मिलाओ। फिर सेट-स्क्यर की सहायता से FQ रेखा के समानान्तर A, B, C, D तथा E बिन्दुओं से E-1, D-2, C-3, B-4 तथा A-5 रेखायें खींचो जो PQ रेखा को P-5, 5-4, 4-3, 3-2, 2-1 तथा 1Q,6 समान भागों में विभक्त करेगी।

दूसरी विधि मान लिया एक सरल रेखा PQ दी गई है। जिसको 6 समान भागों में विभक्त करना है सर्वप्रथम PQ एक सरल रेखा लो फिर P बिन्दु से ऊपर की तरफ तथा Q बिन्दु से नीचे की तरफ दो समान न्यून कोण बनाती हुई रेखाएं खींचो। इन दोनों रेखाओं पर परकार की सहायता से समान दूरी पर A,B,C,D,E,F तथा G,H,IJ,K,L चिन्ह अंकित करो। अब F को Q से, E को G से, D को से, C को I से, B को J से, A को K से तथा P को L से इस प्रकार मिलाओ ताकि वे QR रेखा को 1, 2, 3, 4, 5 पर काटे। इस प्रकार P-5, 5-4, 4-3, 3-2, 2-1 तथा LQ, PQ रेखा के 6 समान भाग होगें।

मापनियों के वर्ग (Categories of Scales)

रचना विधि एवं उद्देश्यों के आधार पर मापनियों को 5 वर्गों में रखा जाता है। 

1. बड़ी मापनी (Large Scale) 

2. छोटी मापनी (Small Scale) 

3. सरल मापनी (Simple Scale) 

4. विकर्ण मापनी (Diagonal Scale) 

5. तुलनात्मक मापनी (Comparative Scale) 

(1) बड़ी मापनी ( Large Scale) – वह मापनी जिसके द्वारा धरातल की छोटी दूरियाँ मानचित्र की लम्बी दूरियों द्वारा दर्शाई जाती हैं बड़ी मापनी कहलाती है अर्थात जिस मापनी का निरूपक भिन्न (R.E) बड़ा होगा वह बड़ी मापनी होती है। उदाहरण के तौर पर 20 से०मी० : 1 कि०मी० (R.E. 1 : 5,000) जिसका अर्थ है मानचित्र पर 20 से०मी० लम्बी रेखा धरातल की मात्र 1 कि०मी० दूरी को दर्शाती है। इस मापनी द्वारा बनाए गए मानचित्र दर्शाए गए क्षेत्र की विस्त त जानकारी प्रदान करते है। इनमें गौण लक्षणों को भी प्रदर्शित किया जाता है। भू-सम्पति मानचित्र एवं स्थलाक तिक मानचित्र बड़ी मापनी पर बने होने के कारण विस्त त जानकारी प्रदान करते हैं। 

(2) छोटी मापनी (Small Scale) – वह मापनी जिसके द्वारा धरातल की लम्बी दूरियों को मानचित्र पर छोटी दूरियों द्वारा दर्शाया जाता है छोटी मापनी कहलाती है। छोटी मापनी का निरूपक भिन्न (R..) भी छोटा होता है। उदाहरणार्थ : 1 से०मी० : 20 कि०मी० जिसका अर्थ है मानचित्र पर 1 से०मी० लम्बी रेखा धरातल की 20 कि०मी० दूरी को दर्शाती है। छोटी मापनी पर बने मानचित्र विस्त त क्षेत्रफल को दर्शाते हैं लेकिन इन मानचित्रों में गौण लक्षणों को दर्शाना सम्भव नहीं होता। एटलस एवं दीवारी उनमें मानचित्र छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। 

(3) सरल मापनी (Plain Scale) – जैसा कि नाम से विदित है यह मापनी बनाने में बहुत सरल है। इस मापनी को एक सरल रेखा के द्वारा दर्शाया जाता है जिसकी लम्बाई 5 से 8 इंच या 12 से 20 से०मी० के मध्य होती है। सर्वप्रथम इस रेखा को आवश्यकता के अनुसार समान प्राथमिक भागों (Primary Divisions) में बाँट दिया जाता है जो धरातल की लम्बी दूरियों को दर्शाते हैं। इसके बाद छोटी दूरियों को पढ़ने के लिए मापनी के बाईं ओर के प्रथम प्राथमिक भाग को समान गौण भागों (Secondary Divisions) में बाँट दिया जाता है जो धरातल की छोटी दूरियों को दर्शाते हैं। रेखा के प्राथमिक एवं गौण भागों पर धरातलीय दूरियों को अंकित किया जाता है। शून्य सदैव बाईं ओर के प्राथमिक भाग को छोड़कर अंकित किया जाता है। 

मापक पर अंकित धरातलीय दूरियाँ पूर्णाक संख्या (Round Figure) में होनी चाहिए। सरल मापनी के साथ साधारण कथन मापक या निरूपक भिन्न अवश्य लिखा जाना चाहिए। इस मापनी को रैखिक मापनी (Linear Scale) या आलेखी मापनी (Graphic Scale) के नाम से भी जाना जाता है। 

उदाहरण : एक मानचित्र का निरूपक भिन्न 1 : 20,00,000 है किलोमीटर में दूरी पढ़ने के लिए सरल मापनी की रचना कीजिए। रचना विधि- दिया गया निरूपक भिन्न (R.E.) = 1 : 20,00,000 अर्थात मानचित्र पर 1 से०मी० लम्बी रेखा धरातल की 20,00,000 से०मी० लम्बी रेखा को दर्शाती है। 

माना मापनी बनाने के लिए एक सरल रेखा 15 से०मी० ली गई जो दिए गए निरूपक भिन्न के अनुसार धरातल की

20,00,000/100000 x 15= 300 कि०मी० को प्रदर्शित करेगी।

मापनी

1 कि०मी० = 1,00,000 से०मी० 

सर्वप्रथम एक सरल रेखा 15 से०मी० लम्बी लो उसके 5 समान प्राथमिक भाग करो। प्रत्येक प्राथमिक भाग धरातल की 60 कि०मी० दूरी को दर्शाएगा। फिर बाईं ओर के पहले प्राथमिक भाग को 5 समान गौण भागों में बाटों प्रत्येक भाग धरातल की 12 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा।

प्रथम प्राथमिक भाग को छोड़कर शून्य अंकित करो शून्य से दाईं तरफ प्राथमिक भागों पर क्रमशः 60, 120, 180 तथा 240 अंकित करो तथा शून्य से बाईं और गौण भागों पर क्रमशः 12, 24, 36, 48 तथा 60 अंकित करो मापनी के दोनों सिरो पर किलोमीटर लिख दो। मापनी के ऊपर दिया गया निरूपक भिन्न (R.F.) लिखो इस प्रकार सरल मापनी तैयार हो जाएगी। 

(4) विकर्ण मापनी (Diagonal Scale)

जिस मापनी में विकर्णों का प्रयोग करके गौण भागों को और भी छोटे भागों में विभक्त कर दिया जाता है वह विकर्ण मापनी कहलाती है। सरल मापनी में मील फलांग, किलोमीटर, हेक्टोमीटर आदि दो मात्रकों (Units) को ही पढ़ा जा सकता है जबकि विकर्ण मापनी में तीन मात्रकों जैसे मील-फलांग-गज या किलोमीटर-हैक्टोमीटर-डेकामीटर में दूरियाँ पढ़ी जा सकती हैं। विकर्ण मापनी में प्रथम दो मात्रकों को बनाने की रचना विधि सरल मापनी के अनुसार है जबकि तीसरे मात्रक की दूरी को मापनी के गौण भाग पर बनाए गए आयतों (Rectangles) में विकर्ण खींचकर बनाया जाता है। 

उदाहरणार्थ – माना किसी आयत में क्षैतिज रेखा के अतिरिक्त समान अन्तर पर खींची गई समानान्तर रेखाओं की संख्या 5 है तो आयत का विकर्ण पहली रेखा को 1 : 4, दूसरी को 2 : 3, तीसरी को 3 : 2, चौथी को 4 : 1 में विभाजित करेगा। तथा पांचवी भुजा आयत की क्षैतिज भुजा की लम्बाई प्रदर्शित करेगी। मान लो गौण भाग (क्षैतिज भुजा) की लम्बाई 1 से०मी० है तो समान अन्तर पर खींची गई रेखाओं पर क्रमशः 0.2, 0.4, 0.6, 0.8 से०मी० की दूरियाँ आसानी से पढ़ी जा सकती हैं। अन्तिम अर्थात पांचवी रेखा को विकर्ण विभाजित नहीं करेगा अतः इसका मान 1 से०मी० व

1 c.m. होगा। यहाँ विशेष बात यह है कि गौण भाग को जितने भागों में बाँटना हो आयत की क्षैतिज भजा के समानान्तर उतनी ही संख्या में सरल रेखाएँ खींची जाती हैं।

उदाहरण : एक मानचित्र का निरूपक भिन्न 1 : 5,00,000 है। 

इसके लिए विकर्ण मापक बनाओ जिसमें 1 कि०मी० तक की दूरी पढ़ी जा सके। 

रचना विधि- दिया गया निरूपक भिन्न = 1 : 5,00,000

अर्थात मानचित्र पर 1 से०मी० = धरातल पर 5,00,000 सै०मी० अथवा 1 सै०मी० = 5 कि०मी०

12 से०मी० लम्बी रेखा दूरी प्रकट करेगी = 5 x 12 = 60 कि०मी० 

सर्वप्रथम एक सरल रेखा AZ 12 से०मी० लम्बी लो। इसको 5 समान प्राथमिक भागों में विभक्त करो प्रत्येक भाग 12 कि०मी० दूरी को दर्शाएगा फिर बाईं ओर की प्रथम प्राथमिक भाग AB को 3 समान गौण भागों में विभक्त करो। प्रत्येक गौण भाग 4 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा। प्रत्येक प्राथमिक एवं गौण भाग पर उसका मान अंकित करो। प्रत्येक

1c.m. प्राथमिक भाग पर लम्ब खींचो। बाईं और के लम्ब AD पर समान दूरी पर 4 समान भाग काटो तथा उन भागों से AZ रेखा के समानान्तर रेखाएं खींचो। बाईं और के प्राथमिक भाग पर बनी आयत ABCD की भुजा CD को भी AB की भांति 3 समान भूगोल गौण भागों में विभक्त करो। तथा उनका मान अंकित करो अब भुजा CD के 4 कि०मी० वाले बिन्दु को AB के 0 कि०मी० वाले बिन्दु से, 8 कि०मी० वाले बिन्दु को 4 कि०मी० वाले बिन्दु तथा 12 कि०मी० वाले बिन्दु को 8 कि०मी० वाले बिन्दु से मिलाकर विकर्ण खींचो। इस प्रकार विकर्ण मापनी तैयार हो जाएगी।

5) तुलनात्मक मापनी (Comparative Scale) .

जिस मापनी के द्वारा एक से अधिक मापक प्रणालियों में दूरियों को प्रदर्शित किया जा सके वह तुलनात्मक मापनी कहलाती है। जैसे मील तथा किलोमीटर, मीटर तथा गज आदि। कई बार इस मापनी द्वारा समय एवं दूरी का तुलनात्मक प्रदर्शन भी किया जाता है। 

तुलनात्मक मापनी की विशेषताएँ

1. तुलनात्मक मापनियाँ एक ही निरूपक भिन्न पर बनाई जाती है। 

2. तुलनात्मक मापनियों का शून्य अंक सदैव एक उर्ध्वाधर सरल रेखा में होता है। कई बार तुलनात्मक मापनियाँ अलग-अलग न बनाकर एक ही सरल मापनी को इस प्रकार विभाजित कर दिया जाता है कि मापनी का एक ही भाग दो विभिन्न मापों को सुगमता से दिखा सके। 

उदाहरण- एक मानचित्र के लिए किलोमीटर तथा मील में दूरियाँ दर्शाने के लिए तुलनात्मक मापनी की रचना कीजिए। जिसका निरूपक भिन्न 1 : 6,33,600 से। 

क्रिया- किमी. मापनी के लिए : दिए गए उदाहरण के अनुसार मानचित्र पर 1 से०मी० लम्बी रेखा धरातल के 6,33,600 से०मी० दूरी को दर्शाती है।

अथवा मानचित्र पर 15 से०मी० लम्बी रेखा धरातल पर =95.04 कि०मी० को दशाएंगी।

परन्तु 95.04 एक पूर्ण संख्या नहीं है इसलिए हम एक पूर्ण संख्या 100 कि०मी० लेते है।

धरातल की 100 कि०मी० दूरी मानचित्र पर

100/95.04 x 15 = 15.8 से०मी० लम्बी रेखा द्वारा दर्शाई जाएगी।

सर्वप्रथम 15.8 से०मी० लम्बी एक सरल रेखा लो उसको 5 समान प्राथमिक भागों में बांटो प्रत्येक भाग धरातल की 20 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा। फिर बाईं ओर के प्रथम प्राथमिक भाग को 5 समान गौण भागों में बांटो प्रत्येक भाग धरातल की 4 कि०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगा। मापनी के दोनों सिरों पर कि०मी० लिख दो। प्रत्येक भाग का मान अंकित करो 

क्रिया- मीलों की मापनी के लिए दिए गए 

उदाहरण के अनुसार

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मानचित्र का सामान्य परिचय (General Introduction to Maps)

मानचित्र का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of a Map)

कागज अथवा किसी समतल सतह पर प थ्वी के सम्पूर्ण अथवा कुछ भाग के धरातलीय एवं सांस्क तिक लक्षणों को दर्शाना मानचित्र कहलाता है। मानचित्र (Map) लैटिन भाषा के मैप्पा (Mappa) शब्द से लिया गया है। मानचित्र को फोटो चित्र से अलग रखा जाता है। फोटोचित्र में किसी वस्तु अथवा स्थान की वास्तविक आक ति आ जाती है। जब कि मानचित्र में दर्शाए जाने वाले विभिन्न विवरणों को रूढ चिन्हों के द्वारा दर्शाया जाता है। 

एफ.जे. मॉक हाऊस के मतानुसार (According to F.J. Monk House): ‘निश्चित मापनी के अनुसार धरातल के किसी भाग के लक्षणों के समतल सतह पर निरूपण को मानचित्र कहते हैं।’ 

स्टैनले व्हाइट के अनुसार (According to Stanley White): मानचित्र वह साधारण चित्र है जिस पर किसी देश अथवा प्रदेश की आक ति को समतल सतह पर चित्रित किया जाता है।

मानचित्रों का उद्देश्य (Purpose of Maps) 

मानचित्र का प्रथम उद्देश्य प थ्वी पर पाए जाने वाली विभिन्न प्राक तिक एवं मानवीय लक्षणों को मापनी के अनुसार छोटे आकार में परिवर्तित करके उन्हें समझने योग्य बनाना है। क्योंकि हमारी प थ्वी इतनी बड़ी है कि इसको एक बार में आँखों से देखना सम्भव नहीं है। धरातल पर विभिन्न प्रकार की स्थल आक तियाँ जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, झीलें तथा नदियाँ, मिट्टियाँ और जलवायु के साथ-साथ अनेक प्रकार के मानवीय क्रिया कलाप पाए जाते हैं। इन सभी प्रकार के तथ्यों को दर्शाना मानचित्र का उद्देश्य है। इसके अलावा धरातल पर अद श्य परन्तु महत्वपूर्ण प्रतिरूपों को भी मानचित्रों के द्वारा दर्शाया जा सकता है। यद्यपि इस कार्य के लिए अनेक सांख्यिकीय आरेखों का भी प्रयोग किया जाता है लेकिन वे सब गौण विधियाँ हैं। इन सब को प्रदर्शित करने के लिए मानचित्र ही एक उपयुक्त विधि है।

मानचित्रों की आवश्यकता एवं उपयोग (Needs and Uses of Maps)

वास्तव में ग्लोब ही प थ्वी की आक ति को सही प्रदर्शित करता है लेकिन ग्लोब के अध्ययन में अनेक कठिनाईयाँ आती है जैसे1. आक ति में ग्लोब गोल होने के कारण उस पर दर्शाए गए भिन्न महाद्वीपों एवं महासागरों दोनों को एक ही समय एक नजर में देख पाना सम्भव नहीं हैं जिसके कारण एक आम आदमी प थ्वी पर फैले हुए महाद्वीपों एवं महासागरों की सही-सही स्थिति को समझ नहीं पाता जब कि मानचित्र द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी को एक ही नजर में देखा जा सकता है।

2 ग्लोब आक ति में बहुत छोटे होने के कारण पथ्वी के किसी क्षेत्र को उन पर विस्तारपूर्वक नहीं दिखाया जा सकता जबकि मानचित्र द्वारा छोटे से छोटे क्षेत्र का विस्तारपूर्वक अध्ययन सम्भव है। 

3. मानचित्र द्वारा प थ्वी के किन्हीं दो क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है जबकि ग्लोब द्वारा यह सम्भव नहीं है। 

4. मानचित्र पर किन्हीं दो स्थानों की दूरी मापना आसान है जबकि यह कार्य ग्लोब पर काफी कठिन है। मानचित्रों का उपयोग मानव के आर्थिक, सामाजिक, सांस्क तिक तथा राजनैतिक क्रियाकलापों को दर्शाने के लिए किया जाता है। मानचित्र के उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसे ‘भूगोल वेता का उपकरण’ कहा गया है। भूगोल के अतिरिक्त मानचित्र का उपयोग – भू-विज्ञान, जलवायु विज्ञान, मौसम विज्ञान, समुद्र विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, खगोल विज्ञान, इतिहास, क षि आदि विषयों में भी बढ़ रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व में मानचित्रों का उपयोग काफी बढ़ा है मानचित्र के उपयोग का हिटलर के इस कथन से भी पता चलता है ‘मुझे किसी भी देश का मानचित्र दो, मैं उस देश पर विजय प्राप्त कर लूँगा।’ मानचित्र के द्वारा कम से कम स्थान पर अधिक से अधिक सूचनाओं को दर्शाया जाता है। डॉ. एच.आर. मिल (Dr. H.R. Mill) के अनुसार “यह सिद्धान्त मान लिया जाना चाहिए कि भूगोल में जिसका मानचित्र नहीं बनाया जा सकता उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।”

मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps) 

मानचित्रों का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जा सकता है जैसे- मापनी, उद्देश्य, स्थलाक तिक लक्षण की मात्रा, अतवस्तु तथा रचना विधि लेकिन प्रमुख रूप से मानचित्रों के वर्गीकरण का प्रमुख आधार, मापनी, एवं उद्देश्य हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है।

मापनी के आधार पर मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps on the basis of Scales) 

मापनी के अनुसार मानचित्रों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। (i) बड़ी मापनी मानचित्र तथा (ii) छोटी मापनी मानचित्र। बड़ी एवं छोटी मापनी के आधार पर मानचित्र चार प्रकार के होते हैं। 

(A) भूसम्पति मानचित्र (Cadastral Maps) यह मानचित्र बड़ी मापनी पर बनाए जाते हैं अर्थात किसी छोटे से क्षेत्र का विस्त त विवरण इन मानचित्रों में दर्शाया जाता है। जैसे ग्राम मानचित्र, नगर मानचित्र, सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत भूमि क्षेत्र मानचित्र आदि इन्हें सरकारी मानचित्र भी कहते हैं। क्योंकि सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की कर वसूली, नगर योजना, ग्रामीण भूमि उपयोग आदि के लिए भूसम्पति मानचित्र बनवाए जाते है। इन मानचित्रों की मापनी 1 से0मी0 : 40 मीटर अथवा 1 इंच : 110 गज से लेकर 1 से0मी0 : 20 मीटर अथवा 1 इंच: 55 गज तक होती है। 

(B) स्थलाक तिक मानचित्र (Topographical Maps) भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अनुसार स्थलाक तिक मानचित्र वे मानचित्र होते है जिसमें दिखाए गए प्रत्येक लक्षण की स्थिति एवं आक ति को मानचित्र में देखकर उस लक्षण की धरातल के ऊपर पहचान की जा सके। यह मानचित्र भी बड़ी मापनी पर बनाए जाते हैं। इन मानचित्रों के द्वारा उच्चावच (पर्वत, पठार, मैदान), प्रवाह, वनस्पति, ग्राम, नगर, विभिन्न प्रकार के परिवहन मार्गों तथा नहरों आदि को दर्शाया जाता है। किसी छोटे क्षेत्र के विस्त त अध्ययन के लिए यह मानचित्र अधिक उपयोगी होते हैं। मीट्रिक प्रणाली आने से पहले इन मानचित्रों को इंच : 1 मील, 1 इंच : 2 मील तथा 1 इंच : 4 मील की मापनी पर बनाया जाता था लेकिन मीट्रिक प्रणाली अपनाने के बाद यह मानचित्र 1:25, 000 तथा 1 : 50, 000 मापनी पर बनाए जाने लगे हैं।

(C) दीवारी मानचित्र (Wall Maps) इन मानचित्रों को भौगोलिक मानचित्र भी कहा जाता है। इनके द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी अथवा उसके किसी विस्त त भाग को दर्शाया जाता है। स्कूल एवं कालेज की दीवारों पर लगे मानचित्र भी इसी श्रेणी के अर्न्तगत आते हैं। इन मानचित्रों द्वारा विस्त त भू-भाग के अनेक प्राक तिक अथवा मानवीय लक्षणों को दर्शाया जा सकता है जैसे- जलवायु, वनों के प्रकार, खनिजों का वितरण, जनसंख्या वितरण, विभिन्न प्रकार की फसलों का वितरण आदि। यह मानचित्र छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा यह मानचित्र 1 : 15,000,000 से 1 : 2, 500,000 अथवा 1 सेमी0 : 5 कि.मी. से 1 सेमी0 : 40 किमी. मापनी पर बनाए जाते हैं। 

(D) एटलस मानचित्र (Atlas Maps) इन मानचित्रों के द्वारा महाद्वीपों या प्रदेशों के केवल प्रमुख प्राक तिक एवं मानवीय लक्षणों को ही दर्शाया जाता है। क्योंकि एटलस मानचित्र भी छोटी मापनी पर बनाए जाते है। इसलिए छोटे लक्षणों को मानचित्र पर दर्शाना सम्भव नहीं हो पाता। एटलस मानचित्र प्रायः 1 : 15,00,000 से छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। भारत की राष्ट्रीय मानचित्रावली का अंग्रेजी संस्करण 1:1,0,00,000 मापनी पर तैयार किया गया है। एटलस मानचित्र शिक्षण कार्यों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं इन मानचित्रों के द्वारा सम्पूर्ण विश्व, महाद्वीप अथवा किसी देश के विभिन्न भौतिक एवं सांस्क तिक लक्षणों को एक नजर में देखा जा सकता है।

(2) उद्देश्य अथवा विषय वस्तु के आधार पर मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps According to Purpose or Subject Matter) 

उद्देश्य अथवा विषय वस्तु पर आधारित मानचित्रों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। 

(A) प्राक तिक अथवा भौतिक मानचित्र 

(B) मानवीय अथवा सांस्क तिक मानचित्र। 

(A) प्राक तिक अथवा भौतिक मानचित्र (Natural or Physical Maps)

निम्नलिखित मानचित्रों को प्राक तिक अथवा भौतिक मानचित्रों की श्रेणी में रखा गया है। I 

1 खगोलीय मानचित्र (Astronomical Maps) इन मानचित्रों के द्वारा खगोलीय नक्षत्रों, निहारिकाओं, ग्रहों, तथा उपग्रहों आदि की आकाशीय स्थिति को दर्शाया जाता है। 

II भूवैज्ञानिक मानचित्र (Geological Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की संरचना एवं उसकी बाह य आक ति (परिच्छेदिका) को दर्शाया जाता है। 

III भूकम्पी मानचित्र (Seismic Maps) इस मानचित्र के द्वारा भूकम्पीय केन्द्र, भूकम्पीय तरंगों तथा उनके फैलाव को दर्शाया जाता है। 

IV उच्चावच मानचित्र (Relief Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी अथवा उसके किसी भाग की बनावट तथा उस पर पाई जाने वाली विभिन्न स्थलाक तियों को दर्शाया जाता है जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, नदियाँ, घाटियाँ आदि। 

V जलवायु एवं मौसम मानचित्र (Climatic and Weather Maps) इन मानचित्रों के द्वारा जलवायु एवं मौसम सम्बन्धी विभिन्न तत्वों को दर्शाया जाता हैं जैसे- तापमान, वर्षा, वायुदाब, पवनों की दिशा आदि का विवरण।

VI अपवाह मानचित्र (Drainage Maps) इन मानचित्रों के द्वारा प्रमुख नदी एवं उसकी सहायक नदियों के प्रवाह एवं उसकी दिशा को दर्शाया जाता है। 

VII मदा मानचित्र (Soil Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की मिट्टियों को दर्शाया जाता है। 

VIII वनस्पति मानचित्र (Vegetation Maps)

इन मानचित्रों के द्वारा किसी प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्न प्राकतिक वनस्पतियों के वितरण को दर्शाया जाता है। 

(B) मानवीय अथवा सांस्क तिक मानचित्र (Human or Cultural Maps) 

निम्नलिखित मानचित्रों को मानवीय अथवा सांस्क तिक मानचित्रों की श्रेणी में रखा जाता है।

I समाज-सांस्कतिक मानचित्र (Socio-Cultural Maps) इन मानचित्रों द्वारा मानव संस्क ति से जुड़े हुए घटकों को दर्शाया जाता है जैसे- जाति, भाषा, धर्म, वेशभूषा आदि। 

II जनसंख्या मानचित्र (Population Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण विश्व, किसी देश अथवा राज्य की जनसंख्या का वितरण, धनत्व, व द्धि, स्त्री-पुरुष अनुपात, आयु-वर्ग, स्थानान्तरण तथा व्यावसायिक संरचना आदि को दर्शाया जाता है। 

III आर्थिक मानचित्र (Economic Maps) इन मानचित्रों द्वारा मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को दर्शाया जाता है। जैसेक षि मानचित्र में विभिन्न फसलों के वितरण को दर्शाया जाता है। औद्योगिक मानचित्र में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को दर्शाया जाता है। परिवहन मानचित्र में किसी क्षेत्र के विभिन्न प्रकार के परिवहन मार्गों को दर्शाया जाता है। खनिज मानचित्र में किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले खनिजों का वितरण दर्शाया जाता है।

IV राजनैतिक मानचित्र (Political Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण विश्व, किसी देश, राज्य अथवा जिले आदि की राजनैतिक सीमाओं को दर्शाया जाता है। 

V ऐतिहासिक मानचित्र (Historical Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी देश के राजनैतिक इतिहास तथा इससे सम्बन्धित घटानाओं को दर्शाया जाता है।

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