भारत : खनिज संसाधन एवं उद्योग (Mineral Resources & Industries)

कोयला (Coal)

कोयला देश में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत हैं और देश की व्यावसायिक ऊर्जा की खपत में इसका योगदान 67 प्रतिशत है। इसके अलावा यह इस्पात और कार्बो-रसायनिक उद्योगों में काम आने वाला आवश्यक पदार्थ है। कोयले से प्राप्त शक्ति खनिज तेल से प्राप्त की गयी शक्ति से दोगुनी, प्राकृतिक गैस से पाँच गुनी तथा जल-विद्युत शक्ति से आठ गुना अधिक होती है। इसके महत्व के कारण इसे काला सोना की उपमा दी जाती है। कोयले के भण्डारों की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है – भारतीय मिनरल ईयर बुक (IMYB) 2009 के अनुसार देश में 1200 मीटर की गहराई तक सुरक्षित कोयले का भण्डार 26721.0 करोड़ टन था।

कोयले के पाँच शीर्ष भण्डारक राज्य

राज्यभण्डारण (करोड़ टन में)
झारखण्ड7671.1
ओडिशा6522.6
छत्तीसगढ़4448.3
प. बंगाल2832.6
म. प्र.2098.1
स्रोत : IMYB2009

वर्ष 2008-09 के दौरान कोयले का कुल उत्पादन 492.9 मिलियन टन था। 

देश में कोयले के समस्त उत्पादन का लगभग 77% भाग बिजली उत्पादन में खपत होता है।

कोयला उत्पादक शीर्ष पाँच राज्य

राज्यउत्पादन % में
छत्तीसगढ़20.7
ओडिशा20.0
झारखण्ड19.5
मध्य प्रदेश14.4
आन्ध्र प्रदेश9.0

भारत में कोयले के प्रकार 

कार्बन, वाष्प व जल की मात्रा के आधार पर भारतीय कोयला निम्न प्रकार का है

1. एन्थेसाइट कोयला (Anthracite Coal) : यह कोयला सबसे उत्तम है। इसमें कार्बन की मात्रा 80 से 95 प्रतिशत, जल की मात्रा 2 से 5 प्रतिशत तथा वाष्प 25 से 40 प्रतिशत तक होती है। जलते समय यह धुंआ नहीं देता तथा ताप सबसे अधिक देता है। यह जम्मू-कश्मीर राज्य से प्राप्त होता है।

2. बिटुमिनस कोयला (Bituminous Coal) : यह द्वितीय श्रेणी का कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 55% से 65%, जल की मात्रा 20% से 30% तथा 35% से 50% होती है। यह जलते समय साधारण धुंआ देता है। गोंडवाना काल का कोयला इसी प्रकार का है। 

3. लिग्नाइट कोयला (Lignite Coal) : यह घटिया किस्म का भूरा कोयला है। इसमें कार्बन की मात्रा 45 प्रतिशत से 55 प्रतिशत, जल का अंश 30 प्रतिशत से 55 प्रतिशत तथा वाष्प 35 प्रतिशत से 50 प्रतिशत होती है। यह कोयला राजस्थान, मेघालय, असम, वेल्लोर, तिरुवनालोर (तमिलनाडु), दार्जिलिंग (प. बंगाल) में मिलता है।

कोयला क्षेत्र 

(क) गोंडवाना कोयला क्षेत्र : गोंडवाना क्षेत्र के अन्तर्गत दामोदर घाटी के प्रमुख कोयला क्षेत्र निम्न हैं

रानीगंज क्षेत्र : प. बंगाल का रानीगंज कोयला क्षेत्र ऊपरी दामोदर घाटी में है जो देश का सबसे महत्वपूर्ण एवं बड़ा कोयला क्षेत्र है। इस क्षेत्र से देश का लगभग 35% कोयला प्राप्त होता है।

शीर्ष तीन लिग्नाइट भण्डारक राज्य

राज्य% मात्रा
तमिलनाडु80.36
राजस्थान11.65
गुजरात6.81

कोयला उत्पादक प्रमुख क्षेत्र

क्षेत्रराज्य
झरियाझारखण्ड
कालाकोडजम्मू-कश्मीर
उमरसारगुजरात
पलानाराजस्थान
बाहुरपांडिचेरी
निचाहोमजम्मू-कश्मीर
बरकलाकेरल
नवेलीतमिलनाडु
नागचिक नामअरुणाचल प्रदेश

लिग्नाइट उत्पादक शीर्ष तीन राज्य

राज्य% अंश में
तमिलनाडु65.7
गुजरात31.1
राजस्थान3.08

कोयले के पाँच शीर्ष उपयोग क्षेत्र

क्षेत्र% अंश में
तापीय संयन्त्र74.6
ईंटों के भट्टे 9.9
इस्पात उद्योग3.7
सीमेन्ट उद्योग3.5
उर्वरक1.0

धनबाद जिले में स्थित झरिया कोयला क्षेत्र झारखण्ड राज्य का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक क्षेत्र है। देश के 90% से अधिक कोकिंग कोयले के भण्डार यहाँ स्थित हैं। कोयला धोवन शालाएँ सुदामडीह तथा मोनिडीह में स्थित हैं। 

गिरिडीह क्षेत्र : झारखण्ड राज्य में स्थित, यहाँ के कोयले की मुख्य विशेषता यह है कि इससे अति उत्तम प्रकार का स्टीम कोक तैयार होता है जो धातु शोधन के लिए उपयुक्त है। 

बोकारो क्षेत्र : यह हजारीबाग में स्थित है। यहाँ भी कोक बनाने योग्य उत्तम कोयला मिलता है। यहाँ मुख्य यह करगाली है जो लगभग 66 मीटर मोटी है। 

करनपुरा क्षेत्र : यह ऊपरी दामोदर की घाटी में बोकारो क्षेत्र से तीन किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। 

सोन घाटी कोयला क्षेत्र : इस क्षेत्र केअन्तर्गत मध्य प्रदेश के सोहागपुर, सिंद्वारौली, तातापानी, रामकोला और उड़ीसा के औरंगा, हुटार के क्षेत्र आते हैं। 

महानदी घाटी कोयला क्षेत्र : इस क्षेत्र के अन्तर्गत उड़ीसा के तलचर और सम्भलपुर क्षेत्र, मध्य प्रदेश के सोनहट तथा विश्रामपुर-लखनपुर क्षेत्र मुख्य हैं। 

छत्तीसगढ़ में कोरबा क्षेत्र की खाने हैं। इसका उपयोग भिलाई के इस्पात कारखाने में होता है। कोरबा के पूर्व में रायगढ़ की खानें हैं। चलवर खाने ब्राह्मणी नदी घाटी में हैं।

आन्ध्र प्रदेश के सिंगरैनी क्षेत्र में उच्च किस्म का कोयला मिलता है। 

(ख) सिंगरैनी युग के कोयला क्षेत्र : सम्पूर्ण भारत का 2 प्रतिशत कोयला टर्शियरी युग की चट्टानों से प्राप्त होता है। इसके मुख्य क्षेत्र राजस्थान, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और तमिलनाडु हैं। राजस्थान में लिग्नाइट कोयले के भण्डार पलाना, बरसिंगरसर, बिथनोक (बीकानेर) कपूरकड़ी, जालिप्पा (बाड़मेर) और कसनऊ-इग्यार (नागैर) में है।

तमिलनाडु राज्य के दक्षिण में अर्काट जिले में नवेली नामक स्थान पर लिग्नाइट कोयला मिलता है। लिग्नाइट का सर्वाधिक भण्डार तथा उत्पादक तमिलनाडु में होता है। मन्नारगुड़ी (तमिलनाडु) में लिग्नाइट का सबसे बड़ा भण्डार अवस्थित है।

खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम (Mineral Oil or Petroleum)

पेट्रोलियम टर्शियरी युग की जलज अवसादी (Aqueous sedimntary rocks) शैलों का ‘चट्टानी तेल’ है। जो हाइड्रोकार्बन यौगिकों का मिश्रण है। इसमें पेट्रोल, डीजल, ईथर, गैसोलीन, मिट्टी का तेल, चिकनाई तेल एवं मोम आदि प्राप्त होता है। भारत में कच्चे पेट्रोलियम का उत्पादन 2008-09 में 33.5 मिलियन टन था। जिसमें अभितटीय (Onshore) क्षेत्र का योगदान 11.21 मिलियन टन तथा अपतटीय (Offshore) क्षेत्र का योगदान 22.3 (66.6%) मिलियन टन था।

भारत में अवसादी बेसिनों का विस्तार 720 मिलियन वर्ग किमी. क्षेत्र पर है जिसमें 3.140 मिलियन वर्ग किमी. का महाद्वीपीय तट क्षेत्र सम्मिलित है। इन अवसादी बेसिनों में 28 बिलियन टन हाइड्रो-कार्बन के भण्डार अनुमानित किये गये हैं, जिनमें स 20082009 तक 7-70 बिलियन टन भण्डार स्थापित किये जा चुके हैं। हाइड्रोकार्बन में 70% तेल एवं 30% प्राकृतिक गैस मिलती है। प्राप्ति योग्य भण्डार 2.60 बिलियन टन होने का अनुमान है।

खनिज तेल क्षेत्र : भारत में चार प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। यथा

  1. ब्रह्मपुत्र घाटी 
  2. गुजरात तट 
  3. पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र 
  4. पूर्वी अपतटीय क्षेत्र 

ब्रह्मपुत्र घाटी : यह देश की सबसे पुरानी तेल की पेटी है जो दिहिंग घाटी से सुरमा घाटी तक 1300 किमी. क्षेत्र में विस्तृत है। यहाँ के प्रमुख तेल उत्पादक केन्द्र हैं- डिगबोई (डिब्रुगढ़), नाहरकटिया, मोरनहुद्वारीजन, रुद्रसागर-लकवा तथा सुरमाघाटी। 

गुजरात तट :

  • यह क्षेत्र देश का लगभग 18 प्रतिशत तेल उत्पादन करता है।  यहाँ तेल उत्पादन की दो पेटियाँ हैं। यथा खम्भात की खाड़ी के पूर्वी तट के सहारे, जहाँ अंकलेश्वर तथा खम्भात प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। 
  • खेड़ा से महसाना तक, जहाँ कलोर, सानन्द, नवगाँव, मेहसाना तथा बचारजी प्रमुख तेल क्षेत्र हैं। भरूच, मेहसाना, अहमदाबाद, खेड़ा, बड़ोदरा तथा सूरत प्रमुख तेल उत्पादक जिले हैं। 
  • अंकलेश्वर तेल क्षेत्र भरूच जिले में 30 वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। 
  • अशुद्ध तेल कोयली तथा ट्राम्बे में परिष्कृत किया जाता है। खम्भात : लुनेज क्षेत्र, जिसे ‘गान्धार क्षेत्र’ भी कहते हैं, बड़ोदरा के 60 किमी. पश्चिम में स्थित है। 
  • अहमदाबाद-कलोर क्षेत्र खम्भात बेसिन के उत्तर में अहमदाबाद के चारों ओर स्थित है।

प्राकृतिक गैस के शीर्ष उत्पादक क्षेत्र/राज्य 2008-09]

क्षेत्र/राज्य मात्रा मिलियन क्यूबिक मी. में
अपतटीय24086 (73.3%)
गुजरात2605 (7.93%)
असोम2603 (7.92%)
आन्ध्र प्रदेश1524 (4.63%)
तमिलनाडु1542 6
त्रिपुरा553
सम्पूर्ण भारत32849 (100%)
सार्वजनिक क्षेत्र 25265 (76.9%)
निजी क्षेत्र7584 (23.0%)

कच्चे तेल के शीर्ष उत्पादन क्षेत्र/राज्य

क्षेत्र/राज्यमात्रा (हजार टन में)
अपतटीय22232 (66.35%)
गुजरात5944 (17.74%)
असोम4673 (13.94%)
तमिलनाडु289 5
आन्ध्र प्रदेश265
सम्पूर्ण भारत33506
सार्वजनिक क्षेत्र28832 (86.0%)
निजी क्षेत्र4674 (13.94%)

कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का भण्डार

क्षेत्र/राज्यकच्चा तेल (मिलियन टन मे)प्राकृतिक गैस (बिलियन
क्यूबिक मी.)
भारत773.301115.27
(क) अपतटीय452.46840.09
(ख) तटीय320.8427517
सम्पूर्ण भारत 773.301115.27

3. पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र : इस क्षेत्र से देश के समस्त कच्चे तेल उत्पादन का 67 प्रतिशत उत्पादित किया जाता है। इसके अन्तर्गत तीन क्षेत्र सम्मिलित किये जाते हैं। यथा

  • बम्बई-हाई तेल क्षेत्र देश का विशालतम तेल उत्पादक क्षेत्र है जिसका राष्ट्रीय उत्पादन में 60% से अधिक योगदान है। यह मुम्बई के 176 किमी. दक्षिण पश्चिम में लगभग 2500 वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। अतिदोहन के कारण इसका उत्पादन निरन्तर घट रहा है। 
  • बेसीन तेल क्षेत्र बम्बई हाई के दक्षिण पश्चिम में स्थित है। इस क्षेत्र के तेल भण्डार बम्बई हाई से अधिक बड़े हैं। अलियाबेट तेल क्षेत्र भावनगर से 45 किमी. दूर खम्भात की खाड़ी में स्थित है। 

4. पूर्वी अपतटीय क्षेत्र :

  • पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस कृष्णा, गोदावरी तथा कावेरी नदियों के बेसिनों तथा डेल्टाओं में प्राप्त हुए हैं। कृष्णा-गोदावरी अपतटीय बेसिन में स्थित रवा क्षेत्र में तेल प्राप्त हुआ है। अन्य तेल क्षेत्र अमलापुरु (आन्ध्र प्रदेश), नारिमानम तथा कोइरकलापल्ली (कावेरी बेसिन) में स्थित हैं अशुद्ध तेल चेन्नई के निकट पनाइगुड़ि में परिष्कृत किया जाता है।
  • अशुद्ध तेल कावेरी डेल्टा, ज्वालामुखी (हिमाचल प्रदेश) तथा बाड़मेर (राजस्थान) में भी प्राप्त हुआ है। 
  • मन्नार की खाड़ी (तिरुनेलवेली तट), पाइन्ट कालीमीर तथा जफना प्रायद्वीप एवं अवन्तांगी, कराईकुडी तट, बंगाल की खाड़ी, कश्मीर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक विस्तृत पेटी, अण्डमान द्वीप के पश्चिम में अपतटीय क्षेत्र आदि में भी तेल प्राप्ति की सम्भावना है। सरकार ने नयी खोज लाइसेन्स नीति के तहत 48 नये क्षेत्रों में तेल की खोज के लिये विदेशी कम्पनियों से निविदा आमन्त्रित किये थे। 

यूरेनियम

इसकी प्राप्ति धारवाड़ तथा आर्कियन श्रेणी की चट्टानोंपेग्मेटाइट, मोनोजाइट बालू तथा चेरालाइट में होती है। यूरेनियम के प्रमुख अयस्क पिंचब्लेंड, सॉमरस्काइट एवे थेरियानाइट है। झारखण्ड का जादूगोडा (सिंहभूम) क्षेत्र यूरेनियम खनन के लिए सुप्रसिद्ध है। सिंहभूम जिले में ही भाटिन, नारवा, पहाड़ और केरुआडूंगरी में भारी यूरेनियम के स्रोतों का पता लगा है। राजस्थान में यूरेनियम की प्राप्ति भीलवाड़ा, बूंदी और उदयपुर जिलों से होती है।

थोरियम

भारत विश्व का सर्वाधिक थोरियम उत्पादक राष्ट्र है। थोरियस मोनोजाइट रेत से प्राप्त किया जाता है, जिसका निर्माण प्री-कैम्ब्रियन काल की चट्टानों के विध्वंश चूर्ण से हुआ है। जो मुख्यतः केरल के तटवर्ती भागों में मिलता है। इसके अलावा यह नीलगिरि (तमिलनाडु), हजारीबाग (झारखण्ड) और उदयपुर (राजस्थान) जिलों में तथा पश्चिमी तटों के ग्रेनाइट क्षेत्रों में रवों के रूप में भी प्राप्त होता है।

अभ्रक (Mica)

अभ्रक का मुख्य अयस्क पिग्माटाइट है। वैसे यह | मस्कोवाइट, बायोटाइट, फ्लोगोपाइट तथा लेपिडोलाइट जैसे खनिजों का समूह है, जो आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों में खण्डों के रूप में पाया जाता है। मिनरल ईयर बुक 2009 के अनुसार भारत 1206 हजार टन अभ्रक उत्पादित कर विश्व का (0.3%) 15वाँ सर्वाधिक अभ्रक उत्पादक राष्ट्र है। ज्ञातव्य है कि अभ्रक का मुख्य उपयोग विद्युतीय सामान में इन्सुलेटर सामग्री के रूप में तथा वायुयानों में उच्च शक्ति वाली मोटरों में, रेडियों उद्योग तथा रडार में होता है।

अभ्रक (कच्चा) के चार शीर्ष भण्डारक राज्य

राज्य% अंश
राजस्थान51
आन्ध्र प्रदेश28
महाराष्ट्र17
बिहार3

चार शीर्ष अभ्रक (कच्चा) उत्पादक राज्य

राज्य% अंश में
आन्ध्र प्रदेश100.0
राजस्थानउत्पादन नहीं हुआ
बिहारउत्पादन नहीं हुआ
झारखण्डउत्पादन नहीं हुआ

प्राकृतिक अभ्रक के उत्पादन में भारत का विश्व में 15वाँ (0.3%) स्थान है जबकि अभ्रक शीट के उत्पादन एवं भण्डारण में प्रथम स्थान है। इसके आयातक देशों में जापान, यू.एस.ए. ब्रिटेन प्रमुख है। अभ्रक उत्पादक प्रमुख क्षेत्र अधोलिखित हैं। यथा

राज्यक्षेत्र
आन्ध्र प्रदेशनैल्लोर और खम्भात
राजस्थानजयपुर तथा उदयपुर
झारखण्डहजारीबाग, सिंह भूमि
बिहारगया, आगलपुर, मुंगेर

 जिप्सम (Gypsum)

यह अवसादी चट्टानों पाया जाता है। इसे सैलेनाइट भी | कहते हैं। यह कैल्शियम का एक जलकृत सल्फाइड है। इसका उपयोग मृदा सुधारक, सीमेंट तथा चूना मिलाकर प्लास्टर-ऑफ-पेरिस, रंग-रोगन-रासायनिक पदार्थों, गन्धक का अम्ल एवं रासायनिक खाद बनाने में किया जाता है।

जिप्सम भण्डारक प्रथम तीन राज्य

राज्य% अंश में
राजस्थान43.28
जम्मू एवं कश्मीर42.46
तमिलनाडु9.37

जिप्सम उत्पादक शीर्ष दो राज्य

राज्य% अंश में
राजस्थान99
जम्मू एवं कश्मीर0.80

जिप्सम उत्पादक प्रमुख क्षेत्र अधोलिखित है। यथा

राज्यक्षेत्र
राजस्थाननागौर, बीकानेर, जैसलमेर, गंगानगर, बाड़मेर, और पाली जिले
जम्मू एवं कश्मीरउरी, बारामूला, डोडा जिले
तमिलनाडुकोयम्बटूर, तिरुचिरपाल्ली व
चिंगलपेट जिला

बॉक्साइट (Bauxite)

बॉक्साइट टर्शियरी युग में निर्मित लेटराइटी शैलों से सम्बद्ध है, जो एल्युमिनियम का ऑक्साइड है। यह अवशिष्ट अपक्षय का प्रतिफल है जिससे सिलिका का निक्षालन होता है। ज्ञातव्य है कि बॉक्साइट में एल्युमिना की मात्रा 55 से 65 प्रतिशत होता है।

एल्युमिनियम एक हल्की, मजबूत, धातुवर्गनीय (Malleable), तन्य (Ductile), ऊष्मा एवं विद्युत की संचालक तथा वायुमण्डलीय संक्षारण की प्रतिरोधी धातु होने के कारण सर्वाधिक उपयोगी धातुओं में गिनी जाने लगी है। यह विद्युत, धातुकर्मी, वैमानिकी (Aeronautics), स्वचालित वाहनों, रसायन, रिफ्रेक्टरी बॉक्साइट से 1 टन एलुमिना का उत्पादन और 2 टन एलुमिना से 1 टन एल्यूमिनियम का उत्पादन होता है। IMEB-09 के अनुसार भारत में बॉक्साइट का कुल भण्डार 328 करोड़ टन का है, जो विश्व के समस्त बॉक्साइट भण्डार का 7 प्रतिशत है अर्थात् संचित भण्डार की दृष्टि से भारत का स्थान चतुर्थ है।

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भारत : कृषि (India Agriculture)

रबी फसल

• यह अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती है तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती है। जैसे- गेहूँ, जौ, चना, मटर, मसूर, सरसों इत्यादि।

खरीफ फसल

• यह जून-जुलाई में बोई जाती है तथा अक्टूबर में काटी जाती है। जैसे- चावल, मक्का, कपास, ज्वार, गन्ना, बाजरा, तम्बाकू, दालें इत्यादि ।

जायद फसलें

• यह मार्च में बोई जाती है तथा मई-जून में काटी जाती है। जैसे- ककड़ी, खीरा, तरबूज, खरबूजा इत्यादि। – नकदी फसल यह वह फसल है जो व्यापार के उद्देश्य से किसानों द्वारा उगाई जाती है। जैसे- कपास, गन्ना, जूट, तम्बाकू इत्यादि।

झूम (Jhum) की खेती

  • यह अस्थिर प्रकार की कृषि है जो एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होती रहती है।
  • असम, अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैण्ड आदि पूर्वोत्तर राज्यों में यह कृषि प्रचलित है। इसमें जंगलों में आग लगाकर, पेड़ों को काटकर, भूमि साफ की जाती है।
  • इसके बाद इस भूमि पर खेती की जाती है। 2-3 साल बाद यह भूमि त्याग दी जाती है और नई भूमि तैयार की जाती है। इस प्रकार एक के बाद एक वनों का सफाया होता रहता है।
  • यह खेती पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है क्योंकि जंगलों को समाप्त करने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ जाता है।
  • झूम खेती विश्व के अन्य देशों में भी होती है जहाँ इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।

झूम खेती देश 

लाडांग (Ladang) मलेशिया 

चैंगिन (Chengin) फिलीपीन्स

मिलपा (Milpa) मैक्सिको 

कोनुको (Konuko)  वेनेजुएला

माजोले (Masole)  जायरे बेसिन 

चेना (Chena) श्रीलंका

कृषि सम्बन्धी राज्यवार उत्पादन (अवरोही क्रम में) उत्पादन हजार टन में (वर्ष 2009-10 में) 

चावल (Rice) (1) पश्चिम बंगाल (2) पंजाब (3) उत्तर प्रदेश 

गेहूँ (Wheat) (1) उत्तर प्रदेश (2) पंजाब (3) हरियाणा 

ज्वार (Jowar) (1) महाराष्ट्र (2) कर्नाटक (3) मध्य प्रदेश 

बाजरा (Bazra) (1) राजस्थान (2) उत्तर प्रदेश (3) हरियाणा 

मक्का (Miaze) (1) कर्नाटक (2) आंध्र प्रदेश (3) महाराष्ट्र 

कुल खाद्यान्न (1) उत्तर प्रदेश (2) पंजाब (3) मध्य प्रदेश 

चना (Gram) (1) मध्य प्रदेश (2) महाराष्ट्र (3) आन्ध्र प्रदेश 

अरहर (Pulse) (1) महाराष्ट्र (2) मध्य प्रदेश (3) कर्नाटक 

मूंगफली (Groundnut) (1) गुजरात (2) आन्ध्रप्रदेश (3) तमिलनाडु 

रेपसीड और सरसो (1) राजस्थान (2) हरियाणा (3) मध्य प्रदेश 

कपास (हजार बेल्स) (Cotton) (1) गुजरात (2) महाराष्ट्र (3) आन्ध्रप्रदेश ।

जूट (Jute) हजार बेल्स (1) पश्चिम बंगाल (2) बिहार (3) असम

काफी (Coffee) (1) कर्नाटक (2) केरल (3) तमिलनाडु 

चाय (Tea) (1) असम (2) पश्चिम बंगाल (3) तमिलनाडु 

प्राकृतिक रबड़ (Natural Rubber) (1) केरल (2) तमिलनाडु (3) कर्नाटक 

नारियल (Coconut) (1) केरल (2) तमिलनाडु (3) कर्नाटका 

गन्ना (Sugar Cane) (1) उत्तर प्रदेश (2) महाराष्ट्र (3) कर्नाटक 

तम्बाकू (Tobacco) (1) आन्ध्रप्रदेश (2) गुजरात (३) कर्नाटक 

आलू (Potato) (1) उत्तर प्रदेश (2) पश्चिम बंगाल (3) बिहार 

कुल रेशम (हजार किग्रा.) (Silk) (1) आन्ध्र प्रदेश (2) कर्नाटक (3) पश्चिम बंगाल 

केला (Banana) (1) महाराष्ट्र (2) तमिलनाडु (3) गुजरात 

काली मिर्च (Black Pepper) (1) केरल (2) कर्नाटक (3) तमिलनाडु 

सोयाबीन (1) मध्यप्रदेश (2) महाराष्ट्र (3) राजस्थान 

तिलहन (1) मध्य प्रदेश (2) राजस्थान (3) गुजरात 

भेड़ (हजार) (Sheep) (1) आंध्रप्रदेश (2) राजस्थान (3) कर्नाटक 

कुल दूध (Milk) (1) उत्तर प्रदेश (2) पंजाब (3) राजस्थान

शीर्ष पाँच बंजर भूमि वाले राज्य

राज्य (2005)बंजर भूमि वर्ग किमीभौगो. क्षे. का %
राजस्थान10145429.64
जम्मू-कश्मीर7020269.24
म. प्र.5713418.53
महाराष्ट्र4927516.01
आन्ध्र प्रदेश4526716.45
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भारत : मिट्टियाँ (India: Soils)

भारत में मुख्य रूप से आठ प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं

1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)

• उत्तर भारत के विशाल मैदानों में यह मिट्टी नदियों द्वारा लाकर जमा की गयी है तथा समुद्री तटों पर समुद्री लहरों द्वारा। यह मिट्टी दो उपवर्गों में बँटी हुई है- नयी मिट्टी (खादर) एवं पुरानी जलोढ़ मिट्टी (बांगर)। धान, गेहूँ, दलहन, तिलहन, गन्ना एवं जूट की खेती के लिए यह मिट्टी बहुत उपयुक्त है। यह 46.2 प्रतिशत क्षेत्र में है। 

2. काली मिट्टी (Black Soil or Regur Soil)

• यह मिट्टी मुख्यतः दक्कन के लावा क्षेत्र में पाई जाती है। इस मिट्टी का रंग गहरा काला होता है क्योंकि इसमें लोहा, एल्यूमीनियम और मैग्नीशियम लवण की मात्रा अधिक होती है। इस मिट्टी के कण , घने होते हैं जिसके कारण नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसका क्षेत्र महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में फैला हुआ है। यह मिट्टी कपास की फसल के लिए अच्छी होती है। 

3. लाल मिट्टी (Red Soil)

इसका निर्माण स्वेदार आग्नेय शैल जैसे ग्रेनाइट तथा निस के विखण्डन से हुआ है। कहीं-कहीं इसका रंग पीला, भूरा, चॉकलेटी और काला भी पाया जाता है। रंग की विभिन्नता का कारण लोहे के अंश की विभिन्नता है। मुख्य रूप से यह मिट्टी दक्षिणी भारत में मिलती है। इस मिट्टी की प्रधान उपज ज्वार-बाजरा, दलहन, तम्बाकू आदि है। 

4. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)

इसका निर्माण मानसूनी जलवायु के विशेष लक्षण-आर्द्र एवं शुष्क मौसम के क्रमिक परिवर्तन के कारण निक्षालन की प्रक्रिया (leaching away) द्वारा होता है। इसमें सिलिका की कमी होती है। इसमें लोहा तथा ऐल्युमीनियम अधिक होता है। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलने वाली लैटेराइट निम्न क्षेत्र में पाई जाने वाली लैटेराइट की तुलना में ज्यादा अम्लीय होती है। यह मिट्टी झारखण्ड के राजमहल, पूर्वी और पश्चिमी घाटों के क्षेत्रों एवं मेघालय के पहाड़ी क्षेत्रों में पायी जाती है। इसम तथा पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में भी यह मिट्टी पायी जाती है। इसकी प्रधान उपज चाय, कॉफी आदि है। 

5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)

अरावली श्रेणी के पश्चिमी में जलवायु की शुष्कता तथा भीषण ताप के कारण नंगी चट्टाने विखण्डित होकर ये मिट्टी बनाती हैं। यह मिट्टी राजस्थान तथा हरियाणा के दक्षिण-पश्चिमी भाग में पायी जाती हैं। इसमें सिंचाई की उपलब्धता के द्वारा कृषि कार्य सम्भव है। 

6. वन एवं पर्वतीय मिट्टी (Forests and Mountain Soil)

• इस प्रकार की मिट्टी अधिकांशतः वनों एवं पर्वतीय क्षेत्रों में मिलती है। ये मिट्टियाँ उन क्षेत्रों को घेरती हैं, जहाँ या तो पर्वतीय ढाल हो या वन्य क्षेत्रों में घाटियाँ हों। इसमें जैविक पदार्थों तथा नाइट्रोजन की अधिकता होती है। यह हिमालय के पर्वतीय भागों तमिलनाडु, कर्नाटक, मणिपुर, आदि जगहों पर मिलती है। 

7. लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी (Saline and Alkaline Soils)

• ये अनुर्वर एवं अनुत्पादक रेह, ऊसर एवं कल्लर के रूप में भी जानी जाती है। ये मिट्टियाँ अपने में सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम समाहित करती हैं। उत्तरी भारत के सूखे एवं अर्द्ध सूखे क्षेत्रों, यथा पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान तथा बिहार के कुछ हिस्सों में इस मिट्टी का विस्तार है। 

8. पीट एवं जैविक मिट्टी (Prary and Marshy Soils)

उच्च घुलनशील लवण एवं जैविक पदार्थों से युक्त पीट मिट्टी केरल के अलप्पी व कोट्टायम जिले, बिहार के पूर्वोत्तर भाग, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में मिलती है।

शीर्ष पाँच लवणीय मृदा वाले राज्य

राज्य क्षेत्रफल लाख हेक्टेयर
गुजरात12.16
प. बंगाल8.20
आन्ध्र प्रदेश5.88
हरियाणा5.00
तमिलनाडु4.70

महत्वपूर्ण तथ्य 

पारिस्थितकीय आधार पर मृदा अधोलिखित प्रकार की होती है। यथा

1. अवशिष्ट मिट्टी (Residual Soil)- जो मिट्टी बनने के स्थान पर ही पड़ी रहती है उसे अवशिष्ट मिट्टी कहते हैं। 

2. वाहित मिट्टी (Transported Soil)- यह मिट्टी बनने वाले स्थान से बहकर आई हुई मिट्टी होती है।

3. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)-  जो मिट्टी जल द्वारा बहकर दूसरे स्थान पर पहुंचती है। 

4. वातोढ़ मिट्टी (Eoilan)- जो मिट्टी वायु द्वारा उड़कर दूसरे स्थानपर पहुंचती है। 

5. शैल, मलवा मिट्टी (Colluvial)- जो मिट्टी पृथ्वी के आकर्षण के द्वारा दूसरे स्थान पर पहुंचती है।

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भारत की प्राकृतिक वनस्पति (Natural vegetation of india)

भारत में निम्नलिखित प्रकार के वन पाये जाते हैं

वनस्पति क्षेत्रवर्षाक्षेत्रवनस्पति की विशेषताएँवृक्ष
उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र सदाबहार वनवार्षिक वर्षा 250 सेमी. से अधिक पूरे वर्ष अधिक तापमान एवं नमी वाला क्षेत्र900 मी. से नीचे वाले वृक्ष क्षेत्र में। पश्चिमी घाट, तमिलनाडु, कर्नाटक,केरल, पश्चिम बंगाल के छोटे-छोटे भाग, तटीय उड़ीसा,
अन्दमान-निकोबार और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र।
अपने पत्ते कभी एक साथ नहीं गिराते और तीन और चार स्तरों में व्यवस्थित रहते हैं।मुख्यतः कठोर लकड़ी वाले वृक्ष-राजवुड, महोगनी, इबोनी, एबनोस, बाँस, रबर, सीन्कोना, चन्दन आदि।
उष्ण कटिबन्धीय अर्द्ध सदाबहार वन200 से 250 सेमी वार्षिक वर्षाअसम, पश्चिम बंगाल,तटीय उड़ीसा, और पश्चिम घाट में सदाबहार वन के पूर्वी यह सीमा पर संकीर्ण पट्टी का निर्माण करता हैवृक्ष वितान कम घने होते हैं और तलाओं और (epiphytes) की | । | प्रमुखता होती है। वनस्पति सदापर्णी वृक्ष और पर्णपाती वृक्ष के
बीच संक्रमण है।
मुख्य वृक्ष- कदम रोजवुड, कान्जू, चम्पा और आम
उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वनवर्षा 200 सेमी. से कम जिसमें 156–200 सेमी. वर्षा युक्त मानसून वन <156 सेमी. वर्षा युक्त उष्ण कटिबन्धीय शुष्क पर्णपाती वन कहलाता
है।
पश्चिम बंगाल, उड़ीसा छोटानागपुर का पठार,पश्चिमी घाट का पूर्वी ढलान और हिमालय का निचला भागग्रीष्म में वृक्ष छह से आठ सप्ताह तक पत्ते गिरते रहते हैं, ग्रीष्म में वृक्ष वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिएउत्तर में साल, मध्य तथा पश्चिमी भाग में टीक, दक्षिणोत्तर भाग में चंदन। सीसो,महुआ, नीम खैर आदि
उष्ण कटिबन्धीय काँटेदार वन50-75 सेमी. वर्षा आंतरिक पठारी भाग, पूर्वी राजस्थान, पूर्वी और उत्तरी पंजाब,उत्तरी गुजरात, |आन्ध्रप्रदेश के कुछ भाग।झड़ने वाले छोटे काँटेदार वृक्ष जो 10 मी. तट ऊँचाई वाले होते हैं।ऐकेशिया,बबूल,इयूफोरबिया, खैर,खजूर आदि
मरुस्थलीय वनस्पतिवार्षिक वर्षा 10-50 सेराजस्थान के पश्चिमी भाग।झाड़ियाँ दूर-दूर फैले रहते हैं।कैकटस, काँटेदार झाड़ियाँ आदि।
हिमालय वनस्पतिवर्षा 75 सेमी. से 125 सेमी. के बीचहिमालय के पहाड़ी क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश।ऊँचाई के साथ वनस्पति में परिवर्तन होता हैचौड़े पत्ते और कोणीय आकार के वृक्षमुख्य, वनस्पति हैं।जैसे-पाइन, ओक,चीड़, देवदार, ब्लू पाइन, सिल्वर फर आदि (पश्चिम हिमालय में) और ओक, लॉरेल
और चेस्टनट (पूर्वी हिमालय क्षेत्र में)।

दलदली गरान (Mangrove) वनस्पतिऔसतन 40 से 200 सेमी. वर्षा वाले क्षेत्र कुछ स्थानों पर बहुत घना-पश्चिमी घाट,गंगा, महानदी, कृष्णा,कावेरी और गोदावरी डेल्टा। सन्दरवन उपर्युक्त उदाहरण।ज्वार के कारण खारा पानी स्वच्छ पानी से निचले तटीय क्षेत्र में मिलकर ऐसे वनस्पति सबसे | के उपजने में मदद करते हैं जिनमें
अवस्तम्भ जड़ें (Stilt Root) और जो असंख्य आरोही लतायें युक्त होती हैं।
सुन्दरी, नारियल,पाइन, केवड़ा, बेंत, क्रू आदि
उपोष्ण आर्द्र पहाड़ी वनवर्षा 150-300 से. मी के बीचपूर्वी हिमालय में 900 मी. से ऊपर और पश्चिमी हिमालय वाले क्षेत्र।कोणधारी वृक्ष और पृथुपर्णी वृक्ष का मिश्रित वन पाइन और ओक
शीतोष्ण वन1830 मी. से अधिक ऊँचाई पर पूर्वी | हिमालय में और 1500 मी. से अधिक ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय वाले क्षेत्र में।सदाबहार कोणधारी वनदेवदार, भारतीय
चेस्टनट, मैगनोलिया, ब्लू पाइन, ओंक और हेमलॉक।
अल्पाइन वनपूर्वी हिमालय में 3650 मी. ऊँचाई तकपौधे इतने छोटे और एक दूसरे से इतने सटे हुए होते हैं कि वे मुलायम कालीन की तह लगाते हैं।स्यूस, फर, वर्च, | जूनिपर और रोडोडेन्ड्रॉन अल्पाइन वनस्पति और घास की वनस्पति के ऊपर पथरीले भाग में मिलते हैं जहाँ कुछ काई और कुछ जड़ी बूटियाँ मिलती है जब तक कि स्थायी हिम रेखा नहीं पहुँच जाती है।

नोट :- राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार देश के 33.3% क्षेत्र पर वन होने चाहिए। 

वन सम्बन्धी तथ्य 

12वीं वन स्थिति रिपोर्ट-2011 के अनुसार कुल वन क्षेत्रफल 692027 वर्ग किमी. है। (कुल भू–भाग का 21.05%) 

देश में सर्वाधिक वन क्षेत्रफल वाले राज्य

  • 1. मध्य प्रदेश 
  • 2. अरुणाचल प्रदेश 
  • 3. छत्तीसगढ़ 
  • 4. महाराष्ट्र

देश में न्यूनतम वन क्षेत्रफल वाले राज्य

  • 1. हरियाणा 
  • 2. पंजाब
  • 3. गोवा
  • 4. सिक्किम 

भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत की दृष्टि से सर्वाधिक वन वाले राज्य/संघीय क्षेत्र (अपने भौगोलिक क्षेत्र के सापेक्ष)

  • 1. मिजोरम (90.28%) 
  • 2. लक्षद्वीप (84.38%) 
  • 3. अ.नि.वी.स. (81.51%) 
  • 4. अरुणाचल प्रदेश (80.50%)

सबसे बड़े मैंग्रोव क्षेत्र वाले राज्य/संघीय क्षेत्र

  • 1. प. बंगाल (2152 वर्ग किमी.) 
  • 2. गुजरात (1064 वर्ग किमी.) 
  • 3. अ.नि.द्वी.स. (615 वर्ग किमी.) 

देश में सबसे ज्यादा बांस के वन वाले राज्य

  • 1. अरुणाचल प्रदेश 
  • 2. मध्य प्रदेश 
  • 3. महाराष्ट्र 

राष्ट्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान केन्द्र, झाँसी (उ.प्र.) में स्थित है। 

केन्द्रीय मरुक्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (राजस्थान) में स्थित है।

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भारत की जलवायु (Climate of India)

भारत के जलवायु प्रदेश

अनेक विद्वानों ने भारत को जलवायु प्रदेशों में विभाजित करने का प्रयास किया है। इन प्रयासों में ट्रवार्था (Trevartha) का जलवायु प्रादेशीकरण काफी प्रचलित हैं। इस वर्गीकरण के आधार पर भारत को निम्नलिखित जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है। 

ऊष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु 

देश के उत्तरी-पूर्वी भाग तथा पश्चिमीतटीय मैदान इस प्रदेश के अंतर्गत आते हैं। इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 200 सेमी. (कुछ क्षेत्रों में 800 सेमी.) से अधिक होती है तथा तापमान वर्षभर 18.2° से. से अधिक रहता है। इस ऊष्ण जलवायु प्रदेश के कुछ भागों में तापमान वर्षभर 29° से. तक पाए जाते हैं। देश का सर्वाधिक वर्षा का स्थान मासिनराम, जो चेरापुंजी के निकट मेघालय में है, इसी प्रदेश में स्थित है। इन क्षेत्रों में ऊँची आर्द्रता वनस्पति की वृद्धि के लिए अनुकूल है। इन क्षेत्रों की प्राकृतिक सघन वर्षा वन है तथा ये वन सदाहरति होते हैं। 

ऊष्ण कटिबंधीय सवाना जलवायु

सहयाद्रि के वृष्टि छाया में आने वाले अर्द्ध शुष्क जलवायु के क्षेत्र को छोड़कर लगभग पूरे प्रायद्वीपीय पठार में इस प्रकार की जलवायु पाई जाती है। इस क्षेत्र में भी औसत मासिक तापमान 18.2° से. से अधिक रहता है। वार्षिक तापांतर ऊष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक ऊँचा होता है। वर्षा की मात्रा भी न केवल कम है बल्कि वर्षा ऋतु भी अपेक्षाकृत छोटी होती है। वर्षा की औसत वार्षिक मात्रा पश्चिम में 76 सेमी. से पूर्व में 152 सेमी. के बीच होती है। इन क्षेत्रों की वनस्पति में वर्षा की मात्रा के अनुसार विभिन्नता पाई जाती है। अपेक्षाकृत नम क्षेत्रों में पतझड़ वालेवन पाए जाते हैं तथा अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रों की वनस्पति काँटेदार झाड़ियों तथा पर्णपाती वृक्षों का सम्मिश्रण होती है।

ऊष्णकटिबंधीय अर्द्धशुष्क स्टेपी जलवायु

यह जलवायु मध्य महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक विस्तृत वृष्टि छाया की पेटी में पाई जाती है। कम तथा अनिश्चित वर्षा इस जलवायु की प्रमुख विशेषता हैं औसत वार्षिक वर्षा 38.1 सेमी. से 72.2 सेमी. है तथा तापमान दिसंबर में 20° से. से 28.8° से. के मध्य रहता हैं ग्रीष्मकाल में औसत मासिक तापमान 32.8° से. तक चला जाता है। वर्षा की सीमित मात्रा तथा अत्यधिक अनियमितता के कारण ये क्षेत्र सूखाग्रस्त रहते हैं जिससे इस क्षेत्र में कृषि को हानि पहुँचती है। जलवायु के दृष्टिकोण से यह क्षेत्र केवल पशुपालन तथा शुष्क कृषि के लिए अनुकूल है। इस क्षेत्र में उगने वाली वनस्पति में काँटेदार वृक्षों तथा झाड़ियों की अधिकता पाई जाती है। 

ऊष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी जलवायु

थार के मरुस्थल तथा गंगा के मैदान के अधिक नम क्षेत्रों के मध्य स्थित पंजाब से थार तक फैले एक विस्तृत क्षेत्र में इस प्रकार की जलवायु पाई जाती है। इस क्षेत्र के दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में प्रायद्वीपीय पहार के अपेक्षाकृत नम क्षेत्र स्थित हैं। इस क्षेत्र की जलवायु उत्तरी तथा थार के मरुस्थल के बीच संक्रमण प्रकार की हैं। वर्षा 30.5 तथा 63.5 सेमी. के मध्य होती है तथा तापमान 12° से. से 35° से. के मध्य रहता है। ग्रीष्मकाल में तापमान ऊँचा होता है तथा अनेक बार 45° से. तक पहुँच जाता है। वर्षा की मात्रा सीमित ही नहीं अपितु यह अत्यधिक अनियमित भी है। यह क्षेत्र केवल शुष्क कृषि तथा पशुपालन के लिए अनुकूल हैं। कृषि केवल सिंचाई की सहायता से संभव है। 

ऊष्णकटिबंधीय मरुस्थली जलवायु

राजस्थान के पश्चिमी भाग तथा कच्छ के रन के कुछ भागों में इस प्रकार की जलवायु पाई जाती है। इन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है तथा कई बार कई वर्षों तक वर्षा नहीं होती। वर्षा की औसत मात्रा 30.5 सेमी. से कम, कई भागों में 12 सेमी. से भी कम, होती है। इन खेत्रों में भीषण गर्मी होती है। शीतकाल में तापमान अपेक्षाकृत नीचा होता है तथा इस क्षेत्र के उत्तरी भागों में जनवरी में औसत तापमान 11.60 से. तक गिर जाता हैं इस शुष्क जलवायु के क्षेत्र में वनस्पति आवरण बहुत ही कम है। केवल काँटेदार पौधे और कुछ घास ही इस क्षेत्र में उग पाते हैं।

आर्द्र शीतकाल वाली नम उपोष्ण जलवायु

इस प्रकार की जलवायु हिमालय से दक्षिण में एक विस्तृत क्षेत्र में पाई जाती है। इस जलवायु प्रदेश के दक्षिण में ऊष्णकटिबंधीय सवाना प्रदेश तथा इसके पश्चिम में ऊष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी प्रदेश हैं। आर्द्र शीतकाल वाला यह जलवायु क्षेत्र हिमालय के साथ-साथ पंजाब से असम तक विस्तृत है तथा अरावली से पूर्व का राजस्थान का क्षेत्र भी इसी जलवायु प्रदेश के अंतर्गत सम्मिलित कियाजाता है। इस प्रदेश में वर्षा का औसत 63.5 सेमी. से 125.4 सेमी. तक है। इसके उत्तरी भाग में, हिमालय से संलग्न क्षेत्र में वर्षा अधिक होती है तथा दक्षिण की ओर पूर्व से पश्चिम की ओर भी कम होती जाती है। अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकाल में होती है तथा कुछ क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभों के प्रभाव से शीतकाल में भी वर्षा होती है।

पर्वतीय जलवायु

इस प्रकार की जलवायु का प्रमुख क्षेत्र हिमालय क्षेत्र है। पर्वतीय क्षेत्रों में सूर्य के सम्मुख तथा इससे विमुख ढालों पर तापमान में काफी विषमता पाई जाती है। हिमालय क्षेत्र में वर्षा की मात्रा सामान्यता पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। पवनों के अभिमुख तथा विमुख ढालों के बीच भी वर्षण में महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है। सामान्यता हिमालय के दक्षिणी ढालों पर, जो दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनों के अभिमुख ढाल हैं, वर्षा की मात्रा उत्तरी ढालों की अपेक्षा अधिक होती है। यही कारण है कि हिमालय के दक्षिणाभिमुख ढालों पर वनस्पति का आवरण भी सामान्यतः अधिक घना पाया जाता है।

ऋतुएँ

ऋतुभारतीय कैलेंडर के अनुसार महीनेअंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार महीने
बसंत चैत्र–बैसाखमार्च-अप्रैल
ग्रीष्मज्येष्ठ-आषाढ़मई-जून
वर्षाश्रावण-भाद्रजुलाई-अगस्त
शरदआश्विन-कार्तिकसितंबर-अक्टूबर
हेमंतमार्गशीष–पौषनवंबर-दिसंबर
शिशिरमाघ–फाल्गुनजनवरी-फरवरी

शीत ऋतु

  • भारत में शीत ऋतु, दिसंबर, जनवरी व फरवरी माह में होती है। शीत ऋतु के दौरान तापमान सामान्यतः 21°C रहता हैं 
  • शीत ऋतु काल में उत्तरी भारत में वायु दाब उच्च रहता है व उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहमान रहती है 
  • जिससे शीत ऋतु शुष्क रहती है। शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभ के कारण वर्षा होती है। ऐसा क्षीण चक्रवातीय अवदबावों के कारण होता है। पश्चिमी विक्षोभ की उत्पत्ति पूर्वी भूमध्य सागर में होती है जो पूर्व की ओर बढ़ कर पश्चिमी एशिया, ईरान, अफगानिस्तान व पाकिस्तान को पार करके भारत पहुँचता है व मार्ग में कैस्पियन सागर व फारस की खाड़ी से प्राप्त आर्द्रता के द्वारा उत्तरी भारत में वर्षा करता है।  
  • तमिलनाडु में शीतकाल में वर्षा होगी।
  • शीत ऋतु में आने वाली व्यापारिक पवनों के उत्तर-पूर्वी मानसून कहते हैं। इन व्यापारिक पवनों से उत्तर भारत में रबी की फसल को विशेष लाभ होता है। इस समय पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में अत्यधिक हिमपात के साथ-साथ चेन्नई में भी भारी वर्षा होती है।

ग्रीष्म ऋतु

  • भारत में मार्च-जून के मध्य ग्रीष्म ऋतु होती है। मार्च माह में सूर्य के कर्क रेखा की ओर गमन के कारण भारत में तापमान बढ़ने लगता है। तापमान बढ़ने के कारण दक्षिण का तापमान मार्च में 43°C तक पहुँच जाता है। उत्तरी भारत में यह सिीति मध्य मई में आती है।
  • तापमान बढ़ने के साथ-साथ वायुदाब भी घटता जाता है। इस समय निम्न वायुदाब का केन्द्र राजस्थान व नागपुर के पठारी क्षेत्रों में बनता है। मार्च-मई के मध्य वायु की दिशा व मार्ग में परिवर्तन होने से पछुआ पवन चलती है जो लू कहलाती है। ये अत्यंत उष्ण व शुष्क होती है। आर्द्र व शुष्क पवनों के मिलने से आँधी चलती है व वर्षा होती है। पश्चिम बंगाल, कोलकाता में काल वैशाखी वर्षा इसका उदाहरण है। 
  • दक्षिण भारत व असम में मई माह में होने वाली वर्षा अत्यंत लाभदायक होती है। असम में यह वर्षा चाय के लिए लाभप्रद होती है व इसे चाय वर्षा कहते हैं। इस प्रकार केरल कर्नाटक में इसे आम्रवृष्टि कहते हैं। यह वर्षा जूट, चाय, कहवा, चावल के लिए उपयोगी होती है। 

वर्षा ऋतु (मानसून) 

  • भारत में वर्षा ऋतु का काल जून-सितंबर के मध्य रहता है
  • जून माह में सूर्य की करणों कर्क रेखा पर सीधी पड़ रही। रहती हैं। जिसके कारण पश्चिमी मैदानी भागों में पवन गर्म होकर ऊपर उठ जाती है व कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। कम दबाव का क्षेत्र इतना प्रबल होता है कि कम दबाव क्षेत्र को भरने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनें भूमध्य रेखा पार कर जब ये पवनें भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ती हैं तो पृथ्वी की गति के कारण इनकी दिशा में परिवर्तन हो जाता है तथा ये दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहने लगती हैं। इसी कारण जून-सितंबर के मध्य होने वाली वर्षा को दक्षिण-पश्चिम मानसूनी वर्षा कहते हैं। मानसून पवनें, व्यापारिक पवनों के विपरीत परिवर्तनशील होती हैं। 
  • दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनों का उद्गम स्थल समुद्र में होता हैं जब ये पवनें भारतीय उपमाहद्वीप में प्रवेश करती हैं तो अरब सागर व बंगाल की खाड़ी से नमी प्राप्त कर लेती है। मानसूनी पवनें भारतीय सागरों में मई माह के अंत में प्रवेश करती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून सर्वप्रथम लगभग 5 जून के आसपास केरल तट पर वर्षा करता है व महीने भर में संपूर्ण भारत में वर्षा होने लगती है। भारतीय उपमाहद्वीप की स्थलाकृति के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून निम्नलिखित दो शाखाओं में विभक्त हो जाता है
  • » अरब सागर शाखा, 
  • » बंगाल की खाड़ी शाखा।

अरब सागर शाखा (मानसून)

यह शाखा देश के पश्चिमी तटों, पश्चिमी घाटों, महाराष्ट्र, गुजरात व मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में वर्षा करती है। पंजाब में बंगाल की खाडत्री से आनेवाली मानसूनी शाखा से मिल जाती है। यह शाखा पश्चिम घाटों पर भारी वर्षा करती है, परंतु दक्कन के पश्चिमी घाट के दृष्टि-छाया प्रदेश में होने के कारण इन क्षेत्रों में अल्प वर्षा हो पाती है। इसी प्रकार गुजरात व राजस्थान में पर्वत अवरोधों के अभाव के कारण वर्षा कम हो पाती है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून की दोनों शाखाओं में अरब सागर शाखा अधिक शक्तिशाली है और यह शाखा बंगाल की खाड़ी की शाखा की अपेक्षा लगभग तीन गुना अधिक वर्षा करती है। इसके दो कारण हैं, पहला- बंगाल की खाड़ी शाखा का एक ही भाग भारत में प्रवेश करता है और दूसरा भाग म्यांमार व थाईलैण्ड की ओर मुड़ जाता है। 

अरब सागर मानसून की उत्तरी शाखा, गुजरात, कच्छ की खाड़ी व राजस्थान से प्रवेश करती है। यहाँ पर्वतीय अवरोध न होने के कारण इन क्षेत्रों में यह शाखा वर्षा नहीं करती तथा सीधे उत्तर-पश्चिम की पर्वतमालाओं से टकराकर जम्मू-कश्मीर व हिमाचल प्रदेश में भारी वर्षा करती है। मैदानी भागों की ओर लौटते समय नमी की मात्रा कम होती है। अतः लौटती पवनों के द्वारा राजस्थान में अल्प वर्षा होती है।

बंगाल की खाड़ी शाखा (मानसून)

मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर दिशा में बंगाल, बांग्लादेश व म्यांमार की ओर बढ़ती है। म्यांमार की ओर बढ़ती मानसून पवनों का एक भाग अराकम पहाड़ियों से टकराकर भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिम बंगाल व बांग्लादेश में आता है। 

यह शाखा हिमालय पर्वतमाला के समांतर बढ़ते हुए गंगा के मैदान में वर्षा करती हैं। हिमालय पर्वतमाला मानसूनी पवनों को पार जाने से रोकती हैं व संपूर्ण गंगा बेसिन में वर्षा होती है। उत्तर व उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ी शाखा उत्तर-पूर्वी भारत में भारी वर्षा करती है। मेध्ज्ञालय में तथा गारो, खासी व जयंतिया पहाड़ियों कीपनुमा स्थाकृति की रचना करती है जिसके कारण यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है। विश्व में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान चेरापूंजी (वर्तमान में मासिनराम) इन्हीं पहाड़ियों में स्थित है।

शरद ऋतु 

शरद ऋतु उष्ण बरसाती मौसम से शुष्क व शीत मौसम के मध्य संक्रमण का काल है। शरद ऋतु का आरंभ सितंबर मध्य में होता है। यह वह समय है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून लौटता है- लौटते मानसून के दौरान तापमान व आर्द्रता अधिक होती है जिसे “अक्टूबर हीट” कहते हैं। मानसून के लौटने पर प्रारंभ में तापमान बढ़ता है परंतु उसके उपरांत तापमान कम होने लगता है। 

तापमान में कमी का कारण यह है कि इस अवधि में सूर्य की किरणें कर्क रेखा से भूमध्य रेखा की ओर गमन कर जाती हैं व सितंबर में सीधी भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं। साथ ही उत्तर

भारत के मैदानों में कम दबाव का क्षेत्र इतना प्रबल नहीं रहता कि वह मानसूनी पवनों को आकर्षित कर सकें।

सितंबर मध्य तक मानसूनी पवनें पंजाब तक वर्षा करती हैं। मध्य अक्टूबर तक मध्य भारत में व नवंबर के आरम्भिक सप्ताहों में दक्षिण भारत तक मानसूनी पवनें वर्षा कर पाती हैं और इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप से मानसून की विदाई नवंबर अंत तक हो जाती है। यह विदाई चरणबद्ध होती है इसीलिए इसे “लौटता दक्षिण-पश्चिम मानसून” कहते हैं।

शरद ऋतु में बंगाल की खाड़ी से चक्रवात उठते हैं जो भारत व बांग्लादेश में भयंकर तबाही मचाते हैं। चक्रवातों के कारण पूर्वी तटों पर भारी वर्षा होती है।

नोट :- 

ग्रीष्म ऋतु में मानसून पूर्व की वर्षा प्राप्त होती है जो | भारत के औसत वार्षिक वर्षा का लगभग 10 प्रतिशत होती है। | विभिन्न भागों में इस वर्षा के अलग-अलग स्थानीय नाम हैं।यथा- 

(i) आम्र वर्षा (Mango shower) : ग्रीष्म ऋतु के खत्म होते-होते पूर्व मानसून बौछारें पड़ती हैं, जो केरल में यह एक आम बात है। स्थानीय तौर पर इस तूफानी वर्षा को आम्र वर्षा कहा जाता है, क्योंकि यह आमों को जल्दी पकने में सहायता देती हैं कर्नाटक में इसे कॉफी वर्षा (Coffee shower) एवं चेरी ब्लॉसम कहाा जाता है।

(ii) फूलों वाली बौछार : इस वर्षा से केरल व निकटवर्ती कहवा उत्पादक क्षेत्रों में कहवा के फूल खिलने लगते हैं। 

(iii) काल बैसाखी : असम और पश्चिम बंगाल में बैसाख के महीने में शाम को चलने वाली ये भयंकर व विनाशकारी वर्षायुक्त पवनें हैं। इनकी कुख्यात प्रकृति का अंदाजा इनके स्थानीय नाम काल बैसाखी से लगाया जा सकता है। जिसका अर्थ है- बैसाख के महीने में आने वाली तबाही। चाय, पटसन व चावल के लिए ये पवने अच्छी हैं। असम में इन तूफानों को ‘बारदोली छीड़ा’ अथवा ‘चाय वर्षा’ (Tea Shower) कहा जाता है। 

(iv) लू : उत्तरी मैदान में पंजाब से बिहार तक चलने वाली ये शुष्क, गर्म व पीड़ादायक पवनें हैं। दिल्ली और पटना के बीच इनकी तीव्रता अधिक होती है।

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भारत का अपवाह तंत्र (Drainage system of india)

हिमनद (Glacier)

हिमनद (Glacier) एक बर्फ संहति है जो उच्च स्थल से निम्न स्थल की ओर धीरे-धीरे खिसकती रहती है।

ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर भीतर में (काराकोरम तथा हिमालय श्रेणियों) विश्व के सबसे बड़े ग्लेशियर मिलते हैं। 

काराकोरम श्रेणी के कुछ मुख्य ग्लेशियर निम्न हैं 

  • सियाचिन (विश्व में सबसे बड़ा)- 72 वर्ग किलोमीटर (क्षेत्रफल)
  • फेडचिनको (Fedchenko) 
  • हिस्पर (Hispar)
  • बियाफो (Biafo) 
  • बलतोरो (Baltoro)

भारत : नदी प्रणाली 

भारत में नदियों को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है

  • • हिमालयीय नदियाँ एवं 
  • • प्रायद्वीपीय नदियाँ

हिमालयीय नदियाँ

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बारह मास प्रवाहित होती हैं (Perennial Rivers) इसकी कुछ प्रमुख नदियाँ निम्न हैं

1. सिन्धु नदी तंत्र

  • सिन्धु नदी का उद्गम स्थित स्थल तिब्बत (चीन) में मानसरोवर झील के पास स्थित सानोख्वाब हिमनद (Glacier) है। 
  • इस नदी की लंबाई 2880 किमी. है, जबकि भारत में इसकी लंबाई 709 किमी. है। यह अंततः पाकिस्तान से होकर अरब सागर में विलीन हो जाती है। 
  • सिंधु नदी के साथ बहने वाली सहायक नदियों में जम्मू-कश्मीर की नदियाँ हैं- गरतांग, श्योक, शिगार,नुब्रा, गिलगित। 

 बाकी नदियाँ व उद्गम स्थल इस प्रकार हैं

नामउद्गम स्थलसंगम/मुहानालम्बाई (किमी)
सतलजमानसरोवर झील के समीप
स्थित राकस ताल
चिनाब नदी1050
रावीकांगड़ा जिले में रोहतांग दर्रे के समीप चिनाब नदी720
व्यास रोहतांग दर्रे के समीप तल
सतलज नदी770
झेलमबरेनाग (कश्मीर) के समीप शेषनाग झीलचिनाब नदी725
चिनाबबारालाचा दर्रा (लाहोल–स्फीति)सिन्धु नदी1800

पंजाब-हरियाणा का मैदान- 

इस मैदान का निर्माण सतलज, रावी और व्यास नदियों द्वारा हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 250 मीटर है। यह मैदान मुख्यतः बांगड से निर्मित है। इस मैदान में नदियों के किनारे बाढ़ से प्रभावित एक संकरी पेटी पाई जाती है। जिसे बेट कहा जाता है। दो नदियों के बीच की भूमि को दोआब कहा जाता है। 

  • 1. विष्ट दोआब : व्यास एवं सतलज के बीच 
  • 2. बारी दोआब : व्यास एवं रावी के बीच 
  • 3. रचना दोआब : रावी एवं चेनाव के बीच 
  • 4. चाज दोआब : चेनाब एवं झेलम के बीच 
  • 5. सिंध सागर दोआब : झेलम, चेनाब एवं सिंधु के बीच 

नोट :-

  • सतलज नदी तिब्बत के नारी खोरसन (Nari Khorsan) प्रांत में एक असाधारण कैनियन का निर्माण करती है जो कोलाराडो नदी (अमेरिका) के ग्रांड कैनयन (Grand Canyon) के समान है। 
  • सन् 1960 ई. में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के अनुसार, भारत सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का केवल 20% जल ही उपयोग में ला सकता है। 
  • झेलम का संस्कृत नाम वितस्ता है, चिनाब का अस्किनी अथवा चंद्रभागा, रावी का पुरूष्णी अथवा इरावती, व्यास का विपासा अथवा अर्गिकिया तथासतलज का शतुन्द्री।

2. गंगा नदी तंत्र 

  • गंगा नदी नाम देवप्रयाग में प्राप्त करती है जहाँ भागीरथी (उद्गम स्थल-गंगोत्री) अलकनन्दा (उद्गम स्थल-बद्रीनाथ) से मिलती है।  
  • इससे पहले अलकनन्दा में मन्दाकिनी (उद्गम स्थल केदारनाथ) से मिलती है। 
  • गंगा नदी की कुल लम्बाई 2525 किमी. है, जिसमें से उत्तरांचल तथा उत्तर प्रदेश में 1450 किमी., बिहार में 445 किमी. तथा पश्चिम बंगाल में 520 किमी. है। 

• गंगा की सहायक नदियाँ इस प्रकार है

नामउद्गम स्थलसंगम/मुहानालम्बाई (किमी)
यमुनाबन्दरपूँछ के पश्चिमी ढाल पर स्थित यमुनोत्री में हिमानीगंगा नदी (इलाहाबाद)1375
चम्बलमध्यप्रदेश में महू के समीप स्थित जनापाव पहाड़ीयमुना नदी1050
घाघरामत्सातुंग हिमानीगंगा नदी1080
गण्डकनेपालगंगा नदी425
कोसीगोसाई धाम चोटी के उत्तर मेंगंगा नदी730
बेतवाविन्ध्याचल पर्वतयमुना नदी 480
सोन अमरकण्टक की पहाड़ियाँगंगा नदी780
  • यमुना, गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। चंबल, सिंध, बेतबा और केन इसकी स्वयं की सहायक नदियाँ हैं। 
  • हुगली नदी (कोलकता में) गंगा की एक प्रमुख वितरिका (Distributary) है। 
  • गंगा को बांग्लादेश में पद्मा के नाम से जाना जाता है। पद्मा, ब्रह्मपुत्र (जिसका बंग्लादेश में नाम-जमुना है) से | मिल जाती है और बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। गंगा व ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश में विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा, सुन्दरवन डेल्टा का निर्माण करती है। 
  • बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले पद्मा में से मेघना | (Meghna) नामक एक प्रमुख वितरिका निकलती है।

3. ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

  • यह 2900 किमी. लंबी नदी मानसरोवर झील के पास स्थित चीमायुंगडुंग हिमानी से निकलती है। 
  • तिब्बत (चीन) में इसका नाम सांग्पो (sangp o) एवं भारत में प्रवेश करने पर अरूणाचल प्रदेश में दिहांग (Dihang) है। 
  • असम में इसे ब्रह्मपुत्र कहा जाता है और बांग्लादेश में जमुना कहा जाता है। 
  • इसकी सहायक नदियाँ सुबनसेरी, कामेंग, धनसीरी, मानस, तीस्ता आदि हैं। 
  • गंगा व ब्रह्मपुत्र विश्वका सबसे बड़ा डेल्टा (सुन्दरवन) बनाती हैं।

नोट :-

  • यह ध्यान देने योग्य बात है कि भारत में बहने के अनुसर सबसे लम्बी नदी गंगा है और भारत में प्रवाहित होने वाली नदियों की कुल लंबाई के आधार पर ब्रह्मपुत्र सबसे लंबी नदी है।
  •  ब्रह्मपुत्र भारत की सबसे बड़ी नदी (Largest river of India) (जल की मात्रा के हिसाब से) है।

प्रायद्वीपीय नदियाँ 

इनमें से लगभग सभी नदियाँ मौसमी (Seasonal) होती हैं अर्थात् लगातार बारह महीने नहीं बहती बल्कि बारशि पर निभर होती हैं। 

इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है- पूर्वी प्रवाह वाली नदियाँ तथा पश्चिमी प्रवाह वाली नदियाँ । 

1. पूर्वी प्रवाह वाली नदियाँ 

  • ये सभी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं और डेल्टा बनाती हैं। इनमें प्रमुख नदियाँ निम्न हैं
नाम उद्गम स्थलसंगम/मुहानालंम्बाई (किमी)
कावेरीकर्नाटक के कुर्ग जिले में स्थित ब्रह्मगिरि पहाड़ीबंगाल की खाड़ी805
कृष्णामहाबलेश्वर के समीप पश्चिमी घाट पहाड़बंगाल की खाड़ी1327
गोदावरीनासिक जिले (महाराष्ट्र) के दक्षिण पश्चिम में 64 किमी. दूर स्थित, त्रयंबक गांव की एक पहाड़ी
बंगाल की खाड़ी1465
तुंगभद्रा घाट पहाड़ कर्नाटक के पश्चिम कृष्णा नदी 640
पेन्नारनन्दीदुर्ग पहाड़ी (कर्नाटक) बंगाल की खाड़ी 570
महानदीमध्य प्रदेश के रामपुर जिले के सिंहवा के समीप (कटक के समीप)बंगाल की खाड़ी858
  • गोदावरी को वृद्ध गंगा या दक्षिणी गंगा भी कहा जाता है। इसकी सहायक नदियाँ- मंजरा, पेनगंगा, वर्धा, इंद्रावती, वेनगंगा, शबरी आदि है। 
  • महानदी की सहायक नदियाँ- ईब, सेओनाथ, हसदो, मांड, जोंक, तेल आदि हैं। 
  • कृष्णा की सहायक नदियाँ- कोयना, दूधगंगा, पंचगंगा, भीमा, तुंगभद्रा, मूसी है। 
  • कावेरी दूसरी नदियों के मुकाबले कम मौसमी प्रकृति की हैं अर्थात् इसमें अधिक समय तक पानी रहता है। इसका कारण है कि इसका ऊपर का हिस्सा गर्मियों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून से और नीचे का हिस्सा सर्दियों में लौटते हुए उत्तर-पूर्वी मानसून से जल प्राप्त करता है। यह भारत की सबसे ज्यादा प्रयोग में लायी गई (Most Harnessed) नदी है। इसकी 9095% सिंचाई व जल-शक्ति क्षमता प्रयोग में ली जा चुकी है। 
  • कावेरी की सहायक नदियाँ- हेमवती, लोकपावनी, शिमसा, लक्ष्मणतीर्थ आदि है। 
  • इनके अलावा सुवर्ण रेखा और ब्राह्मणी नामक दो छोटी नदियाँ भी रांची के पठार से निकल कर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। ये हुगली व महानदी के डेल्टाओं के बीच डेल्टा बनाती है।

2. पश्चिमी प्रवाह वाली नदियाँ

ये पश्चिम की ओर बहती है तथा डेल्टा नहीं बनाती है इनमें प्रमुख नदियाँ हैं

नर्मदाविंध्याचल पर्वत श्रेणियों में स्थित अमरकण्टकम नामक स्थान
खम्भात की खाड़ी 1057
ताप्ती बैतूल जिले (म.प्र.) के मुल्ताई नगर के पासखम्भात की खाड़ी724
माहीविंध्याचल पर्वत श्रेणीखम्भात की खाड़ी560
लूनीअजमेर जिले में स्थित नाग पहाड़
(अरावली पर्वत)
कच्छ की खाड़ी450
घग्घरकालका के समीप हिमालयहनुमानगढ़ (राजस्थान)494
साबरमतीउदयपुर जिले का दक्षिण पश्चिमी भाग | (अरावती पर्वत)कच्छ का रण क्षेत्र416
  • नर्मदा भेड़ाघाट (मध्य प्रदेश) में धुआँदार नामक झरने (Dhuandhar falls) का निर्माण करती हैं। इसकी मुख्य सहायक नदियाँ- हिरन, बुरनेर, बंजर, शेर, शक्कर, तवा आदि हैं। 
  • ताप्ती या तापी को नर्मदा की जुड़वाँ नदी के रूप में जाना जाता है। इसकी सहायक नदियाँ- पुरना, बैतूल, अरूणावती, गंजल आदि हैं। 
  • लूनी को लवण नदी (Salt River) के नाम से जाना जाता है। 
  • श्रावती (Sharavati) नदी पश्चिमी घाट से निकलती हैं। यह प्रसिद्ध जोग या गोरसोप्पा जल प्रपात बनाती हैं जो भारत में सबसे ऊँचा (289 मीटर) जल प्रपात है। 

3. अंतःस्थलीय नदियाँ

  • कुछ नदियाँ ऐसी होती है जो सागर तक नहीं पहुंच पाती और रास्ते में ही लुप्त हो जाती हैं। ये अंतःस्थलीय (Inland drainage) नदियाँ कहलाती है
  • घग्घर (Ghaggar) नदी इसका मुख्य उदाहरण हैं यह एक मौसमी नदी हैं जो हिमालय की निचली ढालों से (कालका के समीप) निकलती है और अनुमानगढ़ (राजस्थान) में लुप्त हो जाती हैं। घग्घर को ही वैदिक काल की सरस्वती माना जाता है। 
  • अन्य उदाहरण- लूनी, कांतली, सावी, काकनी आदि है

झील 

  • चिल्का झील (उड़ीसा) भारत की सबसे बड़ी + लैग्कन झील है।
  •  वुलर झील (जम्मू-कश्मीर) मीठे पानी की सबसे बड़ी झील है।
  • लोनार झील (महाराष्ट्र) ज्वालामुखी क्रिया से निर्मित है।
  • भारत की सबसे ऊँची हिमानी-निर्मित झील देवताल झील है। यह गढ़वाल हिमालय में स्थित है।
  • सांभर झील (राजस्थान) से नमक का औद्योगिक उत्पादन किया जाता है।

भारत की प्रमुख जिले

झीलसंबंधित राज्य
चिल्का झीलउड़ीसा
हुसैन सागर झील आन्ध्र प्रदेश
सांभर झीलराजस्थान
डल झीलजम्मू-कश्मीर
वूलर झीलजम्मू-कश्मीर
डीडबाना झीलराजस्थान
कोलेरू झीलआन्ध्र प्रदेश
पुलीकट झीलतमिलनाडु
शेषनाग झीलजम्मू-कश्मीर
मानसबल झीलजम्मू-कश्मीर
बेम्बनाद झीलकेरल
जयसमंद झीलराजस्थान
नक्की झीलराजस्थान
लोकटक झीलमणिपुर

नोट :- भारत में मानव निर्मित सबसे बड़ी झील इन्दिरा सागर है, जो ओंकालेश्वर, महेश्वर तथा सरदार सरोवर बांध परियोजना (गुजरात-मध्य प्रदेश) का जलाशय है।

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भारत का धरातल/प्राकृतिक भाग( Surface of India)

भारत को पाँच प्राकृतिक भागों में बाँटा जा सकता है।

  • उत्तर का पर्वतीय प्रदेश
  • उत्तर का विशाल मैदान
  • दक्षिण का प्रायद्वीपीय पठार
  • समुद्रतटीय मैदान
  • थार मरुस्थल

हिमालय पर्वत

  • हिमालय (हिम + आलय) का अर्थ है ‘हिम का घर’ (Abode of snow)|
  • इसकी कुल लम्बाई लगभग 5000 किमी. है तथा इसकी औसत ऊँचाई 2000 मीटर है। इसकी औसत चौड़ाई 240 किमी. है तथा क्षेत्रफल लगभग 5 लाख वर्ग किमी. का है।

भारत की भू-आकृतिक इकाइयां मानचित्र (Geographical Units of India map)

* हिमालय पर्वत श्रेणी को तीन भागों में बाँटा गया है1.

 महान या वृहत हिमालय या हिमाद्रि (The Great Himalayas or The Himadri) 

  • इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर है।
  • यह हिमालय पर्वत की सबसे उत्तरी एवं सबसे ऊँची श्रेणी है। हिमालय के सभी सर्वोच्च शिखर इसी श्रेणी में हैं, जैसे- एवरेस्ट (8850 मी.), कंचनजंगा (8598 मी.), मकालू (8481 मी.), धौलागिरी (8172 मी.), चो ओऊ (8153 मी.), नंगा पर्वत (8126 मी.), अन्नपूर्णा (8078 मी.), नन्दा देवी (7817 मी.) आदि। इनमें कंचनजंगा, नंगापर्वत और नन्दादेवी भारत की सीमा में हैं और शेष नेपाल में हैं। 
  • इस श्रेणी में भारत के प्रमुख दर्रे अवस्थित हैं। इनमें शिपकी ला और बारालाचा ला हिमाचल प्रदेश में, बर्जिला और जोजिला कश्मीर में, नीति ला, लिपुलेख और थाग ला उत्तरांचल में तथा जेलेप ला और नाथू ला सिक्किम में स्थित हैं।
  • माउन्ट एवरेस्ट-8850 मीटर (इसे नेपाल में सागर माथा व चीन में क्योमोलांगमा कहते हैं।) यह दुनिया की सबसे ऊँची चोटी है। 
  • कंचनजंगा- 8598 मीटर (यह भारत में हिमालय की सबसे ऊँची चोटी है- सिक्किम में)।

लघु हिमालय, मध्य हिमालय या हिमाचल (Outer Himalayas or The Shiwaliks) 

  • यह हिमालय की सबसे दक्षिणी श्रेणी है। इसकी औसत ऊँचाई 1000 मी. है। इसमें मिट्टी और कंकड़ के बने ऊँचे मैदान मिलते हैं जिन्हें दुन या द्वार कहते हैं (Dehradun, Haridwar) इसके पश्चात् भारत के विशाल मैदान की शुरुआत होती है।
  •  नोट- भारत की सबसे ऊँची चोटी के-2 (काराकोरम) या गॉडविन ऑस्टिन है (ऊँचाई : 8611 मी.) जो काराकोरम श्रेणी में है न कि हिमालय में। यह पाक-अधिकृत कश्मीर में है तथा वृहत् हिमालय के उत्तर में स्थित हैं। 
  • * हिमालय के अलावा उत्तर-पूर्व भारत में कुछ अन्य पर्वत श्रेणियाँ भी हैं
  • • जस्कर व लद्दाख श्रेणी- कश्मीर में
  •  • पटकई, लुशाई, गारो, खासी, जयन्तिया, बुम, मीजो श्रेणी- पूर्वी राज्यों में। 

प्रायद्वीपीय पर्वत

  • » अरावली पर्वत
  • यह राजस्थान से लेकर दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम तक विस्तृत है। इनकी कुल लम्बाई लगभग 880 किमी. है। यह विश्व की सबसे पुरानी पर्वतमाला है। 
  • गुरु शिखर 1722 मीटर इनकी सबसे ऊँची चोटी है। इस पर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल माउण्ट आबू स्थित है। 
  • » विन्ध्याचल पर्वत 
  • • यह पर्वतमाला पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में उत्तर-प्रदेश तक जाती है। 
  • यह विन्ध्याचल, भारनेर, कैमूर व पारसनाथ पहाड़ियों का सम्मिलित रूप है। विन्ध्याचल पर्वत ही उत्तर व दक्षिण भारत को स्पष्ट रूप से अलग करता है। इसकी औसत ऊँचाई 900 मी. है।
  • » सतपुड़ा पर्वत 
  • सतपुड़ा पश्चिम में राजपीपला से आरम्भ होकर छोटा नागपुर के पठार तक विस्तृत है। 
  • महादेव और मैकाल पहाड़ियाँ भी इस पर्वतमाला का हिस्सा हैं। 1350 मी. ऊँची धूपगढ़ चोटी इसकी सबसे ऊँची चोटी है। 
  • पश्चिमी घाट या सह्याद्रि
  • इसकी औसत ऊँचाई 1200 मीटर है और यह पर्वतमाला 1600 किमी. लम्बी है। 
  • इस श्रेणी में दो प्रमुख दर्रे हैं- थालघाट (यह नासिक को मुम्बई से जोड़ता है) एवं भोरघाट (इससे मुम्बई-कोलकाता रेलमार्ग गुजरता है)। 
  • तीसरा दर्रा पालघाट (इससे तमिलनाडु व केरल जुड़ते हैं) इस श्रेणी के दक्षिणी हिस्से को मुख्य श्रेणी से अलग करता है 
  • पूर्वी घाट
  • इसकी औसत ऊँचाई 615 मीटर है और यह श्रेणी 1300 किलोमीटर लम्बी है। 
  • पूर्वी घाट के अंतर्गत दक्षिण से उत्तर की और पहाड़ियों को पालकोंडा, अन्नामलाई, जावादा। और शिवराय की पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। 
  • इस शृंखला की सबसे ऊँची चोटी महेन्द्रगिरी
  • (1501 मीटर) है। 
  • नीलगिरि या नीले पर्वत 
  • नीलगिरि की पहाड़ियाँ, पश्चिमी घाट व पूर्वी घाट की मिलन स्थली है। 
  • नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी दोद्दाबेट्टा (Doddabetta) है।
  • नोट :-
  • सुदूर-दक्षिण में इलायची की पहाड़ियाँ हैं।। इन्हें इल्लामलाई पहाड़ी भी कहते हैं।
  •  प्रायद्वीपीय भारत का सबसे ऊँची चोटी अन्नाईमुडी (2695 मीटर) है जो अन्नामलाई पहाड़ियों में है।
पर्वत चोटी
देशसमुद्रतल से ऊँचाई (मीटर में)
माउण्ट एवरेस्ट
नेपाल
8,850
कंचनजंगाभारत8,598
मकालूनेपाल
8,481
धौलागिरिनेपाल
8,172
नंगा पर्वतभारत8,126
अन्नपूर्णानेपाल
8,078
नन्दा देवीभारत7,817
नामचबरवा
तिब्बत7,756

भारत के प्रमुख दर्रे 

  • कराकोरम दर्रा- यह जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र में कराकोरम श्रेणियों में स्थित है। इसकी समुद्र तल से ऊँचाई 5,654 मीटर है। 
  • जोजिला दर्रा- यह जम्मू-कश्मीर राज्य के जासकर श्रेणी में स्थित है। श्रीनगर से लेह जाने का मार्ग इसी दर्रे से गुजरता है। इसकी ऊँचाई 3529 मीटर है।
  • पीरपांजाल दर्रा- यह जम्मू-कश्मीर राज्य के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह पीरपांजाल के मध्य 3494 मीटर ऊँचा है।
  • बानिहाल दर्रा- यह जम्मू-कश्मीर राज्य के दक्षिण-पश्चिम में | पीरपांजाल श्रेणियों में स्थित है। इसकी ऊँचाई 2882 मीटर है। | जम्मू से श्रीनगर का मार्ग इसी दर्रे से गुजरता है।
  • शिपकीला दर्रा- यह दर्रा हिमाचल प्रदेश राज्य के जास्कर | श्रेणी में स्थित है। इस दर्रे से होकर शिमला से तिब्बत जाने का मार्ग है। 
  • रोहतांग दरा- हिमाचल प्रदेश में पीरपांजाल श्रेणियों में | यह दर्रा स्थित है। इसकी ऊँचाई 4631 मीटर है।
  • बाड़ालाचा दर्रा- यह हिमाचल प्रदेश में जासकर श्रेणी में | स्थित है। इसकी ऊँचाई 4512 मीटर है। मंडी से लेह जाने | वाला मार्ग इसी दर्रे से होकर गुजरता है।
  • माना दर्रा- यह उत्तराखण्ड के कुमायूं श्रेणी में स्थित है। | इस दर्रे से होकर भारतीय तीर्थयात्री मानसरोवर झील और कैलाश पर्वत के दर्शन हेतु जाते हैं।
  • नीति दर्रा- यह दर्रा भी उत्तराखण्ड के कुमायूं श्रेणी में | स्थित है। यह 5389 मीटर ऊँचा है। यहाँ से भी मानसरोवर झील व कैलाश घाटी जाने का रास्ता खुलता है।
  • नाथुला दर्रा- यह सिक्किम राज्य में डोगेक्या श्रेणी में | स्थित है। भारत एवं चीन के बीच युद्ध में यह अपने सामरिक | महत्व के कारण अधिक चर्चा में रहा। यहाँ से दार्जिलिंग और चुंबी घाटी होकर तिब्बत जाने का मार्ग है। 
  • जेलेपला दर्रा- यह दर्रा भी सिक्किम राज्य में है। भूटान | जाने वाला मार्ग इसी दर्र से होकर गुजरता हैं
  • बोमडिला दर्रा- यह अरुणाचल प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी | भाग में स्थित है। बोमडिला से तवांग होकर तिब्बत जाने का | मार्ग है।
  • यांग्याप दर्रा- अरुणाचल प्रदेश के उत्तर-पूर्व में स्थित | इस दर्रे के पास से ही ब्रह्मपुत्र नदी गुजरती है। यहाँ से चीन | के लिए भी मार्ग खुलता है।
  • दिफू दर्रा- अरुणाचल प्रदेश के पूर्व में भारत-म्यांमार | सीमा पर यह दर्रा स्थित है।
  • थाल घाट- यह महाराष्ट्र राज्य के पश्चिमी घाट की श्रेणियों में स्थित है। इसकी ऊँचाई 583 मीटर है। यहाँ से होकर दिल्ली-मुंबई के प्रमुख रेल व सड़क मार्ग गुजरते
  • भोरघाट- यह दर्रा भी महाराष्ट्र राज्य के पश्चिमी घाट श्रेणियों में स्थित है। पुणे-बेलगाँव रेलमार्ग और सड़क मार्ग इसी दर्रे से गुजरते हैं।
  • पालघाट- यह केरल राज्य के मध्य पूर्व में नीलगिरि की पहाड़ियों में स्थित है। इसकी ऊँचाई 305 मीटर है। कालीकट–त्रिचूर से कोयंबटूर-इंदौर के रेल व सड़क मार्ग इसी दर्रे से होकर गुजरते हैं।

भारत की भू-आकृतिक इकाइयां

इकाइयाँक्षेत्रफल (वर्ग किमी. में)कुल क्षेत्रफल का प्रतिशत
उत्तरी पर्वत श्रेणियाँ 5,78,00017.9
विशाल मैदान 5,50,000
17.7
थार मरुस्थल 1,75,0005.4
मध्यवर्ती उच्च भूमि 3,36,00010.4
प्रायद्वीपीय पठार12,41,00038.5
तटीय मैदान 3,35,000 10.4
द्वीपीय समूह
8,3000.3

पठार

प्रायद्वीपीय पठार

मध्यवर्ती उच्च भूमिदक्कन का पठार
अरावली श्रेणीसतपुड़ा श्रेणी
पूर्वी राजस्थान की उच्च भूमिमहाराष्ट्र का पठार
मालवा का पठारमहानदी बेसिन
बुन्देलखण्ड का पठारउड़ीसा उच्च भूमि
विन्ध्यालच–बघेलखण्डदण्ड कारण्य
पठार
छोटा नागपुर पठारतेलंगाना (आन्ध्र) पठार
मेघालय का पठारतमिलनाडु पठार
पश्चिमी घाट
पूर्वी घाट
  • ‘यह भू–भाग उत्तर में गंगा–सतुलज मैदान से तथा शेष तीनों दिशाओं में समुद्र से घिरा है। 
  • भ्रंश घाटी में बहने वाली नर्मदा इस पठार को मुख्य रूप से दो भागों में बाँट देती है- उत्तर में मालवा का पठार तथा दक्षिण में दक्कन का पठार । 
  • दक्कन का पठार क्रिटेशियस–इओसिना युग (CretaceousEocene Era) में लावा निकलने से निर्मित है। 
  • बेतवा, पार्वती, काली सिंध, माही आदि नदियाँ मालवा के पठार से होकर बहती हैं।
  • मालवा पठार के दक्षिण में विन्ध्य पठार स्थित है।
  • बुंदेलखण्ड पठार मालवा पठार के उत्तर व उत्तर-पूर्व में स्थित है।
  • इनके पूर्व में छोटा नागपुर का पठार है जिसका सबसे बड़ा भाग रांची का पठार है। यहाँ खनिजों की भरमार है।
  • दक्कन का पठार भारत में सबसे बड़ा पठार है। 
  • इसके अंतर्गत महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश राज्यों के भू-भाग आते हैं।
  • गोदावरी नदी इसे दो भागों में विभक्त कर देती है
  • तेलंगाना पठार व कर्नाटक पठार।
  • इसकी उत्तरी सीमा ताप्ती नदी बनाती है।

मैदान

  • भारत का विशाल मैदान विश्व के सबसे अधिक उपजाऊ व घनी आबादी वाले भू–भागों में से एक है। 
  • इस विशाल मैदान का निर्माण नदियों द्वारा बहाकर लाये गये निक्षेपों से हुआ है। 
  • इसकी मोटाई गंगा के मैदान में सबसे ज्यादा व पश्चिम में सबसे कम है।
  •  इसकी पश्चिमी सीमा राजस्थान मरुभूमि में विलीन हो गयी है। 
  • केरल में इन मैदानों में समुद्री जल भर जाता है और ये लैगून बन जाते हैं। यहाँ इन्हें कयाल (Kayals or Backwaters) कहा जाता है। इनमें सबसे बड़ा लैगून वैम्बानद झील (Vembanad समद्ध है। जो केरल में स्थित है।

मिट्टी की विशेषता और ढाल के आधार पर इन्हें प्रमुख तौर पर चार भागों में बाँटा गया है

  • भाभर प्रदेश- हिमालयी नदियों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों से टूटकर गिरे पत्थरों-कंकड़ों को लाने से बना मैदान भाभर कहलाता है। इसमें पानी धरातल पर नहीं ठहरता है। 
  • तराई प्रदेश- भाभर से नीचे तराई प्रदेश फैला रहता है। यह निम्न समतल मैदान है, जहाँ नदियों का पानी इधर-उधर दलदली क्षेत्रों का निर्माण करता है।
  • बांगर प्रदेश- यह नदियों द्वारा लाई गयी पुरानी जलोढ़ मिट्टी से निर्मित होता है। इसमें कंकड़ भी पाये जाते हैं जो कैल्शियम से बने होते हैं। 
  • खादर प्रदेश- यह प्रत्येक वर्ष नदियों द्वारा लाई मिट्टी से निर्मित होता है। इसकी उर्वरा शक्ति सबसे ज्यादा होती है।

भारत के द्वीप

भारत में सबसे लंबी तट रेखा (Coast line) गुजरात राज्य की, फिर आन्ध्र प्रदेश राज्य की और फिर महाराष्ट्र राज्य की है।

*भारतीय सीमा में निम्नलिखित द्वीप शामिल हैं

 अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह

  • यह द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी में स्थित है। 
  • अण्डमान समूह में 204 द्वीप है, जिनमें मध्य अण्डमान (Middle Andaman) सबसे बड़ा है।
  • यह विश्वास किया जाता है कि ये द्वीप समूह देश
  • के उत्तर-पूर्व में स्थित पर्वत श्रृंखला का विस्तार है।
  • उत्तर अण्डमान में स्थित कैंडल पीक (Sadale
  • Peak) सबसे ऊँची (737 मीटर) चोटी है।
  • निकोबार समूह में 19 द्वीप हैं जिनमें ग्रेट
  • निकोबार सबसे बड़ा है।
  • ग्रेट निकोबार सबसे दक्षिण में स्थित है और इण्डोनेशिया के सुमात्रा द्वीप से केवल 147 किमी. दूर हैं 
  • बेरन (Barren) एवं नारकोन्डम (Narcondam) ज्वालामुखीय द्वीप हैं जो अंडमान निकोबार द्वीप
  • समूह में स्थित है।
  • डंकन पैसेज (Duncan Passage) दक्षिण अण्डमान एवं लिटिल अण्डमान के बीच है। 
  • 10 डिग्री चैनल लिटिल अण्डमान एवं कार निकोबार के बीच है। यह अण्डमान को निकोबार से अलग करता है।

लक्ष्यद्वीप समूह

  • ये द्वीप अरब सागर में स्थित है।
  • इस समूह में 25 द्वीप हैं। ये सभी मूंगे के द्वीप
  • (Coral Islands) हैं एवं प्रवाल भित्तियों (Coral
  • Reefs) में घिरे हैं।
  • इनमें तीन द्वीप मुख्य हैं- लक्षद्वीप (उत्तर में),
  • मिनीकॉय (दक्षिण में), कावारत्ती (मध्य में)। 
  • 9 डिग्री चैनल कावारत्ती को मिनीकॉय से अलग करती है।
  • 8 डिग्री चैनल मिनीकॉय द्वीप (भारत) को मालदीव से अलग करता है।
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भारत का सामान्य परिचय (General introduction of india)

 स्थिति व सीमाएँ

  • भारत एशिया महाद्वीप का एक देश है, जो एशिया के दक्षिणी भाग में हिन्द महासागर के शीर्ष पर तीन ओर समुद्रों से घिरा हुआ है। पूरा भारत उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ता है। 
  • भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक है। 
  • भारत का देशान्तर विस्तार 68°7′ पूर्वी देशान्तर से 97°25′ पूर्वी देशान्तर तक है। * 
  • भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी. है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से संसार में भारत का सातवाँ स्थान है। यह रूस के क्षेत्रफल का लगभग 1/5, सं.रा. अमेरिका के क्षेत्रफल का 1/3 तथा ऑस्ट्रेलिया के क्षेत्रफल का ⅖ है।
  • जनसंख्या की दृष्टि से संसार में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है।
  • विश्व का 2.4% भूमि भारत के पास है जबकि विश्व की लगभग 17.5% जनसंख्या भारत में रहती है। 
  • भारत के उत्तर में नेपाल, भूटान व चीन, दक्षिण में श्रीलंका एवं हिन्द महासागर, पूरब में बांग्लादेश, म्यांमार एवं बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में पाकिस्तान एवं अरब सागर है। भारत को श्रीलंका से अलग करने वाला समुद्री क्षेत्र मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) तथा पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) है।
  • प्रायद्वीप भारत का दक्षिणतम बिन्दु – कन्याकुमारी है।
  • भारत का सुदूर दक्षिणतम बिन्दु – इन्दिरा प्वाइंट (गेट निकोबार में है)। 
  • भारत का उत्तरी अन्तिम बिन्दु – इंदिरा कॉल है।

देश की चतुर्दिक सीमा बिन्दु 

  • • दक्षिणतम बिन्दु- इन्दिरा प्वाइंट (ग्रेट निकोबार द्वीप) 
  • • उत्तरी बिन्दु- इन्दिरा कोल (जम्मू-कश्मीर) 
  • • पश्चिमी बिन्दु- राजहर कीक (गुजरात) 
  • • पूर्व बिन्दु- वालांगू (अरुणाचल प्रदेश) |
  • • मुख्य भूमि की द. सीमा- कन्याकुमारी (तमिलनाडु)

स्थलीय सीमाओं पर स्थित भारतीय राज्य

देश सीमा पर अवस्थित भारतीय राज्य
पाकिस्तान (4)गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू और कश्मीर
अफगानिस्तान (1) जम्मू और कश्मीर
चीन (5)जम्मू और कश्मीर, हिमांचल
प्रदेश, उत्तरांचल, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश

नेपाल (5)उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार,पश्चिमी बंगाल, सिक्किम
भूटान (4)सिक्किम, पश्चिमी बंगाल,
असम, अरुणाचल प्रदेश
बांग्लादेश (5)
पश्चिमी बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम
म्यांमार (4)अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम

पड़ोसी देशों के मध्य सीमा विस्तार

भारत-बांग्लादेश सीमा 4096 किमी
भारत-चीन3439 किमी
भारत-पाक सीमा3310 किमी
भारत-नेपाल सीमा1761 किमी
भारत-म्यानमार सीमा1643 किमी
भारत-भूटान सीमा 587 किमी

– मुख्य बिन्दु – 

  • कर्क रेखा (Tropic of Cancer) भारत के बीचो-बीच से गुजरती है। 
  • भारत का मानक समय (Indian Standard Time) इलाहाबाद के पास नैनी से लिया गया है, जिसका देशान्तर 82°30′ पूर्वी है। (वर्तमान में मिर्जापुर) यह ग्रीनविच माध्य समय (GMT) से 5 घण्टे 30 मिनट आगे है।
  •  भारत की लम्बाई उत्तर से दक्षिण तक 3214 किमी. तथा पूर्व से पश्चिमी तक 2933 किमी. है। 
  • भारत की समुद्री सीमा 7516.6 किमी. लम्बी है जबकि स्थलीय सीमा की लम्बाई 15,200 किमी. है। भारत की मुख्य भूमि की तटरेखा 6,100 किमी. है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है।
  • जनसंख्या की दृष्टि से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से गोवा भारत का सबसे छोटा राज्य है।

शीर्ष पाँच क्षेत्रफल वाले राज्य राज्य

राज्यक्षेत्रफल वर्ग किमी
राजस्थान3422239
मध्य प्रदेश308245
महाराष्ट्र307713
आन्ध्र प्रदेश275069
उत्तर प्रदेश240928

शीर्ष पाँच भौगोलिक, क्षेत्र वाले जिले

जिलाक्षेत्रफल वर्ग किमी
कच्छ45652
लेह45110
जैसलमेर38428
बाड़मेर28387
बीकानेर27284
  •  जनसंख्या की दृष्टि से सिक्किम भारत का सबसे छोटा राज्य है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह सबसे बड़ा केन्द्र-शासित प्रदेश है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से लक्षद्वीप सबसे छोटा केन्द्र-शासित प्रदेश है।
  • जनसंख्या की दृष्टि से दिल्ली सबसे बड़ा केन्द्र शासित प्रदेश है। 
  • जनसंख्या की दृष्टि से लक्षद्वीप सबसे छोटा केन्द्र शासित प्रदेश है।
  • मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा पठारी राज्य हैं ।
  • राजस्थान भारत का सबसे बड़ा मरुस्थलीय राज्य है।
  • मध्य प्रदेश में वन (जंगल) सबसे अधिक है।
  • भारत में द्वीपों की कुल संख्या 248 है बंगाल की खाड़ी में 223 तथा अरब सागर में 25 द्वीप हैं।
  • भारत के सबसे दक्षिणी छोर का नाम ‘इन्दिरा प्वाइंट’ है और यह बंगाल की खाड़ी में ग्रेट निकोबार (Great Nicobar) द्वीप पर स्थित है। 
  • भारत का सबसे उत्तरी बिन्दु इन्दिरा कॉल, जम्मू-कश्मीर में स्थित है।
  • पूर्वी घाट को कोरमण्डल तट के नाम से जाना जाता है।
  • पश्चिमी घाट को मालाबार तट के नाम से जाना जाता है।
  • भारत के जिन राज्यों में से होकर कर्क रेखा गुजरती है, वे हैं- गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिमी बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम ।भारतीय मानक समय की देशांतर रेखा (82°30′) उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तीसगढ़, उड़ीसा एवं आन्ध्रप्रदेश से गुजरती है
  • उत्तर प्रदेश की सीमा सबसे अधिक राज्यों (8) को छूती है- उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड एवं बिहार
  • भारत में सर्वाधिक नगरों वाला राज्य उत्तर प्रदेश है जबकि मेघालय में सबसे कम नगर हैं। 
  • भारत में सर्वाधिक नगरीय जनसंख्या वाला राज्य महाराष्ट्र है  जबकि सबसे कम नगरीय जनसंख्या सिक्किम में है।
  • भारत में कार्यशील व्यक्तियों की जनसंख्या 4.02 करोड़ है। 
  • भारत में सड़क मार्ग की कुल लम्बाई 18,43,420 किमी.
  • भारत का सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 है जो बनारस से कन्याकुमारी तक जाता है (2369 किमी.)।
  • भारत में रेलमार्ग की कुल लम्बाई 64,140 किमी. है।तिरुअनन्तपुरम एवं कोचीन (केरल) नगरों में मानसून की सर्वप्रथम वर्षा होती है।

प्रमुख चैनल/जलडमरू

विभाजित स्थल खण्डचैनल/खाड़ी/स्ट्रेट
इन्दिरा प्वाइंट-इण्डोनेशियाग्रेट चैनल
लघु अंडमान-निकोबार10° चैनल
मिनीकॉय-लक्षद्वीप9° चैनल
मालदीव-मिनीकाय8° चैनल
भारत-श्रीलंकामन्नार की खाड़ी
पाक की खाड़ीपाक स्ट्रेट
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