राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएं ( Features of Rajasthani painting )

  • विषय वस्तु की विविधता, वर्ण विविधता, प्रकृति परिवेश, देश काल के अनुरूप होना राजस्थान चित्रकला की प्रमुख्पा विशेषताएं हैं। 
  • – धार्मिक एंव सांस्कृतिक क्षेत्र की चित्रकला में भक्ति एंव अंगार इस की प्रधानता हैं। 
  • – दीप्तियुक्त, चटकदार एंव सुनहरे रंगो का अधिक प्रयोग किया जाता है। – किला महलों व हवेलियों में त्रिकला का पोषण हुआ। 
  • – मुगल त्रिकला से प्रभावित राजस्थानी चित्रकला में विलासिता, तडक भडक अन्तःपुर के चित्रव पारदर्शी वस्त्र पहने पात्रों के चित्र बनाए गए हैं। 

– राजस्थानी चित्रकला में समग्रता के दर्शन हाते हैं। मुख्य आकृति व पृष्ठभूमि का हमेशा सामन्जस्य बना रहता था। चित्र में प्रत्येक वसतु का अनिवार्य महत्व होता था। 

– राजस्थानी चित्रकला में प्रकृति का मानवीकरण किया गया हैं। प्रकृति को जड़ नहीं मानकर उसका मान व के सुख – दुख के साथ तारतम्य स्थापित किया गया। 

– मुगलों की अपेक्षा राजस्थानी चित्रकारों को अधिक स्वतन्त्रता होने के कारण लोक विश्वासों को अधिक अभिव्यक्ति मिली। 

– विभिन्न ऋतुओं का श्रृंगारिक वर्णन कर मान व जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का चित्रण किया गया। 

– राजस्थान चित्रकला में नारी सौन्दर्य का चित्रण अधिक किया गया हैं। 

– प्राकृतिक सौन्दर्य का अधिक चित्रण होने के कारण राजस्थानी चित्रकला अधिक मनोरम हो गयी हैं।

राजस्थान की संगीतबद्ध जातियां : – ढोली, राणा, लंगा, मांगणियार, कलावन्त, भवई, कजर, भोपा, ढाढी

लोकगीतों की विशेषताएं:

मनष्य मन की सुख-दुख की भावनाओं का मौखिक रूप में लयबद्ध होना ही लोकगीत हैं। 

राजस्थानी लोकगीतों में पेड़ -पौधों का वणन कर प्रकृति के साथ लोगों का जुडाव प्रकट होता हैं। 

जैसे:- चिश्मी, पीपनी, जीरा 

पशु-पक्षियों के माध्यम से विरहणी महिलाओं ने अपने प्रियतम के पास संदेश भेजे हैं तथा उन पक्षियों को अपने परिवार के सदस्य के समान माना गया हैं। 

जैसे:- कुरजा, सुवटियों, मोरियो, बिच्छूडो। 

राजस्थान लोकगीतों की स्वतंत्रता की बात नहीं की गई हैं। ये पति – पत्नी के निर्मल दाम्पत्य प्रेम के गीत हैं। 

राजस्थान लोकगीतों में हमारे लोक विश्वासों की मुखर अभिव्यक्ति हुई हैं। 

विभिन्न देवी देवताओं पर लिखे गए गीत निराश मनुष्य में भी आशा का संचार करते हैं 

राजस्थानी लोकगीतों में पायल की झंकार व तलवार की टंकार दोनों ही सुनाई देती हैं। 

सामन्ती परिवेश मे लिखे गए राजस्थान लोकगीतो में वीर इस की प्रधानता रहती हैं।

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संस्कार / संस्कृति ( Culture )

जडूला:- जातकर्म (बच्चों के बाल उत्रवाना)

बरी पड़ला:- वर पक्ष के लोगों द्वारा वधू पक्ष के लोगों के लिए लेकर जाने वाले उपहार।

सामेला (मधुर्पक):- शादी पर वधु पक्ष द्वारा वर पक्ष की अगुवानी करना।

मोड़ बाँधनाः- वर को बारात में चढ़ाते समय मांगलिक कार्य।

नांगल:- नये घर का उद्घाटन

कांकनडोरा:- वर को शादी पूर्व बांधे जाने वाला डोरा।

पहरावणी । रंगवरी । समठुनी – शादी के बाद वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिये जाने वाले उपहार।

बढ़ार:- शादी के समय का प्रीतिभोज।

गौना । मुकलावा:- वाल विवाह होने पर बाद में लड़की की पहली विदाई।

छूछक/जामणा:- नवजात के जन्म दर, ननिहाल पक्ष की ओर से दिये जाने वाले आभूषण।

दरसोठन:

रियाण:- किसी अवसर पर अमल (अफीम) की मनुहार।

बैकुण्ठी/चंदोल:- शव यात्रा।

अघेटा:- शमशान ले जाते समय रास्ते में अर्थी की दिशा बदलना।

पगड़ी:- घर में मुखिया की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी चुना जाना।

सांतरवाडा:- मृत्यु के बाद दी जाने वाली सांत्वना।

फूल चुगना:- मृत्यु पश्चात् अस्थि एकत्रित करना।

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राजस्थान मे प्रमुख मेले ( Major Fairs in Rajasthan )

राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित मेले :

1. पतंग महोत्सव – जयपुर 

2. ऊंट महोत्सव – बीकानेर 

3. मरू महोत्सव – जैसलमेर 

4. थार महोत्सव – बाड़मेर 

5. हाथी महोत्सव – जयपुर 

6. शरद महोत्सव – माउंट आबू 

7. मेवाड महोत्सव – उदयपुर 

8. दशहरा महोत्सव – कोटा 

9 हिण्डोला महोत्सव – पुष्कर

अन्य मेले:

1. गंगा दशहरा – कामां (भरतपुर) 

2. भोजन थाली मेला – कामां (भरतपुर) 

3. बसंत पचंमी मेला – दौसा 

4. गौतम जी का मेला – सिरोही 

5. जगदीश मेला – गोनेर (जयपुर) 

6. घोड़ो-गधो का मेला – भावबन्ध (जयपुर) (लुणियावास) 

7. सावित्री मेला – पुष्कर 

8. गरूड़ मेला – बयाना (भरतपुर) 

9. सुईया कपालेश्वर मंदिर – बाडमेर (इसे अर्द्धकुम्भ भी कहते हैं।) 

10. राम रावण मेला – बड़ी सादड़ी (चित्तौड़गढ़) । 

11. मीरा महोत्सव – – चित्तौड़गढ़ 

12. तीर्थराज मेला – धौलपुर 

13. डोलची महोत्सव – दौसा 

14. डोल मेला – बारां 

15. विक्रमादित्य मेला – उदयपुर 

16. चनणी चेरी कामेला – देशनोक (बीकानेर) 

17. सवाई भोज मेला – आसींद (भीलवाड़ा) 

18. बाणगंगा मेला – विराटनगर (जयपुर) 

19. चूंगी तीर्थ मेला – जैसलमेर 

20. चारभुजा नाथ मेला – मेड़ता (नागौर)

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राजस्थान की मस्जिदें एवं मजारें ( Mosques and Mausoleum of Rajasthan )

1. ईदगाह मस्जिदः जयपुर 

2. मलिकशाह की दरगाहः जालौर 

3. मीठे शाह की दरगाहः गणरौण 

4. गुलाब खां का मकबरा : जोधपुर 

5. गुलाब कलन्दर का मकबराः जोधपुर 

6. गमता गाजी मीनारः जोधपुर 

7. भूरे खां की मजारः मेहरानगढ़ (जोधपुर). 

8. इकमीनार : जोधपुर 

9. सफदरजंग की दरगाहः अलवर 

10. अलाउदीन आलमशाह की दरगाहः तिजारा (अलवर) 

11. बीबी जरीना का मकबराः धौलपुर 

12. मेहर खां की मीनार शिवगंज (सिरोही) 

13. सैय्यद बादशाह की दरगाहः शिवगंज (सिरोही) 

14. जामा मस्जिद : शाहबाद (बारां) 

15. काकाजी परी की दरगाहः प्रतागढ़ 

16. मस्तान बाबा की दरगाहः सोजत (पाली) 

17. रजिया सुल्तान का मकबराः टोंक 

18. गूलर कालदान की मीनारः जोधपुर 

19. तन्हापीर की दरगाहः जोधपुर 

20. कबीर शाह की दरगाहः करौली 

21. कमरूद्दीन शाह की दरगाह ः झुंझुनू । 

22. पीर अब्दुल्ला की दरगाहः बांसवाड़ा 

23. दीवान शाह की दरगाहः कपासन (चित्तौड़गढ़) 

24. हजरत शक्कर बाबा की दरगाहः नरहड़ (झुंझुनूं) इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता हैं। 

25. सैय्यद फखरूद्दीन की दरगाहः गलियाकोट (डूंगरपुर) 

26. चल फिर शाह की दरगाहः चित्तौड़गढ़ 

27. पंजाब शाह की दरगाहः रणथम्भौर 

28. मर्दानशाह पीर की दरगाहः रणथम्भौर 

29. फखरूद्दीन चिश्ती की दरगाहः सरवाड़ (अजमेर) 

30. नालीसर मस्जिदः सांभर (जयपुर) 

31. इमली वाले बाबा की दरगाहः ताला (जयपुर) 

32. लैला मजनू की मजारः

रायसिंह नगर (गंगानगर) 

33. बाबा दौलतशाह की दरगाहः चौमूं 

34. दूल्हेशाह की दरगाहः पाली 

35. पीर निजामुद्दीन की दरगाहः फतेहपुर (सीकर)

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राजस्थान के प्रमुख मंदिर ( Major temples of Rajasthan )

किराडू के मंदिर:

– माहवार (बाड़मेर) के समीप। 

– किराडू का पुराना नाम किरात कूप हैं जो परमार राजाओं की राजधानी थी। 

– मुख्य मंदिर – सोमेश्वर – किराडू के मंदिरों को राजस्थान का खजुराहों कहते हैं 

– यह मंदिर नागर शैली में बने हुये हैं। सूर्य मंदिर:- झालरापाटन (झालावाड़) 

– इसे सात सहेलियों का मंदिर कहते हैं। 

– कर्नल जेम्स टॉड ने चारभुजा मंदिर भी कहा हैं। 

– इसे पद्मनाभ मंदिर भी कहते हैं। 

अधुना के मंदिर:

– बांसवाड़ा – अधुना भी परमारों की राजधानी थी। 

– मुख्य मंदिर- हनुमान जी का मंदिर। 

– 11 वीं व 12 वीं शताब्दी के बने हुये हैं। 

– इन्हें वागड का खजुराहों कहते हैं। 

रणकपुर के जैन मंदिर:

– कुम्भा के समय रणकशाह द्वारा निर्मित 

– मुख्य मंदिर- चौमुखा मंदिर (वास्तुकार-देपाक) 

– इस मंदिर में 1444 खम्भे हैं, अतः इसे खम्भों का अजायबघर कहते हैं। 

– इस मंदिर के पास ही नेमिनाथ मंदिर हैं, जिसे वेश्याओं का मंदिर भी कहते हैं 

देलवाड़ा के जैन मंदिर

– सिरोही विमलसहि मंदिर:

– इसका निर्माण 1031ई. में भीमशाह (गुजरात) के चालुक्य राजा का मंत्री ने करवाया था। 

नेमिनाथ मंदिर:

– चालुक्य राजा धवल के मंत्री तेजपाल एवं वास्तुपाल ने इसका निर्माण करवाया। 

– इसे देवरानी-जेठानी का मंदिर भी कहते हैं। 

पुष्कर के मंदिर:

– यहां ब्रह्य जी का मंदिर बना हुआ हैं, जिसका निर्माण गोकुल चन्द पारीक ने करवाया। 

– यहां कार्तिक पूर्णिमा को मेला भरता हैं। 

– यहां सावित्री माता का मंदिर भी हैं। 

– यहां रंगनाथ मंदिर भी बना हुआ हैं, जो द्रविड़ शैली का हैं। 

– पुष्कर को कोंकण तीर्थ भी कहा जाता हैं।

– ब्रह्य जी के अन्य मंदिर:- आसोतरा (बाड़मेर) छींछ (बांसवाड़ा) 

एकलिंगनाथ जी के मंदिर:

– कैलाशपुरी (उदयपुर) 

– नागदा के समीप । 

– 8वीं सदी में बापा रावल ने इसका निर्माण करवाया था।

सहस्त्रबाहु का मंदिर:

– नागदा (उदयपुर)

– इसे सास-बहु का मंदिर भी कहते हैं। 

नौ-ग्रहों का मंदिर:

– किशनगढ़ (अजमेर) 

सावलिया जी का मंदिर:

– मंडफिया (चित्तौड़गढ़) – इसे चोरों का मंदिर भी कहते हैं। 

हर्षद माता का मंदिरः

मुनि का मंदिर 

– कार्तिक पूर्णिमा को मेला भरता हैं। 

– कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता थे। 

अम्बिका माता:

– जगत (उदयपुर) 

– इसे मेवाड़ का खजुराहों कहते हैं। 

– इसे राजस्थान का मिनी खजुराहों कहते हैं। 

कसुंआ मंदिर:- कोटा 

– मौर्य राजा धवल ने शिव मंदिर बनवाया था, जिसमें 1000 शिवलिंग हैं। 

– यहां गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर भी हैं, जिसके दर्शन नहीं किये जाते हैं। 

शीतलेश्वर महादेवः

– झालावाड़ (कर्नल टॉड ने झालरापाटन को घंटियों का शहर कहा हैं।) 

– इसका निर्माण 689 ई. में हुआ। 

– यह राजस्थान का प्राचीनतम तिथि युक्त मंदिर हैं। 

महामंदिर:- जोधपुर 

– राजा मानसिंह द्वारा निर्मित 

– ना सम्प्रदाय का सबसे बड़ा मंदिर। 

सिरे मंदिर:

– जालौर (जोधपुर के राजा मानसिंह ने इसका निर्माण करवाया था)

– बीकानेर – यह 5 वें जैन तीर्थकर सुमतिनाथ का मंदिर हैं। 

– इसके निमा ‘ण में पानी की जगह घी का उपयोग किया गया था। 

सतवीस मंदिरः

– चित्तौड़गढ़ – 11वीं शताब्दी के जैन मंदिर। 

थंडदेवरा मंदिर:

– अटरू (बारां) – इसे हाड़ौती का खजुराहों कहते हैं। (राजस्थान का मिनि खजुराहों)

फुलदेवरा मंदिर:- बारां

– इसे माम-भान्जा मंदिर भी कहते हैं। 

सोनी जी की नसियां :

– अजमेर – इसे लाल मंदिर भी कहते हैं। 

– 1864 में मूलचन्द सोनी ने इसका निर्माण करवाया। 

खड़े गणेश का मंदिर:- कोटा बाजणा 

गणेश मंदिर:- सिरोही सारण 

श्वर महादेव मंदिर:

– सिरोही 

नाचणा गणेश मंदिर:

– रणथम्भौर 

हेरम्ब गणपतिः

– बीकानेर (जूनागढ़ किले में।) 

– गणपति शेर पर सवार हैं। 

रावण मंदिर:

– मण्डौर (जोधपुर) 

– श्रीमाली ब्राह्यण पूजा करते हैं।

विभीषण मंदिर

:- कैथून (कोटा) 

खोड़ा गणेश:

– अजमेर 

रोकड़िया गणेश:

– जैसलमेर 

सालासर बाजाली:

– चुरू (बालाजी के दाढ़ी – मूंछ हैं।) , 

72 जिनालयः

– भीनमाल (जालौर) 

मेहन्दीपुर बाजाली:

– दौसा (N.H.-11 आगरा से जयपुर) 

पावापुरी जैन मंदिर:

– सिरोही – 

नारेली के जैन मंदिर:

– अजमेर 

बालापरी:

– नागौर (कुम्हारी) यहां खिलौने चढ़ाये जाते हैं। 

मूछाला महावीरः

– घाघेराव (पाली) 

33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर:

– बीकानेर (जूनागढ़) 

33 करोड़ देवी-देवताओं की साल:

– मंडौर (अभयसिंह द्वारा निर्मित) 

नीलकण्ड महादेव मंदिर:

– अलवर (अजयपाल द्वारा निर्मित) 

मालासी भैरू जी का मंदिर:

– मालासी (चुरू) . यहां भैरू जी की उल्टी मूर्ति लगी हैं। 

खाटू श्याम जी का मंदिर:

– खाटू (सीकर) 

– बर्बरीक का मंदिर कल्याणजी का मंदिर:- डिग्गी (टोंक)

अन्य मंदिर:

1. ऋषभदेव जी का मंदिर:- उदयपुर

– पूरे देश में एकमात्र यही ऐसा मंदिर हैं जहां सभी सम्प्रदाय व जाति (श्वताम्बर, दिगम्बर, जैन, शैव, वैष्णव,

भील) के लोग आते हैं। 

2. सिरयारी मंदिर- पाली – जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के प्रथम आचार्य री भिक्षु की निर्वाण स्थली। 

3. मुकन्दरा का शिवमंदिर – कोटा 

4. स्वर्ण मंदिर- पाली – जिसे ‘Gateway of Golden and Mini umbai’ के नाम से जाना जाता हैं। 

5. सुन्धा माता का मंदिर- जालौर – राजस्थान का प्रथम रोप-वे बनाया गया हैं। 

6. नागर शैली का अंतिम व सबसे भव्य मंदिर- सोमेश्वर (किराडू) (पुर्जर – प्रतिहार कालीन) 

7. पंचायतन शैली का प्रथम उदाहरण राजस्थान में – औसियां का ‘हरिहर मंदिर’ (भारत में प्रथम उदाहरण,देवगढ़ (झांसी) का दशावतार मंदिर) – नाकोड़ा भैरव जी – बालोतरा।

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राजस्थान के लोकनाट्य ( Loknatya of Rajasthan )

ख्याल :

  • – पौराणिक एंव ऐतिहासिक कथाओं को पद्यबद्ध करके नाटक के रूप में मंचन किया जाता हैं।
  • . सूत्रधारः- हलकारा
  • 1. कुचामनी ख्याल:
  • – प्रवर्तक- लच्छी राम 
  • – इसमें महिला पात्रों की भूमिका पुरूषों द्वारा डी निभायी जाती हैं। 
  • – इसका स्वरूप ‘ओपेरा’ जैसा होता हैं। 
  • – मुख्य कथाएं – चांद नीलगिरि, राव रिड़मल, मीरा मंगल। 
  • – उगमराजः- कुचामनी ख्याल के प्रमुख कलाकार हैं।
  • 2. जयपूरी ख्याल:- इसमें महिला पात्रों की भूमिका महिला ही निभाती हैं।
  • 3. हेला ख्याल:- दौसा, लालसोट एवं सवाई माधोपुर क्षेत्र में प्रसिद्ध। – वाद्य यंत्रः नौबत
  • 4. तुर्रा- कलंगी:- तुकनगीर व शाह अली ने इसे लोकप्रिय किया था। चन्देरी के राजा ने इन्हें तुर्रा व कलंगी दिया था। 
  • – तुर्रा पक्ष – शिव – कलंगी पक्ष – पार्वती – सहेडूसिह व हमीद बेग ने इसे मेवाड़ में लोकप्रिय किया था। 
  • – इसमें दो पक्ष आमने – सामने बैठकर प्रतिस्पर्धा मूलक संवाद करते हैं, जिसे गम्मत कहते हैं। 
  • – तुर्रा – कलंगी ख्याल में मंच की सजावट की जाती हैं। 
  • – दर्शकों के भी भाग – लेने की सम्भावना रहती हैं। 
  • – अन्य कलाकार – चेतराम, ताराचन्द, जयदयाल सोनी, ओंकारसिंह
  • 5. शेखावाटी ख्याल/चिड़ावी ख्याल:- नानूराम व दूलिया राणा ने इसे लोकप्रिय किया।
  • 6. अली बख्शी ख्याल:- अलवर जिले के मुण्डावर ठिकाणे के नवाब अली बख्श के समय यह ख्याल शुरू हुयी। अली बख्श को अलवर का रसखान कहा जाता हैं। 
  • 7. कन्हैया ख्याल:- भरतपुर, धौलपुर, करौली क्षेत्र में लोकप्रिय। 
  • – कृष्ण लीलाओं का मंचन किया जाता हैं। – सूत्रधार – मेड़िया
  • 8. ढप्पाली ख्याल:- लक्ष्मणगढ़ (अलवर) क्षेत्र में लोकप्रिय।
  • 9. भेंट के दंगल:- बाडी (धौलपुर) क्षेत्र में लोकप्रिय। 
  • – धार्मिक कहानियों का मंचन किया जाता हैं।

नौटंकी:

  • अलवर, भरतपुर, करौली क्षेत्र में लोकप्रिय। 
  • – प्रवर्तक – भूरीलाल 
  • – वर्तमान में प्रमुख कलाकार-गिरिराज प्रसाद। 
  • – 9 प्रकार के वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं। 
  • – यह हाथरस शैली से प्रभावित हैं। 
  • – नौटंकी में प्रचलित कहानी:
  • – अमरसिंह राठौड़, आल्हा-ऊदल, सत्यवान-सावित्री, हरिशचन्द्र-तारामती।

रम्मत:

  • बीकानेर एवं जैसलमेर क्षेत्र की लोकप्रिय। 
  • – पुष्करणा ब्राह्मणों द्वारा खेली जाती हैं। 
  • – होली एवं सावन के महीने में रम्मत खेली जाती हैं। 
  • – जैसलमेर में तेजकवि ने इसे लोकप्रिय किया था। 
  • – तेजकवि की प्रसिद्ध रम्मतेः- स्वतत्रं बावनी, (1942 में महात्मा गांधी को की गयी भेंट) मूमल, जोगी भृतहरि, छेले तम्बोलन – तेजकवि अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ थे। 
  • – बीकानेर में ‘पाटों’ पर रम्मत का मंचन किया जाता हैं। 
  • – पाटा संस्कृति – बीकानेर की मौलिक विशेषता हैं। 
  • – होली के समय शुक्ल अष्टमी से चतुदर्शी तक इनका अधिक मंचन किया जाता हैं।
  • – हेड़ाऊ – मेरी की रम्मत सर्वाधिक लोकप्रिय हैं, जिसे जवाहर लाल ने शुरू किया था। 
  • – रम्मत शुरू से पहले रामदेव जी का गीत गया जाता हैं। 
  • – बीकानेर के कलाकार:- तुलसीदास जी, सुआ महाराज, फागु महाराज।

स्वांगः

  • किसी पौराणिक या ऐतिहासिक पात्र की वेशभूषा पहनकर उसकी नकल करना। 
  • – भीलवाड़ा के जानकीलाल भांड व परशुराम ने इसे लोकप्रिय किया। 
  • – जानकी लाल भांड को ‘मंकी मेन’ कहा जाता हैं। 
  • – मांडल (भीलवाड़ा) में चेत्र शुक्ल त्रयोदशी को नाहरों का स्वांग किया जाता हैं।

गवरी:

  • राजसथान का प्राचीनतम लोक नाट्य। 
  • – इसे राजस्थान का मेरू नाट्य भी कहा जाता हैं। 
  • – मेवाड़ क्षेत्र में भील पुरूषों द्वारा गवरी नाट्य का मंचन किया जाता हैं। –
  •  रक्षा बन्धन से शुरू होकर 40 दिनों तक चलता हैं। 
  • – इसमें शिव-भस्मासुर कथा को आधार बनाया जाता हैं। 
  • – सूत्रधार- कुटकड़िया, शिव- राईबुड़िया। 
  • – हास्य पुट डालने वाला कलाकार – झटपटिया।
  • राजसथान का प्राचीनतम लोक नाट्य। 
  • – इसे राजस्थान का मेरू नाट्य भी कहा जाता हैं। 
  • – मेवाड़ क्षेत्र में भील पुरूषों द्वारा गवरी नाट्य का मंचन किया जाता हैं। –
  •  रक्षा बन्धन से शुरू होकर 40 दिनों तक चलता हैं। 
  • – इसमें शिव-भस्मासुर कथा को आधार बनाया जाता हैं। 
  • – सूत्रधार- कुटकड़िया, शिव- राईबुड़िया। 
  • – हास्य पुट डालने वाला कलाकार – झटपटिया।
  • – विभिन्न कथानकों को आपवस में जोड़ने के लिए बीच में सामुहिक नृत्य किया जाता हैं। जिसे ‘गवरी की घाई कहते’ हैं।

तमाशा:

  • – यह जयपुर मे लोकप्रिय हैं। 
  • – सवाई प्रतापसिंह के समय बंशीधर भट्ट (महाराष्ट्र) को तमाशा के लिए जयपुर लाया गया। 
  • – उस समय ‘गौहर जान’ तमाशा में भाग लिया करती थी। 
  • – होली के दिन- जोगी-जोगण का तमाशा। 
  • – शीतलाष्टमी के दिन- जुट्ठन मियां का तमाशा। चैत्र अमावस्या के दिन- गोपीचन्द का तमाशा। 
  • – अखाड़ा में तमाशा का मंचन किया जाता हैं।

भवाई:

  • – गुजरात के सन्निकट राजस्थानी जिलों में अधिक लोकप्रिय। 
  • – इसमें संगीत पक्ष पर कम ध्यान दिया जाता हैं, बल्कि करतब दिखाये जाते हैं।
  • – भवाई लोकनाट्य व्यावसायिक प्रकृति का हैं। 
  • – राजस्थान में मुख्य कलाकार:- रूपसिंह, तारा शर्मा, सांगी लाल। 
  • – महिला व पुरूष पात्रो को सगाजी व सगीजी कहा जाता हैं। 
  • – कलाकार मंच पर अपना परिचय नहीं देते हैं। 
  • – शांता गांधी का जसमल ओड़ण प्रसिद्ध भवाई लोक नाट्य हैं।

चारबैंत

  • – टोंक क्षेत्र में लोकप्रिय। 
  • – मूलत:- अफगानिस्तान का लोकनाट्य हैं। 
  • – पहले इसे पश्तों भाषा में प्रस्तुत किया जाता था। 
  • – मुख्य वाद्य यंत्र- डफ। 
  • – टोंक नवाब फैजुल्ला खां के समय करीम खां निहंग ने इसे टोंक में लोकप्रिय किया था।

फड़ः

  • – कपड़े के पर्दे पर किसी देवता से सम्बन्धित जीवन चरित्र का मंचन फड़ कहलाता हैं। 
  • – 30 Feet – Leugthl – 5 Frit – Buidth, फड़ का चित्रण किया जाता हैं। 
  • – किसी देवता की मनौती पूरी होने पर फड़ बचवाते हैं।

रासलीला:

  • – इसे वल्लभाचार्य द्वारा शुरू किया गया।
  • – भगवान श्रीकृष्ण से सम्बन्धित घटनाओं का मंचन किया जाता हैं।
  • – भरतपुर क्षेत्र में लोकप्रिय हैं।
  • – शिवलाल कुमावत ने इसे भरतपुर में लोकप्रिय किया था।
  • – रामस्वरूप जी व हरगाविन्द जी भी इसके मुख्य कलाकार हरे हैं।
  • – कामां (भरतपुर), फुलेरा (जयपुर) की रासलीला प्रसिद्ध हैं।

रामलीला:- तुलसीदास जी द्वारा 

  • – भगवान राम से समबन्धित घटनाओं की मंचन किया जाता हैं। 
  • – बिसाऊ (झुन्झुनूं) की रामलीला- मूक अभिनय पर आधारित। 
  • – अटरू (बारां) यहां रामलीला में धनुष को भगवान राम द्वारा न तोड़ा जाकर, जनता द्वारा तोड़ा जाता हैं। 
  • – पाटूदां (कोटा)- की रामलीला भी प्रसिद्ध हैं। 
  • – वेकटेश मंदिर (भरतपुर)- भरतपुर के वेंकटेश मंदिर में होती हैं।

सनकादिक लीला:

  • – चित्तौड़गढ़ के घोसुण्डा व बस्सी स्थान पर इसका मंचन किया जाता हैं। 
  • – मंचित देवता कथा- गणेश, गारा-काला भैंरू, नृसिंह- हिरण्यकश्यप। 
  • – आश्विन व कार्तिक महिनों में आयोजन किया जाता हैं।
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राजस्थान भाषा की मत्त्वपूर्ण कृत्तियाँ (Important works of Rajasthan language)

आर्य भाषा

वैदिक संस्कृत           

पाली                                  संस्कृत

महाराष्ट्री प्राकृत

शौरसेनी  प्राकृत

मागधी  प्राकृत

गुर्जरी अपभ्रंश :- राजस्थानी

शौरसेनी अपभ्रंश :- हिन्दी

डिंगल :- पं. राजस्थानी का साहित्यिक रूप

पिंगल :- पूर्वी राजस्थानी का साहित्यिक रूप इसमें ब्रज भाषा का मिश्रण पाया जाता हैं। 

राजस्थानी भाषा का विकासः

– गुर्जरी अपभ्रंश- 11वीं से 13वीं शताब्दी . 

प्राचीन राजस्थानी – 13वीं से 16वीं शताब्दी (जैन साहित्य) . 

मध्यकालीन राजस्थानी- 16वीं से 18वीं शताब्दी (चारण साहित्य) . 

आधुनिक राजस्थानी- 18वीं —- . 

राजस्थानी साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ- भरतेश्वर बाहुबली घोर, (वज्रसेन सूरी) जैन ग्रन्थ .

उद्योतन सूरि ने अपनी पुस्तक कुवलयमाला में मरू भाषा का उल्लेख किया हैं। (18 देसी भाषाओं का उल्लेख) 

अबुल फजल भी मारवाड़ी भाषा का उल्लेख करता हैं। 

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन 1912 में लिखी अपनी पुस्तक LINGVISTIC SURVEY OF INDIA में राजस्थानी भाषा का उल्लेख किया हैं। 

  • 1. सारंगधर – हम्मीर रासौ 
  • 2. जोधराज – हम्मीर रासौ
  • 3. श्रीधर – रणमल छन्द, इसमें ईडर के राजा रणमल व पाटन के सूबेदार जफर खां के बीच युद्ध को वर्णन है। 
  • 4. चन्दबरदाई (वास्तविक नाम पृथ्वीराज भट्ट) – पृथ्वीराज रासौ (पिंगल भाषा शैली में रचित ग्रन्थ) इसका पहला प्रामाणिक उल्लेख राजप्रशस्ति महाकाव्य में मिलता हैं। 
  • 5. दलपत विजय – खुमाण रासौ, इसमें बापा रावल से महाराणा राजसिंह तक का वर्णन हैं। 6. गिरधर आसिया – सगतसिंघ रासौ, इसमें महाराणा प्रताप के भाई शक्तिसिंह का वर्णन हैं।
  • 7. डूंगरसिंह – शत्रुसाल रासौ (बूंदी) 
  • 8. आशानन्द (भादरेस) – गोगाजी री पेडी, बाघा रा दहा, उमादे भटियाणी रा कवित। 
  • 9. ईसरदास (आशानन्द जी के भतीजे) – हाला झाला री कुण्डलिया, सूर । 
  • 10. केशदास गाडण – 1. गुणरूपक 2. अमरसिंह जी रा दूहा 3.विवेक वार्ता (उपनिषदों पर लिखित कृति) 
  • 11. शिदास गाडण – ‘अचलदास खिंची री वचनिका’ (गागरोन का वर्णन) 
  • 12. उमरदान – 1. अमल रा औगण 2. दारू रा दौस 3. भजन री महिमा 
  • 13. पृथ्वीराज राठौड़ – बेलि क्रिसण रूक्मणि री 2. गंगा लहरी 3. दशम भागवत रा दूहा, ठाकुरजी रा दूहा 4. दशरथ वराउत 
  • 14. करणीदान
  • – सरूज प्रकाश- जोधपुर महाराजा अभयसिंह वगुजरात के सूबेदार सर बुलन्द खां के बीच युद्ध का वर्णन हैं। 
  • – सूरज प्रकाश का संक्षिप्त रूप- बिड़द सिणगार, इस पुस्तक के लिए करणीदान जी को 1 लाख रूपये दिए गए। 
  • 15. वीरभाण – राजरूपक 
  • 16. कृपाराम खिड़िया – राजिया रा दूहा “पाटा पीड़ उपाव, तन लागा तलवारिया। वहै जीभ राव
  • घाव, रती औषध न राजिया।।” 
  • 17. जग्गा खिड़िया वचनिका राठौड़ रतनसिंह महेस दासोत री (धरमत के युद्ध में रतलाम रनेश रतनसिंह राठौड़ द्वारा दिखायी गयी अद्भुत वीरता का वर्णन हैं) 
  • 18. कवि कल्लोल
  • – ढोला मारू रा दूहा “अकथ कहानी प्रेम की, मुख सुं कही न जाय। गुंगा रा सुपना भयों, सुमर-सुमर पछतायो।।” 
  • 19. कुशल लाभ
  • – ढोला-मारू री चौपाई 20. बुद्धसिंह
  • – नेहतंरंग
  •  21. सूर्यमल्ल मिश्रण – वंश भास्कर, वीर सतसई, बलवन्त विलास, सती रासौ, छन्द मयूख,
  • धातु रूपावली, राम रंजाट “सुत धारा रज-रज थिथों, बहू बलेवा जाय। लखिया डूंगर लाज रा, सासू उर न समाय।।” 
  • 22. बीठू सूजा
  • – राव जैतसी रो छन्द (इसमें बीकानेर के राजा जैतसिंह व कामरान के बीच हुये ‘रातीघाटी के युद्ध’ का वर्णन)
  • 23. बांकीदास – 1. बांकीदास री ख्यात, कुकवि बतीसी, दात्तार बावनी, मान जसो मंडन 
  • 24. मुरारिदास – जसवन्त जसो भूषण 
  • 25. मुहणौत नैणसी 
  • – नैणसी री ख्यात, मारवाड़ रा परगना री विगत (जनगणना का उल्लेख मिलता हैं।) 
  • – मुंशी देवी प्रसाद ने इन्हें ‘राजपूताने का अबुल-फजल’ कहा हैं।
  • 26. न पति नाल्हा – बीसलदेव रासौ (विग्रहराज चतुर्थ) 
  • 27. नल्लसिंह – विजयपाल रासौ (करौली) 
  • 28. हम्मीर (रणथम्भौर का राजा) – श्रंगार हार 
  • 29. दयालदास – बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात। (राव बीका से सरदारसिंह तक का वर्णन) 
  • 30. बख्तावर जी – केहर प्रकाश 
  • 31. सवाई प्रतापसिंह – केहर ग्रन्थावली 
  • 32. दुरसा आढा – विरूद्ध छतहरी, किरतार बावनी, राव सुरताण रा कवित
  • 33. बादर ढाढ़ी 
  • 34. वृन्द
  • 35. दयाल 
  • 36. खेतसी साडूं 
  • 37. जगजीवन भट्ट 
  • 38. जोगीदास 
  • 39. किशोदास 
  • 40. साँया जी झूला 
  • 41. कल्याणदास 
  • 42. नरहरिदास 
  • 43. कविजान
  • – वीरभाण (मारवाड़ के राजा वीरमदेव की वीरता का वर्णन हैं।) 
  • – सत्य स्वरूप (औरंगजेब के पुत्रों के बीच हुये उतराधिकार संघर्ष का वर्णन हैं।) 
  • – श्रंगार शिमा – राणा रासौ (बापा रावल से लेकर जयसिंह तक का वर्णन हैं।) 
  • – भाषा भारथ (महाभारत का डिगंल में अनुवाद) 
  • – अजितोदय 
  • – हरिपिंगल प्रबन्ध (प्रतापगढ़ के राजा हरिसिंह के बारें में वर्णित) 
  • – राजप्रकाश 
  • – नागदमण 
  • – गुण गोविन्द –
  •  अवतार चरित्र 
  • – काथमरासौ, बुधि सागर, लैला-मजनूँ

आधुनिक राजस्थानी साहित्य 

1. श्रीलाल नथमल जोशी – 1. एक बीनणी दो बींद, परण्योड़ी कुंवारी, सबड़का, आभै पटकी, घोरां रो घोरी

2. विजयदान देथा – बातां री फुलवारी, तीडो राव, मां रो बदलो, हिटलर, अलेखू दूविधा 

3. लक्ष्मी कुमारी कुडांवत – माँझल राव, अमोलक बाता, कै रे चकवा बात, गिर ऊंचा ऊंचा गढ़ा, राजस्थान की प्रेम कहानियां, हुंकारो दो सा, बाघा-भारमली, बगड़ावत, मूमल, टाबरां री बात, डूंगरजी जवाहरजी री बात

4. कन्हैया लाल सेठिया – धरती धोरां री, लीलटास, पाथल और पीथल, कुकू मिजंर, निर्ग्रन्थ 

5. यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र – हूं गोरी किग पीव री, खम्भा अन्नदाता, हजार घोड़ो का सवार, तास रो घर, जमारो, मेहंदी के फूल, जोग-संजोग, एक और मुख्यमंत्री 

6. मेघराज मुकुल – उमंग, सैनाणी, चंवरी 

7. रांगेय राघव – घरौदे, मुर्दो का टीला, कब तक पुकारूँ, आज की आवाज 

8. गौरीशंकर हिराचन्द ओझा – प्राचीन लिपिमाला, कर्नल जेम्स टॉड का जीवन चरित्र, राजपूताने का इतिहास 9. जहूर खां मेहर – राजस्थानी संस्कृति रा चितराम, अर्जून आकी आंख, घर जला घर कोसां 

10. चन्द्रसिंह बिरकाली – बादली (कालिदास के मेघदूत का राजस्थान अनुवाद), लू, सांझ बालासाद, कह- मुकरनी। 

11. नारायणसिंह भाटी – मीरा, परमवीर, दुर्गादास, बरसा रा डिगोड़ा डूंगर लाँधिया 

12. सीताराम लालस – राजस्थानी शब्दकोष 

13. हरिराम मीणा – हां चाँद मेरा हैं। 

14. मणिमघुकर – पगफेरो सुधि सपनों के तीर, रसगन्धर्व 

15. चन्द्रधर शर्मा गुतेरी

16 श्यामलदास

– वीर विनोद(शम्भूसिंह के समय लिखना शुरू किया था तथा फतेह सिंह के समय पूरी की गयी।) (वीर विनोद मेवाड़ का इतिहास हैं। परन्तु इसमें अन्य इतिहास की भी समकालीन जानकारियाँ मिलती हैं।) 

1/ रेक्तदान चारण बरखा बीनणी, नेहरू ने ओलमो 

2. विचन्द्र भरतिया – कनक सुन्दरी (उपनयास) केसर विलास (नाटक) 

3. हमीदुल्ला – भारमली, दरिन्दे, ख्याल 

4. कुन्दन माली – सागरं पांखी 

5. हीरालाल शास्त्री – प्रत्यक्ष जीवन शाम 

6. सावित्री परमार – जमी हुयी झील (मीरा पुरस्कार) 

– राजस्थानी भाषा एवं साहित्य अकादमी – बीकानेर 

– राजस्थान साहित्य अकादमी – उदयपुर

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राजस्थान की प्रमुख छतरियाँ ( Major chhatris of Rajasthan )

गैटोर की छतरियाँ:

  • – यहां पर जयपुर के शासकों की छतरियाँ हैं। 
  • – सवाई जयसिंह से लेकर माधोसिंह द्वितीय तक। 
  • – ईश्वरीसिंह की छतरी यहां स्थित नहीं हैं, ईश्वरीसिंह की छतरी ईसरलाट के पास ही हैं।

आहड़:

  • – यहां पर मेवाड़ के शासकों की छतरियाँ हैं। 
  • – सबसे पहले यहां अमरसिंह प्रथम की छतरी बनायी गयी थी। 
  • – इस स्थान को महासतियाँ कहते हैं।

पंचकुण्ड (मंडौर):

  • यहां जोधपुर के राजाओं की छतरियाँ हैं। 
  • – जसवन्त थड़ा:- जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय का स्मारक, इसका निर्माण उनके बेटे सरदारसिंह ने करवाया था इसे राजस्थान का ताजमहल कहत हैं। 
  • – कागा की छतरियाँ यहां जोधपुर के सामन्तों की छतरियां बनायी जाती हैं। 
  • – जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के प्रधानमंत्री राजसिंह कुम्पावत की 18 खम्भों की छतरी बनी हैं।  

देवीकुंड सागर (बीकानेर):

  • – यहां बीकानेर के राजाओं की छतरियां बनी हुयी हैं। 
  • – इनमें राव कल्याण मल की छतरी अधिक प्रसिद्ध हैं। 
  • – बड़ा बाग (जैसलमेर) (महारावल जैतसिंह की छतरी) 
  • – यहाँ जैसलमेर के राजाओं की छतरियां हुयी हैं।

क्षार बागः

  • कोटा के राजाओं की छतरियां बनी हुयी हैं। 
  • – क्षार बाग की छतरीयों को छत्रविलास बाग की छतरियां भी कहते हैं

पालीवाल:

  • – बन्जारों की छतरी- लालसोट (दौसा) 
  • – नाथों की छतरी- जालौर (छतरी पर तोता बना हुआ हैं।) 
  • – मिश्रजी की छतरी- अलवर जिले के नेहड़ा गांव में स्थित। 
  • – भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध।
  • – दशावतरों के चित्र बने हुये हैं। 
  • – कुत्ते की छतरी- जोधपुर 
  • – गोपालसिंह जी की छतरी – करौली
  • – गंगाबाई की छतरी:- गंगापुर सिटी (भीलवाड़ा) 
  • – रैदास जी, कल्ला जी की छतरी- चित्तौड़ढ़ में।
  • राजस्थान की प्रमुख हवेलीयाँ व महल:जैसलमेर:
  • 1. पटवों की हवेली- जिसका निर्माण गुमानचन्द बाफना ने करवाया। 
  • 2. सालिमसिंह की हवेली – 9 मंजिला हवेली, जिसकी ऊपर की दो मंजिलें लकड़ी की बनी हुयी हैं। 
  • 3. नथमल की हवेली- वास्तुकार: हाथी व लालू 
  • 4. सर्वोत्तम विलास पैलेस

शेखावाटी:

  • 1. सोने-चांदी की हवेली- महनसर (झुन्झुनूं) 
  • 2. भगतों की हवेली – नवलगढ़ (झुन्झुनूं) 
  • 3. रामनाथ गोयनका की हवेली – मंडावा (झुन्झुनूं) 
  • 4. पसारी की हवेली – श्रीमाधोपुर (सीकर) 
  • 5. माल जी का कमरा – चुरू 
  • 6. मंन्त्रियों की हवेली – चुरू 
  • 7. सुराणों की हवेली – चुरू 
  • 8. खेतड़ी महल – झुन्झुनूं (राजस्थान का दूसरा हवा महल)

कोटा:– गुलाब महल, अबली मीणी का महल, अमेड़ा महल, हवा महल:- रामसिंह द्वितीय, जगमंदिर:

दुर्जनसाल ने अपनी रानी ब्रजकंवर के लिए बनाया। 

नवलगढ़ः- सर्वाधिक हवेलियाँ, हवेलिया क नगर, शेखावाटी की स्वर्ण नगरी।

जोधपुर:

  • 1. बड़े मियां की हवेली 
  • 2. राखी हवेली 
  • 3. पोकरण हवेली 
  • 4. एक खम्भा महल:- महाराजा अजीतसिंह ने बनवाया था। 
  • 5. राई का बाग पैलेसः- जसवंत दे (जसवंतसिंह प्रथम की रानी) 
  • 6. उम्मेद पैलेसः- छीतर पैलेस भी कहते हैं। इसका निर्माण अकाल राहत कार्यो के दौरान कराया गया था यह एशिया का सबसे बड़ा आवासीय महल हैं। 
  • 7. अजीत भवन पैलेस:- राजस्थान का पहला हेरिटेज होटल 
  • 8. पुष्य हवेली:- विश्व की एकमात्र हवेली जो एक ही नक्षत्र पुष्य नक्षय में बनी।

डूंगरपुरः

  • 1. एक थम्बिया महल: 
  • 2. जूना महल

अलवर:- 

  • 1. हका बंगला, तिजास 
  • 2. चिनय क्लिास पैलेस, सिटी पैलेस (अलवर)

टोंक:- 

1. सुनहरी कोठी (इस्लामिक शैली में निर्मित)

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राजस्थान के दुर्ग ( Forts of Rajasthan )

(1) गागरोन का किला :

  • – वर्तमान झालावाड़ जिले में काली सिंध व आबू नदियों के किनारे स्थित हैं। 
  • – गागरोन का किला एक जलदुर्ग हैं। 
  • – इसका निर्माण डोड परमार शासकों ने करवाया था, इसलिए इसे डोडगढ़ भी कहते हैं। इसे धूलरगढ़ भी कहते हैं। 
  • – देवेनसिंह खीची ने बजीलदेव डोड को हराकर इस पर अधिकार कर लिया था। (चौहान कुल कल्पद्रुम के अनुसार)

जैत्रसिंह

  • 1303में। जैत्रसिंह के समय अलाउदीन ने आक्रमण किया था।
  • – संत हमीदुद्दीन चिश्ती जैत्रसिंह के समय गागरौण आए थे, जिन्हें हम ‘मीठे साहब’ के नाम से जानते हैं इनकी दरगाह गागरौण के किले में बनी हुयी हैं।

प्रतापसिंह

  • इन्हें हम संत पीपा के नाम से जानते हैं। 
  • – इनके समय में फिरोज तुगलक ने गागरौण पर विफल आक्रमण किया था। 
  • – संत पीपा की छतरी गागरौण में बनी हुयी हैं।
  • अचलदास – 1423 ई. में मालवा का सुलतान होशगंशाह गागरोन पर आक्रमण करता हैं। इस समय गागरौण के किले का पहला साका होता हैं। 
  • – अचलदास खिंची अपने साथियों के साथ लड़ता हुआ मारा जाता हैं। 
  • – लाला मेवाड़ी ने नेतृत्व में जौहर किया जाता हैं। 
  • – अचलदास खीची की अन्य रानी का नाम – उमा सांखला (जांगलू) 
  • – शिवदास गाडण ने ‘अचलदास खीची री वचनिका’ नामक ग्रन्थ लिखा हैं।

पाल्हणसिंह (अचलदास का बेटा, कुम्भा का भांजा) 

  • – 1444 ई. में मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी गागरोण पर आक्रमण करता हैं। 
  • – कुम्भा अपने सेनानायक धीरज दवे को भेजकर पाल्हणसिंह की सहायता करता हैं। 
  • – इस समय गागरोण के किले का दूसरा साका होता हैं। महमूद खिलजी ने गागरौण का किला महाराणा सांगा (मेवाड़) के अधिकार में आ गया था। 
  • – सांगा ने अपने मित्र मेदिनी राय (चन्देरी) को यह किला दे दिया।
  • – 1567-68 के चित्तौड़ आक्रमण के समय अकबर इसके किले में ठहरता हैं और फैजी इससे मुलाकात करता हैं। 
  • – बाद में अकबर ने यह किला पृथ्वीराज राठौड़ को दे दिया। 
  • – पृथ्वीराज राठौड़ ने इसी किले में ‘बेलिक्रिसण रूक्मिणी’ की रचना की। 
  • – शाहजहां ने यह किला कोटा महाराजा माधोसिंह को दे दिया था 
  • – कोटा महाराजा दुर्जनसाल ने यहां मधुसुदन का मंदिर बनवाया। 
  • – जालिमसिंह झाला ने यहां जालिम कोट (परकोटा) का निर्माण करवाया। 
  • – औरंगजेब ने यहां बुलन्द दरवाजे का निर्माण करवाया।
  • – इस किले में एक जौहर कुंड अंधेरी बावड़ी हैं यहां बंदियों को सजा दी जाती थी। 
  • – गागरोण का किला बिना नीव के (चट्टानों पर) खड़ा हैं। 
  • – कोटा राज्य की टकसाल यहीं पर थी।

(2) चित्तौड़गढ़ का किला:

  • दुर्गो का सिरमौर 
  • – दुर्गो का तीर्थस्थल 
  • – राजस्थान का गौरव – ‘ओ गढ़ नीचो किम झुकै, ऊँचों जस गिर वास। हर झाटै जौहर जठै, हर भाठे इतिहास’ 
  • – इस किले का निर्माण चित्रागंद मौर्य ने किया था। (कुमारपाल प्रबन्ध के अनुसार) 
  • – 743 ई. में बापा रावल ने मान मौर्य को हराकर चित्तौड़ के किले पर अधिकार कर लिया। 
  • – 1559 ई. में उदयपुर की स्थापना तक चितौड़ मेवाड़ की राजधानी रहा हैं। यह राजस्था का सबसे बड़ा आवासीय किला हैं। 
  • – चित्तौड़ के किले में तीन साके हुए। 
  • 1. 1303 ई. में 
  • 2. 1535 ई. 
  • – कुम्भा में कुम्भश्याम। कम्भा स्वामी का मंदिर, श्रृंगार चंवरी का मंदिर बनवाया। 
  • – मोकल ने (समिद्वेश्वर) मंदिर का पुनर्निमाण करवाया। 
  • – बनवीर ने नवलखा भंडार बनवाया। 
  • – बनवीर ने तुलजा भवानी का मंदिर बनवाया। 
  • – चित्तौड़ के किले में :- रत्नेश्वर तालाब, भीमलत तालाब, मीरा मंदिर, कालिका मंदिर, लाखोटा बारी आदि प्रमुख
  • 3. 1568 ई. में।
  • – चित्तौड़ का किला मेसा पठार पर मीनाकृति में बना हुआ हैं। 
  • – धान्वन दुर्ग को छोड़कर इसमें अन्य सभी विशेषताएं हैं। 
  • – यह किला गम्भीरी व बेड़च नदियों के किनारे बसा हुआ हैं। 
  • – महाराणा कुम्भा ने इसमें विजयस्तम्भ (कीर्ति स्तम्भ) का निर्माण करवाया। 
  • – चित्तौड़ के किले में एक जैन कीर्ति स्तम्भ बना हुआ हैं। 
  • – यह राजस्थान की प्रथम इमारत हैं, जिसपर 15 अगस्त 1949 को एक रूपये का डाक टिकट जारी किया गया था।

(3) कुम्भलगढ़ का किला:

  • – महाराणा कुम्भा ने 1448 ई. के बीच करवाया। 
  • – कुम्भलगढ़ का वास्तुकार मडंन था। 
  • – कुम्भलगढ़ वर्तमान राजसमंद जिले में स्थित हैं। 
  • – कुम्भलगढ़ के किले को मेवाड़-मारवाड का सीमा प्रहरी कहते हैं 
  • – अत्यधिक ऊँचाई पर बना हुआ होने के कारण अबुल फजल ने कहा था कि इस किले को नीचे से ऊपर की ओर देखने पर पगड़ी गिर जाती हैं। 
  • – कुम्भलगढ़ के शीर्ष भाग में कटारगढ़ बना हुआ हैं, जो कुम्भा का निजी आवास था। कटारगढ़ को मेवाड़ की आंख कहते हैं।
  •  – कुम्भलगढ़ के किले में उद्धा ने कुम्भा की हत्या (मामदेव कुंड के पास) की थी। 
  • – उड़नाराजकुमार पृथ्वीराज की छतरी बनी हुयी हैं। (12 खम्भों की) 
  • – पन्नाधाय उदयसिंह को लेकर कुम्भलगढ़ के किले में आयी थी उदयसिंह का रातिलक यहीं हुआ था।
  • – प्रताप ने भी अपना शुरूआती शासन कुम्भलगढ़ से चलाया था। 
  • – कुम्भलगढ़ के किले को मेवाड़ के शासकों की ‘संकटकालीन राजधानी’ कहते हैं। 
  • – कुम्भलगढ़ के किले में भी कुम्भा स्वामी का मंदिर बना हुआ हैं। 
  • – इसी किले में झाली रानी का मालिया बना हुआ हैं। 
  • – कुम्भलगढ़ के दीवार की लम्बाई – 36 किलोमीटर हैं। 
  • – चौड़ाई इतनी हैं कि आठ घोडे समानान्तर दौड़ सकते हैं। 
  • – कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी तुलना (यूरोप) के एट्रस्कन’ से की हैं।

(4) रणथम्भौर का किला:

  • वर्तमान में सवाई माधोपुर में स्थित। 
  • – 8 वीं शताब्दी में चौहान शासकों द्वारा निर्मित। 
  • – अण्डाकार आकृति में निर्मित। 
  • – गिरि व वन दोनों दुर्गा की विशेषता रखता हैं।
  • – अबुल फजल:- ‘बाकी सब किले नंगे हैं, पर रणथम्भौर दुर्ग बख्तरबंद हैं।’ 
  • – हम्मीर के समय जलालुदीन खिलजी ने यहां एक विफल आक्रमण किया था। इस विफलता के बाद खिलजी ने कहा था। 
  • – ऐसे 10 किलों को मैं मुसलमान के बाल के बराबर भी नहीं समझता। . 
  • – 1301 ई.’ में अलाउदीन ने रणथम्भौर किले पर आक्रमण किया। उस समय रणथम्भौर का पहला साका (हम्मीर के नेतृत्व में) हुआ। 
  • – रणथम्भौर का किला हम्मीर हठ के लिए प्रसिद्ध हैं। – “रण लडियों रण नीति सुं, रणथल रणथम्भौर। हठ राख्यौ हम्मीर रो, कट-कट खांगा कोर।।” 
  • – इस किले में जोगी महल, सुपारी महल, रणत भंवर गणेश जी का मंदिर (शादी की पहली कुमकुमपत्री याहं भेजी जाती हैं।), पद्म तालाब, जौरा-भौंरा महल, पीर सद्दीन की दरगाह। 
  • – अकबर कालीन टकसाल यहां स्थित हैं।

मेहरानगढ:

  • – यह किला जोधपुर में मयूर आकृति में बना हुआ हैं, इसलिए इसे मयूर ध्वज गढ़ भी कहते हैं। 
  • – इस किले का निर्माण राव जोधा ने 1459 ई. में करवाया था। 
  • – इस किले की नींव करणी माता ने रखी थी। 
  • – मेहरानगढ़ किले की नींव में राजाराम नामक व्यक्ति की बलि दी गयी थी। 
  • – मालदेव के समय शेरशाह सूरी ने इस किले पर अधिकार कर लिया था। तथा एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। 
  • – मालदेव ने किले में लोहा पोल का निर्माण करवाया था।
  • अजीतसिंह ने मुगल खालसे की समाप्ति पर फतेह पोल का निर्माण करवाया। 
  •  मानसिंह ने किले में पोल का निर्माण करवाया। (इस पोल के दरवाजे निमाज का ठाकुर ‘अमरसिंह उदावत’ अहमदाबाद से लाया था।) 
  • – मेहरानगढ़ के किले में ‘कीरतसिंह सोढ़ा’ की छतरी बनी हुयी हैं। 
  • – धन्ना- भीवा की छतरी बनी हुयी हैं। (मामा-‘भान्जा की छतरी) 
  • – महाराजा सूरसिह ने मोती महल का निर्माण करवाया।
  • – सूरसिंह ने ही एक तलहटी महल (अपनी रानी सौभाग्यवती के लिए) बनवाया। 

– जैसलमेर दुर्गः

  • – जैसलमेर के राजा जैसल ने 1155ई. में इस किले का निर्माण करवाया। 
  • – “गढ़ दिल्ली गढ़ः आगरों, अर गढ़ बीकानेर। भलो चिणायों भाटियां, सिरे गढ़ जैसलमेर” 
  • – जैसलमेर के किले में 77 बुर्जे बनी हुयी हैं। 
  • – जैसलमेर का किला त्रिभुजाकार (त्रिकुट) आकृति में बना हुआ हैं। 
  • – “दूर से देखने पर ऐसा लगता हैं मानों रेत के समन्दर में जहाज ने अपना लंगर डाल रखा हो।” 
  • – जैसलमेर का किला अंगडाई लेते शेरे के समान प्रतीत होता हैं। 
  • – जैसलमेर के किले को ‘स्वर्णगिरी का किला’ कहते हैं। इसे सोनार का किला भी कहते हैं। 
  • – सत्यजीत रे ‘सोनार किला’ नामक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म बनायी थी। 
  • – जैसलमेर के किले में दोहरा परकोटा बना हुआ हैं, जिसे कमर कोट कहा जाता हैं। 
  • – जैसलमेर का किला अपने ढाई साको के लिए प्रसिद्ध हैं। 
  • – अबुल फजल ने कहा था- पत्थर की टांगे ही आपको जैसलमेर के किले तक पहुंचा सकती हैं।  – “शरीर किजे काठ रा, पग कीजे पाषाण। बस्तर कीजे लौह का, तब पंहुचे जैसाण।।” 
  • – इस किले में चूने का उपयोग नहीं किया हैं। 
  • – जैसलमेर के किले की छत लकड़ी की बनी हुयी हैं। 
  • – बादल महल बना हुआ हैं। 
  • – जवाहर विलास महल। 
  • -‘ 2009 ई. में जैसलमेर किले में 5 रू. का डाक टिकट जारी किया गया।

बीकानेर दुर्गः (चतुष्कोण आकृति) 

  • – बीकानेर के किले को जूनागढ़ किला कहा जाता हैं। 
  • – इस किले का निर्माण महाराजा रायसिंह ने करवाया था। 
  • – इसमें 37 पुर्जे बनी हुयी हैं। 
  • – जूनागढ़ के किले को ‘जमीन का जेवर’ कहते हैं। 
  • – जूनागढ़ में सूरजपोल के पा सजयमल फता की मूर्तियां लगी हुयी हैं। 
  • – जूनागढ़ किले में 33 करोड़ देवी – देवताओं का मंदिर हैं। 
  • – बादल महल , अनूप महल (बीकानेर के राजाओं का रातिलक किया जाता था।) निर्माण महाजा डूंगरसिंह ने करवाया था। , हरमंदिर – जूनागढ़ किले के चारों तरफ खाई बनी हुई हैं। 
  • – आमेर किले के चारों तरफ खाई बनी हुई हैं। 
  • – आमेर व बीकाने दो ऐसे किले हैं, जो जिस वंश के द्वारा निर्मित किए गए थे, हमेशा उसी वंश के अधिकार में रहे।

भटनेर का किला:

  • – हनुमानगढ़ जिले में स्थित हैं। (भूपत भाटी ने इसका निर्माण शुरू करवाया था।) 
  • – भाटी शासकों ने इसका निर्माण करवाया था। महमूद गजनवी ने इस पर आक्रमण किया था।
  • – तैमूर ने भी यहां आक्रमण किया था इस आक्रमण के समय यहां हिन्दू महिलाओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी जौहर किया था। 
  • – तैमूर इसे भारत का सर्वश्रेष्ठ किला बताता हैं।
  • – तैमूर के आक्रमण के समय यहां का शासक दूलचन्द भाटी था। 
  • – हूँमायुं के भाई कामरान ने यहां आक्रमण किया था। उस समय यहां का किलेदारन खेतसिंह कांधल था। 
  • – अकबर ने भी यहां आक्रमण किया था। कल्याणमल का भाई ठाकुरसिंह लड़ता हुआ मारा गया। 
  • – रायसिंह के बेटे दलपतसिंह व उसकी पांच रानियों के स्मारक बने हुए हैं। (दलपतसिंह ने अपने पिता रायसिंह के विरूद्ध भी विद्रोह किया था।) 
  • – मनोहर कच्छवाहा ने यहां मनोहर पोल का निर्माण करवाया। 
  • – 1805 ई. में बीकानेर महाराजा सूरतसिंह ने इस पर अधिकार कर लिया उस दिन मंगलवार था, इसलिए भटनेर के
  • किले का नाम बदलकर हनुामनगढ़ कर दिया। 
  • – भारत में सबसे अधिक आक्रमण झेलने वाला किला। 
  • – भटनेर के किले को ‘उत्तरी सीमा का प्रहरी’ कहा जाता हैं। 
  • – बलबन के भाई शेर खां की कब्र हैं।

जालौर का किला 

  • सूकड़ी नदी के किनारे स्थित। 
  • – सुवर्णगिरी के किले के नाम से विख्यात। 
  • – प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम ने इसका निर्माण करवाया। 
  • – कान्हड़देव सोनगरा ने यहां पुनर्निमाण करवाया। 
  • – 1311 ई. में जालौर के किले में शाका हुआ था। 
  • – अलाउदीन खिलजी ने यहां अलाई मस्जिद व खिलजी मीनार बनवाई थी। जालौर का नाम जलालाबाद रख दिया था। 
  • – जोधपुर महाराजा मानसिंह अपने संघर्ष के दिनों में जालौर के किले में रहा था। (मानसिंह महल) 
  • – जालौर के किले में तोपखाना मस्जिद बनी हुयी हैं। जो पूर्व में भोज परमार द्वारा बनायी गयी एक संस्कृत पाठशाला थी। कान्हड़देव की बावड़ी, वीरमदे की चौकी, जलंधर नाथ जी का मंदिर। मलिक शाह की दरगाह।

सिवाणा का किला:

  • बाड़मेर जिमें मे स्थित। 
  • – वीर नारायण पंवार ने इसका निर्माण करवाया था।
  • कूमट झाड़ी की अधिकता के कारण इसे कूमट दुर्ग भी कहते हैं। 
  • – सिवाण का किला राठौड़ो की शरणस्थली कहलाता हैं। 
  • – अलाउदीन के आक्रमण के समय सातल व सोम के नेतृत्व में साका हुआ था। 
  • – अकबर के आक्रमण के समय कल्ला रायमलोत के नेतृत्व में साका हुआ था।
  • “किलों अणखलों यूं कहे, आव कल्ला राठौड़। मळारे तो मेहणो उतरे, तोहे बधे सिर मोड़।।” 
  • – सिवाणा के किले में मांडेलाव तालाब बना हुआ हैं।

आमेर का किला:

  • – इसे काकिलगढ़ भी कहा जाता हैं। 
  • – मानसिंह I ने इसका निर्माण करवाया था। 
  • – आमेर के किले में सुहाग मंदिर हैं। यह रानियों क हास-परिहास का स्थान था। 
  • – सुख मंदिर :- एक जैसे 12 कमरे हैं, जो मिर्जा राजा जयसिंह ने बनवाए थे। 
  • – दौलाराम का बाग 
  • – मावठा जलाशय 
  • – शिला माता का मंदिर 
  • – जगत शिरोमणि मंदिर 
  • – आम्बिकेश्वर मंदिर 
  • – बारहदरी महल 
  • – दीवान – ए – आम 
  • – दीवान ए खास 
  • – केसर क्यारी बगीचा

जयगढ़ का किला:

  • – पहले इस स्थान को चील्ह का टोला कहते हैं। 
  • – मानसिंह प्रथम ने इसक निर्माण कार्य शुरू करवाया था। 
  • – मिर्जा राजा जयसिंह ने इसका निर्माण पूरा करवाया व इसका नाम जयगढ़ रखा। 
  • – सवाई जयसिंह ने इस में जयबाण तोप रखवायी। 
  • – जयगढ़ का किला अपने पानी के विशाल टांकों के लिए प्रसिद्ध हैं। 
  • – इसमें आमेर के कछवाहों शासकों का शस्त्रागार व खजाना था। 
  • – इन्दिरा गांधी ने यहां 1975-76 में यहां खुदाई करवायी। 
  • – इस किले में सुरंगे बनी हुयी हैं। इस कारण इस किले को रहस्यमय दुर्ग भी कहते हैं। 
  • – इसे जयपुर का संकटमोचक किला कहते हैं। 
  • – विजयगढ़ी:- राजनैतिक जेल, सवाई जयसिंह ने अपने छोटे भाई (चीमाजी) विजयसिंह को यहां गिरफ्तार करके रखा था, इस कारण इसका नाम विजयगढ़ी पड़ गया।

नाहरगढ़ का किला:

  • – इस किले का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया था। 
  • – जगतसिंह द्वितीय की प्रमिका रसकपूर को यहीं गिरफ्तार करके रखा गया था। 
  • – सवाई माधोसिंह द्वितीय ने अपनी 9 पासी । पासवानों के लिए 9 एक जैसे महल बनवाए। 
  • – इसे जयपुर का पहरेदार किला कहते हैं। 
  • – प्रारम्भ में इसका नाम सुदर्शनगढ़ था, बाद में नाहरसिंह भौमियाजी के नाम पर इसका नाम नाहरगढ़ पड़ गया।

बाला किला:

  • – अलवर जिले में स्थित हैं। 
  • – निकुम्भ चौहानों ने इसका निर्माण करवाया था। 
  • – कोकिल देव के बैटै अलधुराय ने इसका पुनर्निमाण करवाया था। 
  • – हसन खां मेवाती ने इसकी मरम्मत करवायी।
  • – इसमें :- निकुम्भ महल, जल महल 
  • – जहाँगीर इस किले में ठहरता था। इसलिए इसे सलीम महल भी कहते हैं। 
  • – करणी माता का मंदिर बना हुआ हैं। (बख्तावरसिंह)

तारागढ़ (अजमेर):

  • – इस किले का निर्माण चौहान शासक अजयराज ने करवाया। उड़ना राजकुमार पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी तारा के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रख दिया। 
  • – पृथ्वीराज चौहान का स्मारक बना हुआ हैं। पृथ्वीराज चौहान के घोड़े नाट्य रम्भा का स्मारक बना हुआ हैं। – मीरान साहब की दरगाह बनी हुयी हैं। 
  • – यह किला मराठों के अधिाकर में भी रहा था। 
  • – इसव किले में नाना साहब का झालरा बना हआ हैं। 
  • – मराठों से यह किला अग्रेजों ने छीन लिया। 
  • – विलियम बैंटिक ने इसे ‘आरोग्य सदन’ में बदल दिया। 
  • – दारा शिकोह ने यहां शरण ली थी। 
  • – रूठी उमा दे ने भी अपना कुछ समय यहां बिताया था। 
  • – हिजडे की मजार बनी हुयी है। 
  • – इसे राजस्थान का जिब्राल्टर कहते हैं। 
  • – गढ़ बीठली किला भी कहते हैं।

अकबर का किला:

  • 1570 ई. में ख्वाजा मुइनदीन के प्रति सम्मान प्रकट करने केलिए अकबर ने इस किले का निर्माण करवाया। 
  • – हल्दीघाटी युद्ध से पहले यहां पर युद्ध की अंतिम योजना बनायी गयी थी। 
  • – जाहंगीर मेवाड़ अयान के दौरान तीन साल यहां ठहरा था। 
  • – 10 जनवरी 1616 को ‘टॉमस रो’ जहांगीर से मिलता हैं। 
  • – इस महल को अकबर का दौलतखाना भी कहते हैं। 
  • – अग्रेजों ने इसे शस्त्रागार में बदल दिया था, इसलिए इसे मैगजीन का किला भी कहते हैं। 
  • – इसमें राजपूताना म्यूजियम बना हुआ हैं।

चुरू का किला :

  • – इस किले में बीकानेर के राजा सूरतसिंह ने यहां आक्रमण किया, उस समय चुरू का ठाकुर स्योजीसिंह (शिव जी सिंह) था। 
  • – इस आक्रमण के समय किले में सीसा समाप्त होने पर चांदी के गोले दागे गये थे (बीकानेर का सेनापति अमरचन्द सुराणा) 
  • – “बीको फीको पड़ गयो, बण गोरा हमगीर। चांदी गोळा चालिया, आ चुरू री तासीर”

भरतपुर का किला (लोहागढ़) 

  • – 1733 ई. में सूरजमल ने इस किले का निर्माण करवाया। 
  • – भरतपुर के राजा जवाहरसिंह ने इस किले में दिल्ली आक्रमण से लूट कर लाए हुये अष्ट धातु के दरवाजे लगवाए। तथा इस जीत की स्मृति में जवाहर बुर्ज बनवायी। 
  • – महाराजा रणजीतसिंह ने जसवंत राव होल्कर को इस किले में शरण दी थी। 
  • – अनेक प्रयासों के बावजूद अग्रेज इस किले को जीत नहीं सकें, इसी कारण भरतपुर के किले को लोहागढ़ कहा जाता हैं।
  • – रणजीतसिंह ने इस जीत की स्मृति में ‘फतह बुर्ज’ का निर्माण करवाया। 
  • – चार्ल्स मेटकॉफ ने अंग्रेजों की इस विफलता पर कहा था। 
  • – “अग्रेजी की प्रतिष्ठा भरतपुर के दुर्भाग्यपूर्ण घेरे में दबकर रह गई।” इसी किले के बारें में कहा जाता हैं। 
  • – “आठ फिरंगी नौ गौरा, लड़े जाट का दो छोरा।।” 
  • – किशोरी महल, दादी मां का महल, वजीर की कोठी, गंगा मंदिर, लक्ष्मण मंदिर।

बयाना का किला:

  • – इस किले का निर्माण विजयपाल ने करवाया था। 
  • – इसे बादशाह का किला, बाणासुर किला, विजय मंदिर गढ, के नाम से जाना जाता हैं। 
  • – खानवा के युद्ध के बाद बाबर इस किले में आया था। 
  • – इसमें:- लोदी मीनार, अकबर की छतरी, जहांगीरी दरवाजा, सादुल्ला सराय, दाउद खां की मीनार। 
  • – बयाना में समुद्रगुप्त में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया। 
  • – रानी चित्रलेखा (समुद्रगुप्त के सामत की पत्नी) ने ऊषा मंदिर का निर्माण करवाया। 
  • – समुन्द्रगुप्त के सामन्त विष्णुवर्धन ने भीमलाट ऊषालाट का निर्माण करवाया था।

तारागढ़ (बूंदी):

  • – इस किले का निर्माण हाड़ा शासक बरसिंह ने करवाया था। 
  • – दूर से देखने पर यह तारे के समान दिखायी देता हैं। 
  • – इसमें:- सुख महल , छत्र महल, रानी जी की बावड़ी, 84 खम्भों की छतरी, फूल सागर तालाब। 
  • – सूरसागर तालाब- बंदी, बीकानेर – बूंदी का तारागढ़ किला अपने भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। 
  • – रूडयार्ड किपलिंग :
  • – इसे देखकर लगता हैं कि इसको भूतों द्वारा निर्माण करवाया गया हैं। 
  • – जेम्स टॉड:- बूंदी के महलों को राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ महल बताता हैं। 
  • – गर्म गुंजन:- तोप रखी हुयी हैं।
  • मांडलगढ:- वर्तमान भीलवाड़ा जिले में स्थित हैं। 
  • – इस किले का निर्माण चादंना / चानणा गुर्जर ने माण्डिया भील की स्मृति में करवाया था। 
  • – माडंलगढ़ में जगन्नाथ कछवाहा की 32 खम्भों की छतरी बनी हुयी हैं। 
  • – राणा सांगा की छतरी भी यहीं स्थित हैं। 
  • – मानसिंह हल्दीघाटी युद्ध से पहले मांडलगढ़ में रूकता हैं। 
  • – इस में उडेश्वर महादेव का मंदिर बना हुआ हैं। 
  • – शीतला माता का मंदिर भी हैं। 
  • – मांडलगढ़ में मण्डल आकृति में बना हुआ हैं, इसलिए भी इसे मांडलगढ़ कहते हैं।

अचलगढः

  • – इस किले का निर्माण परमार शासकों ने करवाया था।
  • – महाराणा कुम्भा ने इसका पुनर्निर्माण करवाया व कुम्भा स्वामी का मंदिर बनवाया। 
  • – सावन भादों की मूर्तियां (कुम्भा – ऊदा) लगी हुयी हैं।
  • अचलेश्वर स्वामी का मंदिर हैं, इसमें शिव जी के अंगूठे की पूजा की जाती हैं। इस मंदिर के ठीक सामने दूरसा आढ़ा की मूर्ति लगी हुयी हैं। 
  • – अचलगढ़ को ‘भँवराथल’ कहते हैं, क्योंकि महमूद बेगठा के आक्रमण के समय यहां पर मधुमक्खियों ने
  • उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया था।

शेरगढ़ः

  • – यह किला बारां जिले में परवन नदी के किनारे स्थित हैं। 
  • – इसे कोषवर्धनगढ़ भी कहते हैं। (जल दुर्ग)

शेरगढ़ः– (धौलपुर) :

  • – इसका निर्माण कुषाण काल में हुआ था। 
  • – शेरशाह सूरी ने इसका नाम शेरगढ़ रख दिया था। 
  • – इस किले में सैय्यद हुसैन की दरगाह हैं। 
  • – हुनुहुँकार तोप भी इसी किले में स्थित हैं। 
  • – धौलपुर के सिक्कों को तमचांशाही कहतें हैं। 
  • – इस किले में भारत का सबसे बड़ा घंटाघर हैं। 
  • – धौलपुर में कमलबाग हैं, जिसका बाबर की आत्मकथा बाबरनामा में जिक्र हैं। 
  • – राजस्थान, मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश की सीमाओं पर स्थित।

कोटा का किला:– (माधोसिंह, परकोटा) 

  • – जैत्रसिंह (बूंदी का राजा ने यहां एक गुलाब महल का निर्माण करवाया।) 
  • – कालान्तर में माधोसिंह ने इसे कोटा के किले के रूप में विकसित किया। 
  • – जेम्स टॉड के अनुसवार इस किले का परकोटा आगरा के किल’ बाद सबसे बड़ा हैं। 
  • – झाला हवेली- भित्ति चित्रो के लिए प्रसिद्ध हैं।

कांकणबाड़ी का किला:

  • – (अलवर, मिर्जा राजा जयसिंह) 
  • – अलवर जिले में स्थित मिर्जा राजा जयसिंह ने इसका निर्माण करवाया। 
  • – आरंगजेब ने दारा शिकोह (बड़े भाई) को यहां बंधक बना कर रखा था।

शाहबाद का किला:

  • – बारां जिले में स्थित। 
  • – मुकुटमणि देव चौहान ने इसका निर्माण करवाय था। 
  • – शेरशाह सूरी अपने कालिजर अभियान के दौरान इस पर अधिकार कर लेता हैं, व इसका नाम सलीमाबाद कर देता हैं। 
  • – इसमें एक बादल महल बना हुआ हैं। 
  • – इसमें नवलवान तोप रखी हुयी हैं।

चौमूं का किला:

  • – जयपुर जिले में स्थित। 
  • – इसे धारधारागढ़ रघुनाथगढ़, चौमुंहागढ़ भी कहते हैं। 
  • – इसका निर्माण करणसिंह ने करवाय था। 
  • – इसमें एक हवा मंदिर (आतिथ्य स्वागत) बना हुआ हैं।

दौसा का किला:

  • – देवगिरी पहाड़ी पर बना हुआ हैं। 
  • – छाजले की आकृति का बना हुआ हैं। 
  • – दौसा कछवाओं की पहली राजधानी थी।

माधोराजपुरा काकिला:

  • – जयपुर जिले में स्थित। (फागी तहसील के पास) 
  • – जयपुर महाराजा सवाई माधोसिंह ने मराठों पर जीत के उपलक्ष्य में बनवाया था। 
  • – यह किला किछवाहों की नरूका शाखा के अधीन रहा था। यहां का भारतसहि नरूका, अमीर खां पिण्डारी की बेगमों को बंधक बना कर लाता हैं।

फतेहपुर का किला:

  • – सीकर जिले में स्थित। 
  • – 1453 में फतेहपुर के नवाब फतेह खां कायमखानी ने निर्माण करवाया था। 
  • – पीर निजामुदीन की दरगाह बनी हुयी हैं। 
  • – सरस्वती पुस्तकालय- फुतेहपुर

नीमराणा का किला:

  • – अलवर जिले में स्थित। 
  • – इसे पंचमहल भी कहते हैं

कुचामन का किला:

  • – (निर्माण- मेड़तिया शासक जालिमसिंह) 
  • – नागौर जिले में स्थित। 
  • – इसे जागीरों किलों का सिरमौर कहते हैं।

नागौर का किला:– 

  • – इसका निर्माण चौहान शासक सोमेश्वर के सामन्त कैमास ने करवाया था। 
  • – इसे ‘अहिच्छत्रगढ़’ दुर्ग भी कहते हैं। 
  • – अमरसिंह राठौड़ की वीरता के लिए प्रसिद्ध हैं। 
  • – इसे 2013 का आगा खां अवार्ड दिया गया हैं।

– भैंसरोड़गढ़ का किला:

  • – (एक व्यापारी द्वारा निर्मित) 
  • – चम्बल व बामनी नदियों के संगम पर चित्तौड़गढ जिले में स्थित हैं। 
  • – इसे राजस्थान का वेल्लोर कहते हैं। (जल दुर्ग)

मालकोट का किला:

  • – मेड़ता (नागौर) के किले को मालकोट का किला कहते हैं। 
  • – निर्माण- मालदेव ने।

मोहनगढ़ का किला:

  • – जैसलमेर जिले मे स्थित। 
  • – निर्माण- जैसलमेर महाराजा जवाहरसिंह के समय। 
  • – भारत का अंतिम किला हैं।

तिमनगढ़ का किला:

  • त्रिभुवनगढ़ भी कहते हैं। 
  • – ननद- भौर्जा का कुआं
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राजस्थान के लोक-नृत्य व जनजातियों के नृत्य(Folk Dances and Tribal Dances of Rajasthan)

राजस्थान के लोक-नृत्य

घूमर:. 

  • राजस्थान का राज्य नृत्य। . 
  • नृत्यों का सिरमौर। . 
  • राजस्थान की आत्मा। . 
  • केवल महिलाओं द्वारा किया जाता हैं, विवाह एवं मांगलिक अवसरों पर विशेषतः गणगौर . 
  • घूमर में हाथों का लचकदार संचालन आकर्षक होता हैं। । . 
  • लहगें के घूम के कारण ही इसे घूमर कहा जाता हैं। . 
  • इसमें विशेष 8 चरण होते हैं, जिन्हें सवाई कहते हैं . 
  • ढोल, नगाड़ा, शहनाई वाद्य यत्रों का प्रयोग किया जाता हैं। . 
  • इसे रजवाड़ी लोक नृत्य कहा जाता हैं। (राज परिवारों में विशेषतः)

कच्छी घोड़ी:

शेखावाटी क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य (व्यावसायिक नृत्य) . 

केवल पुरूषों द्वारा किया जाता हैं। . 

चार – चार पंक्तियों में पुरूष आमने-सामने खड़े होकर नृत्य करते हैं . 

नृत्य करते समय फूल की पंखुड़ियों के खिलने का आभास होता हैं। . 

इसमें नृतक हाथ में तलवार रखते हैं।

अग्नि नत्यः. 

जसनाथी सम्प्रदाय के लोगों द्वारा यह नृत्य किया जाता हैं। . 

बीकानेर का कतरियासर गांव इसका मुख्य स्थल हैं। . 

नृत्य करते समय आग से मतीरा फोड़ना, तलवार के करतब दिखाना प्रमुख हैं। . 

नृत्य करते समय नृतक फते-फते बोलता हैं। . 

आग के साथ राग व फाग का सुन्दर समन्वय दखेने को मिलता हैं। . 

बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने इस नृत्य को संरक्षण प्रदान किया।

गींदड़ नृत्यः

शेखावाटी क्षेत्र का लोक नृत्य (नगाड़ा प्रमुख वाद्य यंत्र) . 

माघ पूर्णिमा (होली का डंडा रोपण) से इसकी शुरूआत हो जाती हैं और फिर होली तक चलता रहता हैं। . गीदड़ केवल पुरूषों द्वारा किया जाता हैं। . 

पुरूष के द्वारा महिला वस्त्र पहनकर किया जाने वाला नृत्य- गणगौर कहलाता हैं।

भवाई नृत्यः

उदयुपुर क्षेत्र में किया जाने वाला व्यावसायिक नृत्य। . 

इस लोक नृत्य में तलवारों ना नाचना मुंह से रूमाल उठाना, थाली के किनारों पर नाचना, गिलासों पर नाचना, सिर पर सात – आठ मटके रख कर नृत्य आदि करतब किये जाते हैं।

चरी नृत्यः. किशनगढ़ क्षेत्र में। . 

गुर्जर महिलाओं द्वारा किया जाता है। . 

सिर पर सात चरी रखकर, सबसे ऊपर की चरी में कपास के बीजों को जलाकर नृत्य किया जाता हैं। . फलकू बाई:- प्रसिद्ध नृत्यांगना

तेरह ताली नृत्यः- 

उद्गम स्थल- पादरला (पाली) . 

कामड़ जाति / पंथ (रामदेव जी के भक्त) की महिलाओं द्वारा किया जाता हैं। . 

इसमें नौ मंजिरे दायें पैर में बांधे जाते हैं। . 2 मंजिरे कोहनी के ऊपर दोनों हाथों में तथा दो मंजिरे एक – एक हाथ में लिए जाते हैं। . 

महिलाएं बैठ कर नृत्य करती हैं। . 

मांगी बाई- प्रसिद्ध नृत्यांगना। . 

वाद्य यंत्र- मंजीरा, तानपूरा, चौतारा।

ढोल नृत्यः. 

जालौर क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य . 

ढोली, माली, भील, सरगड़ा आदि जातियों में पुरूषों द्वारा मांगलिक अवसरों पर किया जाता हैं। . 

थाकना शैली में नृत्य किया जाता हैं। . 

जयनारायण व्यास द्वारा कलाकारों को प्रोत्साहन दिया गया।

बम नृत्यः. 

अलवर, भरतपुर, धौलपुर क्षेत्रों में फसल की कटाई के अवसर पर पुरूषों द्वारा किया जाने वाला लोकनृत्य। . 

इसमें नगाड़े को बम किया जाता हैं। . 

इसमें गायन को रसिया कहा जाता हैं, इसलिए इस नृत्य को बम रसिया भी कहा जाता हैं

घुड़ला नृत्यः– (जोधपुर के राजा सातल की याद में।) . 

मारवाड़ क्षेत्र में शीतलाष्टमी से गणगौर तक किया जाता हैं। . 

छिद्रित मटके में दीपक रखकर लड़किया डांस करती हैं। . 

मणिशंकर गांगुली, देवीलाल सामर, कोमल कोठारी,- ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मंच प्रदान किया।

बिंदौली नृत्यः

झालावाड़ क्षेत्र का लोक नृत्य। . 

होली के अवसर पर किया जाता हैं।

चंग नृत्यः. 

शेखावटी क्षेत्र में होली के अवसर पर पुरूषों द्वारा किये जाने वाला नृत्य।

डांग नृत्यः

नाथद्वारा क्षेत्र में होली के अवसरों पर किया जाता हैं।

जनजातियों के नृत्यः

भील जनजातिः 

  • 1. गैरः
  • – मेवाड़ क्षेत्र में भील पुरूषों द्वारा किया जाने वाला लोक नृत्य। 
  • – मारवाड़ में यह लोक नृत्य सभी सम्प्रदाय द्वारा किया जाता हैं। 
  • – मुख्य केन्द्र- कनाना (बाड़मेर) 
  • – ओंगी नामक वस्त्र पहनकर नृत्य किया जाता हैं। 
  • 2. गवरी नृत्यः. 
  • मेवाड़ में भील पुरूषों द्वारा किया जाना वाला लोक नृत्य। . 
  • भाद्रपद कृष्ण एकम् (रक्षाबन्धन से एक दिन बाद) से शुरू होकर 40 दिन तक चलता हैं। . 
  • इसमें गवरी पार्वती का प्रतीक हैं। . 
  • इसे राई नृत्य भी कहते हैं। 
  • 3. हाथीमना:- भील पुरूषों द्वारा विवाह के अवसर पर घूटनों के बल बैठकर किया जाता हैं। 
  • 4. नेजाः- 
  • भील व मीणा जनजाति के लोक नृत्य। लकड़ी के डंडे पर नारियल बांधा जाता हैं। महिलाऐं उसकी
  • रक्षा करती हैं तथा पुरूष उतारने की कोशिश करता हैं। 
  • 5. घुमरा:- बांसवाड़ा क्षेत्र की महिलाओं द्वारा। 
  • 6. युद्धः
  • 7. द्विचकरी:

गरासिया जनजातिः 

  • 1.वालर नृत्यः- (विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर किया जाने वाला) . 
  • महिला पुरूष दोनों भाग लेते हैं। . 
  • वालर नृत्य में किसी भी वाद्य यंत्रों का प्रयोग नहीं किया जाता हैं। . 
  • नृत्य करते समय महिला – पुरूष अर्द्धवृत बनाते हैं। 
  • 2. मांदल:
  • 3. लूरः
  • 4. कूदः
  • 5. जवारा:- महिलाओं द्वारा होली का दहन के समय। 
  • 6. मोरिया:- पुरूषों द्वारा विवाह के समय। 
  • 7. गौर:

कालबेलिया जनजाति:

  • 1. चकरी:- गुलाबो (प्रसिद्ध नृत्यागंना) 
  • 2. शंकरिया:- प्रेम कहानी पर आधारित युगल नृत्य। 
  • 3. बागड़ियाः- भीख मांगते समय महिलाओं द्वारा। 
  • 4. पणिहारी:
  • 5. इंडोणी:

मेवः रणबाजा, रतवई

सहरियाः शिकारी नृत्य

कथौड़ीः जनजाति: मावलिया नृत्य (पुरूषों द्वारा नवरात्रा के समय), होली नृत्य (महिलाओं द्वारा फडका साड़ी पहनकर पिरामिड बनाया जाता हैं।) कजरः- चकरी (महिला), धाकड (पुरूष)

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