प्रजामंडल आंदोलन ( Halo movement )

रियासतों में कुशासन को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थापना करने , राजनीतिक जनजागृति पैदा करने, नागरािके के मौलिक अधिकारों की बहाली करने के उद्देश्य से किये गये आंदोलन प्रजामंडल आंदोलनों के नाम से जाने जाते हैं। 

1938ई. के कांग्रेस के हरिपुर अधिवेशन के बाद देशी रियासतों में चल रहे संघर्ष को कांग्रेस ने अपना समर्थन दिया 

1927 ई. मं बम्बई में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् की स्थापना की गयी थी, जिसकी रियासती इकाइयों को प्रजामण्डल के नाम से जाना गया।

मारवाड़ सेवा संघ:- 1920ई. में जयनारायण व्यास व चांदमल सुराणा द्वारा मारवाड़ सेवा संघ का गठन किया गया जिसका उद्देश्य जना जागृति पैदा कर मारवाड़ रियासत में उत्तरदायी शासन की थापना करवाना था। मारवाड़ सेवा संघ, राजस्थान सेवा संघ की एक इकाई थीं

तोल आंदोलन:- 1920-21 ई में मारवाड़ रियासत में ब्रिटिश भारत की तर्ज पर सौ तोले के स्थान पर 80 तौले का एक सेर कर दिया गया, मारवाड़ सेवा संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा इसके खिलाफ आंदोलन चलाया गया, अतः सरकार को अपना निर्णय बदलना पड़ा। मारवाड़ यूथ लीग:- 10 मई 19831 ई. को जयनारायण व्यास द्वारा मारवाड़ रियासत में इस संगठन की स्थापना की गयी।

चण्डावल घटनाः– मई 1942 ई. में चण्डावल (पाली) नामक स्थान पर मारवाड़ प्रजा परिषद के कार्यकर्ताओं की एक सभा पर रियासती सैनिलकों द्वारा हमला किया गया फलस्वरूप कई कार्यकर्ता घायल हो गये।

डाबड़ा काण्ड:– 13 मार्च 1947 ई. को डाबड़ा (नागौर) नामक स्थान पर मारवाड़ प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं की एक सभा मोतीलाल तेजावत नामक एक किसान के घर पर हो रही थी। डीडवाना परगने के जागीरदार द्वारा कार्यकर्ताओं पर हमला करवाया गया। प्रजामंडल के मुख्य नेता चुन्नीलाल समेत 12 लोग मारे गये। मथुरादास माथुर घायल हो गये।

सर्वहितकारिणी सभा:– 1913 ई. में बीकानेर प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं स्वामी गोपालदास व कन्हैया लाल द्वारा चुरू में इसकी स्थापना की गयी इसके तहत बालिका शिक्षा के लिए पुत्री पाठशाला तथा दलित शिक्षा के लिय कबीर पाठशालाएं खोली गयी।

बीकानेर षडयंत्र अभियोगः– बीकानेर महाराजा गंगासिंह जब दूसरे गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लेने के लिये लंदन गये तब वहां पर बीकानेर के कार्यकर्ताओं द्वारा ‘बीकानेर दिग्दर्शन’ (बीकानेर में कुशासन को बताने वाली) नामक पत्रिका बटवायी गयी। इसके दण्डस्वरूप स्वामी गोपालदास, चन्दनमल बहड़, सत्यनारायण सर्राफ बीकाने षडयंत्र मुकदमा चलाया गया। जेन्टलमैन एग्रमेन्ट:- भारत छोड़ो आंदोलन के समय सितम्बर 1942 में जयपुर प्रजामंडल के नेता हीराला शास्त्री व जयपुर के प्रधानमंत्री मिर्जा ईस्माइल के मध्य एक समझौता हुआ, जिसे Gentlemen Agreement कहा जाता हैं, इसके तहत यह तय किया गया कि जयपुर रियासत अंग्रेजों की जन-धन से सहायता नहीं करेगी। प्रजामंडल के कार्यकर्ता शांतिपूर्ण विरोध कर सकते हैं तथा कार्यकत्ताओं की गिरफ्तारी नहीं की जायेगी। राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के प्रयास किये जायेंगे। जयपुर प्रजामडंल भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लेगा

आजादमोर्चा:– जयपुर प्रजामंडल के द्वारा Quit India movement में भाग नहीं लेने के हीरालाल शास्त्री के निर्णय से नाराज कार्यकर्ताओं ने बाबा हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में आजाद मार्चा का गठन किया तथा भारत छोडो आंदोलन में भाग लिया, जिसके अन्य नेता रामकरण जोशी, दौलतमल भंडारी व गुलाबचन्द कासलीवाल थे। तसीमो कांड:- अप्रैल 1947 ई. में धौलपुर प्रजामंडल के तसीमो नामक गांव में पुलिस फायरिंग की गयी, जिसमें पंचमसिंह व छतरसिंह दो कार्यकर्ता शहीद हो गये।

रास्तापाल घटना:- वागड़ सेवा संघ द्वारा संचालित विद्यालयों को बंद करवाने गये डूंगरपुर राजय के सैनिकों कने रास्तापाल नामक गांव में विद्यालय बंद नहीं करने पर अध्यापक नानाभाई की गोली मारकर हत्या कर दी तथा दूसरे अध्यापक सेगांभाई को गाड़ी के पीछे बांधकर घसीटा गया, 13 वर्षीय भील बालिका कालीबाई अध्यापक सेंगाभाई को बचाने के प्रयास में पुलिस की गोलियों की शिकार (शहीद) हो गयी। (19 जून 1947) डूंगरपुर जिले में गेप सागर के तट पर काली बाई की प्रतिमा लगी हुयी हैं। राजस्थान सराकर बालिका शिक्षा के क्षेत्र में बालिका पुरस्कार प्रदान करती हैं।

कथटराथल सम्मेलनः– 25 अप्रैल 1934 ई. को कटराथल (सीकर) नामक स्थान पर महिलाओं से दुर्व्यवहार के खिलाफ किशोरी देवी (किसान नेता हरलालसिंह) के नेतृत्व में 10000 महिलाओं का एक सम्मेलन हुआ इसमें भरतपुर के किसान नेता ठाकुर देशराज की पत्नी उत्तमादेवी ने भी भाग लिया था।

कूदंन हत्याकांड:– अप्रैल 1934ई. में कूदन (सीकर) नामक गांव में पुलिस अधिकारी कैप्टन वेब द्वारा किसानों पर फायरिंग कर दी गई, इसमें कई किसान मारे गये, इस हत्याकांड की चर्चा लदंन के House of Commons में भी हुयी थी।

महत्वपूर्ण सगंठन:

1.देश हितैषिणी सभाः – मेवाड़ रियासत में विवाह सम्बन्धी सुधार करने के उद्देश्य से 2 जुलाई 1877ई. को महाराणा सज्जनसिंह की अध्यक्षता में समाज सुधार संगठन बनाया गया, जिसके उद्देश्य विवाह के समय होने वाले खर्च को कम करना,ख बहु विवाह निषेध करना था। समाज सुधार के परिप्रेक्ष्य में किसी रियासत में हुआ पहला प्रयास कवि राजा श्यामलदास (वीर विनोद के लेखक) इसके सदस्य थे।

2. वाल्टरकृत राजपूत हिकारिणी सभा:- जनवरी 1889 ई. में A.G.G. वाल्टर ने राजपूतों में विवाह सम्बन्धी सुधार करने के लिए इस सभा का गठन किया जिसके उद्देश्य:1. विवाह योग्य आयु निश्चित करना (लड़के के लिए 18, लड़की 14 वर्ष) 2. बहु विवाह बंद करना। 3. टीका व रीत बंद करना।

3. राजपूताना मध्य भारत सभा:- 1918ई. में जमनालाल बजाज द्वारा दिल्ली के चादंनी चौक में मारवाड़ी पुस्तकालय में इस सभा का गठन किया गया जिसका मुख्यालय अजमेर (बाद में) बनाया गया। विजयसिंह पथिक, गणेश शंकर विद्यार्थी, चांदकरण शारदा आदि लोग भी इससे जुड़े हुये थे।

4. राजस्थान सेवा संघ:- 1919 ई. में विजयसिंह पथिक द्वारा वर्धा (महाराष्ट्र) में इसका गठन किया गया था। रामनारायण चौधरी व हरिभाई किंकर इस संघ के मुख्य कार्यकर्ता थे। राजस्थान सेवा ने किसान आंदोलनों (बूंदी, शेखावाटी आदि) में अपनी मुख्य भूमिका निभाई राजस्थान सेवा संघ का मुख्यालय अजमेर में बनाया गया।

5. जीइन कुटीर:- 1927 ई. में वनस्थली (टोंक) में हीरालाल शास्त्री द्वारा इस संस्था का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य एक ऐसे ग्राम समाज का निर्माण करना था, जो पूर्णतः स्वावलम्बन पर आधारित हैं।

6. हिन्दी साहित्य समितिः- 1912 ई. में इस संस्था की स्थापना की गयी थी, इसके तहत 1927ई. में भरतपुर में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन करवाया गया जिसके अध्यक्ष गौरी शंकर हीराचन्द औझा थे इस सम्मेलन में रवीन्द्र नाथ टैगोर व जमना लाल बजाज ने भी भाग लिया था। (भरतपुर में किशनसिंह ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया था।) 

7. अखिल भारतीय हरिजन संघ:- 1932 ई. में गांधी जी ने घनश्यामदास बिड़ला के नेतृत्व में अखिल भारतीय हरिजन संघ की स्थापना की थी, इसकी राजपूताना इकाई के अध्यक्ष हरविलास शारदा थे। 

8. वीर भारत सभाः- राजस्थान में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रयास के लिये 1910 में केसरीसिंह बारहठ व राव गोपालसिंह खरवा द्वारा इसका गठन किया गया था, विजयसिंह पथिक भी इससे जुड़े हुये थे। यह संस्था अभिनव भारत (वीर सावरकर) की प्रान्तीय इकाई थी।

प्रजामण्डलों का राजनैतिक व सामाजिक योगदानः

राजनैतिक योगदान .                     सामाजिक योगदान

राजनीतिक चेतना जागृत .               महिलाओं की स्थिति में सुधार

राष्ट्रीय चेतना का संचार .               शिक्षा का प्रचार-प्रसार . 

उत्तरदायी सरकारें की स्थापना      . आदिवासियों के कल्याण के लिये सुधार कार्यक्रम

एकीकरण का मार्ग प्रशस्त .          हरिजन उद्धार

राष्ट्रीय एकता को बल .               बेगार प्रथा का उन्मूलन 

सामन्तशाही समाप्त .                सामाजिक सुधार

राष्ट्रीय आंदोलनों को बल

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राजस्थान का एकीकरण (Integration of Rajasthan )

– 5 जुलाई 1947 को रियासती सचिवालय की स्थापना की गयी। 

– रियासती सचिवालय के अनुसार वे रियासतें जिनकी आय 1 करोड़ से अधिक हो व जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो, अपना स्वतंत्र अस्तित्व रख सकती हैं। 

– उस समय राजस्थान में ऐसी 4 रियासतें थी।

1. जयपुर 2. जोधपुर 3. उयदपुर 4. बीकानेर 

– 18 जुलाई 1947 को धारा- 8 के तहत देशी रियासतों पर से ब्रिटिश सर्बोच्चता समाप्त कर दी गयी। (स्वतंत्रता अधिनियम के तहत) 

– आजादी के समय राजस्थान में 19 रियासतें, 3 ठिकाणे (1. लावा 2. नीमराणा 3. कुशलगढ़) व एक केन्द्र

शासित प्रदेश (अजमेर मेरवाड़ा) था। मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह ने राजस्थान गुजरात व मालवा की रियासतों को मिलाकर राजस्थान यूनियन बनाने का प्रस्ताव रखा, इसके लिए 25, 26 जून 1947 को अधिवेशन भी बुलाया। इसमें 22 राजाओं ने भाग लिया, पर जयपुर , जोधपुर और बीकानेर के रियासतों के रूचि नहीं लेने के कारण यह निर्णय फलीभूत नहीं हो सका।

प्रथम चरणः मत्स्य संघ 

– भरतपुर, धौलपुर, अलवर व करौली रियासतों व नीमराणा ठिकाने को मिलाकर मत्स्य संघ बनाया गया। – मत्स्य संघ का नामकरण के. एम. मुंशी ने किया। 

– धौलपुर महाराजा उदयभानसिंह 

– राजप्रमुख – करौली महाराजा गणेशपालसिंह 

– उपराजप्रमुख – अलवर – राजधानी – भरतपुर – उद्घाटन 

– मत्स्य संघ का उद्घाटन 18 मार्च 1948 को भरतपुर के किले में केन्द्रीय खनिज मंत्री एन. वी. गाडविल ने किया।

– शोभाराम कुमावत (अलवर के) को मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री बनाया गया। 

– जुगल किशोर चतुर्वेदी को उपप्रधानमंत्री बनाया गया। 

अलवर व भरतपुर रियासतों का नियत्रंण भारत सरकार ने पहले ही अपने कब्जे में ले लिया था।

द्वितीय चरणः राजस्थान संघ/ पूर्व राजस्थान 

– 9 रियासत + 1 ठिकाने को मिलाकर राजस्थान संघ को बनाया गया। 

– कोटा, बूंदी, झालावाड़, प्रतापगढ़, डुंगरपुर, बांसवाड़ा, किशनगढ़, टोंक , शाहपुरा, कुशलगढ़ (ठिकाना) 

– कोटा – राजधानी 

– कोटा महाराजा भीमसिंह – राजप्रमुख 

– बूंदी महाराजा बहादुरसिंह – वरिष्ठ उपराजप्रमुख 

– डुगरपुर के लक्ष्मणसिंह – कनिष्ठ उपराजप्रमुख

शाहपुरा के गोकुल लाल असावा 

– प्रधानमंत्री – 25 मार्च 1948 को एन. वी. गाडविल ने कोटा में उद्घाटन किया। 

– शाहपुरा व किशनगढ़ दो ऐसी रियासतें थी, जिन्हें तोपो की सलामी का अधिकार नहीं था। – बांसवाडा महारावल चनद्रवीरसिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए कहा था कि में अपने Death Warant पर हस्ताक्षर कर रहा हूं।

तृतीय चरण – संयुक्त राजस्थान 

– राजस्थान संघ + मेवाड़ 

– मेवाड़ राणा भूपालसिंह – राजप्रमुख 

– कोटा महाराजा भीमसिंह – उपराजप्रमुख 

– बूंदी महाराजा बहादुरसिंह – वरिष्ठ उपराजप्रमुख 

– डुंगरपुर महारावल लक्ष्मणसिंह – कनिष्ठ उपराजप्रमुख 

– 18 अप्रैल 1948 को उदयपुर में जवाहर लाल नेहरू ने उद्घाटन किया। 

– इसमें यह निर्णय लिया गया कि संयुक्त राजस्थान संघ का प्रतिवर्ष एक अधिवेशन कोटा में होगा और कोटा के विकास के लिए विशेष प्रयास किये जाएगें। 

– राजधानी – उदयपुर 

– मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह को 20 लाख रू. सालाना (प्रिवी पर्स के रूप में) दिय जाने थे, जिनमें से 10 लाख रू. – प्रिवी पर्स।

5 लाख रू. – राजप्रमुख के रूप में वेतन

5 लाख रू. – धार्मिक कार्यो के लिए दिए गए। 

– प्रधानमंत्री _ – माणिक्य लाल वर्मा 

– उपप्रधानमंत्री – गोकुल लाल असावा 

– इसमें मंत्रिमंडल में सामन्तों को शामिल करने से गतिरोध उत्पन्न हो गया।

चतुर्थ चरणः वृहत् राजस्थान 

– संयुक्त राजस्थान संघ + बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर 

– मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह – महाराजप्रमुख 

– जयपुर राज सवाई मानसिंह द्वितीय – राजप्रमुख 

– जोधपुर राजा हनवन्तसिंह – वरिष्ठ उपराजप्रमुख 

– कोटा महाराजा भीमसिंह – वरिष्ठ उपराजप्रमुख 

– बूंदी के बहादूरसिंह – कनिष्ठ उपराजप्रमुख 

– डुगरपुर के लक्ष्मणसिंह – कनिष्ठ उपराजप्रमुख 

– सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर जयपुर को राजधानी बनाया। 

– 30 मार्च 1949 को वल्लभ भाई पटेल ने जयपुर में उद्घाटन किया। 

– इस दिन को ‘राजसथान दिवस’ के रूप में मनाया जाता हैं। – प्रधानमंत्री

– हीरालाल शास्त्री – जोधपुर

– हाई कोर्ट – बीकानेर

– शिक्षा विभाग। – भरतपुर

– कृषि विभाग। – कोटा

– वन एवं सहकारी विभाग। – उदयपुर

– खनिज विभाग। जयपुर के राजा को 18 लाख रू. PRIVI PURSE के रूप में दिए। 

– जोधपुर – 17.5 लाख रू. 

– बीकानेर – 17 लाख रू

पंचम चरणः संयुक्त वृहद राजस्थान 

– वृहद राजस्थान + मत्स्य संघ (15 मई 1949) 

– शोभाराम कुमावत को शास्त्री मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। 

– शंकरराव देव समिति की सिफारिश के आधार पर मत्स्य संघ का विलय किया गया।

षष्ठम् चरण – राजस्थान 

– संयुक्त वृहद राजस्थान + सिरोही (आबू व देलवाड़ा को छोड़कर)

– 26 जनवरी 1950 

– आबू व देलवाड़ा सहित 89 गांव बॉम्बे राज्य में शामिल किए गए। गोकुल भाई भट्ट का हाथल गांव राजस्थान में शामिल किया गया। 

– हीरालाल शास्त्री – पहले मनोनीत मुख्यमंत्री

सप्तम चरण 

– फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया था (तीन सदस्यीय) 

– के. एम. पणिक्कर (बीकानेर की तरफ से संविधान सभा में जाने वाले सदस्य) 

– हृदयनाथ कुजरू – इसकी सिफारिशों के आधार पर 1 नवम्बर 1956 को अजमेर-मेरवाड़ा का राजस्थान में विलय कर दिया गया। 

– अजमेर को राजस्थान का 26 वां जिला बनाया गया। 

– आबू व देलवाड़ा राजस्थान में मिलाये गए। 

– मध्यप्रदेश का सुनेल टप्पा राजस्थान में मिलाया गया। 

– राजस्थान का सिरोंज मध्यप्रदेश में मिलाया। गया। 

– इस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया थे। 

– राजप्रमुख का पद समाप्त कर दिया गया। (7वें संविधान संशोधन 1956 द्वारा) 

– सरदार गुरूमुख निहालसिंह को राजस्थान का पहला राज्यपाल बनाया गया।

अजमेर-मेरवाड़ा एक केन्द्रशासित प्रदेश था जिसमें 30 सदस्यों की धारा सभा होती थी। इसके मुख्यमंत्री हरिभाऊ उपाध्याय थे। 

इन्होंने अजमेर के राजस्थान में विलय का विरोध किया था।

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राजस्थान के किसान आंदोलन ( Rajasthan’s peasant movement )

बिजौलिया किसान आंदोलनः 

– बिजौलिया वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में स्थित हैं, तत्कालीन मेवाड़ रियातस का (अ) श्रेणी का ठिकाणा था। 

– राणा सांगा ने अशोक पंवार को ऊपरमाल की जागीर दे दी। और इसका मुख्यालय बिजौलिया था।

(खानवा के युद्ध में राणा सांगा की तरफ से अशोक पंवार लड़ता हैं) 

– बिजौलिया में 1897 ई. से किसान आंदोलन शुरू होता हैं। यह आंदोलन ‘धाकड़’ जाति के किसानों द्वारा किया गया।

इस आंदोलन के मुख्य कारण:

– 84 प्रकार की लाग-बाग (कर) – लाटा – कुंता व्यवस्था (खेत में खड़ी फसलों के अनुमान पर)  – चंवरी कर, तलवार बंधाई कर 

– यह आंदोलन मुख्यतः 3 चरणों में विभक्त था। 

– प्रथम चरण – 1897-1914। 

– द्वितीय चरण – 1914-1923। 

– तृतीय चरण – 1923-1941

प्रथम चरण (1897-1914 ई.) 

– गिरधारी पुरा नामक एक गांव में एक मृत्युभोज के अवसर पर किसानों की सभा हुई, साधु सीताराम दास के कहने पर नानजी व ठाकरी पटेल को मेवाड़ महाराणा से मिलने भेजा गया। 

– रियासत की तरफ से हामिद खां को ठिकाने की जांच करने के लिए भेजा गया। 

– नानजी व ठाकरी पटेल को बिजौलिया ठाकुर ने बिजौलिया से निष्कासित कर दिया। 

– पहले चरण में इस आंदोलन में अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी, अतः यह आंदोलन स्वतः स्फूर्त चलता था। 

– स्थानीय नेता- प्रेमचंद भील, ब्रह्मदेव, फतहकरण चारण।

द्वितीय चरण (1914-1923 ई.) – 1906 ई. में पृथ्वीसिंह बिजौलिया का नया जागीरदार बनता हैं। व,जा पर तलवार बंधाई नामक एक नया कर लगा देता हैं।

तलवार बंधाई- यह उत्तराधिकार शुल्क था जो नये सांमत द्वारा राजा को दिया जाता था। मेवाड़ में इसे तलवार बंधाई, कैदखालसा, नजराना तथा मारवाड़ में हुक्मनामा, पेशकशी कहा जाता था। जैसलमेर रियासत में सामंतों से यह कर नहीं लिया जाता था।

– विजयसिंह पथिक व माणिक्यलाल वर्मा दोनों आदोंलन से जुड़ें। 

– 1917 ई. में विजयसिंह पथिक ने ‘ऊपरमाल पंच बोर्ड’ की स्थापना की । मुन्ना पटेल को इसका अध्यक्ष बनाया। 

– मेंवाड़ रियासत ने 1919ई. में ‘बिनदुलाल भट्टाचार्य’ की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। 

– A.G.G. हॉलैण्ड के प्रयासो से किसानों व रियासतों के बीच समझौता हो जाता हैं, तथा किसानों के 35 कर माफ कर दिये गये पर ठिकाने ने इस समझौते को लागू नहीं किया।

तृतीय चरण (1923-1941 ई.) 

– तीसरे चरण मे विजयसिंह पथिक इस आदोंलन से अलग हो जाते हैं। जमनालाल बजाज को नेतृत्व सौंपा गया।

– जमनालाल बजाज ने हरिभाऊ उपाध्याय को आदोंलन के नियुक्त किया। 

– मेवाड़ के प्रधानमंत्री राघवाचारी व राजस्व मंत्री मोहनसिंह मेहता के प्रयासों से किसानों के साथ समझौता हो गया और उनकी (किसानों) मांगे मान ली गयी। 

– इस प्रकार 1941 ई. में यह आंदोलन समाप्त हो गया। इस प्रकार यह सर्वाधिक समय (44 वर्ष) तक चलने वाला यह अहिसंक आंदोलन था। 

– गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर से प्रकाशित अपने समाचार पत्र ‘प्रताप’ में बिजौलिया किसान आंदोलन को प्रमुखता से महत्व देते हैं। 

– माणिक्यलाल वर्मा अपने पंछीड़ा गीत के माध्यम से किसानों में जोश भरते थे। 

बेंगू किसान आंदोलन 

– बेंगू वर्तमान चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित हैं, यह भी मेवाड़ रियासत का (अ) श्रेणी का ठिकाणा था। 

– यहां का ठाकुर ‘अनुपसिंह चूडांवत’ था। यहां के किसान भी विभिन्न लाग-वागों से परेशान थे। किसानों ने इन करों को कम करने की मांग की तो ठिकाणे व किसानों के बीच समझौता हो गया पर रियासत ने इस समझौते को अस्वीकार कर दिया व इसे ‘बोल्शेविक समझौता’ कहा गया। रियासत ने ‘ट्रेन्च’ को मामले की जांच करने के लिए भेजा। 

– किसानों ने ट्रेन्च का बहिष्कार किया। 

– गोविन्दपुरा गांव में सभा कर रहे किसानों पर ट्रेन्च ने 13 जुलाई 1923 को गोली चला दी, रूपा जी व कृपा जी धाकड़ नामक दो किसान शहीद हो गए। 

– 1926 ई. में किसानों की शर्ते मान ली जाती हैं। 

– विजयसिंह पथिक व रामनारायण चौधरी ने आदोंलन का नेतृत्व किया।

बूंदी किसान आदोंलन/ बरड़ किसान आदोंलन

– 1920 ई. में साधु सीताराम दास ने डाबी किसान पचांयत की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष ‘हरला भड़क’ को बनाया गया। 

– 2 अपैल 1923 ई. को सभा कर रहे किसानों पर पुलिस अधिकारी ‘इकराम हुसैन’ ने गोली चला दी। 

– ‘नानक जी भील’ झंडा गीत गाते हुए शदीद हो गए। 

– मुख्य नेता पण्डित नयनूराम शर्मा, भँवरलाल सुनार, नारायणसिंह। 

– इस आदोंलन में मुख्यतः गुर्जर किसानों ने भाग लिया। 

– इस आदोंलन में महिलाओं ने भी भाग लिया था।

नीमचणा किसान आंदोलन (अलवर) 

– 14 मई 1925 ई. को को नीमूचणा में आंदोलन कर रहे किसानों पर कमाण्डर ‘छाजूसिंह’ ने गोली चला दी, ___ कई किसान मारे गये। 

– ‘तरूण राजस्थान’ समाचार पत्र ने इस खबर को सचित्र प्रकाशित किया। 

– महात्मा गांधी ने इसे ‘दोहरी डायरशाही’ की संज्ञा दी। 

– दिल्ली से प्रकाशित रियासत समाचार पत्र ने इस हत्याकांड को जलियावाला से भी अधिक भयानक बताया।

शेखावाटी किसान आदोंलनः – 1931ई.- जाट क्षेत्रीय महासभा का गठन। 

– 1933ई.- महासभा का पहला अधिवेशन पलथाना (सीकर) में हुआ। 

– कूदन हत्याकाण्ड (अप्रैल 1934)- कैप्टन वेब द्वारा की गयी फायरिंग में कई किसान मारे गये। इसकी

चर्चा ब्रिटेन के हाऊस ऑफ कॉमन्स में हुई। 

– कटराथल सम्मेलन (25 अप्रैल 1934)

– सिहोट के सांमत द्वारा महिलाओं से किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में 10,000 से अधिक महिलाओं का सम्मेलन हुआ। इसकी अध्यक्षा किशोरीदेवी तथा मुख्य वक्ता उत्तमादेवी थी। 

– जयसिंहपुरा हत्याकांड (21 जून 1934)- प्रथम हत्याकांड जिसके हत्यारों को सजा सम्भव हो सकी।

भगत आंदोलनः 

– वह आंदोलन मुख्यतः भील जनजाति के किसानों द्वारा किया गया था। 

– सुरजी भगत व गोविन्द गिरी ने इसे शुरू किया था। 

– गोविन्द गिरी ने 1883 ई. में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की। गोविन्द गिरी दयानन्द सरस्वती से प्रभावित थे। अतः उन्होनें आदिवासियों को हिन्दू धर्म के दायरे में रखने के लिए भगतपंथ की स्थापना की।

– 17 नवम्बर 1913 ई. को मानगढ़ की पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर जब भीलों की सभा हो रही थी, तब मेवाड़ भील कोर ने पहाड़ी को घेर लिया व गोली चला दी। 

– 1500 से अधिक भील मारे गये। इसे राजस्थान का जलियावाला हत्याकांड कहा जाता हैं। 

– आज भी उनकी याद में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को मेला लगता हैं। 

– गोविन्द गिरी की फांसी की सजा को 20 वर्ष की कैद में बदला गया था। लेकिन 10 वर्ष बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। अपना शेष जीवन गुजरात के काम्बिया गांव में शांतिपूर्ण तरीके से गुजारा।

एकी आंदोलन – ये भोमट क्षेत्र के भील तथा गरासिया जनजाति लोगों द्वारा किया गया था, इसलिए भोमठ – भील आंदोलन भी कहते हैं। 

– चित्तौड़गढ़ के मातृकुण्डिया नामक स्थान से वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को यह आंदोलन शुरू हुआ था। 

– मातृकुण्डिया को ‘राजस्थान का हरिद्वार’ कहते हैं। 

– इस आंदोलन के मुख्य नेता मोलीलाल तेजावत थे। 

– मोती लाल तेजावत मेवाड़ रियासत के ‘झाड़ोल ठिकाणे’ के कामदार थे। प्रारम्भ में यह आंदोलन झाडोल, कोटडा व गोगुन्दा तहसीलों में शुरू हुआ था। जो बाद में डुंगरपुर, बाँसवाड़ा, ईडर, विजयनगर (गुजरात की एक रियासत) आदि रियासतों में फैल गया। 

– मोतीलाल तेजावत ने मेवाड़ महाराणा के समक्ष 21 सूत्री मांग-पत्र प्रस्तुत किया था, जिसे ‘मेवाड़ की पुकार’ कहते हैं। 

– 7 मार्च 1922 ई. में नीमड़ा (विजयनगर) गांव में हो रही एक सभा पर पुलिस फायरिंग कर दी गयी थी, 

– मोती लाल तेजावत इस आंदोलन के बाद भूमिगत हो गए, पर 1929 में गांधीजी के कहने पर ईडर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 

– ईडर रियासत ने उन्हें मेवाड़ को सौंप दिया, मेवाड़ की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ‘महाइन्द्राज सभा’ ने मोतीलाल तेजावत से रियासत के विरूद्ध कोई गतिविधि नहीं करने का लिखित आश्वासन मांगा। 

– गांधीजी के सहायक मणिलाल कोठारी के हस्तक्षेप से समझौता हुआ। – 1936 ई. में मोतीलाल तेजावत को रिहा कर दिया गया। 

महाइन्द्राज सभा- मेवाड़ का सर्वोच्च न्यायालय जिसकी स्थापना 1880 ई. में महाराणा सज्जनसिंह द्वारा की गई।

( मेवाड़ भील कोर- इसकी स्थापना 1841ई. में की गई। इसका मुख्य केन्द्र खैरवाड़ा (उदयपुर) था। )

मीणा जाति का आंदोलन । 

– 19254 ई. में ‘आपराधिक जाति अधिनियम’ बनाकर मीणा जाति की उसके अन्तर्गत रख दिया गया। 1930 में ‘जयरायम पेशा’ कानून के तहत प्रत्येक मीणा स्त्री-पुरूष को थाने में हाजिरी लगवाना अनिवार्य कर दिया गया। 

– 1933 में मीणा क्षेत्रीय महासभा की स्थापना की गयी। व महासभा ने इस कानून को निरस्त करने की मांग की। 

– 1944 ई. में मुनि मगन सागर के नेतृत्व में सीकर के नीमकायाना में एक मीणा सम्मेलन बुलवाया गया और मीणा समाज को उनके गौरवशाली अतीत से अवगत करवाया गया। 

– मुनि मगनसागर ने मीनपुराण नामक ग्रंथ की रचना की। 

– बंशीधर शर्मा ने 1944 ई. में जयपुर मीणा सुधार समिति की स्थापना की। 

– 28 अक्टूबर 1946 कों बागावास सम्मेलन में सभी चौकीदार मीणाओं ने अपने पदो से इस्तीफे दे दिये तथा इसे मुक्ति दिवस के रूप में मनाया। 

– आजादी के बाद 1952 में जरायम पेशा कानून को रद्द कर दिया गया।

प्रजामण्डल आंदोलन 

– 1927 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना की गयी। (बम्बई में)

 – विजयसिंह पथिक को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया। 

– 1928 ई. में ‘राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद’ का गठन किया गया। 

– 1931 ई. मे अजमेर में इसका पहला अधिवेशन हुआ। अध्यक्ष- रामनारायण चौधरी 

– 1938 ई. के कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में रियासतों (देशी) में चल रहे आंदोलनों को कांग्रेस ने समर्थन

बंदी प्रजामंडल 

संस्थापक- कांतिलाल, ऋषिदत्त मेहता, नित्यानन्द। 

– ऋषिदत्त मेहता ने ‘बूंदी राज्य लोक परिषद’ की स्थापना भी की थी।

– ऋषिदत्त मेहता ने 1923 में ब्यावर से ‘राजस्थान’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला। इसमें हाड़ौती क्षेत्र की खबरें प्रकाशित होती थी।

मारवाड़ प्रजामंडल 

– 1918 ई. में चांदमल सुराणा ने मारवाड हितकारिणी सभा की स्थापना की। 

– 1920 ई. में जयनारायण व्यास ने ‘मारवाड़ सेवा संघ’ की स्थापना की। 1920-21 में मारवाड़ सेवा संघ ने तौल आंदोलन चलाया था। (100 तोले के स्थान पर 80 तोले का एक सेर कर दिया गया।) 

– 1929 ई. में जयनारायण व्यास ने मारवाड़ राज्य लोक परिषद् की स्थापना की। 1931 में इसका अधि वेशन पुष्कर में हुआ इसकी अध्यक्षता चादकरण शारदा ने की। इस अधिकवेशन में काका कालेरकर व कस्तूरबा गांधी आए थे। 

– 10 मई 1931 ई. में जयनारायण व्यास ने Marwar Youth league की स्थापना की। 

– 1932 ई. में जोधपुर में स्वाधीनता दिवस मनाया गया। छगन राज चौपासनी वाला ने तिरंगा झंडा फहराया। 

– 1934 ई. में भवंर लाल सर्राफ ने मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की। 

– 1936 ई. – कृष्णा दिवस (बॉम्बे)

– शिक्षा दिवस (जोधपुर)

– जयनारायण व्यास के जोधपुर प्रवेश पर पाबंदी। 

– 1937 ई. में बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने जोधपुर के प्रधानमंत्री डोनाल्ड फील्ड को पत्र लिखकर

जयनारायण व्यास के प्रवेश सम्बन्धी लगी पाबन्दी को हटाने की मांग की। 

– भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 19 जून 1942 को जेल में भूख हड़ताल कर रहे बालमुकुन्द बिस्सा की मृत्यु हो गयी, बालमुकुन्द बिस्सा ने जोधपुर में ‘जवाहर खादी भण्डार’ की स्थापना की।

(बालकृष्ण कौल ने अजमेर में जेलों में कुव्यवस्था के विरूद्ध हड़ताल की थी।)

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयनारायण व्यास सिवाणा किले में नजरबंद किया गया। अन्य नेताओं को जालौर किले में नजरबंद किया गया। 

– जयनारायण व्यास की पुस्तके:- 1. मारवाड़ की अवस्था 2. पोपा बाई की पोल 

– समाचार पत्र 1. अखण्ड भारत 2. आगीबाण 3. पीप

डाबडा कांड:- 13 मार्च 1947

– डीडवाना परगने के डाबडा गांव में एक किसान मोतीलाल के घर पर सभा हो रही थी, पुलिस ने फायरिंग कर दी। 12 लोग मारे गये। 

– मथुरा दास माथुर घायल हो गये।

बीकानेर प्रजामंडल :

– कन्हैयालाल ढुंढ़ व स्वामी गोपालदास ने 1913 में चुरू में ‘सर्वहितकारिणी सभा’ की स्थापना करी। 

– कन्हैयालाल ढुंढ़ ने ‘कन्या विद्यालय’ व कबीर पाठशाला (दलित शिक्षा) खोली। 

– 1930 ई. में चुरू के धर्मस्तूप पर तिरंगा फहरा दिया। 

– महाराजा गगांसिंह जब गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लन्दर गए तब ‘चन्दनमल बहड़ व स्वामी गोपालदास’ ने बीकानेर दिग्-दर्शन नामक पत्रिकाए बंटवायी। इन पर 1932 ई. में बीकानेर षडयंत्र केस चलाया गया।

– 1936 ई. में वैद्य मघाराम ने कलकत्ता में बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना की। 

– 1942 ई. में ‘रघुवर दयाल गोयल’ ने बीकानेर राज्य लोक परिषद की स्थापना की। 

– 26 अक्टूम्बर 1944 को बीकानेर दमन विरोधी दिवस बनाया गया। 

– 1 जुलाई 1946 को रायसिंह नगर में जुलूस निकाल रहे प्रजामंडल के कार्यक्रर्ताओं पर फायरिंग कर दी

गयी। बीरबरसिंह नामक एक युवक मारा गया। 17 जुलाई 1946 को बीकानेर रियासत में बीरबल दिवस मनाया गया। इंदिरा गांधी नहर की जैसलमेर शाखा को ‘बीरबल शाखा’ नाम दिया गया। 

– बीकानेर प्रजामंडल के तहत ही दुधवा-खारा (चूरू), महाजन (बीकानेर), उदासर (बीकानेर) आदि किसान आदोंलन चलाये गये।

धौलपुर प्रजामंडल 

– संस्थापक- कृष्णदत्त पालीवाल (आर्य समाज के नेता श्रद्धानन्द सरस्वती के कहने पर) 

– तसीमो काण्ड – अप्रैल 1947 में प्रजामंडल के सदस्यों पर फायरिंग की गयी। छतरसिंह व पचंमसिंह

शहीद हो गए। 

–  डूगरपुर प्रजामंडल (26 जनवरी 1944) 

– स्थापनाः मोगीलाल पांड्या व हरिदेव जोशी ने की।

मेवाड़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- बलवंतसिंह मेहता (अध्यक्ष), भूरेलाल बया (उपाध्यक्ष) माणिक्य लाल वर्मा (महामन्त्री) 

– मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधियों पर रियासत ने पाबन्दी लगा दी। अतः माणिक्यलाल वर्मा ने अजमेर से

इसका संचालन किया। ‘मेवाड़ का वर्तमान शासन’ नामक पुस्तक माणिक्य लाल वर्मा ने लिखी। 

– 1941 ई में मेवाड़ प्रजामंडल का पहला अधिवेशन उदयपुर में हुआ। 

– माणिक्यलाल वर्मा इसके अध्यक्ष थे। 

– जे. पी. कृपलानी व विजयलक्ष्मी पंडित इसमें भाग लेने के लिए उदयपुर आए। 

– 1946 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का सातवां अधिवेशन उदयपुर में हुआ। ‘जवाहर लाल नेहरू’ व ‘शेख अब्दुल्ला ‘ इसमें भाग लेने के लिए उदयपुर आए। 

– भारत छोड़ो आंदोलन में माणिक्य लाल वर्मा की पत्नी नारायणी देवी वर्मा अपने 6 महीने के पुत्र दीनबन्धु को साथ लेकर जेल गयी। 

– प्यारे लाल बिश्नोई की पत्नी भगवती बिश्नोई भी जेल गयी थी। 

– भीलवाड़ा भी मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधयों का प्रमुख केन्द्र था। 

– भीलवाड़ा के रमेश चन्द्र व्यास मेवाड़ प्रजामंडल के पहले सत्याग्रही थे। 

– नाथद्वारा भी मेवाड़ प्रजामंडल का अन्य केन्द्र था।

शाहपुरा प्रजामंडल

– संस्थापक- लादूराम व्यास व रमेशचन्द्र ओझा। (माणिक्यलाल वर्मा के कहने पर) 

– शाहपुरा पहली रियासत थी, जिसमें पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना की गयी (गोकुल लाल असावा के

नेतृत्व में) 

– शाहपुरा के राजा ‘सुदर्शन देव’ ने प्रजामंडल को अपना समर्थन दिया।

करौली प्रजामंडल 

– संस्थापक- त्रिलोकचन्द माथुर, चिरंजी लाल शर्मा, कुंवर मदनसिंह। 

– कुंवर मदनसिंह ने 1927ई. में किसान आदोंलन चलाया।

अलवर प्रजामंडल 

– इसकी स्थापना हरिनारायण शर्मा ने की, इसके पहले अधिवेशन के अध्यक्ष भवानी शंकर शर्मा थे।

– अलवर प्रजामंडल ने भी भरत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया था। 

– हरिनारायण शर्मा ने वाल्मिकी संघ, आदिवासी संघ व अस्पृश्यता निवारण संघ स्थापित किए।

भरतपुर प्रजामंडल 

– स्थापना- जुगलकिशोर चतुर्वेदी ने रेवाड़ी में इसकी स्थापना की। 

– अध्यक्ष – गोपी लाल यादव – किशनलाल जोशी, मास्टर अदित्येन्द्र – भरतपुर प्रजा परिषद 

– प्रजामण्डल का समाचार पत्र- ‘वैभव’

कोटा प्रजामंडलः 

– संस्थापक- पण्डित नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि। 

– नयनूराम शर्मा ने कोटा राज्य में बेगार विरोधी आंदोलन चलाया।

( नयनूराम शर्मा ने 1934 में हाडौती प्रजामंडल की स्थापना की। )

– कोटा प्रजामंडल का पहला अधिवेशन मांगरोल (बारां) में हुआ था। 

– 1942 ई. नाथूलाल जैन तथा मोती लाल के नेतृत्व में प्रजामंडल के सदस्यों ने कोटा के प्रशासन पर कब्जा

कर लिया था। 

– कॉलेज की छात्राओं ने रामपुरा कोतवाली पर कब्जा कर लिया था।

किशनगढ़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- कांतिलाल चौथानी, जमाल शाह।

सिरोही प्रजामंडल 

– स्थापना- गोकुल भाई भट्ट ने बॉम्बे में की थी। गोकुल भाई भट्ट को राजस्थान का गांधी कहा जाता हैं।

कुशलगढ़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- भंवरलाल निगम।

बांसवाड़ा प्रजामंडलः 

– संस्थापक- भूपेन्द्र नाथ त्रिवेदी, मणिशंकर नागर, धूलजी भाई भावसार। 

– भूपेन्द्र नाथ त्रिवेदी बम्बई से ‘संग्राम’ नामक समाचार पत्र निकालते थे। 

– इस प्रजामंडल में एक महिला मंडल का गठन ‘विजया बहिन भावसार’ ने किया था।

डुगरपुर प्रजामंडल (1 अगस्त 1944) 

– संस्थापकः भोगीलाल पांड्या (वागड़ का गांधी), हरिदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय (समाचार पत्र- सेवक)

रास्तापाल कांड (19 जून 1947) – सेवा संघ द्वारा स्थापित स्कूल को बंद करवाने गये रियासत के सैनिकों ने एक शिक्षक नानाभाई की हत्या कर दी व दूसरे शिक्षक सेगांभाई को गाड़ी के पीछेकर घसीट रहे थे, तब एक कालीबाई नामक एक वीरबालिका ने अपनी हसिया से उन रस्सियों को काट दिया, पर खुद पुलिस की गोलियों की शिकार हो गयी। 

– डुंगरपुर में गेप सागर तालाब के पास कालीबाई तथा नानाभाई की प्रतिमा लगी हुयी हैं। 

– राजस्थान सरकार बालिका शिक्षा के क्षेत्र में कालीबाई के नाम से पुरस्कार देती हैं।

पूनावाडा काण्ड – अध्यापक शिवराम भील के साथ मारपीट।

– इस प्रजामंडल में रियासती अन्यायपूर्ण नीतियों के विरूद्ध जनजागृति हेतु प्रयाण सभाओं का आयोजन किया गया।

जैसलमेर प्रजामंडल 

– जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना मीठालाल व्यास ने जोधपुर में की। 

– प्रजामंडल के सदस्य सागरमल गोपा को जेल में जलाकर हत्या कर दी गयी।

प्रतापगढ़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- ठक्कर बापा, अमृतलाल पायक, चुन्नीलाल प्रभाकर।

झालावाड़ प्रजामंडल 

संस्थापक- मांगीलाल भव्य ने की। 

– झालावाड़ में स्वंय राजराणा हरिश्चन्द्र (राजा) के नेतृत्व में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना की गयी।

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1857 की क्रांति राजस्थान ( rajsthan Revolution of 1857 )

1832 ई. में A.G.G. (Agent to governer General) मुख्यालय ‘अजमेर’ में स्थापित किया गया। 

– राजस्थान के पहले A.G.G. ‘मि. लॉकेट’ थे। 

– 1845 ई. में इस मुख्यालय को ‘आबू’ स्थानान्तरित कर दिया गया। 

– 1857 ई. की क्रांति के समय यहां A.G.G. (Geogre Patrick Laurence) था। 

– Laurence इससे पहले मेवाड़ का ‘Political Agent’ रह चुका था। 

– राजस्थान में अग्रेजों की सैनिक छावनियां- नसीराबाद (अजमेर), नीमच (मध्यप्रदेश), एरिनपुरा (पाली) देवली (टोंक), खैरवाड़ा (उदयपुर), ब्यावर (अजमेर)। 

– ब्यावर व खेरवाड़ा सैनिक छावनियों ने क्रांति में भाग नहीं लिया।

नसीराबादः 

28 मई 1857 ई. में राजस्थान में सबसे पहले नसीराबाद की छावनी में विद्रोह हुआ। 

– 28 मई 1857 ई. को 15 वी. Netive Infantry के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 

– दो दिन बाद 30 वीं Native Infantry भी इनके साथ मिल गयी व सभी सैनिक दिल्ली की ओर कूच कर गए।

नीमचः 

– मोहम्मद अली बेग नामक एक सैनिकों ने कर्नल एबॉट के सामने अंग्रेजी राज के प्रति वफादार रहने की

कसम नहीं खायी। 

– 3 जून 1857 को हीरासिंह नाम के एक सैनिक के नेतृत्व में छावनी में विद्रोह हो गया। 

– नीमच छावनी से भागे 40 अग्रेजों को डूंगला गांव में रूघाराम नामक किसान ने शरण दी। 

– कैप्टन शावर्स इन्हें मुक्त करवाता हैं व उदयपुर महाराणा स्वरूपसिंह के पास भेज देता हैं। उदयपुर महाराणा ने इन्हें जगमंदिर महलों में रखा। 

– यहां से विद्रोही सैनिक शाहपुरा आते हैं, शाहपुरा का राजा इन्हें सहायता करता हैं। 

– शाहपुरा के राजा ने कैप्टन शावर्स का विरोध किया। 

– यहां से सैनिक निम्बाहेड़ा आए। (उस समय टोंक के अधीन था।) 

– निम्बाहेड़ा में इन्हें व्यापक जनसमर्थन मिलता हैं। निम्बाहेड़ा में देवली छावनी के सैनिक भी इनसे आकर जुड़ गये। यहां से सैनिक दिल्ली की ओर चले गये।

एरिनपुरा: 21 अगस्त 1857 ई. 

– 1835 ई. में जोधपुर लीजियन का गठन किया गया। इसका प्रमुख मुख्यालय एरिनपुरा को बनाया गया। 

– एरिनपुरा छावनी की पूर्विया सैनिकों की टुकड़ी को आबू भेजा हुआ था। वहीं पर उन्होंने विद्रोह कर दिया

और एरिनपुरा में आकर अपने बाकी साथियों के साथ मिल गए। छावनी को लूटकर ‘चलों दिल्ली मारो फिरंगी’ के नारे लगाते हुए दिल्ली की ओर चल पड़े। खैरवा (पाली) नामक स्थान पर इन्हें आउवा का ठाकुर कुशालसिंह चाम्पावत मिलता हैं, व विद्रोही सैनिकों को अपना नेतृत्व प्रदान करता हैं।

कुशालसिंह चम्पावतः 

– बिठौड़ा गांव के उत्तराधिकारी प्रश्न को लेकर कुशालसिंह ने बिठौड़ा के ठाकुर कानजी की हत्या कर दी थी, हत्या करने से यह जोधपुर राज का विद्रोही हो गया। 

– एरिनपुरा छावनी के सैनिकों के साथ जुड़ने से इसका यह विद्रोही अग्रेजों के विरूद्ध हो गया। 

(1) बिठौड़ा का युद्ध – 8 सितम्बर 1857। 

(2) चेलावास का युद्ध – 18 सितम्बर 1857। 

(3) आउवा का युद्ध:- 20 जनवरी 1858।

(1) बिठौड़ा का युद्ध 

कैप्टन हीथकोट + कुशलराज सिंघवी V/s कुशालसिंह 

– कुशालसिंह जीत गया तथा जोधपुर का किलेदार ओनाडसिंह पंवार मारा गया।

(2) चेलावास का युद्ध 

– इस काले – गोरे का युद्ध भी कहते हैं। 

– A.G.G. George Patirick Lawrence व जोधपुर का Political Agent मैकमेसन अंग्रेजी सेना का नेतृत्व करते हैं। इस युद्ध में भी कुशालसिंह जीत गया। 

– मैकमेसन के सिर को काटकर आउवा के किले पर लटका दिया गया।

(3) आउवा का युद्ध

– अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कर्नल होम्स व हंसराज जोशी कर रहे थे, जीत की आशा न देखकर कुशालसिंह

आउवा का भार अपने छोटे भाई पृथ्वीसिंह (लाम्बिया का ठाकुर) को सौपंकर मेवाड़ चला गया। 

– मेवाड़ में कोठरिया (नाथद्वारा) के रावत जोधसिंह के पास शरण लेता हैं और यहां से सलूम्बर के केसरी सिंह चूडांवत के पास चला जाता हैं। 

– आउवा में विद्रोही सैनिक हार जाते हैं, और आउवा की ईष्ट देवी सुगाली माता की मूर्ति ले जाते हैं, इसे

अजमेर के राजपूताना म्यूजियम में रखा। बाद में पाली के बांगड़ म्यूजियम में रखा गया था। 2014ई. में राजस्थान धरोहर संरक्षण तथा प्रोन्नति प्राधिकरण ने निर्णय लिया हैं कि इस मूर्ति को आउवा गांव में स्थापित किया जायेगा। 

कुशालसिंह का साथ देने वाले अन्य सामन्तः आलणियावास- अजीतसिंह, गूलर- बिशनसिंह, आसोप- शिवनाथसिंह – आउवा में हारने के बाद विद्रोही सैनिक शिवनाथसिंह के नेतृत्व में दिल्ली की ओर बढ़ते हैं। लेकिन नारनोल के पास गैर्राड की सेना से हार गये। 

– 1860 ई. में कुशालसिंह नीमच में अग्रेजों के सामने आत्मसर्पण कर देता हैं। 

– ‘टेलर कमीशन’ की जांच के आधार पर कुशालसिंह को बरी कर दिया गया।

कोटा में जनविद्रोहः– 

कोटा में वकील ‘जयदयाल’ व · रिसालदार मेहराब खां’ के नेतृत्व में क्रांति की गयी। (15 अक्टूम्बर 1857) – कोटा के पॉलिटिक्ल एजेन्ट बर्टन की हत्या कर दी गई।

– कोटा महाराव रामसिंह द्वितीय को नजरबंद कर लिया गया। 

– मथुराधीश मंदिर के महन्त कन्हैयालाल गोस्वामी व कोटा महाराव के बीच एक समझौता हुआ, बर्टन की हत्या के लिए स्वंय को जिम्मेदार ठहराने वाले परवाने पर कोटा महाराव ने हस्ताक्षर किए, जयदयाल को कोटा का प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। 

– करौली का शासक मदनपाल सेना भेजकर कोटा महाराव को मुक्त करवाता हैं। 

– इसके भी काफी दिनों बाद ‘जनरल राबर्टस’ कोटा को क्रांतिकारियों से मुक्त करवाता हैं। 

– अग्रेजों ने मेजर बर्टन की हत्या के लिए कोटा महाराव को निरपराध किन्तु उत्तरदायी घोषित किया। 

– कोटा महाराव की तोपों की सलामी 15 से घटाकर 11 कर दी गयी।

टोंक में विद्रोह 

– टोंक का नवाब वजीरूद्दौला अंग्रेजों का समर्थक था। परन्तु नवाब के मामा मीर आलम ने विद्रोहीयों का

साथ दिया। 

– नीमच छावनी के सैनिकों का निम्बाहेड़ा में स्वागत किया गया विद्रोहियों का पीछा करती कर्नल जैक्सन की सेना का ताराचन्द पटेल ने सामना किया। 

– टोंक में महिलाओं ने भी क्रांति में भाग लिया था। 

तात्यां टोपे और राजस्थान:

– तात्यां टोपे सबसे पहले मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) आया था। टोंक के नवाब के खिलाफ, नासीर मोहम्मद खां ने तात्यां टोपे का समर्थन किया। 

– बनास नदी के निकट हुये कुआड़ा युद्ध में तात्यां टोपे हार जाता हैं व हाड़ौती की तरफ चला जाता हैं। यहां पर झालावाड़ का राजा पृथ्वीसिंह तात्यां टोपे के विरूद्ध सेना भेजता हैं। ‘गोपाल पलटन’ को छोड़कर बाकी सेना ने युद्ध करने से मना कर दिया। 

– पलायता नामक स्थान पर हुये युद्ध में तात्या टोपे जीत जाता हैं व पृथ्वीसिंह को भागना पड़ता हैं। 

– थोड़े दिनों बाद अग्रेजों की मदद से ही पृथ्वीसिंह झालावाड़ पर पुनः अधिकार कर पाता हैं। 

– पृथ्वीसिंह ने तात्या टोपे को 5 लाख रूपये भी दिए। 

– सितम्बर 1857 ई. में तात्यां टोपे एक बार फिर बांसवाड़ा में आता हैं, सलूम्बर का रावत केसरीसिंह चूडांवत तात्यां टोपे की मदद करता हैं। 

– बीकानेर के राजा सरदारसिंह ने भी तात्यां टोपे को 10 घुड़सवारों की सहायता दी। 

– तात्यां टोपे को नरवर के जंगलों में (मानसिंह नरूका) ने गिरफ्तार करवा दिया। अग्रेजों ने तात्यां टोपे को फांसी दे दी। 

– सीकर के एक सामन्त को तात्यां टोपे को शरण देने के आरोप में फांसी दे गयी। सीकर में तात्या टोपे की छतरी

– तात्यां टोपे जैसलमेर को छोड़कर राजस्थान की बाकी सब रियासतों में गया था।

– बीकानेर का महाराजा सरदारसिंह एकमात्र शासक था, जो अपनी रियासत से बाहर जाकर लड़ा था। (हिसार के  ‘बाड़लू’ नामक स्थान पर) 

– अग्रेजों ने सरदारसिंह को टिब्बी परगने के 41 गांव दिए थे। 

– जयपुर के सवाई रामसिंह ने भी अग्रेजो का साथ दिया था। 

– अग्रेजो के विरूद्ध षड़यंत्र करने वालों को गिरफ्तार कर लिया था। 1. सादुल्ला खां 2. विलायत खां 3. उस्मान खां

– अग्रेजो ने रामसिंह को ‘सितार ए हिन्द’ की उपाधि दी व कोटपूतली परगना दिया।

– अलवर के राजा बनेसिंह के खिलाफ वहां के दीवान फैजल खान ने विद्रोहियों का साथ दिया। 

– धौलपुर के राजा भगवन्तसिंह को विद्रोहियों से मुक्त करवाने के लिए पटियाला से सेना आयी थी। यहां पर राव रामचन्द्र व हीरालाल के नेतृत्व में क्रांति हुई। 

– भरतपुर के राजा ने Political Agent मॉरीसन को भरतपुर छोड़ने का सुझाव दिया था। यहां की गुर्जर व मेव जनता विद्रोहियों के साथ हो गयी थी। 

– बीकानेर के अमरचन्द बांठिया 1857 की क्रांन्ति में राजस्थान के पहले ऐसे शहीद थे, जिन्हें फांसी दी गयी। ये ग्वालियर के नगरसेठ थे, इन्होनें खजाने का सारे धन क्रांतिकारियों में वितरित कर दिया। इन्हें क्रान्ति का भामाशाह कहा जाता हैं। 

– सूर्यमल्ल मिश्रण व बांकिदास ने अग्रेजों का साथ देने वाले राजाओं की निन्दा की।

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भरतपुर का जाट वंश ( History of Jat Dynasty of Bharatpur )

– 1667 ई. में मथुरा क्षेत्र के आस-पास के जाट किसानों ने औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह कर दिया था। इस विद्रोह का नेतृत्व ‘गोकुला’ नामक जाट किसान ने किया था। गोकुला को पकड़कर उसकी हत्या कर दी। 

– 1687 ई. में सिनसिनी का जमींदार राजाराम विद्रोह कर देता हैं। सिकन्दरा में अकबर के मकबरे को लूट लेता हैं, और अकबर की अस्थियों को निकालकर जला देता हैं। राजाराम के विद्रोह को भी दबा दिया जाता

चूडामण

– जाट राज्य की स्थापना की। थूण किले का निर्माण करवाया 

बदनसिंह 

– सवाई जयसिंह की सहायता से अपने भाई मोहकमसिंह को हराकर राजा बना। सवाई जयसिंह ने इसे डीग की जागीर तथा बृजराज की उपाधि दी। इसने डीग के किले का निर्माण करवाया।

सुरजमलः (1753-63) 

– सूरजमल को ‘जाटो का प्लेटों’ और ‘जाटों का अफलातून’ कहते हैं। 

– भरतपुर के किले का निर्माण करवाया व अपनी राजधानी बनाया। 

– पानीपत के तीसरे युद्ध में भागते हुये मराठा सैनिकों को भरतपुर में शरण देता हैं। 

– 1754 ई. में दिल्ली पर आक्रमण करता हैं, वहां से नूरजहां का झूला उठाकर लाता हैं। और इन झूलों को डीग के महलों में स्थापित करवाया। 

– डीग में जलमहलों का निर्माण करवाया। 

– सूरजमल एक आर्थिक विशेषज्ञ था, उसने भरतपुर की आर्थिक स्थिति सुधारने का अधिक प्रयास किया। 

– उसकी मृत्यु के समय 1763 ई. में भरतपुर राज्य की आय 175 लाख रू. सालाना थी। 

– सूरजमल ने भरतपुर में एक नवीन प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की, जिसमें पद का आधार योग्यता को बनाया गया। 

– भरतपुर में दीवान को ‘मुखत्यार’ कहते थे। 

– सूरजमल के दरबारी ‘मगंलसिंह पुरोहित’ रहें, जिन्होनें ‘सुजान संवत विलास’ नामक पुस्तक लिखी। का निर्माण करवाया। भरतपुर की आर्थिक 175 रू. सालाना हैं

जवाहरसिंह 

– 1774 ई. में दिल्ली पर आक्रमण करता हैं, व दिल्ली के किले से अष्ट धातुओं के बने दरवाजे लेकर आता हैं, इन्हें भरतपुर के किले में लगवाता हैं। ये दरवाजे मुल रूप से चित्तौड़ के किले में लगे हुये थे, जिन्हें अकबर चित्तौड़ अभियान के दौरान आगरा ले गया था, फिर औरंगजेब इन्हें आगरा से दिल्ली ले आता हैं। 

– जवाहरसिंह इस जीत के उपलक्ष्य में भरतपुर के किले में जवाहर बुर्ज का निर्माण करवाता हैं, जवाहर बुर्ज में भरतपुर के राजओं का राज तिलक किया जाता हैं।

रणजीतसिंह 

– 1803 ई. में दूसरे अंग्रेज-मराठा युद्ध के दौरान ‘जसवंत राव होल्कर’ को भरतपुर में शरण देता हैं। 

– अग्रेज सेनापति लॉर्ड लेक भरतपुर पर पांच आक्रमण करता हैं। लेकिन जीत नहीं पाता हैं। इसलिए भरतपुर

के किले को लोहागढ़ कहा जाता हैं। 

– कालान्तर में अग्रेजो के साथ संधि कर ली।

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करौली का इतिहास (यादव वंश) ( History of Karauli (Yadav dynasty )

– करौली में यादवों की ‘जादौन’ शाखा थी। 

विजयपाल 

– 1040 ई. में बयाना को जीतकर इसे अपनी राजधानी बनाता हैं। और यादवों की जादौन शाखा का शासन प्रारम्भ करता हैं। 

अर्जुनपाल: 

– कल्याणपुर नामक नगर की स्थापना करता हैं। 

धर्मपाल 

– कल्याणपुर का नाम करौली रखकर उसे अपनी राजधानी बनाता हैं। 

गोपालपाल

– करौली में ‘मदन मोहन जी का मंदिर’ बनवाता हैं। यह गौड़ीय सम्प्रदाय की राजस्थान की दूसरी प्रमुख पीठ

हरबक्शपाल 

– इसने अंग्रेजों के साथ 1817ई. में संधि कर ली। 

मदनपाल 

– 1857 ई. में क्रांति में कोटा महाराव की मदद की थी। अग्रेजो ने 17 तोपो की सलामी दी। 

– स्वामी दयानन्द सरस्वती सबसे पहले (राजस्थान में) करौली मदनपाल जी के निमत्रंण पर आए थे।

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जैसलमेर के भाटियों का इतिहास ( History of Bhatis of Jaisalmer )

– भाटी भगवान श्रीकृष्ण के वंशज हैं। 

– भाटी यदुवंशी होते हैं, इसलिए जैसलमेर के राजचिन्ह में ‘छत्राला यादवपति’ लिखा हुआ हैं। 

– 285 ई. में भट्टी ने भटनेर को अपनी राजधानी बनाया। भट्टी को ‘भाटियों का आदिपुरूष’ या भाटी राज्य का संस्थापक कहा जाता हैं। 

– भटनेर के कारण ही भाटियों को ‘उत्तर भड़ किवाड’ । उत्तरी सीमा का प्रहरी कहा गया।

मंगलरावः 

– राजधानी – तनोट ।

देवराजः – देवराज ने पंवारो से लोद्रवा छीनकर, लोद्रवा को अपनी राजधानी बनाया। 

– मूमल महेन्द्र की प्रेम कहानी में महेन्द्र अमरकोट का राजकुमार था तथा मूमल लोद्रवा की राजकुमारी थी।

जैसल

– 12 जुलाई 1155 ई. को जैसलमेर की स्थापना करता हैं। व इसे अपनी राधानी बनाता हैं। 

मूलराज 

– अलाउदीन खिलजी ने जैसलमेर पर आक्रमण किया इस समय जैसलमेर का पहला साका हुआ।

दुर्जनसालः 

– 1352 ई. में फिरोज तुगलक ने जैसलमेर पर आक्रमण किया। इस समय जैसलमेर का ‘दुसरा साका’ हुआ। 

लूणकरण:

– 1550 ई. में कंधार के अमीर अली ने आक्रमण किया। इस समय केसरिया तो किया गया लेकिन जौहर

नहीं हो पाया। इसलिए इसे आधा साका कहा जाता हैं। 

मूलराज द्वितीय 

– इसने अंग्रेजों के साथ 1818ई. में संधि कर ली थी। 

जवाहरसिंह 

– आधुनिक जैसलमेर का निर्माता। 

– जैसलमेर में डाक-तार व रेल व्यवस्था लागू की। 

– जैसलमेर में ‘विण्डम पुस्तकालय’ बनवाया।

इन्हीं के समय स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा को जेल में जिंदा जलाकर मार दिया गया। सागरमल गोपा की हत्या की जाँच के लिए गोपाल स्वरूप पाठक आयोग स्थापित किया गया। 

– सागरमल गोपा की पुस्तकें:- 1. आजादी के दीवाने 2. जैसलमेर का गुडाराज 3. रघुनाथसिंह का मुकदमा

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अलवर राज्य का इतिहास ( History of alwar state )

– यहां कछवाहा वंश की ‘नरूका शाखा’ का शासन था। 

– मिर्जा राजा जयसिंह ने कल्याणसिंह को माचेड़ी की जागीर दी। 

– 1774 ई. में बादशाह शाह आलम ने प्रतापसिंह को स्वतंत्र रियासत दे दी। 

– 1775 ई. में प्रतापसिंह ने भरतपुर से अलवर को छीनकर इसे अपनी राजधानी बनाया।

विनयसिंह

विनयसिंह ने अपनी माता ‘मूसी महारानी’ की याद में अलवर में 80 खम्भों की छतरी बनवायी। यह 2 मंजिला छतरी हैं, जिसकी दूसरी मंजिल पर रामायण व महाभारत के चित्र बनाए गए हैं 

– विनयसिंह की रानी का नाम ‘शीला’ था। इसने अपनी रानी के नाम पर सिलीसेढ़ झील बनवायी। 

– सिलीसेढ़ झील को ‘राजस्थान का नन्दनकानन’ कहते हैं।

जयसिंह 

– नरेन्द्र मंडल का नामकरण ‘जयसिंह’ ने किया था। 

– प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। 

– अलवर में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया। 

– ‘डयूक ऑफ एडिनबर्ग’ के अलवर आगमन पर सरिस्का पैलेस का निर्माण करवाया। 

– 10 दिसम्बर 1903 को बालविवाह व अनमेल विवाह पर रोक लगा दी। 

– तिजारा दंगो के बाद जयसिंह को हटा दिया गया, जयसिंह पेरिस चला गया व वहीं उसकी मृत्यु हो गयी।

तेजसिंह 

– आजादी के समय अलवर का शासक महात्मा गांधी की हत्या में इनकी संदिग्ध भूमिका थी, पर बाद में न्यायपालिका ने इन्हें क्लीन चिट दे दी।

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झालावाड राज्य का इतिहास ( History of Jhalawar State )

– 1837 ई. में ‘जालिमसिंह झाला’ के पोते मदनसिंह ने झालावाड़ में एक झाला राज्य की स्थापना की। 1838 ई. में अंग्रेजों ने इसे मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार झालावाड़ राजस्थान की सबसे अंतिम रियासत थी।

इसकी राजधानी झालरापाटन थी। झालरापाटन चन्द्रभागा नदी के किनारे हैं इसे घंटियों का शहर कहा जाता हैं। 

– यहां के राजराणा राजेन्द्रसिंह ने झालावाड़ के मंदिरों को हरिजनों के लिए खुलवा दिया था।

आमेर के कछवाहों का इतिहास 

– भगवान राम के छोटे बेटे कुश के वंशज कुशवाहा कहलाए, जा कालान्तर में कछवाहा हो गया। 

– नरवर से ‘दुल्हराय’ दौसा आता हैं, व दौसा में बडगुर्जरों को हराकर कछवाहा शासन की स्थापना करता हैं ये घटना 1137 ई. की है। 

– कालान्तर में रामगढ़ में मीणाओं को हराकर इसे अपनी राजधानी बनाता हैं। 

– यहां अपनी कुलदेवी जमवाय माता का मंदिर बनवाता हैं और इसका नाम जमवारामगढ़ रख दिया। 

– दुल्हराय का वास्तविक नाम ‘तेजकरण’ था।

* काकिल देव – 1207 में. मीणा शासकों को आमेर में हराकर वहां आमेर पर अधिकार कर लिया और राजधानी जमवारामगढ़ से आमेर ले आता हैं।

* भारमलः 

– 1562ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा अपनी बेटी हरखा बाई (मरियम उज्जमानी) की शादी

सांभर में अकबर के साथ की। मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाला तथा वैवाहिक सम्बन्ध बनाने वाला

राजस्थान का पहला राजा था। 

* भगवंतदास 

– सरनाल युद्ध में मिर्जा विद्रोह को दबाया अतः अकबर ने नगाड़ा व परचम देकर सम्मानित किया। 

– अपनी बेटी मानबाई (शाहे बेगम) की शादी जहांगीर के साथ की। खुसरो इसी का बेटा था। मानबाई ने

जहांगीर की शराब की आदतो से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। 

* मानसिंह 

– 14 फरवरी 1590 को मानसिंह का राज्याभिषेक किया गया। मानसिंह को 5000 का मनसबदार बनाया। जो बाद में बढ़कर 7000 का हो गया। 

– अकबर ने इसे बंगाल, बिहार व काबूल का सुबेदार बनाया। 

बिहार – बिहार में सूबेदारी के दौरान मानपुर नगर बसाता हैं।

बंगाल बंगाल में अकबरनगर नामक शहर बसाता हैं, जिसे वर्तमान में हम राजमहल कहते हैं। 

– पूर्वी बंगाल के राजा केदार को हराकर शिला माता की मूर्ति लेकर आता हैं तथा इसने आमेर में शिला

माता का मंदिर बनवाया। 

दरबारी विद्वान 1. ‘पुण्डरीक विट्ठल’

1. रागमाला 2. राग मंजरी 3. राग चन्द्रोदय 4. नर्तन निर्णय 

– मानसिंह ने आमेर के महलों का निर्माण शुरू करवाया। 

– आमेर में जगत शिरोमणि मंदिर बनवाया, इस मंदिर का निर्माण मानसिंह की रानी कनकावती ने अपने बेटे जगतसिंह की याद में बनवाया। 

– इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की वही मूर्ति लगी हुयी हैं, जिसकी मीरा चित्तौड़ में पूजा किया करती थी। 

– वृदांवन में राधा-गोविन्द का मंदिर बनवाया। 

* मिर्जा राजा जयसिंह (1621-1667 ई.) 

– सबसे अधिक समय तक शासन करने वाला जयपुर का राजा (46 वर्ष) 

– जहांगीर ने इसे दक्षिण में मलिक अम्बर के खिलाफ भेजा था। 

– शाहजहां ने इसे मिर्जा राजा की उपाधि दी व काबुल अभियान पर भेजा। 

– जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह को भी औरंगजेब की तरफ यही लेकर आता हैं। औरंगजेब ने इसे दक्षिण में शिवाजी को नियंत्रित करने के लिए भेजा। 

– 11 जून 1665 – पुरन्दर की संधि- 

शिवाजी V/s जयसिंह 

– मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में हिन्दी के प्रख्यात कवि ‘बिहारी जी’ थे- पुस्तक- बिहारी सतसई – ‘कुलपति मिश्र’ (बिहारी जी के भान्जे) इन्होनें लगभग 52 ग्रन्थों की रचना की थी, जिनसे हमे जयसिंह के दक्षिण अभियानों की जानकारी मिलती हैं। 

– जयपुर में जयगढ़ किले का निर्माण करवाया। 

* सवाई जयसिंह (1700-1743 ई.) 

– सर्वाधिक सात मुगल बादशाहों के साथ काम किया। 

– औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में हुये उत्तराधिकार संघर्ष में इन्होनें शहजादे आजम का पक्ष लिया था। चूंकि जीत मुअज्जम (बहादुरशाह) की हुयी, जो बादशाह बनते ही उसने सवाई जयसिंह आमेर के राजा पद से हटा दिया। इसके छोटे भाई विजयसिंह को राजा बना दिया। 

– आमेर का नाम बदलकर इस्लामाबाद या मोमिनाबाद रख दिया।

– 1741 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव के साथ धौलपुर समझौता करता हैं। जयसिंह ‘मालवा’ का 3 बार सूबेदार बना। 

– जयसिंह ने अश्वमेध यज्ञ करवाया, इसका पुरोहित ‘पुण्डरीक रत्नाकर’ था। 

– अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को दीपसिंह कुम्भाणी ने पकड़ लिया व अपने 25 आदमियों के साथ लड़ता हुआ

मारा गया। 

– सवाई जयसिंह के निर्माण कार्य

– 1. 18 नवम्बर 1727 ई.- जयपुर की स्थापना- वास्तुकार- विद्याधर भट्टाचार्य (पुर्तगाली ज्योतिषी जेवियर .

डि सिल्वा की मदद ली गई।) 

2. नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़) 

3. जलमहल (मानसागर झील) 

4. सिटी पैलेस (चन्द्र महल) 

5. गोविन्ददेव जी का मंदिर (गौड़िय सम्प्रदाय का प्रमुख मंदिर) – जयपुर के शासक खुद को गोविन्द देव जी का दिवान मानते थे। 

6. जन्तर-मन्तर (वैधशाला)- (1) दिल्ली- सबसे पहले (2) जयपुर – सबसे बड़ा- राजस्थान की पहली इमारत जिसे युनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया। (3) मथुरा (4) उज्जैन (5) बनारस। 

– सवाई जयसिंह के दरबारी विद्वान :- (1) पुण्डरीक रत्नाकर- जयसिंह कल्पद्रुम (2) पण्डित जगन्नाथ

युक्लिड ज्यामिति का संस्कृत अनुवाद किया, सिद्धान्त सम्राट तथा सिद्धान्त कौस्तुभ नामक पुस्तकें लिखी। 

– सवाई जयसिंह ने स्वयं ‘जयसिंह कारिका’ नामक ग्रन्थ लिखा। 

– नक्षत्रों की शुद्ध सारणी ‘जीज मुहम्मद शाही’ तैयार करवाई। 

– सवाई जयसिंह ने सती प्रथा पर रोक लगाने की कोशिश की।

ईश्वरीसिंह 1743-1750 ई. तक। 

– राजमहल का युद्ध (1747ई.):

– (बनास नदी के पास) (टोंक).

ईश्वरीसिंह V/s माधोसिंह – (सूरजमल – भरतपुर महाराजा)

(जगतसिंह द्वितीय – मेवाड़) (बूंदी नरेश – उम्मदेसिंह) (कोटा राजा – दुरजनसाल)

(मराठे) – इस युद्ध में ईश्वरीसिंह जीतता हैं। इस जीत के उपलक्ष्य में ईसरलाट (सरगासूली) का निर्माण करवाता हैं। 

– बगरू का युद्ध(1748ई):

– ईश्वरीसिंह V/s माधोसिंह – इस युद्ध में ईश्वरीसिंह हार जाता हैं, उसे मराठों को युद्ध हर्जाना व माधोसिंह को पांच परगने देने पड़े। 

– मराठों द्वारा युद्ध हर्जाने के लिए तंग करने पर ईश्वरीसिंह ने आत्महत्या कर ली।

* माधोसिंह 

– 1751 ई. में मराठों (5000) का कत्ले आम करवाया जयपुर में। 

– काकोड का युद्ध (टोंक) (1759ई.) 

– माधोसिंह ने इस युद्ध में मराठों को हराया। 

– भटवाड़ा का युद्ध (कोटा) (1761ई.) 

– माधोसिंह V/s शत्रुशाल (कोटा) 

– रणथम्भौर पर अधिकार के लिए प्रश्न पर। 

– इस युद्ध में माधोसिंह की हार होती हैं। 

– कोटा का सेनापति जालिमसिंह झाला था। 

– 1763 ई. में माधोसिंह ने सवाई माधोपुर की स्थापना की। 

– मोतीडूंगरी के महल बनवाए। 

– चाकसू में शीतला माता का मंदिर बनवाया।

प्रतासिंह (1778-1803 ई.) 

– 1. तुंगा का युद्ध (1787 ई.) 

– जयपुर के प्रतापसिंह व जोधपुर का विजयसिंह, दोनों मिलकर मराठों के महादजी सिन्धिया को हराते हैं। 

 – 2. पाटन का युद्ध (1790) 

– इस युद्ध में मराठों ने प्रतापसिंह को पराजित किया। इस युद्ध में मराठा सेनापति, एक फ्रांसीसी ‘डी-बोय’ था। 

– 3. मालपुरा का युद्ध 1800ई.। 

– इस युद्ध में मराठों ने जयपुर के प्रतापसिंह व जोधपुर के भीमसिंह की सयुंक्त सेना को हराया। 

– प्रतापसिंह एक अच्छा लेखक था, ‘बृजनिधि’ नाम से कविताएं लिखा करता था। 

– प्रतापसिंह ने एक संगीत सम्मेलन बुलवाया। जिसकी अध्यक्षता देवर्षि बृजपाल भट्ट ने की थी, जिसमें ‘राधा गोविन्द संगीत सार’ ग्रंथ लिखा गया। 

– प्रतापसिंह के संगीत गुरू का नाम चांदखां था, प्रतापसिंह ने इसे ‘बुद्ध प्रकाश’ नामक उपाधि थी। 

– चांद खां ने ‘स्वर सागर’ ग्रन्थ की रचना की। 

– प्रतापसिंह के दरबार में 22 विद्वान रहते थे, जिन्हें गन्धर्व बाईसी या प्रताप बाईसी कहते थे। प्रतापसिंह ने विद्वानों के लिए ‘गुणीजन खाना’ की स्थापना की। प्रतापसिंह ने ‘हवामहल’ का निर्माण करवाया, यह एक पांच मंजिला इमारत हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट के समान हैं। इसमें 953 झरोखे हैं।

– पांच मंजिल

 – 1. शरदमंदिर 

2. रत्न मंदिर 

3. विचित्र मंदिर 

4. प्रकाश मंदिर

 5. हवा मंदिर – हवा महल का वास्तुकार – लालचन्द

जगतसिंह (1803-1818 ई. तक) 

– 1818ई. में अग्रेजो के साथ संधि करता हैं। 

– जगतसिंह की प्रेमिका का नाम ‘रस कपूर’ था। यह शासन कार्यो में हस्तक्षेप करती थी।

रामसिंह (1833-1880 ई. तक) 

– ‘जॉन लुडलो’ को रामसिंह का संरक्षक व जयपुर का प्रशासक बनाया गया। 

– जॉन लुडलों ने 1844 ई. में समाधि प्रथा व कन्या वध पर रोक लगायी। 

– 1845 ई. सत्ती प्रथा पर रोक लगायी 

– 1847 ई. मानव व्यापार पर रोक लगायी। 

– रामसिंह ने जयपुर में गुलाबी रंग करवाया था। 

– ‘प्रिंस अल्बर्ट’ के जयपुर आगमन पर 1876 ई. में अल्बर्ट हॉल की नींव रखी गयी, इसका वास्तुकार ‘स्टीवन जैकब’ था। इसी समय रामनिवास बाग बनवाया गया। कला के विकास के लिए 1857 ई. में ‘मदरसा – ए – हुनरी’ की स्थापना की। कालान्तर में इसका नाम बदलकर Rajasthan School of Arts and Crafts कर दिया गया। 

– 1866 ई. में ‘क्रान्तिचन्द मुखर्जी’ ने एक महिला विद्यालय खोला, यह किसी भी रियासत में महिला शिक्षा का पहला कदम था। यहां बालिकाओं को सिलाई सिखाई जाती थी। 

– महाराजा कॉलेज व संस्कृत कॉलेज की स्थापना की।

माधोसिंह द्वितीय 

– इसे बब्बरशेर कहते हैं। 

– मनमोहन मालवीय को B.H.U. के लिए 5 लाख रूपये दिये थे। 

– नाहरगढ़ में अपनी नौ दासियों के लिए एक जैसे 9 महल बनवाये। 

– 1904 ई. में सबसे पहले ‘डाक टिकट व पोस्टकार्ड व्यवस्था’ लागू की जो रियासतों में किया गया पहला प्रयास था। 

– सिटी पैलेस में मुबारक महल बनवाया।

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चौहानों का इतिहास ( History of Chauhans )

चौहानों की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मतः 

(1) चन्दबरदाई, सूर्यमल्ल मीसण व मुहणौत नैणसी :

– के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ के अग्नि कुंड से हुयी। 

– चौहान, चालुक्य (सौलंकी), प्रतिहार, और परमार इन चारों जातियों की उत्पत्ति अग्नि कुंड से मानी जाती हैं। 

(2) जेम्स टॉड, विलियम क्रुक :- के अनुसार चौहान विदेशी हैं। 

(3) 1170 ई. के बिजौलिया भीलवाड़ा (शिलालेख) के अनुसार चौहानों की उत्पति वत्स गौत्रीय ब्राह्मणों से हुयी।

– बिजौलिया शिलालेख, बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर में लगा हुआ हैं। इस पर अंकित बिजौलिया प्रशस्ति की रचना गुणभद्र ने की थी। 

– राजस्थान के विभिन्न नगरों के प्राचीन नाम भी इससे प्राप्त होते हैं। 

(4) दशरथ शर्मा- चन्द्रवंशी। 

(5) गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा- सूर्यवंशी।

* चौहानों का मल निवास स्थान:

– सपादलक्ष क्षेत्र (सांभर के आस-पास का क्षेत्र) 

– इनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। 

– चौहानों की कुल देवी – आशापुरा माता 

(1) वासुदेवः– 551 ई. में चौहान राज्य की स्थापना की। 

– वासुदेव को चौहानों का आदिपुरूष कहत हैं। 

– बिजौलिया शिलालेख के अनुसार इसने सांभर झील का निर्माण करवाया। 

(2) गूवक:- चौहान प्रारम्भ में प्रतिहारों के सामन्त थे, गूवक ने प्रतिहार शासक नागभट् द्वितीय की अधीनता मानने को अस्वीकार कर दिया। तथा इस प्रकार गूवक ने एक पूर्ण स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। 

(3) चन्दराज – पत्नी का नाम – रूद्राणी (आत्मप्रभा)- यौगिक क्रिया में निपुण महिला। 

– रूद्राणी प्रतिदिन पुष्कर झील में 1000 दीप जलाकर भगवान शिव की पूजा करती थी। 

(4) अजयराज – 1113 ई. में अजमेर नगर की (पृथ्वीराज विजय के अनुसार) स्थापना करता हैं। 

– अजमेर का किला बनवाया। 

– अपनी रानी सोमलेखा के नाम के सिक्के चलाये। 

(5) अर्णोराज – अर्णोराज ने अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया। 

– पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया। 

(6) विग्रहराज चतुर्थ(1153-1163ई.) 

– इसके शासनकाल को सपादलक्ष के चौहानों का स्वर्णकाल कहते हैं। 

– इन्होनें तोमरों से ढिल्लिका (दिल्ली) छीन ली। इसने दिल्ली-शिवालिक स्तम्भ लगवाया। – इसमें अजमेर में ‘सरस्वती कंठाभरण नामक’ संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया। अपने नाटक हरिकेली की पक्तियां इस पाठशाला की दीवारों पर खुदवायी। कालान्तर में कुतुबद्दीन ऐबक ने इस पाठशाला को

तोड़कर एक मस्जिद बनवा दी, जिसे हम अढाई दिन का झोपड़ा के नाम से जानते हैं। 

उपाधियां – बीसलदेव, कवि बान्धव, बीसलपर नगर व बीसलपुर तालाब का निर्माण करवाया। तालाब के किनारे एक भगवान शिव का मंदिर बनवाया। 

– दरबारी सोमदेव ने ललित विग्रहराज नामक पुस्तक लिखी। 

– नरपति नाल्ह ने ‘बीसलदेव रासो’ नामक पुस्तक लिखी। यह गौड़वाड़ी बोली में लिखी गई रचना हैं। यह

बोली पाली की बाली तहसील से लेकर जालौर की आहोर तहसील के मध्य क्षेत्रों में बोली जाती हैं। 

(7) पृथ्वीराज तृतीय (1177-1192 ई.) 

– पिता का नाम ‘ सोमेश्वर । 

– माता का नाम – कर्पूरी देवी (दिल्ली के शासक अनगपाल तोमर की पुत्री) 

– प्रारम्भ में माता कर्पूरी देवी उसकी संरक्षिका बनी, क्यों पृथ्वीराज तृतीय बाल्यावस्था में शासक बने थे। 

– अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह का दमन करता हैं। – भंडानको को हराता हैं। 

– 1182 ई. में तुमुल के युद्ध में महोबा के चन्देल शासक परमारर्दिदेव को हराता हैं। 

– इस युद्ध में परमार्दिदेव चन्देल के दो सेनानायक आल्हा व ऊदल लड़ते हुए मारे गये थे, जो आज भी वहां के लोकगीतों में गाये जाते हैं। 

– 1187 ई. में चालुक्य शासक भीन द्वितीय पर आक्रमण करता हैं। 

– पर दोनों के बीच संधि हो जाती हैं। चौहान (पृथ्वीराज) 

– गहड़वाल (जयचन्द) वैमनस्यः – दिल्ली के उत्तराधिका के प्रश्न तथा संयोगिता के अपहरण के कारण दोनों में मनमुटाव था। 

तराइन का प्रथम युद्ध :- 1191 ई. 

– पृथ्वीराज चौहान V/s मोहम्मद गौरी 

– तात्कालिक कारणः मोहम्मद गौरी द्वारा तबरहिन्द (भटिण्डा) पर अधिकार 

– इसमें पृथ्वीराज का सेनापति चामुण्डराय था।

– इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान जीतता हैं। 

तराइन का द्वितीय युद्धः 1192 ई. 

– इस युद्ध में सेनापति चामुण्डराय भाग नहीं लेता हैं। 

– पृथ्वीराज इस युद्ध में हार जाता हैं। सिरसा (हरियाणा) के पास बंदी बनाकर मार दिया जाता हैं। 

– पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली के पास पिथौरागढ़ का निर्माण करवाया। 

– उपाधि- 

1. ‘राय पिथौरा’ 

2. दल पुंगल (विश्व विजेता) 

  • दरबारी (पृथ्वीराज के दरबार में।) 

1. चन्दबरदायी (वास्तविक नाम पृथ्वीराज भट्ट)- ‘पृथ्वीराज रासौ’ 

2. जयानक- ‘पृथ्वीराज विजय’ 

3. विद्यापति गौड़ 

4. जनार्द्धन 

5. वागीश्वर – पृथ्वीराज चौहान ने एक कला व संस्कृति मंत्रालय की स्थापना की तथा इसका मंत्री पद्मनाभ को बनाया। 

– कैमास व भुवनमल्ल इसके प्रमुख मंत्री थे। 

– मोइनुद्दीन चिश्ती इसी के समय भारत आये थे। 

– तराइन के दोनों युद्धो का विस्तृत विवरण कवि चन्द्र बरदाई के पृथ्वीराज रासौ, हसन निजामी के ताजुल 

– मासिर एवं मिन्हास उस् सिराज के ‘तबकात – ए – नासिरी’ में मिलता हैं।

रणथम्भौर के चौहानों का इतिहास 

– पृथ्वीराज चौहान के बेटे गोविन्दराज ने 1194 ई. में रणथम्भौर में चौहान राज्य की स्थापना की। 

– हम्मीर (1282-1301 ई.) – हम्मीर ने कोटि यज्ञ का आयोजन करवाया। इस यज्ञ का पुरोहित विश्वरूपम् थे। 

– जलालुद्दीन खिलजी के रणथम्भौर आक्रमण को हम्मीर विफल कर देता हैं। इस विफलता के बाद जलालुद्दीन खिलजी ने कहा था कि

– ‘ऐसे 10 किलों को मैं मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता’ हूँ। 

– गुजरात आक्रमण के दौरान अलाउदीन की सेना में विद्रोह हो जाता हैं। 

– विद्रोही मंगोल नेता मुहम्मद शाह तथा केहब्रू हम्मीर के पास चले जाते हैं। 

– उलुग खान व नुसरत खान (अलाउद्दीन के सेनापति) ने रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया। नुसरत खान मारा गया। तब अलाउदीन एक बड़ी सेना लेकर खुद रणथम्भौर पर घेरा डालता हैं। रणमल व रतिपाल नामक दो विश्वासघातियों की वजह से हम्मीर को किले के फाटक खोलने पड़े, रणथम्भौर के किले में 

पहला साका हुआ। – हम्मीर की पत्नी रंगदेवी के नेतृत्व में जौहर किया गया। 

– हम्मीर की पुत्री ‘देवल दे’ इस जौहर से एक दिन पूर्व रणथम्भौर किले के पद्म तालाब में कूदकर आत्महत्या कर लेती हैं। (जल जौहर) । 

– रणथम्भौर का साका 1301 ई. में हुआ था। यह राजस्थान का पहला शाका था। 

– हम्मीर ने अपने जीवनकाल में 17 युद्ध लड़े थे जिनमें से 16 में वो विजयी रहा। 

– अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षीय शासनकाल की याद में रणथम्भौर के किले में 32 खम्भो की छतरी बनवायी। 

– बीजादित्य नामक विद्वान हम्मीर के दरबार में रहता था। 

– हम्मीर को हठ व शरण देने वालों के रूप में याद किया जाता हैं।

“सिंह गमन, सत्पुरूष वचन, कदली फलै इक बार। तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढे न दूजी बार” देने वालों के परम रहता था।

जालौर के चौहानों का इतिहास 

– ऋषि जावालि की तपोभूमि होने के कारण इसे जाबालिपुर कहते थे, जो कालान्तर में जालौर हो गया। 

– जाल वृक्षो की अधिकता होने के कारण इसे जालौर कहा गया। 

– जालौर का किला सोनगिरि (सुवर्णगिरी) नामक पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण यहां के शासक सोनगरा चौहान कहलाए। 

Note– स्वर्णगिरी का किला / सोनार का किला – जैसलमेर – 1182 ई. में कीर्तिपाल ने जालौर में चौहानों की सोनगरा शाखा की स्थापना की। 

– इसने चित्तौड़ के सामंतसिंह को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। कान्हड़देव सोनगरा 

– 1308 ई. में अलाउदीन ‘जालौर की कुंजी’ सिवाणा पर आक्रमण करता हैं। ‘सातल व सोम’ (कान्हड़देव के भतीजे) के नेतृत्व में सिवाणा में साका किया गया। यह सिवाणा का पहला साका था। 

– ‘भायल सैनिक’ ने विश्वासघात किया था। 

– अलाउदीन सिवाणा का नाम ‘खैराबाद’ कर देता हैं। 

– 1311 ई. में अलाउदीन जालौर पर आक्रमण कर देता हैं। अलाउदीन का सेनापति कमालुदीन गुर्ग होता हैं। 

– ‘बीका दहिया’ नामक आदमी ने किले का रास्ता बताकर विश्वासघात किया। जब इस विश्वासघात की सूचना बीका दहिया की पत्नी को मिली, तब उसने अपने विश्वासघाती पति को मार दिया। 

– कान्हडदेव व वीरमदेव के नेतृत्व में साका किया गया।

अलाउदीन ने जालौर पर अधिकार कर लिया और जालौर का नाम जलालाबाद कर दिया। 

– जालौर में अलाउदीन ने ‘अलाई मस्जिद’ का निर्माण करवाया। 

– अलाउदीन की पुत्री ‘फिरोजा’ वीरमदेव (कान्हड़देव का पुत्र) से प्यार करती थी। 

– फिरोजा की धाय माँ ‘गुल विहिश्त’ थी। 

– 1311 ई. युद्ध की जानकारी पद्मनाभ द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘कान्हड़दे प्रबन्ध’ तथा ‘वीरमदेव सोनगरा री

बात’ में मिलता हैं।

सिरोही के देवडा चौहानों का इतिहास 

– लुम्बा ने 1311 ई. में आबू व चन्द्रावती को जीतकर चौहानों के देवड़ा शाखा की स्थापना की। 

– चन्द्रावती को अपनी राजधानी बनायी। 

– सहसमल ने 1425 ई. में सिरोही की स्थापना कर सिरोही को अपनी राजधानी बना ली। 

– अखैराज देवड़ा – खानवा के युद्ध में राणा सांगा की तरफ से भाग लेता हैं। 

– इसे उड़ना अखैराज के नाम से जानते हैं। 

– सुरताण देवडा – अकबर के खिलाफ दत्ताणी का युद्ध किया (1583ई.)। प्रताप के छोटे भाई जगमाल ने अकबर की तरफ से भाग लिया था। 

– दुरसा आढ़ा ने राव सुरताण रा कवित नामक पुस्तक लिखी। 

– शिवसिंह – 1823 ई. में अंग्रेजों के साथ संधि कर लेता हैं। 

– अंग्रेजों के साथ संधि करने वाली सिरोही अंतिम रियासत थी।

बंदी के हाडा चौहानों का इतिहास 

– बूंदी में पहले मीणा शासकों का अधिकार था। बून्दा मीणा के नाम पर ही इसका नाम बूंदी पड़ता हैं। 

– कुम्भा के ‘रणकपुर अभिलेख’ में बूंदी का नाम वृन्दावती भी मिलता हैं। 

– 1241 ई. में देवा हाड़ा ने जैता मीणा को हराकर बूंदी पर अधिकार कर लिया। 

– 1274 ई. में जैत्रसिंह ने कोटा को जीत लेता हैं। 

– 1354 ई. में बरसिंह ने बूंदी के तारागढ़ किले का निर्माण करवाया। 

– तारागढ़ का किला भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। 

– रावसुरजन – 1569 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार कर देता हैं। 

– द्वारिका में ‘रणछोड़ जी का’ मंदिर बनवाता हैं। 

चन्द्रशेखर– 

(1) हम्मीर हठ 

(2) सुरजन चरित्र * बुद्धसिंह – इसने ‘नेहतरंग’ नामक पुस्तक लिखी। 

– इसके शासन काल में सबसे पहले मराठों का हस्तक्षेप होता हैं। इसके पुत्र दलेलसिंह व उम्मेदसिंह के बीच उत्तराधिकार संघर्ष हुआ जिसमें सवाई जयसिंह ने दलेलसिंह का तथा मराठों ने उम्मदेसिंह का पक्ष लिया। 

– जयपुर के राजा सवाई जयसिंह की बहन अमर कंवर की शादी बुद्धसिंह के साथ हुयी। अमरकंवर ने मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर को उम्मदेसिंह के पक्ष में बुलाया

विष्णुसिंह – इसने 1818ई. में अंग्रेजों से संधि कर ली।

कोटा के हाडा चौहानों का इतिहास 

– 1631 ई. में बुंदी के राजा राव रत्नसिंह के पुत्र माधोसिंह ने कोटा राज्य की स्थापना की। 

* मुकुन्दसिंह – धरमत के युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया। 

– इसने कोटा में अबली मीणी का महल बनाया। 

* भीमसिंह – इसने फर्रुखसियर के कहने पर बूंदी पर अधिकार कर लिया। 

बुंदी का नाम फर्रूखाबाद कर दिया। 

– खींचियों (चौहानों की एक शाखा) से गागरोन छीन लिया। 

– भगवान श्रीकृष्ण के भक्त होने के कारण कोटा का नाम नन्दग्राम कर दियां 

– बारा में ‘सावंरिया जी का मंदिर’ बनवाया। 

* उम्मेदसिंह – इसने अंग्रेजो से संधि कर ली। 

– संधि की मुख्य शर्तेः

1. उम्मेदसिंह व उसके वंशजो का कोटा पर अधिकार बना रहेगा। 

2. जालिमसिंह झाला व उसके वशंज पूर्ण अधिकार सम्पन्न दीवान बने रहेंगे। (पूरक संधि)

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