महाद्वीप की सर्वोच्च चोटियां ( Continent’s highest peaks )

महादेशचोटीऊंचाई (मी. में)देश
एशिया माउंट एवरेस्ट 8,848नेपाल
द. अमेरिका माउंट अकांकागुआ6,960 अर्जेटीना
उ. अमेरिकामाउंट मिकिनले6,194अलास्का
अफ्रीकामाउंट किलिमंजारो5,895तंजानिया
यूरोपमाउंट एल्ब्रस5,663रूस
अंटार्कटिका माउंट विंसन5,140अंटार्कटिका
ऑस्ट्रेलियामाउंट कोसीजको2,230ऑस्ट्रेलिया
Share this page

महाद्वीप ( Continent )

सात महाद्वीपों को उनके आकार व क्षेत्रफल के अनुसार निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है : 

1. एशिया 

2. अफ्रीका 

3. उत्तर अमेरिका 

4. दक्षिण अमेरिका 

5. अंटार्कटिका 

6. यूरोप 

7. ऑस्ट्रेलिया

एशिया

जनसंख्या व क्षेत्रफल दोनों की दृष्अि से यह विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप है। 

मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं और चोटियां : हिमालय, काराकोरम, कुनलुन, हिन्दुकुश, तिएनशान, एलब्रूज, अल्तई, टॉरस, सुलेमान, उरल 

उच्चतम चोटी : माऊंट एवरेस्ट (8847 मीटर), नेपाल 

मुख्य नदियां : यांग्टेज, हांग, अमुर, लेना, ऑब, येकूग, येनिसई, ईर्टीश, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, इरावदी इरावदी नदी को म्यांमार की जीवन रेखा माना जाता है। ह्यांग हो नदी को चीन का शोक कहा जाता है। 

प्रमुख झीलें : अराल, बैकल, बल्काश, तुंगाटिंग, टोनले साप 

प्रमुख मरूस्थल : गोबी, टकला माकन, कारा-कुम, थार, काइजलकुल 

खनिज स्रोत : कोयला, लौह, मैगनीज, टिन, एंटिमनि, सोना म्यांमार को पर्वतों व नदियों का देश कहा जाता है । 

यह सुंदर बौद्ध मंदिर पैगोडा के लिए जाना जाता है और इसे सोने के पैगोडा का देश भी कहते हैं। पाकिस्तान को नहरों का देश कहते हैं।

बांग्लादेश को नदियों व सहायक नदियों का देश कहते हैं। 

तुर्की को यूरोप का सिकमैन कहा जाता है। 

लेबनान को मध्यपूर्व का स्विट्जरलैण्ड कहते हैं। 

भूटान को थंडर ड्रैगन का देश कहते हैं। 

थाईलैंड को सफेद हाथियों का देश कहते हैं। 

दक्षिण कोरिया को प्रातः प्रशांत मंडल (Land of morning calm) का देश कहते हैं। 

जापान को उगते सूर्य (Land of rising sun) का देश कहते हैं। 

ओसाका को जापान का मैनचेस्टर कहा जाता है।

अफ्रीका

यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है और यूरोप से तीन गुना बड़ा है। 

यह विषुवतरेखा के दोनों ओर फैला हुआ है। 

यह एकमात्र महादेश है जहां से कर्करेखा व मकर रेखा दोनों गुजरती हैं।

मुख्य पर्वत और चोटियां : किलिमंजारो, रूवेनजोरी, एटलस, ड्रकेन्सबर्ग, तिबेस्टी मस्सिफ। 

मुख्य नदियां : नील, कांगो, निगर, जाबेजी, ऑरेंज, कसाई, लिम्पोपो, सेनेगल।

मुख्य मरुस्थल : उत्तर में सहारा (विश्व का सबसे बड़ा), दक्षिण में कालाहारी और नामिब । 

खनिज स्रोत : सोना, हीरा, बॉक्साइट, तांबा, लौह अयस्क, कोबाल्ट, मैग्नीज, यूरेनियम, शीशा, जिंक, एस्बोसिऑस, फॉस्फेट । 

विश्व में उच्चतम तापमान अल-आजीजिया (लीबिया) में 58°

सेंटीग्रेड दर्ज किया गया है जो इसे विश्व का सबसे गर्म स्थान बनाता है। 

नील विश्व की सबसे लंबी नदी है। इसकी दो सहायक नदियां ब्लूनील व व्हाइट नील हैं | 

ब्लूनील इथीयोपिया में ठाना झील से निकलती है जबकि व्हाइट नील यूगांडा के अल्बर्ट झील से निकलती है। ब्लूनील व व्हाइट नील खातूंम (सूडान की राजधानी) में मिलती हैं व वहां से आगे नील के नाम से बहती हैं। एक बड़ा डेल्टा बनाते हुए यह भूमध्य सागर में गिरती है। 

शुतुरमुर्ग कालाहारी मरूस्थल में पाया जाने वाला कम उड़ने व तेज दौड़ने वाला पक्षी है। यह दक्षिण अमेरिका के री व ऑस्ट्रेलिया के एम्यू के समान होता है। 

कोकोआ अफ्रीका की महत्त्वपूर्ण फसलों में से एक है और घाना व नाइजीरिया कोकोआ के सबसे बड़े उत्पादक हैं। 

दक्षिण अफ्रीका सोना (विश्व का 47%), हीरा (विश्व का 95%) और प्लेटिनम का सबसे बड़ा उत्पादक है, जोहांसबर्ग व विटवाटर्सरैण्ड सोने के लिए व किम्बरले हीरे के लिए प्रसिद्ध है। 

झांबीबार विश्व में लवंग (clove) का सबसे बड़ा उत्पादक है। दूसरा स्थान पेम्बा द्वीप का है।

उत्तर अमेरिका

उत्तर अमेरिका आकार में एशिया के आधे से भी कम है।

पर्वत श्रृंखलाएं : द रॉकी (4800 किमी. से अधिक में फैला), अलास्का श्रृंखला, सिएरा माद्रे, सेंट इलियास 

मुख्य नदियां : मिसौरी, मिसिसिप्पी, यूकोन, रियो ग्रांदे, अर्कान्सास, कोलोराडो, लाल, सेंट लॉरेंस 

मुख्य झीलें : सुपीरियर, हुरॉन, मिशिगन, ग्रेटबीयर, ग्रेट स्लेव, विन्निपेग, ओन्टारियो । 

खनिज स्रोत : कोयला, लौह अयस्क, पेट्रोलियम, सोना, चांदी, तांबा न्यूफाउंडलैण्ड के समीप ग्रांड बैंक मछली पकड़ने के लिए प्रसिद्ध है। मछलियों की मुख्य प्रजातियों टुना और सलमान हैं। 

न्यूयार्क को गगनचुम्बी इमारतों का शहर कहा जाता है। हाटर्सफील्ड जैक्सन अटलांटा अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट (अटलांटा, अमेरिका) विश्व का व्यस्ततम एयरपोर्ट है। 

शिकागो रेल जंक्शन विश्व का व्यस्ततम रेल जंक्शन है। 

उत्तर अमेरिका विश्व के कुल गेहूं के 1/5 का उत्पादन करता है। अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र गेहूं और मक्का के लिए प्रसिद्ध है। इन्हें विश्व की रोटी की टोकरी कहते हैं।

दक्षिण अमेरिका

दक्षिण अमेरिका चौथा सबसे बड़ा महाद्वीप हैं | यह आकार में त्रिभुजाकार है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी एंडीज पर्वत श्रृंखला है जो पूरे महाद्वीप में फैली है।

मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं : एंडीज (उच्चतम चोटी अकांकागुआ), ब्राजीलियन हाईलैण्ड, गुआना हाईलैण्ड । 

मुख्य नदियां : अमेजन, पराना, सैन फ्रांसिस्को, ओरिनोको, रियो निग्रो, परग्वे, उरुग्वे, ला प्लाटा

मुख्य मरुस्थल : दक्षिण में अटकामा 

मुख्य झीलें : मराकैबो, टिटिकाका, मिरिम 

खनिज संसाधन : पेट्रोलियम, लौह अयस्क, चांदी, सोना, तांबा, टिन, शीशा, जिंक 

अमेजन के विषुवतीय वर्षा वन महोगनी जैसी लकड़ियों के भण्डारगृह हैं |  साथ विश्व की सबसे हल्की लकड़ी बाल्सा भी इन्हीं वनों से आती है। 

दक्षिण अमेरिका (अमेजन बेसिन) रबर के पेड़ों का केन्द्र है। करनौबा पाम ट्री (ब्राजील), सिनकोना बार्क (कुनैन दवा में प्रयुक्त) और चिकल (च्चींगम में प्रयुक्त) दक्षिण अफ्रीका के विषुवतीय वर्षा वनों के उत्पाद हैं। 

दक्षिण अमेरिका, मैस्किको, केन्द्रीय अमेरिका और वेस्ट इंडीज को संयुक्त रूप से लैटिन अमेरिका कहते हैं।

यूरोप

मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं : कौकासस, आल्प्स, पाइरीनिज, नवादा 

मुख्य नदी : वोल्गा, डेन्यूब, निएपर, डॉन, पेकोरा, निएस्टर, राइन

मुख्य झील : लडोगा, ओनेगा, वनीर खनिज संसाधन : कोयला, लौह अयस्क, पारा, बॉक्साइट ग्रेट ब्रिटेन : स्कॉटलैण्ड, वेल्स और इंग्लैण्ड को एकसाथ ग्रेट ब्रिटेन कहा जाता है। 

यूनाइटेड किंगडम : ग्रेट ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैण्ड को संयुक्त रूप से यूनाइटेड किंगडम कहते हैं। 

एंटवर्प (बेल्जियम) विश्व का हीरों के व्यापार का सबसे बड़ा केन्द्र फिनलैण्ड को झीलों का देश कहा जाता है। 

यूके का डागर बैंक मछली पकड़ने के लिए प्रसिद्ध है।

ऑस्ट्रेलिया

मुख्य नदी : मरे (2500 किमी) सबसे लंबी नदी है।  इसकी सहायक नदियां डार्लिंग व मर्रमविड्गी हैं। 

खनिज संसाधन : सोना, चांदी, कोयला, लौह अयस्क, शीशा, जिंक बॉक्साइड, तांबा, यूरेनियम और टंगस्टन मैकडोनल और मस्प्रेव श्रृंखला केन्द्रीय ऑस्ट्रेलिया में है।

तस्मानिया सागर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड को पृथक करता है। 

ऑस्ट्रेलिया विश्व में बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक है।

अंटार्कटिका

1820 में इसकी खोज हुई थी। 

अंटार्कटिका पहुंचने वाला प्रथम व्यक्ति रोआल्ड अमुदसेन था। 

यह विश्व के बारे में और अधिक जानने का वैज्ञानिकों को अद्वितीय अवसर प्रदान करता है। इसलिए इसे महाद्वीप कहते हैं | 

यह एकमात्र महाद्वीप है जो पूर्णतः जमा हुआ है। इसलिए इसे सफेद महादेश के रूप में जाना जाता है।

Share this page

विश्व जल परिवहन ( world water transport )

महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग

1. उत्तर अटलांटिक समुद्री मार्ग : यह उत्तर-पूर्वी अमेरिका और उत्तर-पश्चिमी यूरोप को जोड़ती है। यह विश्व की व्यस्ततम समुद्री मार्ग है और इसे बिग ट्रंक रूट कहते हैं। 

2 भूमध्यसागर-हिन्द महासागार मार्ग : यह समुद्री मार्ग सैद बंदरगाह, अदेन, मुम्बई, कोलंबो और सिंगापुर से होकर गुजरता है। यह व्यापारिक मार्ग अत्यधिक औद्योगीकृत पश्चिमी यूरोपीय क्षेत्र को पश्चिम अफ्रीका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड की वाणिज्यिक कृषि और पशुपालन अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ता है। 

3. केप ऑफ गुड होप समुद्री मार्ग : यह अटलांटिक मध्यसागर से जाने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण समद्री मार्ग है जो पश्चिम यूरोपीय व पश्चिम अफ्रीकी देशों को दक्षिण अमेराक में ब्राजील, अर्जेंटिना और उरुग्वे से जोड़ता है। 

4 उत्तर प्रशांत गुड होप समुद्री मार्ग : यह समुद्री मार्ग उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों को एशिया से जोड़ता है। ये बंदरगाह हैं वैनकुवर, सीएटल, पोर्टलैंड, सन फ्रांसिस्को और लॉस एंजिल्स जो अमेरिका की तरफ हैं और योकोहामा, कोबे, संघाई, हांगकांग, मनीला और सिंगापुर जो एशिया की तरफ है। 

5. दक्षिण प्रशांत समुद्री मार्ग : यह समुद्री मार्ग पश्चिम यूरोप और उत्तरी अमेरकिा और बिखरे हुए प्रशांत द्वीपों को पनामा नहर के माध्यम से जोड़ता है।

परिवहन नहरें

1. वोल्गा प्रणाली : यह विश्व की एक बड़ी जलप्रवाह प्रणाली है जिसके अंतर्गत 11,200 किमी नौगम्य जलमार्ग उपलब्ध है। वोल्गा-मास्को नहर द्वारा मास्को क्षेत्र को इससे जोड़ा गया है। 

2. पनामा नहर : इस नहर को पनामा भूसंधि को काट कर बनाया गया है। यह प्रशांत महासागर और कैरेबियन सागर को जोड़ती है। इसके प्रशान्त तट पर पनामा तथा कैरेबियन तट पर कोलोन पत्तन अवस्थित है। यह 72 किमी लंबी नहर न्यूयार्क व सैन फ्रांसिस्कों के बीच की दूरी 13000 किमी कम कर देती है। 

3 स्वेज नहर : यह विश्व की सबसे बड़ी नौगम्य नहर है जो भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है। इस पर सबसे उत्तरी पत्तन पोर्ट सईद तथा दक्षिणतम पत्तन पोर्ट स्वेज है। फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डिनार्ड डे लसेप ने इस नहर के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह नहर जो 1869 में पूरी हुई, नील नदी के बेसिन के निचले हिस्से को सिनाई प्रायद्वीप से पृथक करती है। इस नहर के सबसे उत्तर में स्थित बंदरगाह पोर्ट सेड और दक्षिणी किनारे पर स्थित बंदरगाह स्वेज है। मध्य में पोर्ट फॉड, पोर्ट टॉफिक और इस्मालिया महत्त्वपूर्ण बंदरगाह हैं। 162 किमी लंबी यह नहर मिस्र की सरकार द्वारा 1956 में राष्ट्रीयकृत की गई। 

4 कील नहर : यह पश्चिमी जर्मनी में उत्तरी सागर को बाल्टिक सागर से जोड़ती है। 

5. स्टालिन नहर/श्वेत बाल्टिक नहर : बाल्टिक सागर को आर्कटिक सागर से जोड़ती है। 

6 राइन-मेन-डेन्युब नहर : यह उत्तरी सागर को काला सागर से जोड़ती है। 

7. सू नहर : यह नहर उत्तरी अमेरिका की सुपीरियर झील को घूरन झील से मिलाती है। 

8. एरी नहर : यह अमेरिका में इरी और ह्यूरन झील को जोड़ती है। 9. वेलेन्ड नहर : यह एरी और ओन्टारियों झीलों के बीच की दूरी कम करती है।

Share this page

विश्व के संसाधन ( World resources )

खनिज संसाधन एवं उत्पादक देश

लौह अयस्क 

मुख्य अयस्क : मैग्नेटाइट, हेमेटाइट, लिमोनाइट, सिडेराइट एवं पायराइट। 

प्रमुख खनन केन्द्र 

  • पूर्व सोवियत संघ–क्रिवॉ राग (यूक्रेन), मैग्निटोगोर्क पर्वत
  • तथा कुजनेत्स (रूस) 
  • ब्राजील-मिनास जैरास प्रान्त की इटाबिरा पहाड़ियां 
  • चीन-मंचुरिया, शान्तुंग, शान्सी
  • अमेरिका-सुपीरियर झील प्रदेश (मेसाबी रेंज) 
  • ऑस्ट्रेलिया-पिलबारा क्षेत्र
  • स्वीडन-किरूना व गैलीबार क्षेत्र
  • दक्षिण अफ्रीका-पोस्टमासवर्ग क्षेत्र, ट्रांसवाल

प्रमुख उत्पादक देश चीन, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, रूस, भारत 

मैंगनीज

मुख्य अयस्क-पाइरोल्युसाइट, साइलोमेलीन, ब्रोनाइट 

प्रमुख खनन केन्द्र

  • पूर्व सोवियत संघ–निकोपोल (यूक्रेन) एवं चैतुरा 
  • ब्राजील-अमापा क्षेत्र 
  • गैबोन-माओड खान 
  • दक्षिण अफ्रीका-पोस्टमासवर्ग, किम्बरले

प्रमुख उत्पादक देश  चीन, दक्षिण अफ्रीका, गैबन

तांबा

मुख्य अयस्क : चेल्कोपाइराइट, चेल्कोसाइट, बोनाईट, क्यूप्राइट, मैचेलाइट व एजुराइट 

प्रमुख खनन केन्द्र 

  • चिली–चुक्वीकमाटा पर्वत 
  • अमेरिका–एरिजोना प्रांत, मोताना प्रांत का बूटी क्षेत्र
  • कनाडा-ओंटारियो का सैडबरी जिला 
  • आस्ट्रेलिया माउंट मोरगन व माउंट ईसा 
  • जायरे-कटंगा क्षेत्र
  • दक्षिण अफ्रीका ट्रांसवाल, केप प्रान्त 

प्रमुख उत्पादक देश • चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, इण्डोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया 

एल्युमिनियम

मुख्य अयस्क-बॉक्साइट 

प्रमुख खनन केन्द्र • 

  • ऑस्ट्रेलिया-केपयार्क प्रायद्वीप, वाइपा क्षेत्र
  • अमेरिका-अरकन्सास राज्य का सेलाइन काउंटी क्षेत्र 
  • जमैका-सेंट एलिजाबेथ व सैंटमेरी क्षेत्र 
  • पूर्व सोवियत संघ–कोला प्रायद्वीप 
  • गिनी-बोको व बरूका द्वीप
  • दक्षिण अफ्रीका-उत्तर नटाल प्रान्त 

प्रमुख उत्पादक देश (बॉक्साइट) • ऑस्ट्रेलिया, चीन, ब्राजील, भारत

सोना 

प्रमुख खनन केन्द्र

  • दक्षिण अफ्रीका-जोहान्सवर्ग की विटवासरैंड पहाड़ी में, बोक्सवर्ग व ओरेंज फ्री स्टेट, किम्बरले 
  • अमेरिका-साल्ट लेक क्षेत्र व अलास्का 
  • ऑस्ट्रेलिया-माउंट मोरगन, कालगूर्ली व कूलगार्डी

प्रमुख उत्पादक देश • चीन, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका

चांदी • 

मुख्य अयस्क-अगेंटाइट 

प्रमुख खनन केन्द्र

  • मैक्सिको-चिहुआहुआ, हिल्डाहो 
  • कनाडा-ओंटारियो, ब्रिटिश कोलंबिया, क्यूबेक
  • अमेरिका-उटाह, मोंटाना, एरीजोना, कोलोरेडो 
  • ऑस्ट्रेलिया-माउंट ईसा, कालगूर्ली, ब्रोकेन हिल 
  • बोलीविया-पोटोसी
  • दक्षिण अफ्रीका-ट्रांसवाल व नटाल प्रान्त 

प्रमुख उत्पादक देश • मैक्सिको, पेरू, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया

टिन • 

मुख्य अयस्क-कैसेटेराइट 

प्रमुख खनन केन्द्र • 

  • मलेशिया-सेलांगोर, पेनांग द्वीप, जेलुबु घाटी
  • इंडोनेशिया-बांका, मलक्का जलसन्धि 
  • चीन-युन्नान, हुन्नान प्रान्त
  • म्यांमार-शान पठार, कायिन्नी पठार

प्रमुख उत्पादक देश • चीन, इंडोनेशिया, पेरू

सीसा • 

मुख्य अयस्क-गैलेना

प्रमुख खनन केन्द्र

  • ऑस्ट्रेलिया-ब्रोकेन हिल, माउंट ईसा (क्वीन्सलैंड) 
  • कनाडा-सैडबरी
  • पेरू-सेरा-डी-पास्को 

प्रमुख उत्पादक देश

ऑस्ट्रेलिया, चीन, अमेरिका

जस्ता

मुख्य अयस्क-कैलेमीन 

प्रमुख खनन केन्द्र

  • ऑस्ट्रेलिया-ब्रोकेन हिल व माउंट ईसा
  • कनाडा-ब्रिटिश कोलंबिया 

प्रमुख उत्पादक देश ऑस्ट्रेलिया, चीन, कनाडा हीरा 

प्रमुख खनन केन्द

  • दक्षिण अफ्रीका–किम्बरले (जोहांसवर्ग), केपटाउन 
  • जायरे-कटंगा पठार
  • भारत-पन्ना व गोलकुंडा की खानें 

प्रमुख उत्पादक देश

ऑस्ट्रेलिया, कांगो रिपब्लिक, बोत्सवाना

प्रमुख खनन केन्द्र

  • अमेरिका-अप्लेशियन कोयला क्षेत्र 
  • पूर्व सोवियत संघ-डोनेट्ज बेसिन (यूक्रेन), कुजनेत्स्क बेसिन, करगंडा 
  • चीन-शांसी, शेन्सी, जेचवान बेसिन ऑस्ट्रेलिया न्यू साउथ वेल्स, क्वीनसलैंड व विक्टोरिया प्रान्त
  • जर्मनी-रूर बेसिन व वेस्टाफिलिया क्षेत्र 
  • दक्षिण अफ्रीका-ट्रांसवाल व नटाल प्रान्त 

प्रमुख उत्पादक देश • चीन, अमेरिका, भारत पेट्रोलियम

प्रमुख खनन केन्द्र

  • सं. रा. अमरीका-अप्लेशियन क्षेत्र, गल्फ तटीय क्षेत्र, कैलिफोर्निया क्षेत्र
  • सऊदी अरब-दम्माम, घावर व धहरान (रासांतुरा में तेल शोधन केन्द्र) 
  • कुवैत-बुरघान पहाड़ी (विश्व का वृहतम् संचित भंडार) 
  • ईरान-लाली, करमशाह, नफ्त सफिद, हफ्ज फेल, गच सारन 
  • पूर्व सोवियत संघ-वोल्गा-यूराल क्षेत्र, बाकू क्षेत्र
  • इराक-किरकुक, मोसुल बसरा, तिकरित
  • वेनेजुएला-मराकैबो झील प्रदेश, ओरिनिको बेसिन व अपूरे बेसिन 

प्रमुख उत्पादक देश • सऊदी अरब, रूस, अमेरिका, ईरान प्राकृतिक गैस प्राकृतिक गैस एवं खनिज तेल एक ही स्थान पर मिलते हैं। 

इसके अलावा प्राकृतिक गैस कुछ मात्रा में स्वतंत्र रूप में भी पाई जाती है।

 विश्व में स्वतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रकुल के पास प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा संचित भंडार है। 

प्रमुख उत्पादक देश • रूस, अमेरिका, कनाडा

परमाणु खनिज • 

मुख्य स्रोत-यूरेनियम तथा थोरियम 

मुख्य खनन केन्द्र

  • कनाडा-अथाबस्का झील तथा ग्रेट बियर झील के पास क्रमशः यूरेनियम सिटी तथा पोर्ट रेडियम 
  • सं. रा. अमेरिका-कोलरैडो का पठार 
  • द. अफ्रीका-विटवाटर्सरैंड पहाड़ी
  • जायरे-कटंगा पठार 

प्रमुख उत्पादक देश • ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, जायरे

विश्व के प्रमुख औद्योगिक केंद्र

देश औद्योगिक केंद्रउद्योग
Share this page

विश्व कृषि ( World agriculture )

विश्व की प्रमुख फसलें एवं उनके उत्पादक देश

फसलेंउत्पादक देश
चावलचीन, भारत, इण्डोनेशिया, बंग्लादेश, वियतनाम, थाईलैण्ड
गेहूंचीन, भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन
जौरूस, जर्मनी, कनाडा
जई/ओटरूस, कनाडा, अमेरिका
मक्काअमेरिका, चीन, ब्राजील, मैक्सिको
तिलहनअमेरिका, चीन, भारत
सोयाबीनअमेरिका, ब्राजील, चीन
गन्नाभारत, ब्राजील, थाईलैण्ड, चीन
चुकन्दरफ्रांस, जर्मनी, अमेरिका
चायभारत, चीन, श्रीलंका
कहवाब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया
कपासचीन, अमेरिका, भारत, पाकिस्तान
तम्बाकूचीन, अमेरिका, भारत, ब्राजील
रबड़थाईलैण्ड, इण्डोनेशिया, मलेशिया, भारत, चीन
कोकोआआइवरी कोस्ट, कोस्टारिका, इक्वाडोर
दलहनभारत, ब्राजील, चीन

विश्व की स्थानांतरण कृषि

नामक्षेत्र
कोनूको वेनेजुएला
रोकाब्राजील
कैंगिनफिलीपींस
तुंग्या म्यांमार
चेन्नाश्रीलंका
लेदांग जावा तथा मलेशिया
तमराई थाईलैंड
हुमाइण्डोनेशिया तथा जावा
रेवियतनाम तथा लाओस
तावीमेडागास्कर

कृषि के कुछ वैज्ञानिक शब्द

1. विटीकल्चर : अंगूरों की कृषि 

2. पीसीकल्चर/एक्वाकल्चर : मत्स्यपालन 

3. सेरीकल्चर : मलबेरी पेड़ों के साथ रेशम उत्पादन 

4. हॉर्टीकल्चर : विभन्न फलों का उत्पादन 

5. ओलिवीकल्चर : जैतून की कृषि 

6. आरबोरीकल्चर : विभन्न प्रकार के वृक्षों तथा झाड़ियों की कृषि 

7. एपीकल्चर : मधुमक्खीपालन 

8. फ्लोरीकल्चर : फूलों की कृषि 

9. सिल्वीकल्चर : वनों के संवर्द्धन व संरक्षण से संबंधित क्रिया 

10. वेजीकल्चर : दक्षिण पूर्व एशिया में आदिम मान द्वारा की गई प्रारंभिक कृषि 

11. नेमरीकल्चर : एक आदिम कृषि जिसमें जड़, तना, फल व फूल इकट्ठा किए जाते थे। 

12. ओलेरीकल्चर : सब्जियों की कृषि 

13. मेरीकल्चर : समुद्री जीवों (झांगा, आइस्टर आदि) के उत्पादन की क्रिया 

14. हॉर्सीकल्चर : उन्नत प्रजाति के घोड़ों व खच्चरों का पालन 

15. वर्मीकल्चर : केंचुआ पालन

16. मोरीकल्चर : शहतूत की कृषि (रेशम पालन के लिए) 

17. एरीपोनिक : पौधों को हवा में उगाना 

18. पोमोलॉजी : फल विज्ञान

पशुपालन

दुग्ध एवं दुग्ध उत्पाद 

  • भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है।
  • दूध के अन्य उत्पादक : अमेरिका, कनाडा, रूस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड। 

मांस 

  • मांस मुख्यतः गाय, बैल, भैंस, बकरी, तथा सुअर से प्राप्त किया जाता है। अर्जेन्टीना, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, आदि देश मांस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं । 
  • ये मांस उत्पादन में विश्व में क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान रखते हैं।

ऊन 

  • भेड़, बकरी, ऊंट, लामा, आदि से प्राप्त किये जाते हैं। 
  • उत्पादन की मात्रा व गुणवत्ता की दृष्टि से भेड़ का ऊन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 
  • ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, अर्जेन्टीना व दक्षिण अफ्रीका ऊन उत्पादन और निर्यात की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण देश हैं। 
  • भेड़ पालन के लिए शुष्क और शीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है, जहां छोटी-छोटी घासें उगती हैं। 
  • ऑस्ट्रेलिया के मर्रे-डार्लिंग बेसिन में पाली जाने वाली ‘मेरिनो’ भेड़ें सर्वश्रेष्ठ कोटि का ऊन प्रदान करती हैं।
Share this page

समुद्र विज्ञानं ( Oceanography )

महासागर और समुद्र

पृथ्वी पर व्याप्त विशाल जलीय भाग को चार महासागरों में विभक्त किया गया है : 

(क) प्रशान्त महासागर 

(ख) अटलांटिक महासागर 

(ग) हिन्द महासागर 

(घ) आर्कटिक महासागर 

विभिन्न समुद्र, खाड़ियां, गर्त और उपखाड़ियां आदि इन्हीं महासागरों के भाग हैं। 

पृथ्वी की सतह का 70 प्रतिशत से अधिक भाग महासागरों द्वारा घिरा हुआ है। 

ये सौर ऊर्जा के लिए बचत कोष की भांति कार्य करते हैं। ग्रीष्म ऋतु एवं दिन में अतिरिक्त सौर उर्जा को संचित कर जाड़े में एवं रात में उसकी क्षतिपूर्ति करते हैं। 

अपने व्यापक सतह के कारण सौर ऊर्जा का लगभग 71 प्रतिशत भाग प्राप्त करते हैं। 

सौर ऊर्जा के अवशोषण से समुद्र की ऊपरी परत अपेक्षाकृत अधिक गर्म हो जाता है जिससे इसके घनत्व में कमी आती है। 

विषुवतीय क्षेत्रों में समुद्री सतह ध्रुवीय क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा गर्म होती है। 

समुद्री क्षेत्रों में धात्विक एवं अधात्विक पदार्थों जैसे-पेट्रोलियम, गैसें, लवण, मैंगनीज, सोना, हीरा, लोहा आदि का अपार भंडार है। 

ब्रोमीन और सल्फर, जो सतह पर बहुत विरले पाये जाते हैं, का बहुत बड़ा भंडार सागरीय क्षेत्रों में है। 

समुद्र से लगभग 90 प्रकार से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। 

इनमें महत्वपूर्ण है : तरंग ऊर्जा, वायु ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि ।

महासागरीय नितल उच्चावच

महासागरों के तल विश्व की सबसे बड़ी पर्वत शृंखलाओं, सबसे गहरी खाड़ियों और सबसे बड़े मैदानों से बने हुए हैं। महासागरों के तल की सही मैपिंग सोनार (Sound Navigation and Ranging) की सहायता से संभव हुई है। सागरीय नितल में चार प्रमुख उच्चावच मण्डल पाये जाते हैं :

(क) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shell) 

(ख) महाद्वीपीय मग्न ढाल (Continental Slope) 

(ग) गहरा सागरीय मैदान (Abyssal Plain) 

(घ) महासागरीय गर्त (Ocean’s Deep)

महाद्वीपीय मग्नतट

महाद्वीपों का किनारे वाला वह भाग जो कि महासागरीय जल में डूबा रहता है, उस पर जल की औसत गहराई 100 फैदम (1 फैदम = 6 फीट) तथा ढाल 10 से 3° के बीच होती है, महाद्वीपीय मग्नतट कहलाता है। 

महाद्वीपीय मग्नतट का विस्तार महाद्वीपों की तटरेखा से महाद्वीपीय किनारे तक होता है। 

महाद्वीपीय मग्नतट का छिछलापन सूर्य के प्रकाश को पानी के पार जाने में सक्षम बनाता है जिससे छोटे पौधे और अन्य सूक्ष्म जीवों के विकास को सहायता मिलती है। 

इसलिए ये प्लवकों (Plankton) से समृद्ध होते हैं जहां पर सतह और तल से भोजन लेने वाली लाखों मछलियां आती हैं। 

समुद्री खाद्य लगभग पूरी तरह से महाद्वीपीय मग्नतट से आता है। 

महाद्वीपीय मग्नतट विश्व के सबसे समृद्ध मत्स्य क्षेत्र हैं जैसेन्यूफाउंडलैण्ड का ग्रैण्ड बैंक, उत्तरी सागर का डोगर बैंक और दक्षिण पूर्वी एशिया का सण्डा सेल्फ | 

ये मग्नतट खनिजों के प्रचुर भण्डार हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैसों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इन्हीं से आता है।

महाद्वीपीय ढाल

जलमग्न तट तथा गहरे सागरीय मैदान के बीच तीव्र ढाल वाले मण्डल को ‘महाद्वीपीय मग्न ढाल’ कहा जाता है। 

यह 200-3500 मीटर तक लंबी होती है। समस्त सागरीय क्षेत्रफल के 8.5% भाग पर मग्न ढाल पाये जाते

इस क्षेत्र में दर्रे (Canyons) और खाइयां (Trenches) पाई जाती हैं।

गहरे सागरीय मैदान

सागरीय मैदान महासागरीय नितल का सर्वाधिक विस्तृत मण्डल होता है, जिसकी गहराई 3000 से 6000 मीटर तक होती है। 

समस्त महासागरीय क्षेत्रफल के लगभग 75.9% भाग पर सागरीय मैदान का विस्तार पाया जाता है।

महासागरीय गर्त

महासागरीय गर्त महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं जो महासागरीय नितल के लगभग 7% भाग पर फैले हैं। 

विश्व की सबसे गहरी गर्त मरियाना ट्रेंच है जो कि पश्चिम प्रशान्त महासागर में फिलिपीन्स के पास स्थित है।

महासागरीय उच्चावच

प्रशान्त महासागर (The Pacific Ocean)

यह सबसे बड़ा महासागर है।

 यह पृथ्वी की सम्पूर्ण सतह के एक तिहाई भाग पर फैला हुआ है। 

आकार में यह पृथ्वी के सम्पूर्ण स्थलीय भाग से भी अधिक है। 

इसका आकार लगभग त्रिभुजाकार है जिसका शीर्ष बेरिंग जलसन्धि की ओर उत्तर में अवस्थित माना जा सकता है। 

यह सबसे गहरा महासागर भी है। 

इस सागर का अधिकांश भाग औसतन 7300 मीटर गहरा है। 

20,000 से अधिक द्वीप इस महासागर में अवस्थित हैं। 

महासागर में अवस्थित ये द्वीप प्रवालभित्ति तथा ज्वालामुखी द्वारा बने हुए हैं। 

उत्तरी प्रशान्त महासागर सबसे गहरा भाग है तथा इस भाग की औसत गहराई 5000-6000 मीटर के बीच है। 

मरियाना गर्त 10,000 मीटर से अधिक गहरी है। 

यह विश्व की सर्वाधिक गहरी गर्त है जिसे चैलेंजर ट्रेंच भी कहते हैं।

अटलाटिक महासागर (TheAtlantic Ocean)

इसकी तटरेखा सबसे लंबी है। यह आकार में लगभग प्रशांत महासागर का आधा है तथा पृथ्वी के कुल सतह का छठा भाग घेरे हुए है। 

यह अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर ‘S’ के आकार में है। 

इसी महासागर में सर्वाधिक मग्नतट पाये जाते हैं। 

हडसन की खाड़ी, बाल्टिक सागर और उत्तरी सागर मग्नतट इसमें अवस्थित हैं।

अटलांटिक महासागर की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसमें पाया जाने वाला मध्य अटलांटिक कटक है। 

यह उत्तर से दक्षिण तक महासागर के समानान्तर ‘S’ आकार में फैला हआ है। 

अजोर्स द्वीप, केप वर्ड द्वीप, पीको द्वीप आदि इसके उदाहरण हैं। 

कुछ प्रवाल द्वीप भी हैं, जैसे—बरमूडा द्वीप और ज्वालामुखीय द्वीप। इसके अलावे सेंट हेलेना, ट्रिस्टन डा कुन्हा, गफ आदि ज्वालामुखी द्वीप हैं। 

नोट : लब्रोडोर धारा कनाडा के उत्तरी तट से होकर बहती है और गर्म गल्फ धारा से मिलती है। इन दो धाराओं का मिलन, जिनमें एक गर्म व एक ठंडी है, न्यूफाउंडलैण्ड के गिर्द प्रसिद्ध गाँग का निर्माण करती है। इन धाराओं के मिलन से विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण मत्स्य क्षेत्र बनते हैं। इसमें उत्तर-पश्चिम अटलांटिक का ग्रैंड बैंक क्षेत्र शामिल हैं।

हिन्द महासागर (The Indian Ocean)

भारतीय प्रायद्वीप के दोनों किनारों पर स्थित दो खाड़ियां बंगाल की खाड़ी और अरब सागर हिन्द महासागर से संबंधित हैं।

हिन्द महासागर में हजारों द्वीप हैं, उदाहरणार्थ मालदीव और कोकोस द्वीप प्रवालभित्ती द्वीप है और मॉरिशस व रीयूनियन ज्वालामुखीय द्वीप हैं।

सबसे गहरी समुद्री खाईयां

नाममहासागरसबसे गहरा बिंदुगहराई (मीटर में)
1. मरियाना खाईपश्चिमी प्रशांत चैलेंजर डीप 11,034
2. टोंगा-करमाडेक खाईदक्षिणी प्रशांतविट्याज 11 (टोंगा)10,850
3. कुरिल-कमचटका खाईपश्चिमी प्रशांत 10,542
4. फिलिपाईन खाईउत्तर प्रशांत गैलथिया डीप10,539
5. प्यूरटो रिको खाईपश्चिमी अटलांटिकमिलवाउकी डीप8.648

लवणता एवं तापमान

महासागर एवं समुद्र की एक मुख्य विशेषता उसकी लवणता है।

1000 ग्राम समुद्री जल में उपस्थित लवण की मात्रा लवणता को दर्शाती है। 

समान लवणता वाले क्षेत्रों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा समलवण रेखा (Isohaline ) कहलाती है। 

समुद्री लवणता को मापने वाला यंत्र सेलिनोमीटर (Salinometer) कहलाता है। 

सागरों व झीलों की लवणता बहुत अधिक होती है क्योंकि नदियों से लगातार उनमें लवणता का प्रवाह होता है। 

इनका जल वाष्पीकरण के कारण और अधिक लवणयुक्त हो जाता है। 

लवणता समुद्री जल के तापीय प्रसार, तापमान, सौर विकिरण का अवशोषण, वाष्पीकरण, आर्द्रता आदि को निर्धारित करती है।

ग्रेट साल्ट झील (अमेरिका)220%
मृतसागर (पश्चिम एशिया)240%
लेक वैन (तुर्की)330%

समुद्री जल का संघटन

लवणप्रतिशत मात्रा
सोडियम क्लोराइड77.8
मैग्नीशियम क्लोराइड10.9
मैग्नीशियम सल्फेट4.7
कैल्शियम सल्फेट3.6
पोटैशियम सल्फेट 2.5
अन्य0.5

तापमान

महासागर की गहराई के बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता है। 

औसतन महासागर की सतह पर स्थित जल का तापमान 26.7° सेंटिग्रेड होता है और तापमान विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर लगातार कम होता जाता है। 

उत्तरी गोलार्ध में स्थित महासागर दक्षिणी गोलार्ध के महासागरों से अपेक्षाकृत अधिक औसत तापमान दर्शाते हैं। 

यह भली-भांति ज्ञात तथ्य है कि महासागर का अधिकतम तापमान हमेशा उनकी सतह पर होता है क्योंकि वे सूर्य से सीधे ऊष्मा प्राप्त करते हैं और यह संवहन द्वारा इनके निचले तल को जाता है।

प्रवाल-भित्ति (Coral Reefs)

प्रवाल भित्ति का निर्माण सागरीय जीव मूंगे या कोरल पॉलिप्स के अस्थिपंजरों के समेकन तथा संयोजन द्वारा होता है। 

प्रवाल भित्ति का निर्माण 25° उत्तरी अक्षांश से 25° द. अक्षांश के मध्य 200-300 फीट की गहराई तक किसी द्वीप या तट के किनारे या सागरीय चबूतरों पर जहां सूर्य की किरणें पहुंचती है, वहां होता 20°-25° से. तापमान इनके विकास के लिए आदर्श होता है। 

उच्च लवणता व अति स्वच्छ जल दोनों प्रवाल के विकास के लिए हानिकारक हैं। 

आकृति के आधार पर प्रवाल-भित्ति तीन प्रकार की होती है : 

(क) तटीय प्रवाल-भित्ति (Fringing Reef) 

(ख) अवरोधक प्रवाल-भित्ति (Barrier Reef) 

(ग) एटॉल (Coral Ring orAtoll) 

तटीय प्रवाल-भित्ति : महाद्वीपीय किनारे या द्वीप के किनारे निर्मित होने वाली प्रवाल-भित्ति को तटीय प्रवाल भित्ति कहते हैं | उदाहरण-दक्षिणी फ्लोरिडा, मन्नार की खाड़ी आदि ।

अवरोधक प्रवाल-भित्ति : तटीय धरातल की प्रवालभित्तियों को अवरोधक प्रवाल भित्ति कहते हैं। तटीय धरातल व भित्तियों के बीच विस्तृत परंतु छिछला लैगून होता है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तटी से लगी ग्रेट बैरियर भित्ति 120 मील लंबी है। 

एटॉल : घोड़े की नाल या मुद्रिका के आकार वाली प्रवाल भित्ति को एटॉल कहा जाता है। यह प्रायः द्वीप के चारों ओर या जलमग्न पठार के ऊपर अण्डाकार रूप में पायी जाती है। इसके बीच में लैगून पाया जाता है। उदाहरण-फुनफुटी एटॉल, फिजी एटॉल आदि। 

महासागरीय धाराएं

सागरों में जल के एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने की गति को ‘धारा’ कहते हैं। महासागरों में धाराओं की उत्पत्ति कई कारकों के सम्मिलित प्रभाव के फलस्वरूप सम्भव होती है। 

जैसे-पृथ्वी की घूर्णन गति, सागर के तापमान में भिन्नता, लवणता में भिन्नता, घनत्व में भिन्नता, वायुदाब तथा हवाएं, वाष्पीकरण और वर्षा आदि । 

धाराओं की गति, आकार तथा दिशा के आधार पर इसके अनेक प्रकार हैं: 

(a) प्रवाह (Drift): जब पवन वेग से प्रेरित होकर सागर की सतह का जल आगे की ओर अग्रसर होता है तो उसे प्रवाह कहते हैं। इसकी गति तथा सीमा निश्चित नहीं होती है। उदाहरण-उत्तर अटलांटिक एवं दक्षिण अटलांटिक प्रवाह ।। 

(b) धारा (Current): जब सागर का जल एक निश्चित सीमा के अन्तर्गत निश्चित दिशा में तीव्र गति से अग्रसर होता है तो उसे धारा कहते है। इसकी गति प्रवाह से अधिक होती है। 

(c) विशाल धारा (Stream): जब सागर का अत्यधिक जल भूतल की नदियों के समान एक निश्चित दिशा में गतिशील होता है तो उसे विशाल धारा कहते हैं। इसकी गति प्रवाह तथा धारा दोनों से अधिक होती है। उदाहरण-गल्फस्ट्रीम | 

तापमान के आधार पर महासागरीय धाराएं दो प्रकार हो होती हैं :

(1) गर्म धारा तथा

2) ठण्डी धारा 

यदि जलधारा का तापमान उस स्थान के जल के तापमान से अपेक्षाकृत उच्च होता है, जहां यह जलधारा पहुंचती है, तो इसे गर्म जलधारा कहते हैं और यदि उस स्थान का तापमान जलधारा के तापमान से अधिक होता है तो यह ठण्डी जलधारा कहलाती सामान्यतः विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने वाली जलधारा गर्म होती है एवं ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर आने वाली जलधारा ठण्डी होती है। 

कोरिऑलिस बल के कारण उत्तरी गोलार्ध में जलधारा की दिशा में विक्षेपण दाहिनी तरफ तथा दक्षिण गोलार्ध में बायीं तरफ होता है। 

20°-40° उत्तर और 350-75° पश्चिम में स्थित सरगासो सागर धाराओं से घिरा सागर है। अर्थात् इसका कोई तट नहीं है। 

यह अटलांटिक महासागर का सर्वाधिक लवणयुक्त और गर्म हिस्सा है।

महासागरीय धारा का महत्व 

वायुमंडलीय परिसंचरण की तरह, महासागरीय धाराएं भी ऊष्मा का स्थानान्तरण विषुवत रेखा से ध्रुवों तक करती हैं। 

इसके द्वारा विपुल जलराशि एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जायी जाती है जिससे पृथ्वी की सतह पर तापीय संतुलन को बनाए रखने में महासागर एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। 

इन जलधाराओं से एक व्यापक जलीय परिसंचरण तंत्र विकसित होता है जो सभी महासागरों को प्रभावित करता है। 

व्यापारिक हवाएं अफ्रीका के तट से बड़ी मात्रा में जल को बहाकर कैरेबियाई एवं मैक्सिको की खाड़ी में ले जाती है। 

यहां पर जल जमाव के कारण ही गल्फ स्ट्रीम जैसी गर्म जलधारा का आविर्भाव होता है। 

इसी तरह, पछुआ हवाओं द्वारा गल्फस्ट्रीम के जल को ब्रिटेन एवं यूरोप में तट तक बहाकर ले जाया जाता है। 

प्रचलित हवाओं का सर्वाधिक प्रभाव पूर्व-पश्चिम दिशा में प्रवाहित समुद्री जलधारा पर पड़ता है। 

उत्तर-दक्षिण प्रवाह से तापमान में अन्तर पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता जब वायु का प्रवाह तट से समुद्र की ओर होता है तो उस तटीय क्षेत्रों में ठण्डी जलधारा का विकास होता है जैसे-केनारी एवं बेंगुला धारा। 

समुद्री जलधारा तटीय क्षेत्रों के जलवायु को प्रभावित करती है। 

वे तापमान, आर्द्रता एवं वर्षा को प्रभावित करती है।

प्रशान्त महासागर की जलधाराएं

जलधारा प्रकृति
क्यूरोशिवो गर्म
ओयाशिवो/क्युराइलठण्डी
ओखोत्स्कठण्डी
अलास्कनगर्म
कैलिफोर्नियाठण्डी
पूर्वी ऑस्ट्रेलियाईगर्म
पेरू/हम्बोल्टठण्डी
प्रति विषुवतरेखीयगर्म
दक्षिण विषुवतरेखीयगर्म
अलनीनोगर्म
अंटार्कटिक धाराठण्डी
उत्तर विषुवतरेखीयगर्म

अटलांटिक महासागर की जलधाराएं

जलधाराप्रकृति
उ. विषुवतरेखीय धारागर्म
गल्फ स्ट्रीम गर्म
फ्लोरिडागर्म
उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्टगर्म
नारवेजियन धारागर्म

जलधाराप्रकृति
इरमिंगेर धारागर्म
रेनील धारागर्म
लेब्रोडोर धाराठण्डी
केनरी धाराठण्डी
पूर्वी ग्रीनलैंड धाराठण्डी
द. विषुवतरेखीय धारागर्म
ब्राजीलियन धारागर्म
एंटलिज धारागर्म
द. अटलांटिक ड्रिफ्ट ठण्डी
फॉकलैण्ड धाराठण्डी
बेंगुला धाराठण्डी
अंटार्कटिक धाराठण्डी

हिन्द महासागर की जलधाराएं

जलधाराप्रकृति
मोजाम्बिक धारा गर्म
अगुल्हास गर्म
द. प. मानसूनी धारागर्म एवं अस्थायी
उ. पू. मानसूनी धाराठण्डी एवं अस्थायी
सोमाली धारा ठण्डी एवं अस्थायी
प. ऑस्ट्रेलियाई धारा ठण्डी एवं स्थायी
द. हिन्दमहासागरीय धारा ठण्डी

ज्वार-भाटा (Tides)

सूर्य तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के आवर्ती रूप से ऊपर उठने तथा गिरने को क्रमशः ज्वार तथा भाटा कहते हैं । 

पृथ्वी के निकट होने के कारण चंद्रमा ज्वार-भाटा पर सर्वाधिक प्रभाव डालता है। 

जब सूर्य, चन्द्रमा व पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं तो ज्वार सबसे ऊंचा होता है। 

यह स्थिति पूर्णमासी तथा अमावस्या को होती है। इसे बृहत् ज्वार (Spring Tide) कहते हैं। 

इसके विपरीत, जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा मिलकर समकोण बनाते हैं तो सूर्य तथा चन्द्रमा के आकर्षण बल एक दूसरे के विपरित कार्य करते हैं, जिस कारण निम्न ज्वार (Neap Tide) अनुभव किया जाता है। 

यह स्थिति प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष की अष्टमी को होती है। 

घूमती हुई पृथ्वी पर स्थित एक ही रेखा को दोबारा चंद्रमा के लंबवत नीचे आने में 24 घंटे व 52 मिनट का समय लगता है। 

अतः ज्वार-भाटा 12 घंटे व 26 मिनट के नियमित अंतराल पर आता है। सामान्यतः ज्वार-भाटा प्रतिदिन दो बार आता है लेकिन इंग्लैण्ड के दक्षिणी तट पर स्थित साउथम्पटन में दिन में चार बार ज्वार-भाटा आता है। 

सुनामी (Tsunami)

सुनामी जापानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है तट पर आती समुद्री लहरें। 

इनका ज्वारीय तरंगों से कोई संबंध नहीं होता। 

ये महासागरीय भूकम्पों के प्रभाव से महासागरों में उत्पन्न होती है। 

सुनामी लहरों की दृष्टि से प्रशान्त महासागर सबसे खतरनाक है।

Share this page

जलवायु विज्ञानं ( Climatology )

जलवायु विज्ञान विज्ञान की एक शाखा है जिसमें वायुमंडल के घटक एवं उनकी विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

वायुमंडल

पृथ्वी के चारों तरफ व्याप्त गैसीय आवरण जो पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण टिका हुआ है, वायुमंडल (Atmosphere) कहलाता है। स्ट्राहलर के अनुसार वायुमंडल की ऊंचाई लगभग 16-29 हजार किमी तक है। अनुमानतः संपूर्ण वायुमंडलीय संगठन का 97% भाग 29 किमी की ऊंचाई तक ही अवस्थित है। पृथ्वी के वायुमंडल का निर्माण विभिन्न अवयवों से हुआ है जिनमें गैसीय कण, जलवाष्प तथा धूलकण सम्मिलित हैं।

वायुमंडलीय वायु का संघटन

विभिन्न गैसेंआयतन (प्रतिशत में)
नाइट्रोजन78.8
ऑक्सीजन20.24
आर्गन0.93
कार्बन डाइऑक्साइड0.036
निऑन0.018
हीलियम0.0005
ओजोन0.00006

ऑक्सीजन एक ज्वलनशील गैस है। नाइट्रोजन ऑक्सीजन को तनु करती है एवं इसकी ज्वलनशीलता को नियंत्रित करता है। [120 किमी की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य होगी

कार्बन डाइऑक्साइड एक ग्रीन हाउस गैस है। यह सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है परन्तु पार्थिक विकिरण के लिए यह अपारदर्शी की तरह कार्य करती है। [कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प पृथ्वी की सतह से केवल 92 किमी की ऊंचाई तक पाए जाते हैं|

ओजोन परत सूर्य से आने वाली लगभग सभी पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी को अत्यधिक गर्म होने से बचाती है। [यह पृथ्वी की सतह से 10 से 50 किमी की ऊंचाई तक पाई जाती है

कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन जैसी भारी गैसें निचले वायुमंडल में पाई जाती हैं [कार्बन डाईऑक्साइड 20 किमी तक और नाइट्रोजन 100 किमी तक] जबकि हीलियम, निऑन, क्रिप्टान एवं जेनॉन जैसी हल्की गैसें वायमंडल में अधिक ऊंचाई पर (ऊपरी वायुमंडल) पाई जाती हैं।

जलवाष्प

  • पृथ्वी के लिए एक कंबल की तरह कार्य करता है जो इसे न तो अत्यधिक गर्म और न ही अत्यधिक ठंडा होने देता है। यह सौर्य विकिरण को अवशोषित करने के साथ-साथ पार्थिव विकिरण को भी सुरक्षित रखता है।
  • सूर्य से आने वाली किरणों में प्रकीर्णन के कारण ही आकाश का रंग नीला प्रतीत होता है। 
  • जलवायु के दृष्टिकोण से ये ठोस कण बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये ठोस कण ही आर्द्रताग्राही नाभिक का कार्य करते हैं जिनके चारों तरफ संघनन के कारण जलबूंदों का निर्माण होता है | 
  • बादल तथा वर्षण एवं संघनन के विभिन्न प्रतिरूप इन जलवाष्प कणों के कारण ही अस्तित्व में आते हैं।

वायुमंडल की संरचना 

वायुमंडल में वायु की विभिन्न संकेन्द्रित परतें पायी जाती हैं। जिनके तापमान और घनत्व में भिन्नता होती है । पृथ्वी की सतह के पास घनत्व सर्वाधिक होता है और ऊंचाई बढ़ने के साथ कम होता जाता है। तापमान के ऊर्ध्वाधर वितरण के आधार पर वायुमंडल को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है :

क्षोभमंडल (Troposphere)

  • क्षोभमंडल वायुमंडल की सबसे निचली एवं सघन परत है। यह परत संपूर्ण वायुभार का लगभग 75% स्वयं में समाविष्ट किए हुए है।
  • भूतल से इसकी औसत ऊंचाई लगभग 14 किमी है। यह ध्रुवीय क्षेत्रों में लगभग 8 किमी की ऊंचाई तक तथा विषुवत रेखा के समीप 18 किमी की ऊंचाई तक विस्तृत है। 
  • क्षोभमंडल की मोटाई विषुवत रेखा के समीप सर्वाधिक पाई जाती है क्योंकि इन क्षेत्रों में तापमान का स्थानांतरण संवहन तरंग के कारण अधिक ऊंचाई तक होता है। 
  • इन कारणों से इसे संवहन परत (Convectional Layer) भी कहा जाता है। चूंकि धूलकण और जलवाष्प इसी मंडल में पाए जाते हैं, अतः सारी मौसमी घटनाएं जैसे कुहरा, धुंध, बादल, ओस, वर्षा, ओलावृष्टि, तड़ित-गर्जन, आदि इसी मंडल में घटित होती हैं। 
  • ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में कमी 165 मीटर की ऊंचाई पर 1°C अथवा 1000 फीट पर 3.6°F अथवा 6.5°C/किमी. की दर से होती है। इसे सामान्य ताप हास दर कहते हैं। 
  • उबड़-खाबड़ हवा के पैकेटों की उपस्थिति के कारण जेट विमान के चालक इस परत से बचते हैं। 
  • क्षोभमंडल एवं समतापमंडल के मध्य एक संक्रमण क्षेत्र पाया जाता है जिसे ट्रोपोपॉज (Tropopause) कहते हैं |

समतापमंडल (Stratosphere)

  • समतापमंडल क्षोभमंडल के ऊपर 50 किमी की ऊंचाई तक विस्तृत है।
  • इस परत के निचले भाग में लगभग 20 किमी की ऊंचाई तक तापमान स्थिर पाया जाता है। तत्पश्चात् यह 50 किमी की ऊंचाई तक क्रमिक रूप से बढ़ता जाता है।
  • तापमान में वृद्धि, इस परत में ओजोन की उपस्थिति के कारण होती है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है। 
  • ओजोन का सर्वाधिक घनत्व 20 से 35 किमी के मध्य पाया जाता है। इसलिए इसे “ओजोन परत’ भी कहा जाता है। 
  • समताप मंडल में बादल बिल्कुल नहीं के बराबर पाए जाते हैं और बहुत कम धूल व जलवाष्प पाए जाते हैं अतः यह जेट विमानों के उड़ने हेतु आदर्श होता है। 
  • समतापमंडल के बिल्कुल ऊपरी भाग में तापमान 0°C तक पाया जाता है। 
  • समतापमंडल एवं मध्यमंडल के बीच एक संक्रमण क्षेत्र पाया जाता है, जिसे स्ट्रेटोपॉज (Stratopuase) के नाम से जानते हैं।

मध्यमंडल (Mesosphere)

  • समतापमंडल के ऊपर 80 किमी की ऊंचाई तक मध्यमंडल का विस्तार पाया जाता है। इस परत में ऊंचाई में वृद्धि के साथ तापमान में कमी होती है और 80 किमी की ऊंचाई पर तापमान -100° से. होता है। 
  • इसके ऊपरी हिस्से को मेसोपॉज (Mesopause) कहते हैं।

तापमंडल (Thermosphere)

मेसोपॉज के ऊपर स्थित वायुमंडलीय परत को तापमंडल कहते हैं | इस मंडल में ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान तेजी से बढ़ता है। इसे दो भागों में विभाजित किया गया है :

(i) आयनमंडल (Ionosphere)

  • इसके सबसे ऊपरी भाग को मेसोपॉज कहते हैं। 
  • आयनमंडल का विस्तार 80 से 400 किमी के बीच है।
  • इस परत में तापमान में त्वरित वृद्धि होती है तथा इसके ऊपरी भाग में तापमान 1000°C तक पहुंच जाता है। 
  • इसी परत से रेडियो तरंगें परावर्तित होकर पुनः पृथ्वी पर वापस आती हैं। 

(ii) बाह्यमंडल (Exosphere) 

  • आयनमंडल के बाद का बाहरी वायुमंडलीय आवरण, जो 400 किमी के बाद का ऊपरी वायुमंडलीय भाग है, बाह्यमंडल कहलाता है।
  • यह परत काफी विरलित है और धीरे-धीरे अंतरिक्ष में मिल जाती है।
  • इस परत में ऑक्सीजन, हाइड्रोजन व हीलियम के परमाणु पाए जाते हैं।

वायुमंडल का तापमान

  • वायुमंडल के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर ऊर्जा है। 
  • सूर्याताप (Insolation) आपतित सौर्य विकिरण है। यह लघु तरंगों के रूप में प्राप्त होता है। पृथ्वी की सतह एक मिनट में एक वर्ग सेमी सतह पर 2 कैलोरी ऊर्जा (2 कैलोरी/सेमी/मिनट) प्राप्त करती है। यह सौर्य स्थिरांक कहलाता है।
  • आपतित सौर विकिरण एक प्रकाशपुंज के रूप में होता है जिसमें विभिन्न तरंगदैर्ध्य वाली किरणें होती हैं। सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंग के रूप में होती है। 
  • दीर्घ तरंगदैर्ध्य वाली किरणें वायुमंडल में अधिकांशतः अवशोषित हो जाती हैं, जिन्हें इन्फ्रारेड किरण कहते हैं। लघु तरंग वाली किरणें अल्ट्रावायलेट कहलाती हैं।

वायुमंडल का तापन एवं शीतलन 

  • हवा भी अन्य पदार्थों की तरह तीन तरह से गर्म होती है विकिरण, चालन एवं संवहन । 
  • विकिरण में कोई भी वस्तु या पिंड सीधे तौर पर ऊष्मा तरंग को प्राप्त कर गर्म होता है। यही एकमात्र ऐसी विधि है जिसमें निर्वात में भी ऊष्मा का संचरण होता है। यह ऊष्मा स्थानांतरण का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है। 
  • पृथ्वी सौर विकिरण को लघु तरंग के रूप में ग्रहण करती है एवं इसे दीर्घ तरंग के रूप में मुक्त करती है, जिसे पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation) कहते हैं । 
  • पृथ्वी का वायुमंडल सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है परन्तु पार्थिक विकिरण के लिए लगभग अपारदर्शी की तरह कार्य करता है। कार्बन डाइऑक्साइड तथा जलवाष्प दीर्घ तरंगों के अच्छे अवशोषक हैं।
  • वायुमंडल आपतित सौर विकिरण की तुलना में पार्थिव विकिरण से ज्यादा ऊष्मा प्राप्त करता है। 
  • जब किसी वस्तु में ऊष्मा का स्थानांतरण अणुओं में गति के कारण होता है, तो यह चालन (Convection) कहलाता है। संवहन में वस्तुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने के कारण ऊष्मा का स्थानांतरण होता है।

ऊष्मा बजट (Heat Budget)

पृथ्वी द्वारा प्राप्त सूर्यताप की मात्रा एवं इससे निकलने वाले पार्थिक विकिरण के बीच संतुलन को ‘पृथ्वी का ऊष्मा बजट’ कहते हैं।

दाब कटिबंध एवं पवन संचार

  • वायु का अपना एक भार होता है। इस कारण धरातल पर वायु अपने भार द्वारा दबाव डालती है। धरातल पर या सागर तल पर क्षेत्रफल की प्रति इकाई पर ऊपर स्थित वायुमंडल की समस्त परतों द्वारा पड़ने वाले भार को ही ‘वायुदाब’ कहा जाता है। वायुमंडल लगभग 1 किग्रा/वर्ग सेमी का औसत दाब डालता है। 
  • सागर तल पर गुरूत्व के प्रभाव के कारण वायु संपीड़ित होती है अतः पृथ्वी की सतह के समीप यह घनी होती है। ऊंचाई बढ़ने के साथ यह तेजी से कम होती है। परिणामतः आधा वायुमंडलीय दाब 5500 मीटर के नीचे संपीड़ित होता है। 75% दाब 10,700 मीटर के नीचे और 90% ट्रोपोपॉज (1600 मी) के नीचे संपीडीत होता है।
  • वायुदाब का मापन बैरोमीटर नामक यंत्र से किया जाता है जिसे टॉरिसेली ने विकसित किया था। 
  • एक मीटर लंबी पारे की नली के बिना काम करने वाला एक अधिक ठोस (संक्षिप्त) यंत्र अनेरॉयड बैरोमीटर है। 
  • वायुमंडलीय दाब के वितरण को आइसोबार के मानचित्र से दर्शाया जाता है। 

नोट : .

  • आइसोबार समुद्रतल पर लिए गए समान वायुमंडलीय दाब वाले स्थानों से होकर खीची गई आभासी रेखा है। 
  • इस उद्देश्य हेतु मौसम विज्ञानियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली इकाई मिलिबार कहलाती है।
  • समुद्रतल पर सामान्य दबाव 76 सेंटीमीटर माना जाता है। 
  • एक मिलिबार 1 ग्राम द्वारा एक सेंटीमीटर क्षेत्र पर लगने वाला बल

पृथ्वी के दाब कटिबंध

(a) विषुवतरेखीय निम्न वायुदाब

  • इस वायुदाब की पेटी का विस्तार एक संकीर्ण पट्टी के रूप में है। यहां सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती हैं। अत्यधिक तापमान के कारण हवाएं गर्म होकर फैलती हैं तथा ऊपर उठती हैं। शीघ्र ही ‘ट्रोपोपॉज’ तक बादल का उर्ध्वाधर स्तंभ पहुंच जाता है तथा घनघोर मूसलाधार वर्षा होती है। 
  • इसी पेटी में वायु के अभिसरण के कारण अन्तरा-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का निर्माण होता है।
  • इस पेटी में हेडली कोशिका का निर्माण होता है।
  • यह व्यापारिक पवन प्रचुर मात्रा में नमी धारण करती है। जब यह हेडली संचरण के सहारे आरोहित होती है। 
  • ITCZ के अन्तर्गत हवाओं में गति कम होने के कारण शान्त वातावरण रहता है। इसी कारण इस पेटी को डोलड्रम कहा जाता है।

(b) उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटी

  • दोनों गोलार्धा में 30° से 35° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों के मध्य यह पेटी पाई जाती है। इस क्षेत्र में शुष्क एवं उष्ण वायु पाई जाती है। यहां आकाश बिल्कुल साफ एवं बादल रहित होता है। 
  • यद्यपि इस पेटी के निर्माण का गतिकी कारण अत्यंत जटिल है, तथापि सामान्यतया इसका निर्माण हेडली कोशिका के सहारे वायु के अवरोहण एवं अवतलन से होता है। 
  • जब वायु का अवतलन इन क्षेत्रों में होता है तो वायु गर्म हो जाती है तथा सतह पर आकर इनका अपसरण होता है। इन क्षेत्रों में प्रतिचक्रवातीय दशा पाई जाती है | धरातल पर यह मरूस्थलों का क्षेत्र है जो अफ्रीका और एशिया में सर्वाधिक विस्तृत हैं।

(c) उपध्रुवीय निम्नवायुदाब की पेटी 

  • इस पेटी का विकास 60° और 65° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के आसपास होता है। 
  • इस क्षेत्र में दो भिन्न तापमानों वाली वायुराशियों के मिलने से ध्रुवीय वाताग्र का निर्माण होता है। 
  • दक्षिणी गोलार्ध में इस पेटी में अंटार्कटिका के चारों ओर एक उपध्रुवीय चक्रवातीय व्यवस्था का निर्माण होता है।

(d) ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटी

  • कम तापमान के कारण इस पेटी का विकास होता है। 
  • यहां पर शुष्क एवं ठंडी हवाओं का अपसरण क्षेत्र होता है, जिससे यहां प्रतिचक्रवातीय दशा पाई जाती है। 
  • यहां पर वायु की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की विपरीत दिशा में होती है।

विभिन्न दाब कटिबंध

नामकारणअवस्थितितापमान/ आर्द्रता
विषुवतरेखीय निम्न वायुदाबतापजनित10°N से 10°Sउष्ण/आर्द्र
उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब गतिकी20° से 35उष्ण/आर्द्र
उपध्रुवीय निम्न वायुदाबतापजनित60°N, 60°Sशीत/आर्द्र
ध्रुवीय उच्च वायुदाबगतिकी90°N, 90°S शीत/आर्द्र

वायु संचरण (Wind System)

  • वायु के क्षैतिज प्रवाह को पवन (Wind) कहते हैं। इसका आविर्भाव वायुदाब में क्षैतिज अन्तर के कारण होता है। वायुदाब में क्षैतिज अन्तर के कारण वायु का प्रवाह उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर होता है। उर्ध्वाधर वायु परिसंचरण ‘वायुधारा’ कहलाती है। पवन एवं वायुधारा अर्थात क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर परिसंचरण मिलकर संपूर्ण वायुमंडलीय परिसंचरण
  • का निर्माण करते हैं । पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण हवाएं समदाब रेखाओं को सीधे समकोण पर नहीं प्रतिच्छेद कर पाती हैं, बल्कि यह अपने मुख्य पथ से कुछ विचलित हो जाती हैं । यह विचलन पृथ्वी के घूर्णन का परिणाम है तथा इसे कोरिऑलिस बल कहा जाता है।
  • कोरिऑलिस बल के कारण वायु की दिशा में विचलन उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाई ओर होता है। इसे फेरेल का नियम भी कहते हैं।

पवनों के प्रकार

इसे तीन भागों में बांटा जा सकता है :

1. प्रचलित पवन : ऐसी हवाएं वर्षभर प्रायः एक ही दिशा में एक अक्षांश से दूसरे अक्षांश की ओर चला करती हैं। इनमें से प्रमुख है-व्यापारिक हवाएं, पछुवा हवाएं तथा ध्रुवीय हवाएं। 

2. मौसमी पवन : इन हवाओं की दिशा में मौसमी परिवर्तन होता है। जैसे-मानसून, स्थलीय तथा सागरीय समीर, पर्वत तथा घाटी समीर आदि। 

3. स्थानीय पवन : ये हवाएं विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों में स्थानीय रूप से चला करती हैं। इनकी अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं। इनका नामकरण भी स्थानीय भाषाओं से संबंधित होता है।

प्रचलित पवनें (Planetary winds) प्रचलित पवनें दो प्रकार की होती हैं : 

1. व्यापारिक पवन (Trade winds): इस पवन का प्रवाह उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब के क्षेत्र से विषुवत रेखीय निम्न । वायुदाब की ओर होता है। ये पवनें वर्षभर प्रायः नियमित एवं स्थायी रूप से प्रवाहित होती हैं। ये पवनें दोनों गोलार्धा में विषुवत रेखा के समीप अभिसरित होती हैं तथा अभिसरण क्षेत्र में इसके ऊपर उठने से भारी वर्षा होती है। 

2.पछुआ पवन (Westerlies): पछुआ पवन उपोष्णकटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटी से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर प्रवाहित होती है। उत्तरी गोलार्ध में इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर तथा दक्षिण गोलार्ध में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पूर्व की ओर होती है।

मौसमी पवनें (Periodic winds) इसके अंतर्गत निम्न पवनें आती हैं :

स्थलीय तथा सागरीय पवनें : दिन के समय स्थलीय भाग जल की अपेक्षा शीघ्र गर्म हो जाता है, जिस कारण सागरवर्ती तटीय भाग पर निम्न दाब तथा सागरीय भाग पर उच्च दाब स्थापित हो जाते हैं। इस कारण से सागर से स्थल की ओर हवाएं चलने लगती हैं जिसे सागरीय समीर कहते हैं। __सूर्यास्त के बाद स्थलीय भाग शीघ्र ठंडे हो जाते हैं, जिससे स्थलीय भाग पर उच्च दाब तथा सागरों पर निम्न दाब बन जाता है। परिणामस्वरूप स्थल से जल की ओर हवाएं चलने लगती है जिन्हें स्थलीय समीर कहते हैं। 

पर्वत तथा घाटी पवनें (Mountain Breeze): दिन के समयपर्वतीय घाटियों के निचले भाग में अधिक तापमान के कारण हवाएं गर्म होकर ऊपर उठती हैं तथा पर्वतीय ढालों के सहारे ऊठती है। इन्हें घाटी समीर कहते हैं। रात्रि के समय पर्वतीय ढालों तथा ऊपरी भागों पर विकिरण द्वारा ताप हास अधिक होता है, जिस कारण हवाएं ठंडी हो जाती हैं। ये ठंडी तथा भारी हवाएं ढालों के सहारे घाटियों में नीचे उतरती हैं जिसे पर्वतीय समीर कहते हैं।

स्थानीय पवनें (Local Winds) कुछ स्थानीय पवनें निम्नलिखित हैं : 

  1. ब्लिजार्ड (ग्रीनलैंड, कनाडा, अन्टार्कटिका) : ये ध्रुवीय हवाएं हैं जो बर्फ के कणों से युक्त होती हैं। 
  2. बोरा (एड्रियाटिक सागर) : यह एक शुष्क तथा अति ठंडी प्रचण्ड हवा है। आल्पस के दक्षिणी ढाल से उतर कर ये हवाएं दक्षिण दिशा में प्रवाहित होती हैं। 
  3. ब्रिक फिल्डर : यह ऑस्ट्रेलियाई मरूस्थल से प्रवाहित होने वाली गर्म हवा है। (दिसम्बर से फरवरी) बुरान (मध्य एशिया एवं साइबेरिया) : यह एक अति ठंडी प्रचण्ड हवा है जो उत्तर-पूर्व दिशा से प्रवाहित होती है। यह तापमान को -30°C तक ला देती है। 
  4. चिली : यह एक उष्ण एवं शुष्क हवा है जो सहारा मरूस्थल से भूमध्यसागर की ओर प्रवाहित होती है। 
  5. गिबली : ग्रीष्म ऋतु में सहारा मरूस्थल से भूमध्यसागर की ओर लीबिया में प्रवाहित होने वाली शुष्क हवा है। गिबली का प्रभाव अति प्रचण्ड होता है। 
  6. हबुब (सूडान) : यह एक गर्म हवा है जो ग्रीष्म ऋतु में प्रवाहित होती है। हरमट्टन : पश्चिमी अफ्रीका में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें सहारा मरूस्थल से बहते हुए गिनी तट पर एक शुष्क हवा के रूप में पहुंचती हैं। 
  7. काराबुरान (तारीम बेसिन–चीन) : यह मार्च तथा अप्रैल में प्रवाहित होती है। हांगहो नदी घाटी में लोयस मिट्टी के जमाव में इस हवा का योगदान होता है। 
  8. खामसिन (मिस्र) : यह एक गर्म हवा है जो ग्रीष्म ऋतु के दौरान प्रवाहित होती है। ‘लू’ (उत्तर-पूर्व भारत) : अप्रैल-जून में प्रवाहित होने वाली धूल भरी गर्म हवा। 
  9. मिस्ट्रल (फ्रांस की रोन नदी घाटी) : यह एक ठंडी हवा है जो जाड़े में 120 किमी/घंटे की रफ्तार से प्रवाहित होती है। फलों का बगीचा इससे प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। 
  10. पाम्पेरो (अर्जेन्टिना का पम्पास क्षेत्र) : यह ठंडी एवं शुष्क हवा जाड़े में प्रवाहित होती है। 
  11. समून (इरान एवं कुर्दिस्तान) : एक गर्म हवा जो ग्रीष्म ऋतु में प्रवाहित होती है। 
  12. सिमॉन (सऊदी अरब : यह एक गर्म पवन है जो मार्च से जुलाई की अवधि में बहती है। 
  13. सिरोको (अल्जीरिया) : यह सहारा मरूस्थल से माल्टा एवं सिसली द्वीप की ओर प्रवाहित होती है। यह सामान्यतः गर्म एवं आर्द्र हवा है।
  14. बर्ग (जर्मनी) : आल्पस पर्वत से नीचे उतरती है। यह जाड़े में बर्फ को पिघलाने में मदद करती है। 
  15. चिनूक : यह अमेरिका के कोलोराडो, मोन्टाना, उत्तरी डकोटा, ऑरेगन और व्योमिंग प्रांत में तथा कनाडा के अल्बर्टा, मेनिटोबा एवं मैकेंजी क्षेत्र में दिसम्बर से मार्च तक प्रवाहित होने वाली गर्म और शुष्क हवा है जो बर्फ तथा हिम को पिघलाने में सहायता करती है। इसे ‘हिमभक्षक’ (snow eater) के नाम से जाना जाता है। 
  16. फॉन : आल्पस की उत्तरी ढाल से होकर ऊपरी राइन नदी घाटी में प्रवाहित होती है। लेवेन्टर : यह दक्षिण-पूर्व स्पेन, बेलारिक द्वीप तथा जिब्राल्टर जलसंधि क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली मंद एवं आर्द्र हवा है जिससे इन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है। 
  17. लेवेस : सिराको पवन के समान गर्म एवं शुष्क हवा जो दक्षिण स्पेन के तटीय क्षेत्रों से होकर प्रवाहित होती है। 
  18. ट्रामोण्टान : यह एक ठंडी एवं शुष्क हवा है जो पश्चिमी भूमध्य-सागरीय बेसिन में प्रवाहित होती है। ग्रेगाल : यह टाइरेनियन सागर एवं सिसली तथा माल्टा द्वीप के तटीय क्षेत्र में प्रवाहित होती है। जाड़े में प्रवाहित होने वाली यह हवा ग्रेको (Greco) के नाम से भी जानी जाती है। 
  19. जोण्डा : यह एक गर्म, आर्द्र एवं कष्टदायक हवा है जो अर्जेंटीना में प्रवाहित होती है। 
  20. दक्षिणी बस्टर : एक अत्यधिक ठण्डी एवं शुष्क हवा है जो अर्जेंटीना-उरुग्वे क्षेत्र में प्रवाहित होती है। यह शीत वाताग्र से संबंधित हवा है। 
  21. फ्रायजेम : यह एक अति ठण्डी प्रचण्ड हवा है जो ब्राजील के कम्पोज क्षेत्र एवं पूर्वी बोलीविया में प्रवाहित होती है। 
  22. उत्तरी हवा : यह एक ठंडी उत्तरी हवा है जो अमेरिका के टेक्सास व गल्फ तटीय क्षेत्र में तापमान को कम कर देती है। 
  23. पापागेयो : एक ठंडी एवं शुष्क हवा जो मैक्सिको के तटीय क्षेत्रों में तापमान कम करती है तथा जाड़े में साफ मौसम लाती है। 
  24. सान्ताआना : एक गर्म एवं शुष्क हवा है जो कैलिफोर्निया की घाटी से होकर प्रवाहित होती है। यह धूल भरी हवा है जो फलोद्यानों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है। 
  25. डस्ट डेविल : सहारा, कालाहारी मरूस्थल, मध्य एवं पश्चिमी अमेरिका तथा मध्य पश्चिमी क्षेत्रों में प्रवाहित होने वाली धूल भरी हवा। 
  26. काराबोरान : एक प्रबल धूलभरी उत्तर-पूर्वी हवा जो केन्द्रीय एशिया के तारिम बेसिन में चलती है।

वायुमंडल में जलवाष्प

वायुमंडल में आर्द्रता से आशय वायुमंडल में उपस्थित जल से है। वायुमंडल में उपस्थित जल तीनों अवस्थाओं, जैसे-ठोस (हिम), द्रव (जल) तथा गैस (वाष्प) में हो सकता है।

बादल 

बादल जलकणों या हिमकणों का समूह होता है जो वायुमंडल में तैरता रहता है। जलवायु विज्ञान की वह शाखा जो बादलों का अध्ययन करती है, ‘नेफोलॉजी’ अथवा बादल-भौतिकी कहलाती है।

विश्व मौसम संगठन द्वारा बादलों को निम्नलिखित दस वर्गों में विभाजित किया गया है : 

1. पक्षाभ बादल (Cirrus Clouds) : ये सबसे अधिक ऊंचाई पर छोटे जल-कणों से बने होते हैं अतः वर्षा नहीं करते हैं। चक्रवातों के आगमन के पहले दिखते हैं। 

2. पक्षाभ स्तरी बादल (Cirro Stratus Clouds) : इनके आगमन पर सूर्य तथा चन्द्रमा के चारों ओर प्रभा मण्डल (Malo) बन जाते हैं। ये सामान्यतः सफेद रंग के होते हैं और पारदर्शी होते हैं। ये चक्रवात के आगमन के सूचक हैं। 

3. पक्षाभ कपासी बादल (Cirro Cumulus Clouds) : श्वेत रंग के ये बादल लहरनुमा रूप में पाये जाते हैं | 

4. उच्च स्तरीय बादल (Alto Stratus Clouds): ये भूरे या नीले रंग की पतली चादर के समान होते हैं जो एक समान दिखते हैं। ये व्यापक व लगातार वर्षण करते हैं। 

5. उच्च कपासी बादल (Alto Cumulus Clouds): इनका आकार सफेद या भूरे लहरदार परतों के रूप में होता है। इन्हें कभी-कभी “सीप क्लाउड’ या ‘वुल क्लाउड’ कहा जाता है। 

6. स्तरी बादल (Stratus Clouds): ये बादल कम ऊंचाई के और प्रायः कुहरे के समान भूरे रंग के होते हैं। 

7. कपास-स्तरी-बादल (Cumulo-Stratus-Clouds): ये भूरे व सफेद रंग के होते हैं। ये प्रायः गोलाकार होते हैं जो पंक्ति में व्यवस्थित होते हैं। सर्दियों में प्रायः ये पूरे आकाश को ढंक लेते हैं। ये सामान्यतः स्पष्ट व साफ मौसम से जुड़े होते हैं। 

8. कपासी बादल (Cumulus Clouds): प्रायः ये लंबाई में होते हैं, जिनका ऊपरी भाग गुम्बदाकार होता है, परन्तु आधार समतल होता है। ये साफ व स्वच्छ मौसम से संबद्ध होते हैं। 

9. कपासी वर्षा बादल (Cumulo-Nimbus-Clouds): ये अत्यधिक विस्तृत तथा गहरे बादल होते हैं, जिनका विस्तार ऊंचाई में अधिक होता है। इनके साथ वर्षा, ओला तथा तड़ित झंझावात की अधिक संभावना रहती है। 

10. वर्षा-स्तरी-बादल (Nimbo-Stratus-Clouds): इनका उर्ध्वाधर विस्तार काफी होता है। ये गहरे रंग के निचले बादल हैं और सतह के समीप होते हैं। ये भारी वर्षा से संबद्ध होते हैं।

आर्द्रता (Humidity)

आर्द्रता वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा की माप है। वायु में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण अर्थात अंततः तापमान पर निर्भर करती है। यदि तापमान बढ़ता है तो हवा अधिक जलवाष्प धारण कर सकती है। 

किसी दिए गए तापमान पर हवा द्वारा इसकी पूरी क्षमता तक जलवाष्प धारण करने को सांद्र अवस्था कहते हैं 

वायु की आर्द्रता को प्रकट करने के कई तरीके हैं : 

1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity) : एक विशिष्ट तापमान पर वायु के एक दिए हुए आयतन में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। 

2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) : वायु की एक दी हुई मात्रा की निरपेक्ष आर्द्रता और इसके द्वारा धारण की जा सकने वाली जलवाष्प की अधिकतम मात्रा के बीच के अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं। 

3. विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity) : विशिष्ट आर्द्रता वायु के प्रति इकाई वजन में जलवाष्प का वजन है जिसे ग्राम जलवाष्प/किग्रा वायु जलवाष्प के रूप में व्यक्त करते हैं।

कोहरा (Fog) यह धुंए या धूलकणों के ऊपर जल की छोटी बूंदों की घनी परत है जो वायुमंडल की निचली परत में घटित होता है। कोहरा धरती की सतह पर स्थित एक बादल है।

वर्षण के स्वरूप

  • वायुमंडल में जल तीनों स्वरूपों जैसे-ठोस (वर्ष), द्रव (पानी) और गैस (वाष्प) के रूप में उपस्थित हो सकता है। 
  • जलवायु विज्ञान में वर्षण का अर्थ वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प के संघनन के उपरान्त बने उत्पाद से है जो पृथ्वी की सतह पर संग्रहित होता है। 
  • वर्षण के अन्तर्गत जलवर्षा, हिमवर्षा, ओलावृष्टि, फुहार आदि सभी आते हैं।

जलवर्षा (Rain)

  • जलवर्षा वर्षण का ही एक प्रकार है जो छोटी-छोटी बूंदों के रूप में या 0.5 मिमी से ज्यादा व्यास वाली बूंदों के रूप में सतह पर आती है। 
  • जल की बूंदें जब अत्यधिक ऊंचे बादलों की सतह पर आती हैं तो इसके कुछ भाग का वाष्पीकरण शुष्क हवा की परतों में ही हो जाता है। कभी-कभी वर्षा की सारी बूंदें सतह पर आने से पहले ही वाष्पीकृत हो जाती हैं। 
  • इसके विपरीत, जब वर्षण की क्रिया काफी सक्रिय होती है, तो निचली हवा आर्द्रयुक्त एवं बादल काफी गहरे हो जाते हैं और फिर मूसलाधार वर्षा होती है। इस वर्षा में बूंदें काफी बड़ी-बड़ी और अत्यधिक संख्या में होती हैं। 
  • वर्षा के प्रकार स्थान एवं अन्य मौसमी विशेषताओं के आधार पर वर्षा को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है। 

1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall) • 

  • संवहनीय वर्षा का क्षेत्र अत्यधिक तापमान एवं अत्यधिक आर्द्रता वाला क्षेत्र होता है। संवहन तरंग की उत्पत्ति के लिए सौर विकिरण मुख्य स्रोत के रूप में होता है। 
  • संवहनीय वर्षा क्यूमलोनिम्बस बादल के बनने से होती है। बिजली की चमक, गर्जन एवं कभी-कभी हिम का गिरना इस वर्षा की विशेषता है। इस प्रकार की वर्षा डोलड्रम की पेटी एवं विषुवतरेखीय क्षेत्र में होती है। जहां यह लगभग प्रतिदिन दोपहर में होती है। इस तरह की वर्षा फसल के लिए अधिक प्रभावी नहीं है। इस वर्षा का अधिकांश जल सतह से होकर बहते हुए समुद्र में जा मिलता है।

2. पर्वतीय वर्षा (Orographical Rainfall)

  • यह वर्षा का सर्वाधिक विस्तृत प्रकार है। जब आर्द्रयुक्त पवनें ऊपर उठकर पर्वतीय क्षेत्रों से टकरा कर वर्षा करती हैं तो ऐसी वर्षा पर्वतीय वर्षा कहलाती है। 
  • पवनें पर्वत के जिस तट से टकराती हैं, उस क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा होती है जबकि विपरीत ढाल “वृष्टि छाया प्रदेश” कहलाता है एवं इन क्षेत्रों में वर्षा नगण्य मात्रा में होती है। इसका कारण यह है कि विपरीत ढाल में वायु नीचे बैठती है तथा उसकी आर्द्रता समाप्त हो जाती है। 

3. चक्रवातीय वर्षा (Cyclonic Rainfall)

  • चक्रवातीय वर्षा का संबंध चक्रवात के बनने एवं उसके विकसित होने से है। यह वर्षा कृषि कार्यों के लिए अत्यधिक लाभदायक होती है। 
  • समशीतोष्ण क्षेत्रों में चक्रवातीय वर्षा फुहार के रूप में या हल्की-हल्की बूंदों के रूप में होती है। यह काफी समय तक एवं लगातार होती

फुहार (Shower)

  • जब वर्षण के दौरान बूंदें काफी छोटी एवं समान आकार में होती हैं तथा यह हवा में तैरती हुई प्रतीत होती हैं तो इसे फुहार कहते हैं।
  • फुहार में जल की बूंदों की त्रिज्या 500 माइक्रोन से भी कम होती है।
  • इस तरह के फुहार अतिसंतृप्त बादल से ही बनते हैं जिसमें जल की मात्रा अत्यधिक होती है। इसमें बादल स्तर तथा पृथ्वी की सतह के मध्य व्याप्त वायु की सापेक्ष आर्द्रता लगभग 100 प्रतिशत होती है जिससे ये छोटी-छोटी बूंदें अपने रास्ते में वाष्पीकृत नहीं होती हैं।

हिमपात (Snow)

  • वर्षण के दौरान जब हिम के टुकड़े सतह पर आते हैं तो यह हिमपात या तुषारापात कहलाता है। दूसरे शब्दों में हिमपात जल के ठोस रूप का वर्षण है। 
  • जाड़े की ऋतु में जब तापमान “हिमांक” के नीचे चला जाता है, तो बर्फ के कण ‘अल्टो-स्ट्रेटस’ बादल से सीधे सतह पर आने लगते हैं। ये रास्ते में पिघले बिना सतह पर पहुंचने लगते हैं।

हिमवर्षा (Sleet) 

  • जब वर्षण के दौरान जल एवं हिमकण दोनों मिश्रित रूप में सतह पर पहुंचते हैं तो यह ‘हिमवर्षा’ कहलाती है।
  • जब कभी वायुमंडल में प्रचंड वायुधारा उर्ध्वाधर रूप में विद्यमान होती हैं तो हिमवृष्टि अत्यधिक भयानक रूप धारण कर लेती है।

ओलावृष्टि (Hail) जब हिम छोटे-छोटे दानों के रूप में गिरने लगते हैं जिनका व्यास लगभग 5 मिमी से 10 मिमी के मध्य होता है, तो यह ओलावृष्टि कहलाती है।

सामान्यतया इसमें मटर के दाने के आकार की बर्फबारी होती है, परन्तु कभी-कभी बेसबॉल के आकार की बर्फबारी भी होती है। 

यह वर्षण के सभी प्रतिरूपों में सबसे भयावह होता है जो क्यूमलोनिम्बस बादल से बनता है तथा भयंकर गर्जना के साथ सतह पर पहुंचता है।

ओस (Dew) ओस जमीन की सहत या इसके निकट स्थित किसी पदार्थ पर जमी आर्द्रता होती है। यह रात के समय शांत व स्वच्छ वातारण में घटित होती है। जब जमीन के विकिरण द्वारा वायुमंडल की निचली परत को ओसांक से नीचे तक ठंडा कर दिया जाता है, तो जलवाष्प बूंदों के रूप में संघनित हो जाते हैं। शांत मौसम व स्वच्छ आकाश ओस बनने के लिए सर्वोत्तम स्थिति होती है।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात

चक्रवात व प्रतिचक्रवात की उत्पत्ति विभिन्न प्रकार की वायुराशियों के मिश्रण के फलस्वरूप वायु के तीव्र गति से ऊपर उठकर बवंडर का रूप धारण करने से होती है।

चक्रवात (Cyclone) 

जब केन्द्र में कम दाब के क्षेत्र का निर्माण होता है तो बाहर की ओर दाब बढ़ता जाता है। इस स्थिति में हवाएं बाहर से अंदर की ओर चलती हैं जिसे चक्रवात कहते हैं। चक्रवात में वायु की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा के विपरीत और दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सूइयों की दिशा में होती है। चक्रवात में हवा केन्द्र की तरफ आती है और ऊपर उठकर ठंडी होती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का व्यास 100-500 किमी तक होता है। अलग-अलग जगहों पर इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

  1. हरिकेन (यूएसए) : यह एक उष्ण कटिबंधीय चक्रवात होता है जो वेस्टइंडीज तथा मैक्सिको की खाड़ी में अगस्त-सितंबर महीने में विकसित होते हैं। 
  2. टाइफून (चीन) : यह भी एक उष्ण कटिबंधीय चक्रवात है जो चीन सागर तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में विकसित होते हैं। 
  3. टॉरनैडो : चक्रवातों के आकार की दृष्टि से टारनैडो लघुतम होता है परन्तु प्रभाव के दृष्टिकोण से सबसे प्रलयकारी तथा प्रचण्ड होता है। टारनैडो मुख्य रूप से यूएसए तथा गौण रूप से ऑस्ट्रेलिया में उत्पन्न होते हैं । टारनैडो में हवाएं 800 किमी प्रति घंटे की चाल से प्रवाहित होती हैं, जो कि किसी भी प्रकार के चक्रवात से अधिक तेज है। 
  4. विली-विली : ये उष्णकटिबंधीय तूफान हैं जो उत्तर-पश्चिम ऑस्ट्रेलिया में आते हैं। 
  5. चक्रवात : ये उष्णकटिबंधीय कम दबाव के तूफान हैं जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के भारतीय तटों पर आते हैं।

प्रतिचक्रवात (Anticyclone) 

  • जब केन्द्र में दबाव अधिक हो जाता है तो हवाएं बाहर की ओर चलती हैं। इसे प्रतिचक्रवात कहते हैं और इसमें वाताग्र का अभाव होता है। इसमें वायु की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा में और दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा के विपरीत होती है।
  • प्रतिचक्रवात किसी भी निश्चित दिशा में नहीं चलता है। इससे जुड़ा हुआ मौसम मुख्यतः अच्छा और सूखा होता है।
Share this page

ज्वालामुखी और भूकम्प ( Volcanoes and Earthquakes )

ज्वालामुखी (Volcanoes)

  • ज्वालामुखी एक विस्फोटक छिद्र है जिससे होकर गर्म मैग्मा, पिघली चट्टानें, राख एवं गैसें बाहर निकलती हैं। ज्वालामुखी क्रिया के तहत ज्वालामुखी उद्गार से लेकर ज्वालामुखी पर्वत के निर्माण तक को सम्मिलित किया जाता है। 
  • पृथ्वी के अंदर स्थित पिघली हुई चट्टानों और गैसों को संयुक्त रूप से मैग्मा (Magma) कहते हैं । 
  • पृथ्वी की सतह पर पहुंचने के बाद इन्हें लावा (Lava) कहते हैं। उद्गार की अवधि के आधार पर ज्वालामुखी को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है :

सक्रिय/जाग्रत ज्वालामुखी (Active Volcano)

  • ऐसे ज्वालामुखी से उद्गार सदैव होता रहता है। जैसे-इटली का एटना तथा स्ट्राम्बोली (इटली), मूना लोआ (हवाई), माउंट कैमरून (अफ्रीका), कोटापोक्सी (इक्वाडोर), माउंट गुईअलातिरि (चिली) ओजोस-डेल-स्लेडो (अर्जेन्टीना)। 
  • माउंट-ओजोस-डेल-स्लेडो : यह विश्व का सर्वाधिक सक्रिय ज्वालामुखी है जो अर्जेन्टीना में स्थित है। 
  • माउंट स्टॉम्बोली : इसे भूमध्यसागर का प्रकाश स्तंभ कहा जाता है। यह भूमध्यसागर के लिपारी द्वीप में स्थित है।

सुसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano)

  • ऐसे ज्वालामुखी जो वर्तमान समय में शान्त हैं लेकिन भविष्य में उसके उद्गार को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता, सुसुप्त ज्वालामुखी कहलाते हैं। जैसे–विसुवियस, फ्युजियामा (जापान) क्राकाटाओ (इंडोनेशिया), बैरन द्वीप ज्वालामुखी (अंडमान) आदि।

मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcano)

  • ऐसे ज्वालामुखी के पुनः उद्गार की कोई संभावना नहीं होती। उदाहरण : माउंट किलिमंजारो (केन्या), माउंट वार्निंग (ऑस्ट्रेलिया), पोपा (म्यांमार), माउंट अकांकगुआ (अर्जेन्टीना, सबसे बड़ा मृत ज्वालामुखी पर्वत), मालागासी (हिन्द महासागर), माउंट पेले (वेस्ट इंडीज)।
  • पृथ्वी पर 1500 से अधिक सक्रिय ज्वालामुखी स्थित हैं जिनमें से 500 हमेशा सक्रिय रहते हैं। 
  • कुल सक्रिय ज्वालामुखियों में से 60% प्रशांत क्षेत्र में हैं। 
  • ज्वालामुखीय मृदा काफी ऊपजाऊ होती है। येलोस्टोन नेशनल पार्क में सर्वाधिक प्राकृतिक गेसर (geysers) हैं | 
  • इसे ओल्ड फेथफुल गेसर कहा जाता है।

भूकम्प (Earthquake) 

  • जब बाह्य अथवा आन्तरिक कारणों (प्राकृतिक) से पृथ्वी के भूपटल में तीव्र गति से कंपन्न होने लगता है तो उसे भूकंप कहते हैं। 
  • ज्वालामुखी क्षेत्र में सामान्यतः भूकंप आते रहते हैं। 
  • भूकंप के ठीक ऊपर पृथ्वी की सतह पर स्थित बिन्दु को भूकंपकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं। 
  • भूकंप का जहां आविर्भाव होता है, उसे भूकंपमूल (Seismic Focus) कहते हैं। 
  • भूकंप का अध्ययन भूगर्भ विज्ञान की एक पृथक् शाखा द्वारा किया जाता है जिसे सिस्मोलॉजी कहते हैं। 
  • भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने (Fiction scale) द्वारा मापी जाती है जिसे 1934 में चार्ल्स एफ रिक्टर ने बनाया था। 
  • रिक्टर स्केल लॉगरिथमिक स्केल (1-10) पर आधारित होता है। 
  • इसका अर्थ यह हुआ कि रिक्टर मापक पर प्रत्येक आगे की पूर्ण संख्या, भूकंपलेखी यंत्र (Seismograph) पर पिछली संख्या की 10 गुणा ऊर्जा को प्रदर्शित करती है।

भूकंपीय तरंगें

  • प्राथमिक (P) तरंगें : ये छोटी तरंगदैर्ध्य व उच्च आवृत्ति की होती हैं। ये लंबवत तरंगे हैं जो ठोस, द्रव और गैस समेत सभी माध्यमों से गुजरती हैं। उनका औसत वेग 8 किमी/सेकंड है। 
  • द्वितीयक (S) तरंगें : ये लंबी तरंगदैर्ध्य और निम्न आवृत्ति की होती हैं। ये तरंगें मुख्यतः धरातल तक ही सीमित रहती हैं। अतः भूकंप के दौरान संरचना संबंधी अधिकांश नुकसान का कारण बनती हैं। ये सभी माध्यमों (ठोस, द्रव और गैस) से होकर गुजरती हैं। इनका औसत वेग 4 किमी/सेकंड होता है। 
  • सतही या लंबी (L) तरंगें : ये उच्च तरंगदैर्ध्य और निम्न आवृत्ति की तरंगे हैं और पृथ्वी के क्रस्ट के खोल तक सीमित रहती हैं। इसलिए भूकंप से होने वाला अधिकांश संरचनात्मक नुकसान इन्हीं से होता है। ये तरंगे सभी माध्यमों (ठोस, द्रव और गैस) से गुजरती हैं। इनका औसत वेग 3 किमी/सेकंड होता है। 
  • भूकंप की प्रबलता को मर्कली स्केल (Mercalli scale) पर मापा जाता है। यह मूंकप का अनुभव करने वाले लोगों के अवलोकनों का प्रयोग तीव्रता के आकलन हेतु करती है।

सुनामी (Tsunami) 

  • सुनामी लहरों की एक श्रृंखला है जो महासागर के जल के एक बड़े हिस्से के तेजी से विस्थापित होने के कारण आती है। भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन, क्षुद्रग्रह की टक्कर और जल के अंदर या बाहर की अन्य बड़ी हलचलों के कारण सुनामी उत्पन्न हो सकती है।
Share this page

विश्व स्थलाकृति विकास ( World topography development )

पृथ्वी की सतह अत्यंत ही विषम है और इन विषमताओं का निर्माण भी अलग-अलग प्रक्रियाओं द्वारा हुआ है। पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली इन्हीं विषमताओं को स्थलाकृति कहते हैं। इन्हें निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया गया है : 

1. प्रथम श्रेणी : महाद्वीप और महासागरीय बेसीन 2

. द्वितीयक श्रेणी : पर्वत, पठार, मैदान आदि 

3. तृतीय श्रेणी : झील, नदी, घाटी, गार्ज, जल प्रपात, मौरेन, बालुकास्तूप ।

महाद्वीप एवं महासागर

पृथ्वी पर सात महाद्वीप और चार प्रमुख महासागर हैं।

महाद्वीप 

पृथ्वी की सतह पर स्थित विशाल भू-भाग को महाद्वीप कहते हैं । पृथ्वी के अधिकांश शुष्क क्षेत्र महाद्वीपों पर पाए जाते हैं। पृथ्वी पर कुल सात महाद्वीप हैं जो क्षेत्रफल के घटते क्रम में निम्न हैं : 1. एशिया 2. अफ्रीका 3. उत्तरी अमेरिका 4. दक्षिणी अमेरिका 5. अन्टार्कटिका 6. यूरोप 7. ऑस्ट्रेलिया

महासागर 

पृथ्वी की सतह पर पाये जाने वाले विशाल जलीय भूभाग को महासागर कहा जाता है | सभी जलीय भाग आपस में जुड़े हुए हैं तथापि इन्हे पांच मुख्य भागों में विभाजित किया गया है जो आकार के घटते क्रम में निम्न

1. प्रशान्त महासागर 3. हिन्द महासागर 2. अटलांटिक महासागर 4. आर्कटिक महासागर ।

पर्वत (Mountains)

पर्वत द्वितीय क्रम का उच्चावच कहलाता है। यह पृथ्वी की सतह का ऐसा ऊंचा उठा भाग होता है जिसकी ढाल तीव्र व शिखर क्षेत्र संर्कीण होता है। ये सामान्यतः 600 मी से अधिक ऊंचे उठे क्षेत्र होते हैं। कुछ पहाड़ 8000 मीटर से भी ऊंचे होते हैं। कुछ पर्वतों में स्थाई रूप से जमी हुई बर्फ की नदी होती है जिसे ग्लैसियर (Glacier) कहते हैं। कुछ पर्वत ऐसे हैं जो दृश्य नहीं है क्योंकि वे समुद्र के भीतर हैं।

पर्वतों का अध्ययन ओरोलॉजी (Orology) कहलाता है।

पर्वतों के प्रकार 

1. वलित पर्वत : जब संपीडन बल के द्वारा चट्टानों में वलन का निर्माण होता है तो उसे वलित पर्वत कहते हैं। विश्व में वलित पर्वतों का सर्वाधिक विस्तार पाया जाता है। हिमालय, आल्पस, रॉकी, एंडीज, यूराल आदि वलित पर्वत के उदाहरण हैं |

नोट : भारत की अरावली श्रृंखला विश्व के सबसे प्राचीन वलित पर्वतों में से एक है। 

2. ब्लॉक पर्वत : इस पर्वत का निर्माण तनावमूलक बल द्वारा होता है। तनावमूलक बल के द्वारा भूपटल का कुछ भाग ऊपर उठ जाता है एवं कुछ भाग नीचे धस जाता है। ऊपर उठे भाग को ब्लॉक पर्वत और बीच में धंसे भाग को रिफ्ट घाटी कहते हैं। वॉसजेस (फ्रांस), ब्लैक फॉरेस्ट (जर्मनी), सियरा नेवादा, साल्ट रेंज आदि इसके उदाहरण हैं। 

3. ज्वालामुखी पर्वत : इन्हें संग्रहीत पर्वत (Mountain of accumulation) भी कहा जाता है। इनका निर्माण ज्वालामुखी उद्गार के परिणामस्वरूप निःसृत पदार्थों के जमाव से हुआ है। जैसे-माउंट किलिमंजारों (अफ्रीका), फ्यूजीयामा (जापान) आदि । 4. अवशिष्ट पर्वत : इनका निर्माण प्रांरभिक पर्वतों (वलित, ब्लॉक या ज्वालामुखी) के अपरदन एवं घर्षण से होता है। अरावली पर्वत अवशिष्ट पर्वत का उदाहरण है। इसके अलावा नीलगिरि, पार्श्वनाथ, गिरनार, राजमहल, सिएरा (स्पेन) और कॉस्कील (न्यूयार्क) इसके उदाहरण हैं।

विश्व की प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएं

श्रृंखला स्थान
एंडीज दक्षिण अमेरिका
हिमालय-काराकोरम-हिंदुकुश दक्षिण मध्य एशिया
रॉकी उत्तरी अमेरिका
ग्रेट डिवाइडिंग रेंज पूर्वी ऑस्ट्रेलिया
पश्चिमी घाट पश्चिमी भारत
कॉकेशसयूरोप, एशिया
अलास्काअमेरिका
आल्पसयूरोप
अपेनाईन यूरोप
उरालएशिया

पठार (Plateaus)

  • पठार द्वितीय श्रेणी का उच्चावच है। यह भूपटल के एक तिहाई भाग पर विस्तृत है। सागरतल से कम से कम 300 मीटर ऊपर उठी हुई उच्च भूमि जिसका शिखर सपाट व चपटा होता है, पठार कहलाता है। पठार के किनारे वाले ढाल खड़े होते हैं। 
  • पर्वतों के समान पठार भी नए या पुराने हो सकते हैं। भारत का दक्कन का पठार सबसे पुराने पठारों में से एक है। पूर्वी अफ्रीकी पठार (केन्या, तंजानिया व यूगांडा) और ऑस्ट्रेलिया का पश्चिमी पठार अन्य उदाहरण हैं।
  • तिब्बत विश्व का सबसे ऊंचा पठार है जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 4000-6000 मीटर है। 
  • पठार काफी उपयोगी हैं क्योंकि ये खनिजों के भंडार हैं। यही कारण है कि विश्व में खनन के अधिकांश क्षेत्र पठारी क्षेत्र में स्थित हैं। अफ्रीकी पठार सोने और हीरे की खान के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत में लोहा, कोयला और मैंगनीज के विशाल भंडार छोटानागपुर पठार में पाए जाते हैं।

विश्व के प्रमुख रेगिस्तान

रेगिस्तान क्षेत्रफल (किमी)विस्तार क्षेत्र
सहारा84,00,000 अल्जीरिया, चाड, लीबिया, माली, मारितानिया, नाइजर, सूडान, ट्यूनीशिया, मिस्र और मोरक्को
ऑस्ट्रेलियन15,50,000ग्रेट सैन्ड्री, ग्रेट विक्टोरिया, सिम्पसन, गिब्सन तथा स्टुअर्ट रेगिस्तानी क्षेत्र
अरेबियन13,00,000सऊदी अरब, यमन, सीरिया, एवं नाफुद क्षेत्र
गोबी10,40,000मंगोलिया और चीन
कालाहारी5,20,000बोत्सवाना (मध्य अफ्रीका)
टाकला माकन3,20,000सीक्यांग (चीन)
सोनोरन3,10,000एरीजोना एवं कैलिफोर्निया (अमेरिका तथा मैक्सिको)
नामिब3,10,000दक्षिणी अफ्रीका (नामीबिया)
कराकुम2,70,000तुर्कमेनिस्तान
थार2,60,000उत्तरी-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान
सोमाली2,60,000सोमालिया (अफ्रीका)
अटाकामा1,80,000उत्तरी चिली (दक्षिणी अमेरिका)
काजिलकुम1,80,000 उज्बेकिस्तान, कजाखिस्तान
दस्ते-ए-लुट52,000पूर्वी ईरान
मोजाब35,000दक्षिणी कैलिफोर्निया (संयुक्त राज्य अमेरिका)
सेचूरा26,0000उत्तरी-पश्चिमी पेरू (दक्षिणी अमेरिका)

द्वीप (Islands) द्वीप स्थलखंड का ऐसा भाग है जो जलीय भागों द्वारा चारों तरफ से घिरा रहता है। उत्पत्ति के आधार पर द्वीपों को पांच भागों में बांटा जा सकता है:

विवर्तनिक द्वीप (Tectonic Island) ऐसे द्वीपों का निर्माण भूगर्भिक क्रियाओं के द्वारा भूमि के निम्मजन, उत्थान, भ्रंश घाटियों के निर्माण होने अथवा महाद्वीपीय भूभागों के अलग हो जाने से होता है। अटलांटिक एवं प्रशान्त महासागर में इस प्रक्रिया से अधिक द्वीपों का निर्माण हुआ है।

निक्षेपजनित द्वीप (Depositional Island) विभिन्न कारकों (जैसे-नदियां, ग्लेसियर, महासागरीय धाराएं) के द्वारा अवसादों के जमाव से इन द्वीपों का निर्माण होता है।

अपरदनात्मक द्वीप (Erosional Island) जब मुलायम चट्टानों का अपरदन हो जाता है तथा कठोर चट्टानें यथावत् रह जाती हैं तो इसके चारों ओर जल जमाव से द्वीप का निर्माण होता है, जिसे अपरदनात्मक द्वीप कहते हैं। ग्रीनलैंड द्वीप का निर्माण हिमानी अपरदन से हुआ है।

ज्वालामुखी द्वीप (VolcanicIslands) जब लावा का जमाव समुद्री सतह से बाहर हो जाता है तो इससे द्वीप का निर्माण होता है। हवाई द्वीप, अल्यूशियन द्वीप, आदि इसके उदाहरण हैं।

प्रवाल द्वीप (Coral Islands) प्रवाल कीटों के अस्थि-पंजरों से निर्मित द्वीप प्रवाल द्वीप कहलाता है। लक्षद्वीप, मालदीप, बरमूडा, आदि इसके उदाहरण हैं

विश्व के सबसे बड़े द्वीप

द्वीपस्थानक्षेत्र (वर्ग किमी)
ग्रीनलैंड आर्कटिक महासागर21,75,000
न्यू गुआना महासागर पश्चिमी प्रशांत 789,900
बोर्निआहिन्द महासागर (हिन्द महासागर में सबसे बड़ा)(751,000)
मेडागास्करहिन्द महासागर(587,041)
बैफिन द्वीप, कनाडाआर्कटिक महासागर(5,07,451)
सुमात्रा, इंडोनेशियाहिन्द महासागर(4,22,200)
होंशु, जापान उत्तरी प्रशांत (2,30,092)
ग्रेट ब्रिटेनउत्तरी अटलांटिक (2,29,849)
विक्टोरिया द्वीप, कनाडाआर्कटिक महासागर (2,17,290)
इलेसमेयर द्वीप, कनाडाआर्कटिक महासागर(1,96,236)

जलसंधियां (Straits)

जलसंधि दो अलग-अलग जलीय भागों को जोड़ती है एवं दो स्थलखंडों को अलग करती है। इसका अपना अलग व्यापारिक एवं सामरिक महत्त्व है।

विश्व की प्रमुख जलसंधियां

जलसंधि जोड़ती हैस्थिति
मलक्का जलसंधि अंडमान सागर एवं दक्षिण चीनसागर इंडोनशिया-मलेशिया
पाक जलसंधिपाक खाड़ी एवं बंगाल की खाड़ी भारत-श्रीलंका
सुंडा जलसंधिजावा सागर एवं हिंद महासागरइंडोनेशिया
यूकाटन जलसंधिमैक्सिको की खाड़ी एवं कैरीबियन सागरमैक्सिको-क्यूबा
मेसिना जलसंधिभूमध्यसागरइटली-सिसली
ओरटो जलसंधिएड्रियाटिक सागर एवं आयोनियन सागरइटली अलबानिया
बाब-एल-मंडेब जलसंधिलाल सागर-अदन की खाड़ीयमन जिबूती
कुक-जलसंधिदक्षिण प्रशांत महासागरन्यूजीलैंड
मोजाम्बिक चैनल हिन्द महासागरमोजाम्बिक मालागासी
नार्थचैनलआयरिश सागर एवं अटलांटिक महासागर आयरलैंड-इंग्लैंड
टॉरेस जलसंधि अराफुरा सागर एवं पपुआ की खाड़ीपपुआ न्यूगिनी-आस्ट्रेलिया
बास जलसंधिटस्मान सागर एवं दक्षिण सागरऑस्ट्रेलिया
बेरिंग जलसंधिबेरिंग सागर एवं चुकची सागरअलास्का-रूस
बोनी-फैसियो भूमध्य सागरकोर्सिका-सार्डीनिया
बास्पोरस जलसंधिकाला सागर एव मरमरा सागर तुर्की
डर्डेनलेत्र जलसंधिमरमरा सागर एवं एजियन सागर तुर्की
डेविस जलसंधि बैफिनखाड़ी एवं अटलांटिक महासागरग्रीनलैड-कनाडा
डेनमार्क जलसंधिउत्तर अटलांटिक एवं आर्कटिक महासागरग्रीनलैंड-आइसलैंड
डोबर जलसंधि इंग्लिश चैनल एवं उत्तरी सागरइंग्लैंड-फ्रांस
फ्लोरिडा जलसंधिमैक्सिको की खाड़ी एवं अटलांटिक महासागरसं रा अमेरिका-क्यूबा
हॉरमुज जलसंधिफारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ीओमान-ईरान
हडसन जलसंधि हडसन की खाड़ी एवं अटलांटिक महासागरकनाडा
जिब्राल्टरजलसंधि भूमध्य सागर एवं अटलांटिक महासागरस्पेन मोरक्को
मैगेलन जलसंधिप्रशांत एवं दक्षिण अटलांटिक महासागरचिली
मकास्सार जलसंधिजावा सागर एवं सेलीबीनसागरइंडोनेशिया
सुंगारू जलसंधि जापान सागर एवं प्रशांत महासागर जापान
तातार जलसंधि जापान सागर एवं ओखोटस्क सागररूस
फोवेकस जलसंधि दक्षिणी प्रशांत महासागर न्यूजीलैंड
फार्मोसा जलसंधिद. चीन सागर-पू. चीन सागरचीन-ताइवान

झील (Lakes)

  • वह जलीय भाग जो पृथ्वी की सतह पर गर्त में संचित है तथा चारों तरफ से स्थलखंड से आवृत है, झील कहलाता है। 
  • विवर्तनिक झीलें : टिटिकाका झील, कैस्पियन सागर |
  •  रिफ्ट घाटी झीलें : टंगानका, मलावी, रूडोल्फ, एडवर्ड, अल्बर्ट, मृत सागर।
  • ज्वालामुखी क्रिया से संबद्ध झीलें (क्रेटर झील, कॉल्डेरा झील) : ओरेगन झील, टोबा झील । 
  • नदी द्वारा निक्षेपण से निर्मित झील : गोखूर झील | 
  • समुद्री निक्षेप से निर्मित झील : लैगून, डेल्टा । 
  • कार्ट झील : युगोस्लावियाकी स्कुटारी झील 
  • सर्क या टार्न झील : लाल टार्न झील (यूके) 
  • केटल झील : ओक्रने (स्कॉटलैंड)

विश्व की महत्त्वपूर्ण झीलें

नामदेश
कैस्पियन सागरकजाकिस्तान, रूस, तुर्कमेनिस्तान
सुपीरियरअमेरिका-कनाडा
विक्टोरियायूगांडा-केन्या-तंजानिया
अराल सागरकजाखिस्तान-अजरबैजान
हुरोनअमेरिका-कनाडा
मिशिगनअमेरिका
तनगायिकाबुरूंडी-तंजानिया-जांबिया-जायरे
बैकलरूस
ग्रेट बीयरकनाडा
न्यासातंजानिया-मोजांबिक-मलावी
ग्रेट स्लेव कनाडा
एरीअमेरिका-कनाडा
विन्निपेगकनाडा
ओंटारियोअमेरिका-कनाडा

विशेष अर्थों में सबसे बड़ी झीलें

(a) ताजे पानी की सबसे बड़ी झील (पानी की मात्रा)बैकाल (साइबेरिया)
(b) ताजे पानी की सबसे बड़ी झीलसुपीरियर
(c) सर्वाधिक ऊंची नौगम्य झीलटिटिकाका (बोलीविया)
(d) सबसे गहरी झीलबैकाल (साइबेरिया)
(e) सर्वाधिक खारे पानी की झीलडॉन जुआन
(1) सबसे नीची झील (समुद्र तल से 2500 फीट नीचे)मृतसागर
(g) मेटेओरिक क्रेटर झीललोनार (महाराष्ट्र, भारत में)

Share this page

चट्टान एवं खनिज ( Rocks and minerals )

चट्टान की रचना खनिज पदार्थों से मिलकर होती है। पृथ्वी की बाहरी ठोस परत लिथोस्फीयर, चट्टान से निर्मित है। चट्टान कठोर तथा मुलायम एवं विभिन्न रंगों की हो सकती है। उदाहरणार्थ-ग्रेनाइट कठोर चट्टान है जबकि चीका और रेत मुलायम चट्टान । गैब्रो काला होता है जबकि क्वार्टजाइट दूधिया सफेद भी हो सकता है। सामान्यतः चट्टानें तीन प्रकार की होती हैं: आग्नेय, अवसादी एवं कायान्तरित । 

चट्टानों का वैज्ञानिक अध्ययन पेट्रोलॉजी (Petrology) कहलाता है जो भूगर्भशास्त्र की एक शाखा है। 

चट्टानों का निर्माण जिन पदार्थों से होता है वे खनिज कहलाते हैं। चट्टानों में पाए जाने वाले सर्वाधिक सामान्य खनिज क्वार्ट्ज और फेल्ड्स्पार हैं।

विभिन्न खनिजों की कठोरता अलग-अलग होती है। कठोरता के अंश (degree) 1 से 10 के आधार पर दस खनिजों का चयन किया गया है

खनिजकठोरता
टाल्क 1
कैल्साइट3
एपेटाइट5
क्वार्ट्स7
कोरन्डम9
जिप्सम2
फ्लुओराइट4
फेल्ड्स्पार6
पुखराज8
हीरा10

निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर चट्टानों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है :

(i) आग्नेय चट्टान (Igneous Rocks) 

(ii) अवसादी चट्टान (Sedimentary Rocks) 

(iii) रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rocks)

आग्नेय चट्टान

  • आग्नेय चट्टान का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने से होता है। 
  • सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ था, अतः इसे प्राथमिक शैल भी कहते हैं। 
  • आग्नेय चट्टान में जीवाश्म व परतें नहीं पायी जाती हैं और ये सामान्यतः रवेदार होती हैं। 
  • आग्नेय चट्टानें सभी चट्टानों की पूर्वज हैं और 85% क्रस्ट इन्हीं का बना है। बेसाल्ट, डोलेराइट, ग्रेनाइट और फेल्ड्स पार इसके उदाहरण हैं। 
  • ये चट्टानें अपेक्षाकृत कठोर होती हैं और इनमें पानी नहीं रिसता । इनमें महत्त्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं जैसे-निकेल, तांबा, शीशा, जस्ता, क्रोमाइट, मैगनीज, सोना, हीरा और प्लेटिनम।। 
  • आग्नेय चट्टानों के गुम्बदाकार जमाव को बैथोलिथ कहते हैं जो पृथ्वी की सतह के नीचे जमा होती है। ये मुख्यतः ग्रेनाइट से बनी होती है। उदाहरण : अमेरिका का इडाहो बैथोलिथ

अवसादी चट्टानें

  • इन चट्टानों का निर्माण पृथ्वी की सतह पर आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों के अपरदन और जमाव से होता है। इन्हें परतदार चट्टान भी कहते हैं। 
  • सिलिका, कैल्साइट तथा लौह यौगिक आदि इसके संयोजक तत्व हैं।
  • भूपृष्ठ का लगभग 75% भाग अवसादी चट्टानों से आवृत है। 
  • लेकिन क्रस्ट के निर्माण में इसका योगदान केवल 5% है। 
  • अवसादी चट्टानें क्लास्टिक और नॉन-क्लास्टिक होती हैं । 
  • क्लास्टिक अवसाद मूल चट्टान से टूटे हुए अवसाद हैं जबकि नॉन-क्लास्टिक अवसाद नए जमा हुए खनिज पदार्थ हैं। 

अवसादी चट्टानों को मुख्यतः तीन मुख्य वर्गों में बांटा जा सकता हैं : 

  • (a) यांत्रिक क्रियाओं द्वारा निर्मित बलुआ पत्थर, कांग्लोमरेट, चीका मिट्टी, लोयस, ग्रेवेल, अलुवियम आदि ।
  • (b) जैविक तत्वों द्वारा निर्मित चूना पत्थर, कोयला, प्रवालभिति, पेट्रोलियम आदि। 
  • (c) रासायनिक तत्वों से निर्मित शैलखड़ी, नमक की चट्टान, बोरेक्स, चूनापत्थर, हैलाइट, पोटाश, जिप्सम और नाइट्रेट आदि। 

नोट : संसार का अधिकांश पेट्रोलियम अवसादी चट्टानों में पाया जाता है।

रूपान्तरित चट्टानें

  • आग्नेय एवं परतदार चट्टानों के रूपांतरण से इसका निर्माण होता है। 
  • यह रूपान्तरण उच्च ताप, दाब, तनाव आदि क्रियाओं के द्वारा होता है। 
  • अधिक ताप के कारण इनमें जीवाश्म नष्ट हो जाते हैं, अतः रूपान्तरित चट्टानों में प्रायः जीवाश्मों का अभाव रहता है। ये सबसे कठोर चट्टाने हैं।

प्रमुख रूपान्तरित चट्टानें तथा उनका मौलिक रूप

मौलिक चट्टानरूपान्तरित चट्टान
चूना पत्थरसंगमरमर
बलुआ पत्थरक्वार्जाइट
शेल/चीकास्लेट
ग्रेनाइटशैल
गैब्रोसर्पेनटाइन
एम्फीबोलाइट्सग्रेन्युलाइट्स
बेसाल्टिकसिस्ट
कोयलाग्रेफाइट

Share this page