भारत की नागरिकता (Citizenship of india)

नागरिकता 

  • संविधान के भाग-II, अनुच्छेद-5 से 11 तक में नागरिकता के संबंध में प्रावधान किया गया है। 
  • अनुच्छेद-5 के अनुसार संविधान के आरंभ होने पर प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक होगा, जिसका भारत में अधिवास है। 
  • अनुच्छेद-6 पाकिस्तान से प्रवजन करके आये व्यक्तियों की नागरिकता के संबंध में प्रावधान करता है। 
  • अनुच्छेद-7 में पाकिस्तान को प्रवजन करने वाले लोगों की नागरिकता के बारे में उपबंध किया गया है। 
  • अनुच्छेद-8 भारत में जन्में किन्तु विदेशों में रहने वाले व्यक्तियों को कुछ शर्तों को पूरा करने पर नागरिकता का अधिकार प्रदान करता है। 
  • अनुच्छेद-9 में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारत की नागरिकता समाप्त हो जाएगी। 
  • अनुच्छेद-11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित राज्य विषयों के संबंध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है। 

भारत में नागरिकता प्राप्त करने की विधियाँ हैं

* भारत में जन्म तथा माता-पिता में कोई भी भारतीय नागरिक होना चाहिए। 

* उत्तराधिकार से, पंजीकरण द्वारा, देशीयकरण (Natualization) द्वारा।

नागरिकता समाप्त होने की तीन विधियाँ 

  • परित्याक (Renunciation) • यह एक स्वैच्छिक कर्म है, जिसके द्वारा कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त करने के पश्चात् अपनी भारतीय नागरिकता का परित्याग करता हैं यह प्रावधान कुछ शर्तों पर निर्भर करता है। 
  • पर्यवसान (Termination) यह कानूनी प्रक्रिया द्वारा सम्भव होता है, जब कोई भारतीय नागरिक स्वच्छापूर्वक किसी दूसरे देश की नागरिकता ग्रहण कर लेता है। उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है। 
  • वंचित किया जाना (Deprivation) पंजीकरण (registration) अथवा देशीयकरण (natualisation) द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए अनचित साधनों के प्रयोग का आरोप होने पर, यह भारत सरकार द्वारा नागरिकता की अनिवार्य रूप से की जाने वाली समाप्ति है।

मूल अधिकार

  • भारतीय संविधान के भाग-III तथा अनुच्छेद-12 से 35 तक में मूल अधिकारों का वर्णन किया गया है। 
  • भारत में मूल अधिकार की सर्वप्रथम मांग स्वराज विधेयक 1895 में की गई थी। 1925 में ऐनी बेसेन्ट ने कामन वेल्थ ऑफ इण्डिया बिल के माध्यम से तथा 1928 में मोती लाल नेहरू ने नेहरू रिपोर्ट के माध्यम से इसकी मांग की। 1931 में करांची कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित मूल अधिकार प्रस्ताव स्वीकार किया गया। 1945 में भारत के संविधान के संबंध में सर तेज बहादुर सप्रू द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय संविधान में मूल अधिकारों को शामिल किया जाना चाहिए।
  • संविधान के भाग-III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार राज्य के विरुद्ध दिये गये हैं न कि सामान्य व्यक्तियों के विरुद्ध । व्यक्तियों के अनुचित कृत्यों के विरुद्ध साधारण विधि में उपचार उपलब्ध होते हैं। 
  • अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता, जो मूल अधिकारों को कम करती हो या छीनती हो। यदि राज्य ऐसी कोई विधि बनाता है तो वह उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी। किसी भी विधि, उपविधि अथवा कार्यकारिणी के आदेश द्वारा यदि मूलाधिकारों का अतिक्रमण होता है तो उसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। 
  • अनुच्छेद-13 उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों का प्रहरी बना देता है। उच्चतम न्यायालय न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के अंतर्गत ऐसी विधियों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, जो मूल अधिकारों का उल्लंघन करती हों। 
  • शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) और सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार (1964) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 368 में विहित प्रक्रिया का उपयोग कर संसद द्वारा मूल अधिकारों में भी संशोधन किया जा सकता है। 
  • परंतु गोलक नाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उक्त निर्ण के विरुद्ध 6 : 5 के बहुमत से यह यि दिया कि अनुच्छेद 368स के अधीन संसद को मूलाधिकारों में संशोधन की शक्ति प्राप्त नहीं है। 
  • केशवानंद भारतीय केरल राज्य (1973) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने पुन: यह स्थापित किया कि संसद को मूलाधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में
  • संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है। परंतु ऐसा कोई संशोधन नहीं होगा, जिससे संविधान के मौलिक ढाँचे को आघात पहुँचता हो। उच्चतम न्यायालय ने बाद के अन्य कई मामलों में भी यही मत व्यक्त किया है। 
  • भारतीय संविधान में नागरिकों को छह प्रकार के मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं।
  • संविधान के भाग-III के मूल अधिकारों की एक सामान्य विशेषता यह है कि वे राज्य के विरुद्ध व्यक्ति को प्रदान किये गए हैं, लेकिन कुछ अधिकार न केवल राज्यों के विरुद्ध बल्कि प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी प्राप्त हैं। उदाहरण के लिए सार्वजनिक स्थलों के उपयोग के बारे में भेदभाव का प्रतिपेध (अनुच्छेद 15(2)), अस्पृश्यता का प्रतिषेध (अनुच्छेद 17) विदेशी उपाधि स्वीकार करने का परिषेध (अनुच्छेद 18(3)(4)), मानव के दुर्व्यापार का प्रतिषेध (अनुच्छेद 23) खतरनाक कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (अनुच्छेद-24)। 
  • कुछ मूल अधिकार केवल नागरिकों को दिये गए हैं, विदेशियों को नहीं। उदाहरण के लिए- धर्म मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का प्रतिपेध (अनुच्छेद 15), लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानत (अनुच्छेद 16), भाषण व अभिव्यक्ति, सम्मेलन संगम, आवागमन, निवास और पेशे की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19), 29 और 30। 
  • कुछ मूल अधिकार सभी व्यक्तियों को प्राप्त हैं, चाहे वे विदेशी हों या भारतीय नागरिक। उदाहरण के लिएविधि के समक्ष समानता तथा विधियों का समान संरक्षण (अनुच्छेद 14), अपराधों के लिए दोषसिद्ध के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 22) धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28)।

मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण

समता का
अधिकार (अनु. 14-18)
स्वतंत्रता अधिकार (अनु. 19-22)शोषण के विरुद्ध
अधिकार (अनु. 23-24)
धर्म की स्वतन्त्रता
का अधिकार
(अनु. 25-28)
संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनु. 29-30)सांविधानिक उपचारों का
अधिकार
(32-35)
1. विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण (अनु. 14) 2. धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध (अनु. 15) 3. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनु. 16) 4. अस्पृश्यता का अन्त (अनु. 17) 5. उपाधियों का अन्त (अनुच्छेद 18)1. वाक स्वातन्त्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण (अनु. 19) 2. अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण (अनु. 20) 3. प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता का संरक्षण (अनु. 21) 4. कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (अनु. 22)
1. मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध (अनु. 23) 2. कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (अनु. 24)
1. अंतःकरण की | और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतन्त्रता (अनु. 25) | 2. धार्मिक कार्यों
के प्रबन्ध की स्वतन्त्रता (अनु. 26) | 3. किसी विशिष्ट
धर्म की अभिवृद्धि | के लिए करों के | बारे में संदाय की | स्वतन्त्रता (अनु. 27) 4. कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थिति होने के बारे में स्वतन्त्रता (अनु. 28)
1. अलपसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण (अनु. 29) 2. शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार (अनु. 30)1. मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार (अनु. 32) 2 मलाधिकारों में उपांतरण (संशोधन) करने की संसद की शक्ति (अनु. 33) 3. सैनिक कानून वाले क्षेत्रों में मूलाधिकारों पर प्रतिबंधन (अनु.34) 4. मूल अधिकारों सम्बन्धी उपबन्धों को प्रभावी करने हेतु प्रावधान (अनु. 35)

समानता का अधिकार

  • समानता का अधिकार पहला मौलिक अधिकार है, जिसका वर्णन अनुच्छेद 14 से 18 तक में किया गया है। 
  • अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण का अधिकार- इसमें पहली पदावली ब्रिटेन से ली गयी है जिसका अर्थ है कि कानून के सामने सभी व्यक्ति बराबर हैं। दूसरी पदावली अमेरिका से ली गयी जिसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों में पाये जाने पर कानून सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करेगा। 
  • अनुच्छेद 15 राज्य को यह आदेश देता है कि वह किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव न करे । 
  • अनुच्छेद 15 के अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही प्रदान किये गये हैं। विदेशियों को नहीं। 
  • अनुच्छेद 15 का खण्ड-2 सार्वजनिक स्थानों पर भेदभाव का निषेध करता है। 
  • अनुच्छेद 15 का खण्ड 3 राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • अनुच्छेद 15 का खण्ड 4 प्रथम संवैधानिक संशोधन द्वारा जोड़ा गया। इसमें राज्य द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का उन्नति के लिए विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गयी है। सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 15(4) के आधार पर ही किया गया है। 
  • इस प्रकार अनुच्छेद 15 के खण्ड 3 और अनुच्छेद 15(1) और (2) के सामान्य नियम के अपवाद हैं। 
  • अनुच्छेद 16 लोक सेवाओं में अवसर की समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 16 के खण्ड 2 में कहा गया है कि राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, उद्भव,निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो किसी नागरिक को अपात्र माना जाएगा और न कोई विभेद किया जाएगा। 
  • अनुच्छेद 16(4) के अनुसार राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, नियुक्तियों या पदों लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है। इस प्रकार का उपबंध तभी किया जा सकता है जब वर्ग पिछड़ा हो और उसका राज्यधीन पदों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हुआ हो।
  • अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और उसका किसी भी रूप में आचरण को निषिद्ध करता है। अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागू करना दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। 
  • सरकार ने 1955 में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम पारित किया बाद में इसे 1976 में संशोधित करके सिविल (नागरिक) अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976 पारित किया जो आज प्रवृत्त है। 
  • अनुच्छेद 18 उपधियों का अंत- 1. राज्य सेना सम्बन्धी या शिक्षा सम्बन्धी सम्मान के सिवाय और कोई उपाय नहीं प्रदान करेगा। 2. भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा किन्तु यदि वह उपाधि स्वीकार करता है तो उसे राष्ट्रपति से पूर्व अनुमति लेनी होगी।
  • भारत सरकार ने 1954 से भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे पुरस्कार देना शुरू किया था किन्तु 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने इन उपाधियों का अन्त कर दिया। अन्त में 1980 में कांग्रेस की सरकार ने इन्हें पुनः देना शुरू किया।

स्वतंत्रता का अधिकार 

  • स्वतंत्रता के अधिकार का वर्णन अनुच्छेद 19-22 तक किया गया है। 
  • अनुच्छेद 19 भारत के नागरिकों को 6 बुनियादी स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है। ये निम्नलिखित हैं
  • 1. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 
  • 2. बिना हथियारों के शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्रता 
  • 3. संघ बनाने की स्वतंत्रता 
  • 4. भारत के राज्यक्षेत्र में स्वतंत्र भ्रमण की स्वतंत्रता 
  • 5. भारत के किसी भी भाग में निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता 
  • 6. वृत्ति, आजीविका, व्यापार या कारोबार की स्वतंत्रता उपर्युक्त स्वतंत्रतायें राज्य के विरुद्ध सभी नागरिकों को प्राप्त हैं, लेकिन ये कोई आत्यंतिक या असीमित अधिकार नहीं है। 
  • विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता तथा समाचारों को जानने का अधिकार भी सम्मिलित है। 
  • अनुच्छेद 20 में सभी व्यक्तियों को चाहे वे विदेशी हों या भारतीय नागरिक यह अधिकार देता है कि- 1) जब तक उसने किसी कानून की अवहेलना करके कोई अपराध न किया हो, उसे दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता या जिस समय किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया उस समय उस अपराध के लिए जितने दण्ड की संभावना थी उस व्यक्ति को उससे अधिक दण्ड नहीं दिया जा सकता। 2) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दण्ड नहीं दिया जा सकता और 3) किसी व्यक्ति को अपने ही विरुद्ध गवाही देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। 
  • अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संबंध में उपबंध करता है। 
  • अनुच्छेद 21 गारंटी देता है कि किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही उसके प्राण और दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है अन्यथा नहीं। 
  • प्राण और दैहिक स्वतंत्रता केवल शारीरिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है वरन् इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीवित रहने का अधिकार भी सम्मिलित है। अनुच्छेद 21(क) 86वाँ संविधान संशोधन (2002 ई.) द्वारा जोड़ा गया है जो शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित करता है और प्रत्येक राज्य का यह कर्त्तव्य होगा कि वह 6-14 वर्ष के बालकों को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराये। 
  • अनुच्छेद 22 व्यक्ति को गिरफ्तारी तथा निरोध से संरक्षण प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 22 यह प्रावधान करता है कि जो व्यक्ति गिरफ्तार किया जाता है, उसे गिरफ्तारी के कारणों से अवगत कराना आवश्यक है। प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को अधिवक्ता के माध्यम से अपनी सफाई पेश करने का अधिकार दिया गया है तथा प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित करना आवश्यक है। 
  • अनुच्छेद 22 के खण्ड (3) से (7) तक मं निवारक निरोध से संबंधित प्रावधान किया गया है। 
  • अनुच्छेद 22 संसद को निवारक निरोध से संबंधित कानून बनाने का अधिकार देता है। 
  • निवारक निरोध के अंतर्गत गिरफ्तार व्यक्ति को अधिकतम तीन माह के लिए निरोध में रखा जा सकता है। 
  • सर्वप्रथम 1950 में संसद ने निवारक निरोध अधिनियम पारित किया जिसे 1969 में प्रयास कर दिया गया। सन् 1971 में आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (मीसा) पारित किया गया, जिसे 1977 में जनता सरकार ने निरस्त कर दिया। पुनः 1980 ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम पारित किया।

शोषण के विरुद्ध अधिकार

  • अनुच्छेद 23 मनुष्यों के क्रय-विक्रय, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम को प्रतिषिद्ध करता है तथा इसके उल्लंघन को दण्डनीय अपराध घोषित करता है। 
  • अनुच्छेद 23 न केवल राज्य के विरुद्ध वरन् प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी संरक्षा प्रदान करता है। 
  • लेकिन इसका एक अपवाद भी है। राज्य को सार्वजनिक हित के लिए अनिवार्य सेवा आरोपित करने का अधिकार दिया गया है। लेकिन ऐसी सेवा धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के विभेद के बिना सभी पर समान रूप से आरोपित की जानी चाहिए।
  • अनुच्छेद 24 यह उपबंध करता है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने या खानों में किन्हीं अन्य खतरनाक कायों में नहीं लगाया जाएगा।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

  • भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है। अतः संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत भारत के सभी व्यक्तियों को धर्म में विश्वास करने, धार्मिक कार्य करने व उका प्रचार करने का अधिकार प्रदान किया गया। 
  • अनुच्छेद 25 यह प्रावधान करता है कि सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार है। किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता का यह अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंधित किया जा सकता है। 
  • अनुच्छेद 26 सभी धार्मिक सम्प्रदायों तथा उनकी शाखाओं को यह अधिकार देता है कि वे धार्मिक और मूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और उनका पोषण कर सकते हैं और उन्हें संपत्ति के स्वामित्व, अर्जन और प्रबंध का अधिकार होगा। 
  • अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म की अभिवृद्धि या उसके पोषण में व्यय के लिए कोई कर अदा करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 28 यह प्रावधान करता है कि जो विद्यालय पूरी तरह सरकारी राजकोष में चलाए जाते हैं, उनमें किसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी और जो विद्यालय सरकार से आंशिक वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं अथवा जो राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त हैं, उनमें विद्यार्थी या उसके संरक्षक की स्वीकृति के बिना दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकार 

  • भारत विभिन्न धर्मों, भाषाओं तथा संस्कृतियों का देश है। अतः संविधान में अल्पसंख्यक वर्गों की भाषा, लिपि और संस्कृति की सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। 
  • अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण प्रत्येक अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को बनाए रखने के अधिकार को गारंटी देता है। 
  • अनुच्छेद 30 शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार। (1) सभी अल्पसंख्यक वर्गों को चाहे वे धर्म पर आधारित अल्पसंख्यक वर्ग हो, चाहे भाशा के आधार पर अल्पसंख्यक वर्ग हों, अपनी पसंद की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करने और उनके प्रबंध का अधिकार देता है। 
  • अनुच्छेद 30 के खण्ड (2) में यह प्रावधान किया गया है कि शिक्षा संस्थाओं को सहायता देते समय राज्य इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा कि कोई संस्था किसी विशेष धार्मिक या भाषायी अल्पसंख्यक वर्ग से संबंधित है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

  • संविधान के भाग 3 के मौलिक अधिकारों की सार्थकता तभी होगी जब उन्हें लागू किया जा सके और उनके उल्लंघन की स्थिति में उपचार प्राप्त किया जा सके। हमारा संविधान न केवल कतिपय मूल अधिकारों की गारंटी देता है वरन् सरकार द्वारा नागरिकों के अधिकारों की अवहेलना के लिए किये गये कार्यों के विरुद्ध नागरिकों को उपचार प्राप्त करने का भी अधिकार देता है। नागरिक अपने अधिकारों के विरुद्ध सरकार के किसी भी कृत्य को न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं। 
  • अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय को तथा अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध अभिलेख जारी करने की शक्तियाँ प्राप्त हैं। 
  • उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध निम्नलिखित 5 प्रकार के अभिलेख जारी करता है (1) बंदी प्रत्यक्षीकरण, (2) परमादेश, (3) प्रतिषेध, (4) उत्प्रेरण और (5) अधिकार पृच्छा।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण : यह रिट उस व्यक्ति के विरुद्ध जारी किया जाता है जो किसी अन्य व्यक्ति को निरोध में रखता है। इसमें गिरफ्तार करने वाले व्यक्ति को यह आदेश दिया जाता है कि 24 घंटे के अंदर वह उस व्यक्ति को दंडाधिकारी के समक्ष उपस्थित करे, जिसको उसने गिरफ्तार किया है। इसमें यात्रा की अवधि सम्मिलित नहीं होती है।
  • परमादेश (लोकतंत्र का प्रहरी) : यह रिट न्यायालय द्वारा उस समय जारी की जाती है जब कोई प्राधीकारी या न्यायिक अधिकारी अपने कर्तव्यों में उपेक्षा बरते और न्यायालय रिट जारी करके उसे अपना कर्तव्य करने के लिए बाध्य करता है।
  • प्रतिषेध : यह रिट अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध जारी की जाती है इस रिट को जारी करके अधीनस्थ न्यायालयों को अपनी अधिकारिता के बाहर कार्य करने से रोका जाता है।
  • उत्प्रेषण : यह रिट भी अधीनस्थ न्यायालयों को जारी की जाती है। इस रिट को जारी करके अधीनस्थ न्यायालयों को यह निर्देश दिया जाता है कि वे अपने पास लम्बित मुकदमों के न्याय निर्णयन के लिए उसे वरिष्ठ न्यायालय को भेजें।
  • इस प्रकार प्रतिषेध और उत्प्रेषण दोनों रिटों के अधिकार | एक से ही हैं। लेकिन प्रतिषेध रिट प्रारंभिक चरण में जारी की जाती है और उत्प्रेषण उत्तरवर्ती चरणों में।
  • अधिकार पृच्छा : अधिकार पृच्छा द्वारा लोकपद पर बने किसी व्यक्ति से उसके पद पर बने रहने का औचित्य पूछा जाता है। 
  • केवल नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार :
  • अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30 
  • सभी को प्राप्त मौलिक अधिकार :
  • अनुच्छेद 14, 20, 21, 23, 24, 25, 26, 27 
  • भाग III के बाहर उल्लिखित अधिकार :
  • अनुच्छेद 300 क : संपत्ति का अधिकार (right to property)- विधि के प्राधिकार (authority of law) से ही किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। 
  • अनुच्छेद 301 : व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता (freedom of trade, commerce & intercourse)- इस भाग के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र व्यापार, वाणिज्य और समागम अबाध होगा। 
  • अनुच्छेद 326 : वयस्क मताधिकार (adult suffrage)लोकसभा तथा प्रत्येक राज्य की विधान सभाओं के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार (18 वर्ष) के आधार पर होंगे। (61वाँ संविधान संशोधन 1989 ई.)

संपत्ति का अधिकार

मूल संविधान के अनुच्छेद 19(1), 31, 31(A), 31(B) और 31(C) में संपत्ति के अधिकार और उस पर लगाई गई सीमाओं से संबंधित प्रावधान किए गए थे। किन्तु, 44वें संविधान संशोधन, 1978 के द्वारा संपत्ति के अधिकार को संविधान के भाग-12 में एक नया अनुच्छेद 300-A जोड़कर उसमें शामिल कर दिया गया। 

अनुच्छेद 300-A के अनुसार, कानून के आदेश के बिना किसी को भी उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा। इस प्रकार, अब संपत्ति के अधिकार को अन्य मूल अधिकारों की भाँति संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं है, बल्कि इसे केवल एक कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त

राज्य के नीति के निदेशक तत्व 

  • संविधान के भाग IV के अनुच्छेद 36 से 51 में नीति निदेशक तत्वों का प्रावधान किया गया है।
  •  नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत कुछ आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को रखा गया है, जिनका पालन करना राज्यों का कर्तव्य है। इनका उद्देश्य सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र तथा लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। 
  • डॉ. अम्बेडकर ने कहा है कि ‘नीति निदेशक तत्व भारतीय संविधान की अनोखी विशेषता है। इनमें एक कल्याणकारी राज्य का आदर्श निहित है।’
  • यद्यपि की राज्य के नीति निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है तथापि देश के शासन में ये मूलभूत हैं और राज्य का यह कर्त्तव्य है कि विधि बनाने में इन तत्वों का ध्यान रखें। 
  • संविधान के भाग 4 के नीति निदेशक तत्वों को निम्नलिखित पाँच समूहों में बाँटा जा सकता है

(क) आर्थिक न्याय संबंधी निदेशक तत्व

  • पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो। (अनुच्छेद 39(क)) 
  • समुदाय की भौतिक सम्पदा का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बँटा हो, जिससे सर्वोत्तम सामूहिक हित हो। (अनुच्छेद 39(ख)) 
  • आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले, जिससे धन और उत्पादन के साधन का सर्वसाधारण के अहित में सकेन्द्रणन हो। (अनुच्छेद 39 (ग))
  • पुरुष और स्त्री दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन हो। (अनुच्छेद 39(घ)) 
  • कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को अपनी आयु और शक्ति के प्रतिकूल रोजगार में न जाना पड़े। (अनुच्छेद 39(5)) 
  • बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वास्थ्य विकास केअवसर और सुविधायें दी जायें तथा बालकों एवं अवयस्क व्यक्तियों के शोषण तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाये। (अनुच्छेद 39(च)) 
  • राज्य अपनी सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर प्रत्येक व्यक्ति के लिए काम पाने, शिक्षा पाने, तथा बेकरी, बुढ़ापा बीमारी और अंगहानि की दशाओं में सार्वजनिक सहायता पाने का उपबंध करेगा। (अनुच्छेद 41) 
  • अनुच्छेद 43 में राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह कर्मकारों को काम निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और उसका संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएँ तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्रापत करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से ग्रामों में कुटीर उद्योगों को बढ़ाने का प्रयास करेगा। 
  • अनुच्छेद 38(2) यह उपबंध करता है कि राज्य आय की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा। 

(ख) सामाजिक न्याय संबंधी निदेशक तत्व

  • राज्य जनता के दुर्बल वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा तथा अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा तथा सामाजिक अन्याय और हर प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा (अनुच्छेद 46) । 
  • राज्य अशिक्षा को दूर करने के लिए 14 वर्ष तक की आयु के सभी बालकों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का उपबंध करेगा (अनुच्छेद 45) 
  • राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 44) 
  • राज्य यह सुनिश्चित करे कि विधिक व्यवस्था इस प्रकार कार्य करे कि सभी को अवसर के आधार सुलभ हों और आर्थिक या किसी अन्य अयोग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये तथा उपर्युक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करे। (अनुच्छेद 39(क))

(ग) राजनीति संबंधी निदेशक तत्व

  • राज्य ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उनहें स्वायत्त शासन की इकाई के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों। (अनुच्छेद 40)
  • राज्य लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए कदम उठाएगा। (अनुच्छेद 50) 

(घ) पर्यावरण संबंधी निदेशक तत्व

  • राज्य देश के पर्यावरण की सुरक्षा तथा उनमें सुधार करने का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा। (अनुच्छेद 48 (क)) 
  • राज्य राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं की रक्षा करेगा (अनुच्छेद 49) 
  • राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य होगा कि वह लोगों के पोषाहार स्तर और जीवनस्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य में सुधार करने का प्रयास करे तथा मादक पेय पदार्थों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों प्रयोजन को छोड़कर उपयोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करे। (अनुच्छेद 47) 
  • राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों पर संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेषकर गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारु और वाहक ढोरों की नस्ल के परिक्षण और सुधारने के लिए औरउनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा। (अनुच्छेद 48) 

(ङ) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा संबंधी निदेशक तत्व

  • राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा। 
  • राज्यों के बीच न्याय और सम्मानपूर्ण संबंध बनाए रखने का प्रयास करेगा। 
  • एक-दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का प्रयास करे। 
  • अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करे। 
  • सर आइवर जेनिंग्स ने निदेशक तत्वों को पूण्यात्मा लोगों की महत्वकांक्षा मात्र कहा है। 
  • डॉ. पणिकर के अनुसार नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद लाना है। 
  • डॉ. अम्बेडकर के अनुसार नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है जो राजनैतिक लोकतंत्र से भिन्न है। 
  • ग्रेनविल आस्टिल के अनुसार नीति-निदेशक तत्वों का उद्देश्य सामाजिक क्रांति के उद्देश्यों की प्राप्ति है।

मौलिक अधिकार और निति निदेशक तत्व में अन्तर

नीति निर्देशक सिद्धांतमौलिक अधिकार
1यह आयरलैण्ड के संविधान से लिया
गया है।
यह संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
2. | इसका वर्णन संविधान के भाग-4 में किया गया है। इसका वर्णन संविधान के भाग-3 में किया | गया है।
3 इसे लागू कराने के लिए न्यायालय नहीं जाया जा सकता है।इसे लागू कराने के लिये अनु. 32 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय एवं अनु. 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय में जाया जा सकता है।
4. | यह समाज की भलाई
के लिए है।
यह व्यक्ति के अधिकार के लिए है।
5 इसके पीछे राजनैतिक मान्यता है।
मौलिक अधिकार के पीछे कानूनी मान्यता है।
6 यह सरकार के
अधिकारों को बढ़ाता है
यह सरकार के महत्व को घटाता है।
7 यह राज्य सरकार के द्वारा लागू करने के बाद ही नागरिकों को प्राप्त होता है।
यह अधिकार नागरिकों को स्वतः प्राप्त हो जाता है।

मूल कर्त्तव्य (भाग 4-क) 

  • मूल संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार तो दिये गए थे, लेकिन कर्त्तव्यों को कोई उल्लेख नहीं था। 
  • स्वर्ण सिंह कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 42 वें संवैधानिक संशोधन (1976) द्वारा संविधान में मूल कर्त्तव्य शीर्षक से एक नया भाग 4(क) तथा अनुच्छेद 51(क) जोड़ा गया। 
  • भाग 4(क) अनुच्छेद 51(क) में नागरिकों के 10 मूल कर्तव्यों का उल्लेख किया गया था लेकिन अब 11 (86वाँ संविधान संशोधन 2002 ई.) है।

नागरिकों के मूल कर्त्तव्य 

प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह

  • 1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे। 
  • 2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्चादर्शों को हृदय में संजोए और उनका पालन करे। 
  • 3. भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखें। 
  • 4. देश की रक्षा करें और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे। 
  • 5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेद-भाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे, जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो।
  • 6. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें। 
  • 7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्द्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखें। 
  • 8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें। 
  • 9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें। 
  • 10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए, प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले। 
  • 11. प्रत्येक अभिभावक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह अपने बच्चों का अनिवार्य शिक्षा दिलायें। 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा जोड़ा गया।
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