राज्यपाल / राज्यकार्य पालिका ( Governor / State Executive Council )

राज्य कार्यपालिका 

  • भारत में तीन स्तर पर सरकारें कार्य करती हैं- एक केन्द्र की सरकार, दूसरी राज्य सरकार तथा तीसरी स्थानीय सरकार। 
  • राज्य सरकारें भी केन्द्र के ही अनरूप गठित की जाती हैं। जिस प्रकार केन्द्र सरकार का औपचारिक संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होता है और व्यवहारिक वास्तविक शक्तियाँ मंत्रिपरिषद् में विहित होती हैं, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है, उसी प्रकार राज्य सरकारों का औपचारिक, संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है और वास्तविक शक्तियाँ राज्य मंत्रिपरिषद् के पास होती हैं, जिसका अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है।

राज्यपाल (अनु. 153-167) 

राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का वैधानिक प्रधान होता है। मन्त्रिपरिषद राज्य की कार्यपालिका सत्ता की वास्तविक प्रधान होती है जिसका अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है। 

योग्यताएं: 

  • • वह भारत का नागरिक हो।
  • • उसकी आयु कम-से-कम 35 वर्ष हो। 
  • • उसे विधानसभा के सदस्य की योग्यता रखनी चाहिए। 
  • • उसे लाभ का पद नहीं धारण करना चाहिए। 

राज्यपाल की नियुक्ति (अनु. 155) :

राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। संविधान द्वारा स्थापित संसदीय व्यवस्था में राज्यपाल केवल संवैधानिक प्रधान है। अतः राज्यपाल पद के सम्बन्ध में निर्वाचन के स्थान पर मनोनयन की पद्धति को अपनाया गया है। 

शपथ . राज्यपाल को हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलवाता है। 

कार्यकाल (अनु. 156): • राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद पर बना रह सकता है। परम्परा रूप में उसकी पदावधि 5 वर्ष निर्धारित है। संविधान के अनुसार एक ही व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है। 

वेतन : राज्यपाल का वेतन 1,10,000 रु. प्रतिमाह है। यदि वह एक से अधिक राज्यों के राज्यपाल पद का निर्वहन कर रहा है तो उसके वेतन को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जाता है। 

राज्यपाल की शक्तियाँ :

  • वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा उसके परामर्श से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है। वह महाधिवक्ता और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है। 
  • वह व्यवस्थापिका का अधिवेशन बुलाता, स्थगित करता | ओर व्यवस्थापिका के निम्न सदन “विधानसभा’ को भंग कर सकता है। 
  • वह विधानमण्डल की पहली बैठक को सम्बोधित करता है ओर उसके बाद भी वह विधानमण्डल को सन्देश भेज सकता है। 
  • राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक है। वह विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है या उसे पुनर्विचार के लिए विधानमण्डल को लौटा सकता है। यदि विधानमण्डल दूसरी बार विधेयक पारित कर देता है तो राज्यपाल को स्वीकृति देनी होगी। कुछ विधेयकों को वह राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है। 
  • यदि राज्य के विधानमण्डल का अधिवेशन न हो रहा हो, तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है। (अनु. 213) यह अध्यादेश विधानमण्डल की बैठक प्रारम्भ होने के छ: सप्ताह बाद तक लागू रहता है। यदि छ: सप्ताह पूर्व ही विधानमण्डल इस अध्यादेश को अस्वीकृत कर दे, तो उस अध्यादेश को उसी समय समाप्त समझा जायेगा।
  • जिन राज्यों में विधान परिषद् भी है वहाँ का राज्यपाल विधानपरिषद् के 1/6 सदस्यों को ऐसे लोगों में से नामजद करता है जिन्हें साहित्य, कला, विज्ञान, सहकारिता आन्दोलन तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष तथा व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो। 
  • राज्य विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई भी धन विधेयक प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वह व्यवस्थापिका के समक्ष प्रति वर्ष बजट प्रस्तुत करवाता है ओर उकसी अनुमति के बिना किसी भी अनुदान की मांग नहीं की जा सकती है। 
  • जिन विषयों पर राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है उन विषयों सम्बन्धी किसी विधि के विरुद्ध अपराध करने वाले व्यक्तियों के दण्ड को राज्यपाल कम कर सकता, स्थगित कर सकता, बदल सकता या उन्हें क्षमा प्रदान कर सकता है। 
  • अगर वह देखता है कि राज्य का प्रशासन संविधान के उपबन्धों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है तो वह राष्ट्रपति को राज्य में संवैधानिक तन्त्र की विफलता के सम्बन्ध में सूचना देता है और उसकी रिपोर्ट के आधार पर अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होता है। संकटकालीन स्थिति में वह राज्य में राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है।
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