झालावाड राज्य का इतिहास ( History of Jhalawar State )

– 1837 ई. में ‘जालिमसिंह झाला’ के पोते मदनसिंह ने झालावाड़ में एक झाला राज्य की स्थापना की। 1838 ई. में अंग्रेजों ने इसे मान्यता प्रदान कर दी। इस प्रकार झालावाड़ राजस्थान की सबसे अंतिम रियासत थी।

इसकी राजधानी झालरापाटन थी। झालरापाटन चन्द्रभागा नदी के किनारे हैं इसे घंटियों का शहर कहा जाता हैं। 

– यहां के राजराणा राजेन्द्रसिंह ने झालावाड़ के मंदिरों को हरिजनों के लिए खुलवा दिया था।

आमेर के कछवाहों का इतिहास 

– भगवान राम के छोटे बेटे कुश के वंशज कुशवाहा कहलाए, जा कालान्तर में कछवाहा हो गया। 

– नरवर से ‘दुल्हराय’ दौसा आता हैं, व दौसा में बडगुर्जरों को हराकर कछवाहा शासन की स्थापना करता हैं ये घटना 1137 ई. की है। 

– कालान्तर में रामगढ़ में मीणाओं को हराकर इसे अपनी राजधानी बनाता हैं। 

– यहां अपनी कुलदेवी जमवाय माता का मंदिर बनवाता हैं और इसका नाम जमवारामगढ़ रख दिया। 

– दुल्हराय का वास्तविक नाम ‘तेजकरण’ था।

* काकिल देव – 1207 में. मीणा शासकों को आमेर में हराकर वहां आमेर पर अधिकार कर लिया और राजधानी जमवारामगढ़ से आमेर ले आता हैं।

* भारमलः 

– 1562ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा अपनी बेटी हरखा बाई (मरियम उज्जमानी) की शादी

सांभर में अकबर के साथ की। मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाला तथा वैवाहिक सम्बन्ध बनाने वाला

राजस्थान का पहला राजा था। 

* भगवंतदास 

– सरनाल युद्ध में मिर्जा विद्रोह को दबाया अतः अकबर ने नगाड़ा व परचम देकर सम्मानित किया। 

– अपनी बेटी मानबाई (शाहे बेगम) की शादी जहांगीर के साथ की। खुसरो इसी का बेटा था। मानबाई ने

जहांगीर की शराब की आदतो से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। 

* मानसिंह 

– 14 फरवरी 1590 को मानसिंह का राज्याभिषेक किया गया। मानसिंह को 5000 का मनसबदार बनाया। जो बाद में बढ़कर 7000 का हो गया। 

– अकबर ने इसे बंगाल, बिहार व काबूल का सुबेदार बनाया। 

बिहार – बिहार में सूबेदारी के दौरान मानपुर नगर बसाता हैं।

बंगाल बंगाल में अकबरनगर नामक शहर बसाता हैं, जिसे वर्तमान में हम राजमहल कहते हैं। 

– पूर्वी बंगाल के राजा केदार को हराकर शिला माता की मूर्ति लेकर आता हैं तथा इसने आमेर में शिला

माता का मंदिर बनवाया। 

दरबारी विद्वान 1. ‘पुण्डरीक विट्ठल’

1. रागमाला 2. राग मंजरी 3. राग चन्द्रोदय 4. नर्तन निर्णय 

– मानसिंह ने आमेर के महलों का निर्माण शुरू करवाया। 

– आमेर में जगत शिरोमणि मंदिर बनवाया, इस मंदिर का निर्माण मानसिंह की रानी कनकावती ने अपने बेटे जगतसिंह की याद में बनवाया। 

– इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की वही मूर्ति लगी हुयी हैं, जिसकी मीरा चित्तौड़ में पूजा किया करती थी। 

– वृदांवन में राधा-गोविन्द का मंदिर बनवाया। 

* मिर्जा राजा जयसिंह (1621-1667 ई.) 

– सबसे अधिक समय तक शासन करने वाला जयपुर का राजा (46 वर्ष) 

– जहांगीर ने इसे दक्षिण में मलिक अम्बर के खिलाफ भेजा था। 

– शाहजहां ने इसे मिर्जा राजा की उपाधि दी व काबुल अभियान पर भेजा। 

– जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह को भी औरंगजेब की तरफ यही लेकर आता हैं। औरंगजेब ने इसे दक्षिण में शिवाजी को नियंत्रित करने के लिए भेजा। 

– 11 जून 1665 – पुरन्दर की संधि- 

शिवाजी V/s जयसिंह 

– मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में हिन्दी के प्रख्यात कवि ‘बिहारी जी’ थे- पुस्तक- बिहारी सतसई – ‘कुलपति मिश्र’ (बिहारी जी के भान्जे) इन्होनें लगभग 52 ग्रन्थों की रचना की थी, जिनसे हमे जयसिंह के दक्षिण अभियानों की जानकारी मिलती हैं। 

– जयपुर में जयगढ़ किले का निर्माण करवाया। 

* सवाई जयसिंह (1700-1743 ई.) 

– सर्वाधिक सात मुगल बादशाहों के साथ काम किया। 

– औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में हुये उत्तराधिकार संघर्ष में इन्होनें शहजादे आजम का पक्ष लिया था। चूंकि जीत मुअज्जम (बहादुरशाह) की हुयी, जो बादशाह बनते ही उसने सवाई जयसिंह आमेर के राजा पद से हटा दिया। इसके छोटे भाई विजयसिंह को राजा बना दिया। 

– आमेर का नाम बदलकर इस्लामाबाद या मोमिनाबाद रख दिया।

– 1741 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव के साथ धौलपुर समझौता करता हैं। जयसिंह ‘मालवा’ का 3 बार सूबेदार बना। 

– जयसिंह ने अश्वमेध यज्ञ करवाया, इसका पुरोहित ‘पुण्डरीक रत्नाकर’ था। 

– अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को दीपसिंह कुम्भाणी ने पकड़ लिया व अपने 25 आदमियों के साथ लड़ता हुआ

मारा गया। 

– सवाई जयसिंह के निर्माण कार्य

– 1. 18 नवम्बर 1727 ई.- जयपुर की स्थापना- वास्तुकार- विद्याधर भट्टाचार्य (पुर्तगाली ज्योतिषी जेवियर .

डि सिल्वा की मदद ली गई।) 

2. नाहरगढ़ (सुदर्शनगढ़) 

3. जलमहल (मानसागर झील) 

4. सिटी पैलेस (चन्द्र महल) 

5. गोविन्ददेव जी का मंदिर (गौड़िय सम्प्रदाय का प्रमुख मंदिर) – जयपुर के शासक खुद को गोविन्द देव जी का दिवान मानते थे। 

6. जन्तर-मन्तर (वैधशाला)- (1) दिल्ली- सबसे पहले (2) जयपुर – सबसे बड़ा- राजस्थान की पहली इमारत जिसे युनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया। (3) मथुरा (4) उज्जैन (5) बनारस। 

– सवाई जयसिंह के दरबारी विद्वान :- (1) पुण्डरीक रत्नाकर- जयसिंह कल्पद्रुम (2) पण्डित जगन्नाथ

युक्लिड ज्यामिति का संस्कृत अनुवाद किया, सिद्धान्त सम्राट तथा सिद्धान्त कौस्तुभ नामक पुस्तकें लिखी। 

– सवाई जयसिंह ने स्वयं ‘जयसिंह कारिका’ नामक ग्रन्थ लिखा। 

– नक्षत्रों की शुद्ध सारणी ‘जीज मुहम्मद शाही’ तैयार करवाई। 

– सवाई जयसिंह ने सती प्रथा पर रोक लगाने की कोशिश की।

ईश्वरीसिंह 1743-1750 ई. तक। 

– राजमहल का युद्ध (1747ई.):

– (बनास नदी के पास) (टोंक).

ईश्वरीसिंह V/s माधोसिंह – (सूरजमल – भरतपुर महाराजा)

(जगतसिंह द्वितीय – मेवाड़) (बूंदी नरेश – उम्मदेसिंह) (कोटा राजा – दुरजनसाल)

(मराठे) – इस युद्ध में ईश्वरीसिंह जीतता हैं। इस जीत के उपलक्ष्य में ईसरलाट (सरगासूली) का निर्माण करवाता हैं। 

– बगरू का युद्ध(1748ई):

– ईश्वरीसिंह V/s माधोसिंह – इस युद्ध में ईश्वरीसिंह हार जाता हैं, उसे मराठों को युद्ध हर्जाना व माधोसिंह को पांच परगने देने पड़े। 

– मराठों द्वारा युद्ध हर्जाने के लिए तंग करने पर ईश्वरीसिंह ने आत्महत्या कर ली।

* माधोसिंह 

– 1751 ई. में मराठों (5000) का कत्ले आम करवाया जयपुर में। 

– काकोड का युद्ध (टोंक) (1759ई.) 

– माधोसिंह ने इस युद्ध में मराठों को हराया। 

– भटवाड़ा का युद्ध (कोटा) (1761ई.) 

– माधोसिंह V/s शत्रुशाल (कोटा) 

– रणथम्भौर पर अधिकार के लिए प्रश्न पर। 

– इस युद्ध में माधोसिंह की हार होती हैं। 

– कोटा का सेनापति जालिमसिंह झाला था। 

– 1763 ई. में माधोसिंह ने सवाई माधोपुर की स्थापना की। 

– मोतीडूंगरी के महल बनवाए। 

– चाकसू में शीतला माता का मंदिर बनवाया।

प्रतासिंह (1778-1803 ई.) 

– 1. तुंगा का युद्ध (1787 ई.) 

– जयपुर के प्रतापसिंह व जोधपुर का विजयसिंह, दोनों मिलकर मराठों के महादजी सिन्धिया को हराते हैं। 

 – 2. पाटन का युद्ध (1790) 

– इस युद्ध में मराठों ने प्रतापसिंह को पराजित किया। इस युद्ध में मराठा सेनापति, एक फ्रांसीसी ‘डी-बोय’ था। 

– 3. मालपुरा का युद्ध 1800ई.। 

– इस युद्ध में मराठों ने जयपुर के प्रतापसिंह व जोधपुर के भीमसिंह की सयुंक्त सेना को हराया। 

– प्रतापसिंह एक अच्छा लेखक था, ‘बृजनिधि’ नाम से कविताएं लिखा करता था। 

– प्रतापसिंह ने एक संगीत सम्मेलन बुलवाया। जिसकी अध्यक्षता देवर्षि बृजपाल भट्ट ने की थी, जिसमें ‘राधा गोविन्द संगीत सार’ ग्रंथ लिखा गया। 

– प्रतापसिंह के संगीत गुरू का नाम चांदखां था, प्रतापसिंह ने इसे ‘बुद्ध प्रकाश’ नामक उपाधि थी। 

– चांद खां ने ‘स्वर सागर’ ग्रन्थ की रचना की। 

– प्रतापसिंह के दरबार में 22 विद्वान रहते थे, जिन्हें गन्धर्व बाईसी या प्रताप बाईसी कहते थे। प्रतापसिंह ने विद्वानों के लिए ‘गुणीजन खाना’ की स्थापना की। प्रतापसिंह ने ‘हवामहल’ का निर्माण करवाया, यह एक पांच मंजिला इमारत हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट के समान हैं। इसमें 953 झरोखे हैं।

– पांच मंजिल

 – 1. शरदमंदिर 

2. रत्न मंदिर 

3. विचित्र मंदिर 

4. प्रकाश मंदिर

 5. हवा मंदिर – हवा महल का वास्तुकार – लालचन्द

जगतसिंह (1803-1818 ई. तक) 

– 1818ई. में अग्रेजो के साथ संधि करता हैं। 

– जगतसिंह की प्रेमिका का नाम ‘रस कपूर’ था। यह शासन कार्यो में हस्तक्षेप करती थी।

रामसिंह (1833-1880 ई. तक) 

– ‘जॉन लुडलो’ को रामसिंह का संरक्षक व जयपुर का प्रशासक बनाया गया। 

– जॉन लुडलों ने 1844 ई. में समाधि प्रथा व कन्या वध पर रोक लगायी। 

– 1845 ई. सत्ती प्रथा पर रोक लगायी 

– 1847 ई. मानव व्यापार पर रोक लगायी। 

– रामसिंह ने जयपुर में गुलाबी रंग करवाया था। 

– ‘प्रिंस अल्बर्ट’ के जयपुर आगमन पर 1876 ई. में अल्बर्ट हॉल की नींव रखी गयी, इसका वास्तुकार ‘स्टीवन जैकब’ था। इसी समय रामनिवास बाग बनवाया गया। कला के विकास के लिए 1857 ई. में ‘मदरसा – ए – हुनरी’ की स्थापना की। कालान्तर में इसका नाम बदलकर Rajasthan School of Arts and Crafts कर दिया गया। 

– 1866 ई. में ‘क्रान्तिचन्द मुखर्जी’ ने एक महिला विद्यालय खोला, यह किसी भी रियासत में महिला शिक्षा का पहला कदम था। यहां बालिकाओं को सिलाई सिखाई जाती थी। 

– महाराजा कॉलेज व संस्कृत कॉलेज की स्थापना की।

माधोसिंह द्वितीय 

– इसे बब्बरशेर कहते हैं। 

– मनमोहन मालवीय को B.H.U. के लिए 5 लाख रूपये दिये थे। 

– नाहरगढ़ में अपनी नौ दासियों के लिए एक जैसे 9 महल बनवाये। 

– 1904 ई. में सबसे पहले ‘डाक टिकट व पोस्टकार्ड व्यवस्था’ लागू की जो रियासतों में किया गया पहला प्रयास था। 

– सिटी पैलेस में मुबारक महल बनवाया।

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