संसद :- राज्य सभा, लोकसभा ( Parliament :- Rajya Sabha, Lok Sabha)

संघीय विधान मंडल भारत में केन्द्रीय विधायिका के दो सदन हैं 1. राज्य सभा और 2. लोकसभा 

राज्यसभा को द्वितीय और उच्च सदन कहते हैं, जबकि लोकसभा प्रथम और निम्न सदन है।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति भी केन्द्रीय विधायिका का अंग होता है। 

Parliament = Rajya Sabha + Lok Sabha + President

राज्यसभा

संसद : राज्यसभा

राज्यस्थानों की संख्या
1.आंध्र प्रदेश18
2. तमिलनाडु18
3. मध्य प्रदेश11
4. छत्तीसगढ़5
5. पश्चिम बंगाल16
6. उड़ीसा10
7. राजस्थान10
8. असम7
9. बिहार16
10. झारखण्ड6
11. गोवा1
12. गुजरात11
13. हरियाणा5
14. केरल9
15. महाराष्ट्र19
16. कर्नाटक12
17. पंजाब7
18. उत्तर प्रदेश31
19. उत्तराखण्ड3
20. जम्मू और कश्मीर4
21. नागालैण्ड1
22. हिमांचल प्रदेश3
23. मणिपुर1
24. त्रिपुरा1
25. मेघालय1
26. सिक्किम1
27. मिजोरम1
28. अरुणाचल प्रदेश1
29. पांडीचेरी1
30. संघ शासित प्रदेश दिल्ली में3
  • राज्यसभा संसद का उच्च सदन है। धनिको की सभा। 
  • संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 (238 निर्वाचित + 12 मनोनीत) हो सकती है परन्तु वर्तमान में यह संख्या 245 (233+12) है। 
  • इनमें 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामजद किए जाते हैं। ये ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो। शेष सदस्य जनता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से MLA द्वारा निर्वाचित होते हैं। इनके चुनाव विभिन्न राज्यों और संघ क्षेत्रों की
  • विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

सदस्यों की योग्यताएं :

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसकी आयु 30 वर्ष से कम न हो।
  • वह किसी लाभ के पद पर न हो, विकृत मस्तिष्क का या दिवालिया न हो। 
  • ऐसी अन्य योग्यताएँ रखता हो जो संसद के किसी कानून द्वारा निश्चित की जाएं। 
  • राज्य सभा का उम्मीदवार होने के लिए उस राज्य में संसदीय क्षेत्र का मतदाता होना आवश्यक है जिस राज्य से वह चुनाव लड़ रहा हो। 

कार्यकाल :

  • राज्यसभा एक स्थायी सदन हैं यह कभी भंग नहीं होता बल्कि इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो वर्ष बाद अवकाश ग्रहण कर लेते हैं और इनके स्थान पर नए सदस्यों का चुनाव हो जाता है। इस प्रकार राज्यसभा के प्रत्येक
  • सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।

पदाधिकारी :

भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है तथा राज्यसभा अपने में से किसी एक सदस्य को उपसभापति निर्वाचित करती है। सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति सभापति के कर्तव्यों का पालन करता है।

 उपसभापति को राज्य सभा के सदस्यों द्वारा अपने कुल बहुमत से प्रस्ताव पारित कर हटाया जा सकता है। 

राज्यसभा के कार्य तथा शक्तियाँ : 

  • संविधान संशोधन की शक्ति 
  • राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। 
  • राज्यसभा के सदस्य लोकसभा के सदस्यों के साथ मिलकर उपराष्ट्रपति का चुनाव करते हैं।
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिलकर राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तथा न्य कुछ पदाधिकारियों पर महाभियोग लगा सकती है। 
  • राज्यसभा लोकसभा के साथ मिलकर बहुमत से प्रस्ताव पास कर उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटा सकती है। 
  • एक माह से अधिक अवधि तक यदि आपातकाल लागू रखना हो तो उस प्रस्ताव का अनुमोदन लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों से पारित होना आवश्यक है। 
  • राज्य सूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाने का अधिकार- संविधान के अनुच्छेद 249 के अनुसार यदि राज्यसभा उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत स यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि संसद राज्य सूची में वर्णित किसी विषय के सम्बन्ध में कानून बनाये, तो संसद को उस विषय के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है। इस प्रकार बनाया गया कानून केवल एक वर्ष तक प्रवर्तन में रहता है परन्तु राज्यसभा पुनः संकल्प पारित करके एक वर्ष के समय को और एक वर्ष तक के लिए बढ़ा सकती है तथा बार बार संकल्प पारित करके इस अवधि को असीमित कर सकती है। राज्यसभा ने इस अधिकार का अब तक दो बार प्रयोग किया है
  • (क) 1952 में 1952 में राज्यसभा ने संकल्प पारित करके संसद को व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, वस्तुओं की उपलब्धि तथा वितरण के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार दिया था। 
  • (ख) 1986 में 1986 में राज्यसभा ने संकल्प पारित करके संसद को अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के साथ सुरक्षा क्षे की व्यवस्था करने के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार दिया था। 
  • अखिल भारतीय सेवाओं की व्यवस्था- संविधान के अनुच्छेद 312(1) के अधीन यह प्रावधान किया गया है कि राज्यसभा अपने उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुत से यह संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है संसद संघ और राज्यसभा के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन करे तो संसद को ऐसा अधिकार मिल जाता है। इस शक्ति का प्रयोग करके राज्यसभा ने निम्नलिखित अखिल भारतीय सेवा का सुजन किया है
  • (क) 1961 में- भारतीय इन्जीनियर्स सेवा, भारतीय वन सेवा, भारतीय चिकित्सा सेवा 
  • (ख) 1965 में भारतीय कृषि सेवा तथा भारतीय शिक्षा सेवा ।

लोकसभा

लोकसभा सिटी

राज्यस्थानअनुसूचित जाति के लिए आरक्षित स्थानअनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित स्थान
1. आन्ध्र प्रदेश4262
2. अरुणाचल प्रदेश 2
3 असम1412
4. बिहार 4062
5. झारखण्ड1415
6. गोवा2
7. गुजरात 2624
8. हरियाणा 102
9. हिमांचल प्रदेश41
10. जम्मू-कश्मीर6
11. कर्नाटक 284
12. केरल202
13. मध्य प्रदेश 2946
14. छत्तीसगढ़1114
15. महाराष्ट्र4834
16. मणिपुर21
17. मेघालय 2
18. मिजोरम 11
19. नागालैण्ड1
20. उड़ीसा2135
21. पंजाब133
22. राजस्थान2543
23. सिक्किम1
24. तमिलनाडु 397
25. त्रिपुरा 21
26. उत्तर प्रदेश 8017
27. उत्तराखण्ड 51
28. पश्चिमी बंगाल4282

संघ राज्य क्षेत्र

1. अंडमान तथा निकोबार 1
2. चंडीगढ़11
3. दादरा और नागर हवेली1
4. दिल्ली71
5. दमन और दीव1
6. लक्षद्वीप11
7 पाण्डिचेरी1

संघीय संसद का निम्न अथवा लोकप्रिय सदन है। 

  • लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या (530 + 20 + 2) = 552 हो सकती है। वर्तमान में इसकी व्यावहारिक सदस्य संख्या (530 + 13 + 2) = 545 है। 
  • 91वाँ संशोधन (2003)- कैबिनेट का आकार 15% होगा (सदन का)। 1/3 सदस्य से कम यदि दल-बदल करेंगे तो सदस्यता समाप्त होगी। 
  • 12 से कम नहीं होगी। 84वाँ संशोधन (2000)- लोकसभा क्षेत्रों का आबंटन 2026 तक यथावत रहेगा। 

निर्वाचकों की योग्यताएं :

लोकसभा के चुनाव में उन सभी सदस्यों को मतदान का अधिकार होगा जो भारत के नागरिक हैं, (61वें संविधान संशोधन 1989 के अनुसार) जिनकी आयु 18 वर्ष (इससे पहले यह आयु 21 वर्ष थी) या अधिक है, जो पागल या दिवालिया नहीं है और जिन्हें संसद के कानून द्वारा किसी अपराध, भ्रष्टाचार या गैर-कानूनी व्यवहार के कारा मतदान से वंचित नहीं कर दिया गया है। 

संसद के विपक्षी दल- संसदीय लोकतन्त्र में विपक्ष का विशिष्ट महत्व है। यह सरकार की जन विरोधी नीतियों की आलोचना कर वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करता है तथास जनतंत्र को सुरक्षित रखता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पहले से ही भारत में कई दल थे, जो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सत्ताधारी दल (कांग्रेस) तथा विपक्षी दल (अन्य दल) के रूप में विभाजित हो गये। प्रथम आम चुनाव (1952) के पहले कुछ नये दलों का गठन हुआ, जिनमें से कुछ तो कांग्रेस से ही अलग होकर गठित किये गये थे और नये दल के रूप में जनसंघ अस्तित्व में आया था। लेकिन चुनाव में विपक्षी दल नगण्य ही रहे और 1969 के पहले किसी भी नेता को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता नहीं मिली। यहां यह उल्लेखनीय है कि विपक्ष के नेता के रूप में उस दल के नेता को मान्यता मिलती है, जिस दल की सदस्य संख्या सदन के कुल सदस्यों के दसवें भाग के बराबर होती है। सबसे पहले 1969 में संगठन कांग्रेस के राम सुीग सिंह को लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता मिली और इसके बाद 1977 में कांग्रेस के यशवंत राव बलवन्त राव चव्हाण को लोकसभा में तथा कमलापति त्रिपाठी को राज्यसभा में विपक्ष नेता के रूप में मान्यता दी गयी। इसके बाद कांग्रेस का विभाजन हुआ, फलस्वरूप सी. एम. स्टीफन विपक्ष के नेता के रूप में लोकसभा में प्रतिस्थापित किये गये। 1979 में जब चरण सिंह को कांग्रेस (आई.) ने अपना समर्थन देकर प्रधानमंत्री पद पर आसीन करवाया, तब लोकसभा में जगजीवन राम विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त किये। 1980 के चुनाव तथा 1984 के चुनाव में किसी भी विरोधी राजनीतिक दल को इतना सीन प्राप्त नहीं हुआ कि उसके नेता को विपक्ष का नेता माना जाय। 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी तथा बाद में लालकृष्ण आडवानी विपक्ष के नेता बने ।

1991 के आम चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी के लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त किये हुए हैं। 

राज्यसभा में अब तक जिन नेताओं को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गयी है, वे हैं- 1. कमला पति त्रिपाठी (कांग्रेस), 2. पी. शिवशंकर (कांग्रेस), 3. एस. जयपाल रेड्डी (जनता दल) तथा 4. सिकन्दर बख्त (भारतीय जनता पार्टी) 

सदस्यों की योग्यताएँ

  • वह व्यक्ति भारत का नागरिक हो। 
  • उसकी आयु 25 वर्ष या इससे अधिक हो। 
  • भारत सरकार अथवा किसी राज्य सरकार के अन्तर्गत वह कोई लाभ का पद धारण न किए हुए हों। 
  • वह किसी न्यायालय द्वारा दिवालिया न ठहराया गया हो तथा पागल न हो। 
  • वह संसद द्वारा बनाए गए किसी
  • कानून द्वारा अयोग्य न ठहराया गया हो।
  • संसद के कानून द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताएँ हों। 

कार्यकाल:

  • लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष है किन्त प्रधानमन्त्री के परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा लोकसभा को समय से पूर्व भी भंग किया जा सकता है।
  • संकटकाल की घोषणा लागू होने पर संसद विधि द्वारा लोकसभा के कार्यकाल में वृद्धि कर सकती है जो एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं होगी। 
  • यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों के लिए चुना जाता है और दोनों सदनों में से किसी में अपना स्थान ग्रहण नहीं किया है, तो वह अपने चुने जाने की तिथि से 10 दिन के अन्दर आयोग के सचिव को लिखित सूचना देगा कि वह किस सदन का सदस्य बना रहना चाहता है। जिस सदन का वह सदस्य बना रहना चाहता है, उसके अतिरिक्त दूसरे सदन का उसका स्थान रिक्त हो जाएगा। यदि व्यक्ति चुनाव आयोग के सचिव को ऐसी सूचना नहीं देता, तो उसका राज्यसभा का स्थान स्वतः 10 दिन बाद समाप्त हो जाएगा। 
  • यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों में से किसी में या राज्य के विधानमण्डल में से किसी के लिए एक स्थान से अधिक स्थान के लिए निर्वाचित हो जाता है, तो उसे एक स्थान को छोड़कर अन्य स्थानों से 14 दिन के अन्तर्गत त्यागपत्र दे देना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसके सभी स्थान स्वतः रिक्त हो जायेंगे। 

अधिवेशन :

लोकसभा और राज्यसभा के अधिवेशन राष्ट्रपति के द्वारा ही बुलाए और स्थगित किए जाते हैं। इस सम्बन्ध में नियम केवल यह है कि लोकसभा की दो बैठकों में 6 माह से अधिक का अन्तर नहीं होना चाहिए। 

संसद के सदनों में गणपूर्ति- संसद के सदनों को कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिए गणपूर्ति आवश्यक है। गणपूर्ति के लिए सदन के कुल सदस्यों के दसवें भाग का सदन में उपस्थित रहना आवश्यक है। यदि किसी समय संसद के किसी सदन की गणपूर्ति नहीं होती, तो अध्यक्ष या सभापति तग तक के लिए सदन की कार्यवाही को स्थगित कर सकता है, जब तक सदन की गणपूर्ति न हो जाये। 

कुल वैध मतों का 1/6 मत जमानत बचाने के लिए पाना अनिवार्य है।

पदाधिकारी

  • लोकसभा स्वयं ही अपने सदस्यों से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का निर्वाचन करेगी। इनका कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल तक अर्थात् समय से पूर्व भंग न होने की स्थिति में 5 वर्ष होता है परन्तु इस अवधि के अन्दर अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष स्वेच्छा से अपने पदों से त्यागपत्र दे सकते हैं तथा उन्हें उनके पद से हटाया भी जा सकता है। 
  • अब तक विधेयक को पारित करने के सम्बन्ध में संसद की संयुक्त बैठक में तीन बार विधेयक, यथा दहेज प्रतिषेध विशेयक 1961, बैंककारी सेवक आयोग (निरसन) विधेयक, 1978 तथा 2002 ई. में पोटा (POTA) पारित किये गये है
  • धन विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति से लोकसभा में पेश किया जाता है। लोकसभा द्वारा पारित किये जाने के बाद धन विधेयक को राज्यसभा में भेजा जाता है। जब राज्यसभा को विधेयक भेजा जाता है, तब उसके साथ लोकसभाध्यक्ष का यह प्रमाणपत्र संलग्न होता है कि वह विधेयक धन विधेयक ही है। लोकसभाध्यक्ष को ही यह निर्णीत करने की शक्ति है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं राज्यसभा को धन विधेयक के सम्बन्ध में बहुत कम अधिकार हैं। राज्यसभा, लोकसभा द्वारा पारित धन विधेयक में संशोधन नहीं कर सकती लेकिन उसके सम्बन्ध में अपनी सिफारिश दे सकती है। यह लोकसभा पर निर्भर करता है कि वह राज्यसभा की सिफारिश को स्वीकार करे या न करे। यदि लोकसभा, राज्यसभा की किसी सिफारिश को स्वीकार करती है या अस्वीकार करती है, तो दोनों स्थिति में विधेयक को पारित किया गया माना जाएगा। उसके अतिरिक्त राज्यसभा धन विधेयक को अपने यहां 14 दिन से अधिक नहीं रोक सकती। यदि राज्यसभा धन विधेयक को 14 दिन से अधिक रोकती है, तो विधेयक को उस रूप में पारित माना जाएगा, जिस रूप में लोकसभा ने पारित किया था। 

विनियोग विधेयक- संसद विनियोग विधेयक पारित करके भारत सरकार को भारत की संचित निधि से धन निकालने की अनुमति देती है। इस विधेयक को केवल लोकसभा में ही पेश किया जाता है। इस विधेयक पर विचार-विमर्श केवल उन्हीं मदों तक सीमित होता है, जिन्हें अनुदानों और आगणनों के विचार-विमर्श में शामिल न किया गया हो। विनियोग विधेयक के पूर्व लोकसभा ने जिन अनुदानों को स्वीकार कर लिया हो। उन पर न तो कोई-संशोधन पेश किया जा सकता है औन न ही अनुदान के लक्ष्य को बदला जा सकता है तथा न ही उस धनराशि में परिवर्तन किया जा सकता है, जिसकी अदायगी भारत की संचित निधि से की जानी होगी। लोकसभा द्वारा विधेयक को पारित किये जाने पर इसे राज्यसभा को भेजा जाता है। राज्यसभा विनियोग विधेयक को अपने यहां 14 दिनों से अधिक रोक नहीं सकती और न ही उसमें कोई संशोधन कर सकती है लेकिन सिफारिश कर सकती है, किन्तु यह लोकसभा पर निर्भर करता है कि वह राज्यसभा की सिफारिश को स्वीकार करे या न करे। इसके बाद विधेयक को पारित मान करके राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा जाता है। 

कार्यकारी अध्यक्ष (Protem Speaker)– शपथ हेतु वरिष्ठ सदस्य। 

प्रथम लोकसभाध्यक्ष – गणेश वासुदेव मावलंकर (1952-56)

लोकसभा की शक्तियाँ व कार्य 

संविधान संशोधन सम्बन्धी शक्ति।

  • लोकसभा तथा राज्यसभा मिलकर राष्ट्रपति तथा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पास कर सकती है। 
  • राज्यसभा द्वारा पारित उपराष्ट्रपति को पदच्युति के प्रस्ताव पर लोकसभा का अनुमोदन आवश्यक है। 
  • राष्ट्रपति द्वारा की गई संकटकाल की घोषणा को एक | माह के अन्दर संसद से स्वीकृत होना आवश्यक है।

संसदीय प्रस्ताव

  • ध्यानाकर्षण प्रस्ताव : अध्यक्ष की अनुमति से जब कोई संसद सदस्य किसी मन्त्री का ध्यान सार्वजनिक हित की दृष्टि से अत्यावश्यक विषय की ओर आकर्षित करता है तो उसे ध्यानाकर्षण प्रस्ताव कहते हैं।
  • विशेषाधिकार प्रस्ताव : यदि किसी मंत्री ने तथ्यों को छिपाकर या गलत जानकारी देकर संसद सदस्यों के विशेषाधिकार का हनन किया है तो संसद सदस्य मंत्री के विरुद्ध विशेषाधिकार प्रस्ताव’ रख सकते हैं।
  • कार्य स्थगन प्रस्ताव : जब कोई विशेष घटना घटित हो या देश में कोई विशेष स्थिति उत्पन्न हो जाए तो संसद सदस्य प्रस्ताव कर सकता है कि सदन की वर्तमान कार्यवाही को स्थगित कर इस विशेष घटना, स्थिति या प्रश्नपर विचार किया जाना चाहिए। इसे ही कार्य स्थगन प्रस्ताव कहते हैं।
  • कटौती प्रस्ताव : बजट की माँगों में कटौती हेतु रखे गए प्रस्ताव को ‘कटौती प्रस्ताव’ कहते हैं। इस प्रस्ताव को विचार के लिए स्वीकृति देना अध्यक्ष के स्वविवेक पर निर्भर करता है।
  • निन्दा प्रस्ताव : शासन या किसी विशेष मंत्री द्वारा अपनायी गई नीति या उसके कार्यों की आलोचना करने के लिए ‘निन्दा प्रस्ताव’ लाया जाता है।
  • अविश्वास प्रस्ताव : अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में विपक्षी दल या दलों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि लोकसभा के कम-से-कम 50 सदस्य प्रस्ताव का समर्थन करते हैं तो अध्यक्ष उसे विचार हेतु स्वीकार करते हैं। यदि लोकसभा अपने बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे तो मन्त्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना होता है।

संसद के सत्र, स्थगन, सत्रावसान तथा विघटन

संविधान के अनुच्छेद-85 के अधीन राष्ट्रपति को समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को आहूत करने, उसका सत्रावसान करने और लोकसभा का विघटन करने की शक्ति है। 

संसद के सत्र : राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के प्रत्येक सदन को अधिवेशन के लिए आहूत करता है लेकिन एक सत्र की अंतिम बैठक और उसके बाद के सत्र की पहली बैठक के बीच 6 महीनों से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए। इस प्रकार, एक वर्ष में दो बार संसद का अधिवेशन बुलाया जाना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर संसद का अधिवेशन बुलाता है।

सामान्यतया वर्ष में तीन सत्र होते हैं

1. बजट सत्र (फरवरी-मई) 

2. वर्षाकालीन सत्र (जुलाई-सितंबर) 

3. शीतकालीन सत्र (नवम्बर-दिसम्बर) 

संसद का सत्रावसान : सदन का सत्रावसान राष्ट्रपति करता है। संसद के किसी विशेष सत्र को समाप्त करना ही सत्रावसान कहलाता है। उल्लेखनीय है कि सदन के सत्रावसान के परिणामस्वरूप उसमें लम्बित विधेयक के कार्य समाप्त नहीं होते हैं। 

संसद का विघटन : विघटन सदन की कालावधि को ही समाप्त कर देता है। इसके बाद नये लोकसभा के गठन के लिए निर्वाचनहोना आवश्यक हो जाता है। सामान्यतः राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह से ही विघटन करता है। ध्यान रहे कि राज्यसभा एक स्थायी सदन है इसलिए उसका विघटन नहीं हो सकता। 

लोकसभा के विघटन का प्रभाव : जब लोकसभा का विघटन हो जाता है तो- लोकसभा में लम्बित सभी विधेयक समाप्त हो जाते हैं।

राज्यसभा में लम्बित विधेयक, जिसको लोकसभा ने पारित नहीं किया है, समाप्त हो जाते हैं। राज्यसभा में लम्बित विधेयक, जिसे लोकसभा ने पारित कर दिया है, समाप्त नहीं होंगे, यदि राष्ट्रपति यह घोषणा कर दे कि इस विधेयक के संबंध में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक होगी।

संसद में सामान्य प्रक्रिया

प्रश्नकाल : आमतौर पर प्रतिदिन सदन की कार्यवाही का | प्रथम घण्टा (11 से 12 बजे) प्रश्नकाल होता है। इस काल में प्रश्नों के माध्यम से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सभी बातों के सम्बन्ध में सूचना प्राप्तकी जा सकती है।

  • प्रश्न तीन प्रकार के होते हैं
  • (1) तारांकित प्रश्न द्वारा सदस्य सदन में मौखिक उत्तर चाहता है। 
  • (2) अतारांकित प्रश्न की स्थिति में सम्बद्ध मंत्री द्वारा सदन के पटल पर लिखित उत्तर रखा जाता है। 
  • (3) अल्प सूचना प्रश्न का सम्बन्ध लोक महत्व के किसी तात्कालिक मामले से होता है जो किसी प्रश्न के लिए निर्धारित समय की सूचना के बजाय कम समय की सूचना पर पूछा जा सकता है। 

  • शून्यकाल : सामान्यतः प्रश्नकाल के बाद लगभग 1 घण्टे का समय (12 से 1 बजे) ‘शून्यकाल’ के रूप में रखा जाता है। इस समय में विचार के लिए विषय’ पहले से निर्धारित नहीं होता। इस समय में बिना पूर्व सूचना के सदस्य द्वारा सार्वजनिक हित का ऐसा कोई भी प्रश्न उठाया जा सकता है | जिस पर तुरन्त विचार आवश्यक समझा जाए। यह नाम | समाचार-पत्रों द्वारा दिया गया है।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व : अनु. 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी। इसका अभिप्राय यह है कि वह अपने पद पर तब तक बनी रह सकती है जब उसे निम्न सदन अर्थात लोक सभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
  • अविश्वास प्रस्ताव : अविश्वास प्रस्ताव सदन में विपक्षी दल के किसी सदस्य द्वारा रखा जता है। प्रस्ताव पक्ष में कम से कम 50 सदस्यों का होना आवश्यक है तथा प्रस्ताव प्रस्तुत किये जाने के 10 दिन के अन्दर इस पर चर्चा होना भी आवश्यक है। चर्चा के बाद अध्यक्ष मतदान द्वारा घोषणा करता है।

अध्यादेश : राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल संसद अथवा विधान मंडल के सत्रावसान की स्थिति में आवश्यक विषयों से संबंधित अध्यादेश जारी करते हैं। अध्यादेश को 6 सप्ताह से ज्यादा लागू होने के लिये जब संसद या विधान मण्डल फिर से अस्तित्व में आती है तो उसे इसे 6 सप्ताह के भीतर इस अध्यादेश का अनुमोदन करना आवश्यक है।

बैक बेंचर (Back Bencher) : सदन में आगे के स्थान प्रायः मंत्रियों, संसदीय सचिवों तथा विरोधी दल, के नेताओं के लिए आरक्षित रहते हैं। गैर सरकारी सदस्यों के लिए पीछे का स्थान नियत रहता है। पीछे बैठने वालों को ही बैंक बेंचर कहा जाता

न्यायिक पुनर्विलोकन : भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्राप्त है। न्यायिक पुनर्विलोकन के अनुसार न्यायालयों को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि विधान मंडल द्वारा पारित की गयी विधियाँ अथवा कार्यपालिका द्वारा दिये गये आदेश संविधान के विरोध में हैं तो वे उन्हें निरस्त घोषित कर सकते

अनुपूरक अनुदान : यदि विनियोग द्वारा किसी विशेष सेवा पर चालू वर्ष के लिए व्यय किये जाने के लिए प्राधिकृत कोई राशि अपर्याप्त पायी जाती है या वर्ष के बजट में उल्लिखित न की गई किसी नयी सेवा पर खर्च की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है तो राष्ट्रपति एवं अनुपूरक अनुदान संसद के समक्ष पेश करवायेगा। अनुपूरक अनुदान औरविनियोग विधेयक दोनों के लिए एक ही प्रक्रिया विहित की गई है।

लेखानुदान : जैसा की हमें पता है, विनियोग विधेयक के पारित होने के बाद ही संचित निधि से कोई रकम निकाली जा सकती है किन्तु सरकार को इस विधेयक के पारित होने के पहले ही रुपयों की आवश्यकता हो सकती है। इसलिये 116(क) के अन्तर्गत लोक सभा लेखा अनुदान (Vote on account) पारित कर सरकार के लिए अग्रिम राशि मंजूर कर सकती है।

अधिक अनुदान : जब किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष और उस सेवा के लिए अनुदान की गयी रकम से कोई धन व्यय हो गया हे तो राष्ट्रपति लोकसभा में अधिक अनुदान की मांग रखता है।

गणपूर्ति (Chuorum) : सदन में किसी बैठक के लिए गणपूर्ति अध्यक्ष सहित कुल सदस्य संख्या का दसवां भाग होती है बैठक शुरू होने के पूर्व यदि गणपूर्ति नहीं है तो गणपूर्ति घंटी बजायी जाती है। अध्यक्ष तभी पीठासीन होता है जब गणपूर्ती हो जाती है।प्रश्नकाल : दोनों सदनों में प्रत्येक बैठक के प्रारम्भ के एक घण्टे तक प्रश्न किये जाते हैं और उनके उत्तर दिये जाते हैं। इसे प्रश्न काल कहा जाता है। प्रश्न काल के दौरान सदस्यों को सरकार के कार्यों पर आलोचना का समय मिल जाता है। इसके दो लाभ हैं- एक तो सरकार जनता की कठिनाइयों एवं अपेक्षाओं के प्रति सजग रहती है। दूसरे इस दौरान सरकार अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों की जानकारी सदन को देती है।

संसद की समितियाँ 

  • सार्वजनिक लोक लेखा समिति सार्वजनिक लेखा समिति का गठन प्रत्येक वर्ष संसद के प्रथम सत्र में किया जाता है। 
  • इस समिति का मुख्य कार्य देश के वित्तीय मामलों से संबंधित अपव्यय, भ्रष्टाचार,अकुशलता अथवा कार्य संचालन की त्रुटियों की जाँच करना है। 
  • सार्वजनिक लेखा समिति का अध्यक्ष लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है, विपक्षी यदि लोकसभा का उपाध्यक्ष इसका सदस्य होता है, तो वहीं इसका अध्यक्ष होता है। 
  • लोक लेखा समिति : प्राक्कलन समिति की ‘जुड़वा बहन’ के रूप में ज्ञात इस समिति में 22 सदस्य होते हैं, जिनमें से 15 सदस्य लोकसभा के सदस्यों द्वारा तथा 7 सदस्य राज्य सभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। 1967 से स्थापित प्रथा के अनुसार इस समिति के अध्यक्ष के रूप में विपक्ष के किसी सदस्य को नियुक्त किया जाता है।

प्राक्कलन समिति 

  • लोकसभा की प्राक्कलन समिति : इस समिति में लोकसभा के 30 सदस्य होते हैं और इसमें राज्यसभा के सदस्यों को शामिल नहीं किया जाता। यह सबसे बड़ी समिति होती
  • प्राक्कलन समिति एकमात्र लोकसभा की समिति होती है और इसमें राज्य सभा के सदस्य सम्मिलित नहीं होते। 
  • इस समिति के सभापति की नियुक्ति लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है। 
  • यह समिति मितव्ययिता, कार्यकुशलता तथा सांगठनिक सुधार के बारे में अपनी रिपोर्ट देती है। 
  • इस समिति का मुख्य कार्य नियंत्रक महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों तथा सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के लेखा एवं प्रतिवेदनों की समीक्षा करना है। 
  • लेखानुदान : विनियोग विधेयक को पारित करने के पहले जब सरकार को धन की आवश्यकता होती है, तब लोकसभा लेखानुदान के माध्यम से सरकार के व्यय के लिए अग्रिम धनराशि की व्यवस्था करती है।

विशेषाधिकार समिति

  • इस समिति में लोकसभा के 15 सदस्य होते हैं।
  • सदस्यों की नियुक्ति लोकसभाध्यक्ष द्वारा की जाती है। 
  • प्रधानमंत्री तथा वित्तमंत्री भी इस समिति में सम्मिलित किये जाते हैं। 
  • इस समिति का मुख्य कार्य विशेषाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच करना है।

अन्तर्राज्य परिषद 

  • संविधान के अनु. 263 के अन्तर्गत केन्द्र एवं राज्यों के बीच समतय स्थापित करने के लिए राष्ट्रपति एक अन्तर्राज्य परिषद की स्थापना कर सकता है। 
  • पहली बार जून, 1990 ई. में अन्तर्राज्य परिषद की स्थापना की गई जिसकी पहली बैठक 10 अक्टूबर, 1990 ई. को हुयी।
  • इसमें निम्न सदस्य होते हैं- प्रधानमंत्री तथा उनके द्वारा मनोनीत छह कैबिनेट स्तर के मंत्री, सभी राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों के मुख्यमंत्री एवं संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासक।
  • अन्तर्राज्य परिषद की बैठक वर्ष में तीन बार की जायेगी जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री या उसकी अनुपस्थिति में प्रधानंत्री द्वारा नियुक्त कैबिनेट स्तर का मंत्री करता है।

वित्त आयोग 

  • संविधान के अनु. 280 में वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।
  • वित्त आयोग के गठन का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है। 
  • वित्त आयोग में राष्ट्रपति द्वारा एक अध्यक्ष एवं चार अन्य सदस्य नियुक्त यि जाते हैं।
  • नोट : पहला वित्त आयोग 1951 ई. में गठित किया गया था इसके अध्यक्ष के. सी. नियोगी।

लोक सेवा आयोग 

  • भारत में सन् 1919 ई. के भारत सरकार अधिनियम के अधीन सर्वप्रथम 1926 इ. में लोक सेवा आयोग की स्थापना की गयी लोक सेवा आयोग की स्थापनाक लिए 1924 ई. में विधि आयोग ने सिफारिश की थी। 
  • संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या निर्धारित करने की शक्ति राष्ट्रपति को है वर्तमान में इसकी संख्या 10 है।

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