राजस्थान के किसान आंदोलन ( Rajasthan’s peasant movement )

बिजौलिया किसान आंदोलनः 

– बिजौलिया वर्तमान में भीलवाड़ा जिले में स्थित हैं, तत्कालीन मेवाड़ रियातस का (अ) श्रेणी का ठिकाणा था। 

– राणा सांगा ने अशोक पंवार को ऊपरमाल की जागीर दे दी। और इसका मुख्यालय बिजौलिया था।

(खानवा के युद्ध में राणा सांगा की तरफ से अशोक पंवार लड़ता हैं) 

– बिजौलिया में 1897 ई. से किसान आंदोलन शुरू होता हैं। यह आंदोलन ‘धाकड़’ जाति के किसानों द्वारा किया गया।

इस आंदोलन के मुख्य कारण:

– 84 प्रकार की लाग-बाग (कर) – लाटा – कुंता व्यवस्था (खेत में खड़ी फसलों के अनुमान पर)  – चंवरी कर, तलवार बंधाई कर 

– यह आंदोलन मुख्यतः 3 चरणों में विभक्त था। 

– प्रथम चरण – 1897-1914। 

– द्वितीय चरण – 1914-1923। 

– तृतीय चरण – 1923-1941

प्रथम चरण (1897-1914 ई.) 

– गिरधारी पुरा नामक एक गांव में एक मृत्युभोज के अवसर पर किसानों की सभा हुई, साधु सीताराम दास के कहने पर नानजी व ठाकरी पटेल को मेवाड़ महाराणा से मिलने भेजा गया। 

– रियासत की तरफ से हामिद खां को ठिकाने की जांच करने के लिए भेजा गया। 

– नानजी व ठाकरी पटेल को बिजौलिया ठाकुर ने बिजौलिया से निष्कासित कर दिया। 

– पहले चरण में इस आंदोलन में अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी, अतः यह आंदोलन स्वतः स्फूर्त चलता था। 

– स्थानीय नेता- प्रेमचंद भील, ब्रह्मदेव, फतहकरण चारण।

द्वितीय चरण (1914-1923 ई.) – 1906 ई. में पृथ्वीसिंह बिजौलिया का नया जागीरदार बनता हैं। व,जा पर तलवार बंधाई नामक एक नया कर लगा देता हैं।

तलवार बंधाई- यह उत्तराधिकार शुल्क था जो नये सांमत द्वारा राजा को दिया जाता था। मेवाड़ में इसे तलवार बंधाई, कैदखालसा, नजराना तथा मारवाड़ में हुक्मनामा, पेशकशी कहा जाता था। जैसलमेर रियासत में सामंतों से यह कर नहीं लिया जाता था।

– विजयसिंह पथिक व माणिक्यलाल वर्मा दोनों आदोंलन से जुड़ें। 

– 1917 ई. में विजयसिंह पथिक ने ‘ऊपरमाल पंच बोर्ड’ की स्थापना की । मुन्ना पटेल को इसका अध्यक्ष बनाया। 

– मेंवाड़ रियासत ने 1919ई. में ‘बिनदुलाल भट्टाचार्य’ की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। 

– A.G.G. हॉलैण्ड के प्रयासो से किसानों व रियासतों के बीच समझौता हो जाता हैं, तथा किसानों के 35 कर माफ कर दिये गये पर ठिकाने ने इस समझौते को लागू नहीं किया।

तृतीय चरण (1923-1941 ई.) 

– तीसरे चरण मे विजयसिंह पथिक इस आदोंलन से अलग हो जाते हैं। जमनालाल बजाज को नेतृत्व सौंपा गया।

– जमनालाल बजाज ने हरिभाऊ उपाध्याय को आदोंलन के नियुक्त किया। 

– मेवाड़ के प्रधानमंत्री राघवाचारी व राजस्व मंत्री मोहनसिंह मेहता के प्रयासों से किसानों के साथ समझौता हो गया और उनकी (किसानों) मांगे मान ली गयी। 

– इस प्रकार 1941 ई. में यह आंदोलन समाप्त हो गया। इस प्रकार यह सर्वाधिक समय (44 वर्ष) तक चलने वाला यह अहिसंक आंदोलन था। 

– गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर से प्रकाशित अपने समाचार पत्र ‘प्रताप’ में बिजौलिया किसान आंदोलन को प्रमुखता से महत्व देते हैं। 

– माणिक्यलाल वर्मा अपने पंछीड़ा गीत के माध्यम से किसानों में जोश भरते थे। 

बेंगू किसान आंदोलन 

– बेंगू वर्तमान चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित हैं, यह भी मेवाड़ रियासत का (अ) श्रेणी का ठिकाणा था। 

– यहां का ठाकुर ‘अनुपसिंह चूडांवत’ था। यहां के किसान भी विभिन्न लाग-वागों से परेशान थे। किसानों ने इन करों को कम करने की मांग की तो ठिकाणे व किसानों के बीच समझौता हो गया पर रियासत ने इस समझौते को अस्वीकार कर दिया व इसे ‘बोल्शेविक समझौता’ कहा गया। रियासत ने ‘ट्रेन्च’ को मामले की जांच करने के लिए भेजा। 

– किसानों ने ट्रेन्च का बहिष्कार किया। 

– गोविन्दपुरा गांव में सभा कर रहे किसानों पर ट्रेन्च ने 13 जुलाई 1923 को गोली चला दी, रूपा जी व कृपा जी धाकड़ नामक दो किसान शहीद हो गए। 

– 1926 ई. में किसानों की शर्ते मान ली जाती हैं। 

– विजयसिंह पथिक व रामनारायण चौधरी ने आदोंलन का नेतृत्व किया।

बूंदी किसान आदोंलन/ बरड़ किसान आदोंलन

– 1920 ई. में साधु सीताराम दास ने डाबी किसान पचांयत की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष ‘हरला भड़क’ को बनाया गया। 

– 2 अपैल 1923 ई. को सभा कर रहे किसानों पर पुलिस अधिकारी ‘इकराम हुसैन’ ने गोली चला दी। 

– ‘नानक जी भील’ झंडा गीत गाते हुए शदीद हो गए। 

– मुख्य नेता पण्डित नयनूराम शर्मा, भँवरलाल सुनार, नारायणसिंह। 

– इस आदोंलन में मुख्यतः गुर्जर किसानों ने भाग लिया। 

– इस आदोंलन में महिलाओं ने भी भाग लिया था।

नीमचणा किसान आंदोलन (अलवर) 

– 14 मई 1925 ई. को को नीमूचणा में आंदोलन कर रहे किसानों पर कमाण्डर ‘छाजूसिंह’ ने गोली चला दी, ___ कई किसान मारे गये। 

– ‘तरूण राजस्थान’ समाचार पत्र ने इस खबर को सचित्र प्रकाशित किया। 

– महात्मा गांधी ने इसे ‘दोहरी डायरशाही’ की संज्ञा दी। 

– दिल्ली से प्रकाशित रियासत समाचार पत्र ने इस हत्याकांड को जलियावाला से भी अधिक भयानक बताया।

शेखावाटी किसान आदोंलनः – 1931ई.- जाट क्षेत्रीय महासभा का गठन। 

– 1933ई.- महासभा का पहला अधिवेशन पलथाना (सीकर) में हुआ। 

– कूदन हत्याकाण्ड (अप्रैल 1934)- कैप्टन वेब द्वारा की गयी फायरिंग में कई किसान मारे गये। इसकी

चर्चा ब्रिटेन के हाऊस ऑफ कॉमन्स में हुई। 

– कटराथल सम्मेलन (25 अप्रैल 1934)

– सिहोट के सांमत द्वारा महिलाओं से किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में 10,000 से अधिक महिलाओं का सम्मेलन हुआ। इसकी अध्यक्षा किशोरीदेवी तथा मुख्य वक्ता उत्तमादेवी थी। 

– जयसिंहपुरा हत्याकांड (21 जून 1934)- प्रथम हत्याकांड जिसके हत्यारों को सजा सम्भव हो सकी।

भगत आंदोलनः 

– वह आंदोलन मुख्यतः भील जनजाति के किसानों द्वारा किया गया था। 

– सुरजी भगत व गोविन्द गिरी ने इसे शुरू किया था। 

– गोविन्द गिरी ने 1883 ई. में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की। गोविन्द गिरी दयानन्द सरस्वती से प्रभावित थे। अतः उन्होनें आदिवासियों को हिन्दू धर्म के दायरे में रखने के लिए भगतपंथ की स्थापना की।

– 17 नवम्बर 1913 ई. को मानगढ़ की पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर जब भीलों की सभा हो रही थी, तब मेवाड़ भील कोर ने पहाड़ी को घेर लिया व गोली चला दी। 

– 1500 से अधिक भील मारे गये। इसे राजस्थान का जलियावाला हत्याकांड कहा जाता हैं। 

– आज भी उनकी याद में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को मेला लगता हैं। 

– गोविन्द गिरी की फांसी की सजा को 20 वर्ष की कैद में बदला गया था। लेकिन 10 वर्ष बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। अपना शेष जीवन गुजरात के काम्बिया गांव में शांतिपूर्ण तरीके से गुजारा।

एकी आंदोलन – ये भोमट क्षेत्र के भील तथा गरासिया जनजाति लोगों द्वारा किया गया था, इसलिए भोमठ – भील आंदोलन भी कहते हैं। 

– चित्तौड़गढ़ के मातृकुण्डिया नामक स्थान से वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को यह आंदोलन शुरू हुआ था। 

– मातृकुण्डिया को ‘राजस्थान का हरिद्वार’ कहते हैं। 

– इस आंदोलन के मुख्य नेता मोलीलाल तेजावत थे। 

– मोती लाल तेजावत मेवाड़ रियासत के ‘झाड़ोल ठिकाणे’ के कामदार थे। प्रारम्भ में यह आंदोलन झाडोल, कोटडा व गोगुन्दा तहसीलों में शुरू हुआ था। जो बाद में डुंगरपुर, बाँसवाड़ा, ईडर, विजयनगर (गुजरात की एक रियासत) आदि रियासतों में फैल गया। 

– मोतीलाल तेजावत ने मेवाड़ महाराणा के समक्ष 21 सूत्री मांग-पत्र प्रस्तुत किया था, जिसे ‘मेवाड़ की पुकार’ कहते हैं। 

– 7 मार्च 1922 ई. में नीमड़ा (विजयनगर) गांव में हो रही एक सभा पर पुलिस फायरिंग कर दी गयी थी, 

– मोती लाल तेजावत इस आंदोलन के बाद भूमिगत हो गए, पर 1929 में गांधीजी के कहने पर ईडर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 

– ईडर रियासत ने उन्हें मेवाड़ को सौंप दिया, मेवाड़ की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ‘महाइन्द्राज सभा’ ने मोतीलाल तेजावत से रियासत के विरूद्ध कोई गतिविधि नहीं करने का लिखित आश्वासन मांगा। 

– गांधीजी के सहायक मणिलाल कोठारी के हस्तक्षेप से समझौता हुआ। – 1936 ई. में मोतीलाल तेजावत को रिहा कर दिया गया। 

महाइन्द्राज सभा- मेवाड़ का सर्वोच्च न्यायालय जिसकी स्थापना 1880 ई. में महाराणा सज्जनसिंह द्वारा की गई।

( मेवाड़ भील कोर- इसकी स्थापना 1841ई. में की गई। इसका मुख्य केन्द्र खैरवाड़ा (उदयपुर) था। )

मीणा जाति का आंदोलन । 

– 19254 ई. में ‘आपराधिक जाति अधिनियम’ बनाकर मीणा जाति की उसके अन्तर्गत रख दिया गया। 1930 में ‘जयरायम पेशा’ कानून के तहत प्रत्येक मीणा स्त्री-पुरूष को थाने में हाजिरी लगवाना अनिवार्य कर दिया गया। 

– 1933 में मीणा क्षेत्रीय महासभा की स्थापना की गयी। व महासभा ने इस कानून को निरस्त करने की मांग की। 

– 1944 ई. में मुनि मगन सागर के नेतृत्व में सीकर के नीमकायाना में एक मीणा सम्मेलन बुलवाया गया और मीणा समाज को उनके गौरवशाली अतीत से अवगत करवाया गया। 

– मुनि मगनसागर ने मीनपुराण नामक ग्रंथ की रचना की। 

– बंशीधर शर्मा ने 1944 ई. में जयपुर मीणा सुधार समिति की स्थापना की। 

– 28 अक्टूबर 1946 कों बागावास सम्मेलन में सभी चौकीदार मीणाओं ने अपने पदो से इस्तीफे दे दिये तथा इसे मुक्ति दिवस के रूप में मनाया। 

– आजादी के बाद 1952 में जरायम पेशा कानून को रद्द कर दिया गया।

प्रजामण्डल आंदोलन 

– 1927 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना की गयी। (बम्बई में)

 – विजयसिंह पथिक को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया। 

– 1928 ई. में ‘राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद’ का गठन किया गया। 

– 1931 ई. मे अजमेर में इसका पहला अधिवेशन हुआ। अध्यक्ष- रामनारायण चौधरी 

– 1938 ई. के कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में रियासतों (देशी) में चल रहे आंदोलनों को कांग्रेस ने समर्थन

बंदी प्रजामंडल 

संस्थापक- कांतिलाल, ऋषिदत्त मेहता, नित्यानन्द। 

– ऋषिदत्त मेहता ने ‘बूंदी राज्य लोक परिषद’ की स्थापना भी की थी।

– ऋषिदत्त मेहता ने 1923 में ब्यावर से ‘राजस्थान’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला। इसमें हाड़ौती क्षेत्र की खबरें प्रकाशित होती थी।

मारवाड़ प्रजामंडल 

– 1918 ई. में चांदमल सुराणा ने मारवाड हितकारिणी सभा की स्थापना की। 

– 1920 ई. में जयनारायण व्यास ने ‘मारवाड़ सेवा संघ’ की स्थापना की। 1920-21 में मारवाड़ सेवा संघ ने तौल आंदोलन चलाया था। (100 तोले के स्थान पर 80 तोले का एक सेर कर दिया गया।) 

– 1929 ई. में जयनारायण व्यास ने मारवाड़ राज्य लोक परिषद् की स्थापना की। 1931 में इसका अधि वेशन पुष्कर में हुआ इसकी अध्यक्षता चादकरण शारदा ने की। इस अधिकवेशन में काका कालेरकर व कस्तूरबा गांधी आए थे। 

– 10 मई 1931 ई. में जयनारायण व्यास ने Marwar Youth league की स्थापना की। 

– 1932 ई. में जोधपुर में स्वाधीनता दिवस मनाया गया। छगन राज चौपासनी वाला ने तिरंगा झंडा फहराया। 

– 1934 ई. में भवंर लाल सर्राफ ने मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की। 

– 1936 ई. – कृष्णा दिवस (बॉम्बे)

– शिक्षा दिवस (जोधपुर)

– जयनारायण व्यास के जोधपुर प्रवेश पर पाबंदी। 

– 1937 ई. में बीकानेर महाराजा गंगासिंह ने जोधपुर के प्रधानमंत्री डोनाल्ड फील्ड को पत्र लिखकर

जयनारायण व्यास के प्रवेश सम्बन्धी लगी पाबन्दी को हटाने की मांग की। 

– भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 19 जून 1942 को जेल में भूख हड़ताल कर रहे बालमुकुन्द बिस्सा की मृत्यु हो गयी, बालमुकुन्द बिस्सा ने जोधपुर में ‘जवाहर खादी भण्डार’ की स्थापना की।

(बालकृष्ण कौल ने अजमेर में जेलों में कुव्यवस्था के विरूद्ध हड़ताल की थी।)

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयनारायण व्यास सिवाणा किले में नजरबंद किया गया। अन्य नेताओं को जालौर किले में नजरबंद किया गया। 

– जयनारायण व्यास की पुस्तके:- 1. मारवाड़ की अवस्था 2. पोपा बाई की पोल 

– समाचार पत्र 1. अखण्ड भारत 2. आगीबाण 3. पीप

डाबडा कांड:- 13 मार्च 1947

– डीडवाना परगने के डाबडा गांव में एक किसान मोतीलाल के घर पर सभा हो रही थी, पुलिस ने फायरिंग कर दी। 12 लोग मारे गये। 

– मथुरा दास माथुर घायल हो गये।

बीकानेर प्रजामंडल :

– कन्हैयालाल ढुंढ़ व स्वामी गोपालदास ने 1913 में चुरू में ‘सर्वहितकारिणी सभा’ की स्थापना करी। 

– कन्हैयालाल ढुंढ़ ने ‘कन्या विद्यालय’ व कबीर पाठशाला (दलित शिक्षा) खोली। 

– 1930 ई. में चुरू के धर्मस्तूप पर तिरंगा फहरा दिया। 

– महाराजा गगांसिंह जब गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लन्दर गए तब ‘चन्दनमल बहड़ व स्वामी गोपालदास’ ने बीकानेर दिग्-दर्शन नामक पत्रिकाए बंटवायी। इन पर 1932 ई. में बीकानेर षडयंत्र केस चलाया गया।

– 1936 ई. में वैद्य मघाराम ने कलकत्ता में बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना की। 

– 1942 ई. में ‘रघुवर दयाल गोयल’ ने बीकानेर राज्य लोक परिषद की स्थापना की। 

– 26 अक्टूम्बर 1944 को बीकानेर दमन विरोधी दिवस बनाया गया। 

– 1 जुलाई 1946 को रायसिंह नगर में जुलूस निकाल रहे प्रजामंडल के कार्यक्रर्ताओं पर फायरिंग कर दी

गयी। बीरबरसिंह नामक एक युवक मारा गया। 17 जुलाई 1946 को बीकानेर रियासत में बीरबल दिवस मनाया गया। इंदिरा गांधी नहर की जैसलमेर शाखा को ‘बीरबल शाखा’ नाम दिया गया। 

– बीकानेर प्रजामंडल के तहत ही दुधवा-खारा (चूरू), महाजन (बीकानेर), उदासर (बीकानेर) आदि किसान आदोंलन चलाये गये।

धौलपुर प्रजामंडल 

– संस्थापक- कृष्णदत्त पालीवाल (आर्य समाज के नेता श्रद्धानन्द सरस्वती के कहने पर) 

– तसीमो काण्ड – अप्रैल 1947 में प्रजामंडल के सदस्यों पर फायरिंग की गयी। छतरसिंह व पचंमसिंह

शहीद हो गए। 

–  डूगरपुर प्रजामंडल (26 जनवरी 1944) 

– स्थापनाः मोगीलाल पांड्या व हरिदेव जोशी ने की।

मेवाड़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- बलवंतसिंह मेहता (अध्यक्ष), भूरेलाल बया (उपाध्यक्ष) माणिक्य लाल वर्मा (महामन्त्री) 

– मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधियों पर रियासत ने पाबन्दी लगा दी। अतः माणिक्यलाल वर्मा ने अजमेर से

इसका संचालन किया। ‘मेवाड़ का वर्तमान शासन’ नामक पुस्तक माणिक्य लाल वर्मा ने लिखी। 

– 1941 ई में मेवाड़ प्रजामंडल का पहला अधिवेशन उदयपुर में हुआ। 

– माणिक्यलाल वर्मा इसके अध्यक्ष थे। 

– जे. पी. कृपलानी व विजयलक्ष्मी पंडित इसमें भाग लेने के लिए उदयपुर आए। 

– 1946 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का सातवां अधिवेशन उदयपुर में हुआ। ‘जवाहर लाल नेहरू’ व ‘शेख अब्दुल्ला ‘ इसमें भाग लेने के लिए उदयपुर आए। 

– भारत छोड़ो आंदोलन में माणिक्य लाल वर्मा की पत्नी नारायणी देवी वर्मा अपने 6 महीने के पुत्र दीनबन्धु को साथ लेकर जेल गयी। 

– प्यारे लाल बिश्नोई की पत्नी भगवती बिश्नोई भी जेल गयी थी। 

– भीलवाड़ा भी मेवाड़ प्रजामंडल की गतिविधयों का प्रमुख केन्द्र था। 

– भीलवाड़ा के रमेश चन्द्र व्यास मेवाड़ प्रजामंडल के पहले सत्याग्रही थे। 

– नाथद्वारा भी मेवाड़ प्रजामंडल का अन्य केन्द्र था।

शाहपुरा प्रजामंडल

– संस्थापक- लादूराम व्यास व रमेशचन्द्र ओझा। (माणिक्यलाल वर्मा के कहने पर) 

– शाहपुरा पहली रियासत थी, जिसमें पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना की गयी (गोकुल लाल असावा के

नेतृत्व में) 

– शाहपुरा के राजा ‘सुदर्शन देव’ ने प्रजामंडल को अपना समर्थन दिया।

करौली प्रजामंडल 

– संस्थापक- त्रिलोकचन्द माथुर, चिरंजी लाल शर्मा, कुंवर मदनसिंह। 

– कुंवर मदनसिंह ने 1927ई. में किसान आदोंलन चलाया।

अलवर प्रजामंडल 

– इसकी स्थापना हरिनारायण शर्मा ने की, इसके पहले अधिवेशन के अध्यक्ष भवानी शंकर शर्मा थे।

– अलवर प्रजामंडल ने भी भरत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया था। 

– हरिनारायण शर्मा ने वाल्मिकी संघ, आदिवासी संघ व अस्पृश्यता निवारण संघ स्थापित किए।

भरतपुर प्रजामंडल 

– स्थापना- जुगलकिशोर चतुर्वेदी ने रेवाड़ी में इसकी स्थापना की। 

– अध्यक्ष – गोपी लाल यादव – किशनलाल जोशी, मास्टर अदित्येन्द्र – भरतपुर प्रजा परिषद 

– प्रजामण्डल का समाचार पत्र- ‘वैभव’

कोटा प्रजामंडलः 

– संस्थापक- पण्डित नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि। 

– नयनूराम शर्मा ने कोटा राज्य में बेगार विरोधी आंदोलन चलाया।

( नयनूराम शर्मा ने 1934 में हाडौती प्रजामंडल की स्थापना की। )

– कोटा प्रजामंडल का पहला अधिवेशन मांगरोल (बारां) में हुआ था। 

– 1942 ई. नाथूलाल जैन तथा मोती लाल के नेतृत्व में प्रजामंडल के सदस्यों ने कोटा के प्रशासन पर कब्जा

कर लिया था। 

– कॉलेज की छात्राओं ने रामपुरा कोतवाली पर कब्जा कर लिया था।

किशनगढ़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- कांतिलाल चौथानी, जमाल शाह।

सिरोही प्रजामंडल 

– स्थापना- गोकुल भाई भट्ट ने बॉम्बे में की थी। गोकुल भाई भट्ट को राजस्थान का गांधी कहा जाता हैं।

कुशलगढ़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- भंवरलाल निगम।

बांसवाड़ा प्रजामंडलः 

– संस्थापक- भूपेन्द्र नाथ त्रिवेदी, मणिशंकर नागर, धूलजी भाई भावसार। 

– भूपेन्द्र नाथ त्रिवेदी बम्बई से ‘संग्राम’ नामक समाचार पत्र निकालते थे। 

– इस प्रजामंडल में एक महिला मंडल का गठन ‘विजया बहिन भावसार’ ने किया था।

डुगरपुर प्रजामंडल (1 अगस्त 1944) 

– संस्थापकः भोगीलाल पांड्या (वागड़ का गांधी), हरिदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय (समाचार पत्र- सेवक)

रास्तापाल कांड (19 जून 1947) – सेवा संघ द्वारा स्थापित स्कूल को बंद करवाने गये रियासत के सैनिकों ने एक शिक्षक नानाभाई की हत्या कर दी व दूसरे शिक्षक सेगांभाई को गाड़ी के पीछेकर घसीट रहे थे, तब एक कालीबाई नामक एक वीरबालिका ने अपनी हसिया से उन रस्सियों को काट दिया, पर खुद पुलिस की गोलियों की शिकार हो गयी। 

– डुंगरपुर में गेप सागर तालाब के पास कालीबाई तथा नानाभाई की प्रतिमा लगी हुयी हैं। 

– राजस्थान सरकार बालिका शिक्षा के क्षेत्र में कालीबाई के नाम से पुरस्कार देती हैं।

पूनावाडा काण्ड – अध्यापक शिवराम भील के साथ मारपीट।

– इस प्रजामंडल में रियासती अन्यायपूर्ण नीतियों के विरूद्ध जनजागृति हेतु प्रयाण सभाओं का आयोजन किया गया।

जैसलमेर प्रजामंडल 

– जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना मीठालाल व्यास ने जोधपुर में की। 

– प्रजामंडल के सदस्य सागरमल गोपा को जेल में जलाकर हत्या कर दी गयी।

प्रतापगढ़ प्रजामंडल 

– संस्थापक- ठक्कर बापा, अमृतलाल पायक, चुन्नीलाल प्रभाकर।

झालावाड़ प्रजामंडल 

संस्थापक- मांगीलाल भव्य ने की। 

– झालावाड़ में स्वंय राजराणा हरिश्चन्द्र (राजा) के नेतृत्व में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना की गयी।

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